नया डराता है, नया ही बुलाता है, नया मृत्यु है, नया ही जीवन है

श्रोता१: हमें लगता है जैसे हमें सब कुछ पता है कि अभी क्या होने वाला है। मतलब जैसे कहीं जा रहे हैं तो पता है कहाँ जा रहे हैं। मतलब कुछ भी ऐसा नहीं होता कि पता नहीं है कि क्या कर रहे हैं! मतलब उसका परिणाम क्या होगा। एक अच्छी तरह परिभाषित प्रणाली है। सब एक चक्र में घूम रहा है। जैसे मन में एक छवि है कि यहीं जा रहे हैं और यही होगा और अच्छे से पता है कि इसके अलावा और कुछ नहीं होगा। तो वही किए जा रहे हैं। उसी एक प्रणाली में चले जा रहे हैं। और जैसे लोग सीढ़ी पर चढ़ रहे हैं, उतर रहे हैं। ऐसा लग रहा है जैसे सब कुछ एक प्रणाली कि तरह है। कुछ भी अनिश्चितता नहीं है किसी भी चीज़ की। पूरा एक यंत्र की तरह है जो चल रहा है।

आचार्य जी: जैसे अंतरिक्षयान हो कोई और वो अंतरिक्ष में भटक रहा हो। छोटा सा अंतरिक्षयान है। कहाँ को जा रहा है, किधर को, कुछ पता नहीं है। पर अंतरिक्षयान के अंदर हमें पता है चार कदम इधर क्या है और चार कदम उधर क्या है।

श्रोता १: सर, जैसे मेट्रो में जा रहा हूँ मैं, मुझे पता है कि मुझे इस स्टेशन पर उतरना है। मैं कितना भी कोशिश करलूँ, मैं उसी स्टेशन पर उतरुँगा। कुछ भी कर है।

आचार्य जी: ये जो मेट्रो है ये वही अंतरिक्षयान की तरह ही है। अंतरिक्षयान कहाँ को जाएगा, क्या करेगा, अनंतता में क्यों है, क्यों चल रहा है, इसका कोई पता नहीं है। लेकिन अंतरिक्षयान के अंदर-अंदर हम पूरी योजना बना लेते हैं। अंतरिक्षयान है छोटा सा, उसके अंदर-अंदर हमारी पूरी योजना है। समझ रहे है ना? तीन कदम इधर जाना है, फिर एक इधर जाना है, फिर दो इधर जाना है। और अंतरिक्षयान भी कहाँ जा रहा है उसका हमें कुछ पता नहीं है।

समय का पूरा बहाव है तो उसमें अगर आपकी उम्र 30 साल है तो 30 साल के पहले का भी कुछ पता नहीं, 30 के बाद का भी कुछ पता नहीं, 30 का आपको लगता है कि कुछ पता है। अनंत समय में, अनंत अंतरिक्ष में अंतरिक्षयान कहीं को भी जा सकती है, कुछ भी हो सकता है। उसपर हमारा न कोई जानना है, न कोई नियंत्रण है। लेकिन फिर भी अंदर का पूरा नक्शा बना रखा है। पूरी योजना रहती है। और अपने आपको ये दिलासा रहती है कि मुझे अच्छे से पता है की मैं अगला कदम क्यों और किधर को उठा रहा हूँ।

ये आप देख पा रहे हैं? कि छोटा सा अंतरिक्षयान हो जिसमें अंदर एक,  कह लीजिये, एक कार बराबर जगह हो। जितनी एक कार में होती है या उसे थोड़ी ज़्यादा। और जो अंदर वाले हैं, अंदर तीन, चार लोग बैठे हैं, वो पूरे तरीके से आश्वस्त हैं कि ऐसे चलना है, ऐसे रहना है, इधर को जाना है, वहाँ पहुँचना है। और ये सब वो कहाँ कर रहे हैं?

श्रोता १: अंतरिक्षयान के अंदर।

आचार्य जी: अंतरिक्षयान कहाँ जा रहा है?

असल में जान ही नहीं सकते कि अंतरिक्षयान कहाँ जा रहा है क्योंकि पूरे अंतरिक्ष का कोई नक्षा ही नहीं है। इतना बड़ा है कि ज्ञान से बहार की बात है। उसका कोई नक्षा नहीं बन सकता। अब इस चीज़ को स्वीकार करना कि इतना बड़ा है कि मुझे पता ही नहीं हो सकता कि क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है। वो ज़रा डरता है। तुम एक छोटे दायरे में ही चीज़ों को व्यवस्थित करके अपने आपको ये दिलासा देते हैं कि हमें कुछ पता है।

श्रोता २: कोई नई चीज़ ढूँढने की हमेशा कोशिश रहती है, सर। कि कुछ नया हो जाए। अब जैसे, मैंने काम ख़त्म कर दिए थे 7 बजे, तो 9 बजे बस पकड़नी थी लेकिन ये 7 से 9 के बीच में कोई ऐसा विचार नहीं था कि ऐसा होना चाहिए या वैसा होना चाहिए। पूरा दिमाग इस तरफ था कि जब बस में बैठेंगे तब कितना अच्छा होगा कि…

आचार्य जी: नया क्या है?

श्रोता २: वो ये उत्साह ही है।

आचार्य जी: नहीं, नया क्या है? नए की परिभाषा क्या है?

श्रोता २: जो हमने पहले न अनुभव किया हो।

आचार्य जी: पहले अनुभव नहीं किया। जब पहले अनुभव नहीं किया है तो उसको चाह कैसे सकते हो। इस बात को समझना। जो चीज़ तुमने पहले अनुभव ही नहीं करी है, उसका तुम्हें कुछ पता ही नहीं है, तुम कह रहे हो नए की चाहत रहती है। जिसका तुम्हें कुछ पता ही नहीं है उसको तुम चाह कैसे सकते हो?

श्रोता २: नए का अंदाज़ा भी हम अपनी स्मृतियों से ही लगाते हैं।

आचार्य जी: और स्मृति में नया नहीं है। स्मृति में क्या है?

श्रोता २: पुराना।

आचार्य जी: तो तुम नया नहीं चाहते हो। तुम पुराने से ही सम्बंधित कुछ चाहते हो। क्या? जो पुराने जैसे न हो। नया तुम्हें कुछ नहीं चाहिए, तुम्हें सिर्फ पुराने से मुक्ति चाहिए। बात को समझना। नया अगर वास्तव में नया है तो इसका अर्थ क्या हुआ? की तुम्हें उसका कुछ पता ही नहीं है। न नाम पता है, न आकार पता है, कोई कल्पना ही नहीं है। जब नहीं है, न नाम, न आकार, न कल्पना, तो तुमने उसको चाह कैसे लिया? उसका ख्याल कैसे कर लिया? ठीक है ना? तो नया इत्यादि हमें कुछ नहीं चाहिए। हम बस अपने आप से ऊबे हुए हैं, पुराने से ऊबे हुए हैं। पुराना ख़त्म हो जाए इसकी इच्छा करते रहते हैं। भूल ये कर बैठते हो कि पुराना ख़त्म हो तुम इतने पे रुकते नहीं। तुम नए की मांग भी कर डालते हो। और जैसे ही तुम नए की मांग करोगे फिर तुम क्या कर लोगे?

श्रोता: पुराने की।

आचार्य जी: क्योंकि नया का तो तुम्हें कुछ?

श्रोता: पता ही नहीं।

आचार्य जी: पता हो ही नहीं सकता। तो जैसे ही तुमने नए की मांग की, नए का विचार और कल्पना करली, वैसे ही तुमने क्या करा?

श्रोता: पुराने को दोहराया।

आचार्य जी: पुराने को ही वापिस बुला लिया। पुराने को ही दुबारा वापिस बुला लिया। इन दोनों चीज़ों में अंतर समझना। पुराना ख़त्म हो ये वाजिद मांग है, कुछ नया मिले ये ज़रूरी नहीं है। दोनों में बहुत अंतर है। दोनों एक बात नहीं है। हम इतने पर कभी रुकते नहीं ना कि पुराना ख़त्म हो। क्योंकि ये बात फिर डराती है। अब पुराना ख़त्म और नया कुछ आया नहीं तो हम बड़ी फ़ज़ियत हो जाएगी। तो हम एक साथ दोनों बातें कहते हैं। पुराना ख़त्म हो जाए और उसकी जगह कुछ नया आ जाए। और जो नया आ  जाए वो भी हमारी इच्छा मुताबिक़ हो।

तुम्हारी इच्छा किस चीज़ से बनी है?

श्रोता: पुराने से।

आचार्य जी: पुराने से। तो अंततः होता ये है कि पुराना ख़त्म होता भी है तो उसका जो विकल्प बनता है वो पुराने का ही कोई बदला हुआ, परिवर्तित रूप होता है। नया कुछ आने नहीं पाता। नया सिर्फ उनके पास आता है जिनमें ये हिम्मत हो कि वो कहें कि पुराना ख़त्म हो। और इतना कहकर रुक जाएँ। ये कहकर रुकना, वही ‘सूरमा’ का काम है।

वाकई नया उनको मिलता है जो इतने से राज़ी हो कि पुराना ख़त्म हो जाए, नए का आश्वासन न मांगे। पर हम बड़े होशियार लोग हैं। हम कहते हैं पुराना छोड़ने को तैयार हो जाऊँगा अगर तुम ये आश्वासन दे दो कि नया दोगे। अब वो ये आश्वासन देना भी चाहे देनेवाला तो तुम्हें देगा कैसे? क्योंकि अगर वास्तव में वो तुम्हें कुछ नया देना चाहता है, मैं दोहरा रहा हूँ, नए का अर्थ ही क्या है? वो जिसको तुम जानते ही न हो वही नया है। ठीक है न? तो तुम्हें कैसे बताया जाएगा कि आगे मैं तुम्हें कुछ नया दे रहा हूँ, कैसे बताया जाएगा? न भाषा उसको संप्रेषित कर सकती है। न इशारों से जताया जा सकता है। न स्मृति की ओर इंगित किया जा सकता। बताया ही नहीं जा सकता ना? इस बात को समझना। पुराने से सारे उकताये हुए हो?

श्रोता: हाँ।

आचार्य जी: उकताने का अर्थ ही है कि उसे चाहते नहीं। उकताने का ये भी अर्थ है कि जिसे चाहते नहीं वो तुम्हारे न चाहते हुए भी तुमसे चिपका हुआ है। क्यों चिपका हुआ है? क्यों पुराना कभी ख़त्म नहीं होता? क्यों ऊब है ज़िन्दगी में? क्यों नए की चाहत होते हुए भी नया कुछ आने नहीं पाता? हर कोई पुराना ख़त्म करना चाहता है।

ये दुनिया भर की हरकतें करते रहते हैं कि ये बदले, वो बदले, ये सब पुराना ख़त्म करने की ही क़यामत है। पर पुराना है कि चलता ही जाता है, चलता ही जाता है, ख़त्म ही नहीं होता। इसकी वजह समझ रहे हो न? क्योंकि तुम पुराना ख़त्म करने भर की मांग नहीं करते। तुम कहते हो पुराना जाए और मेरे अनुसार, मेरे अनुकूल, कुछ नया आए। तुम जब भी नया चाहोगे वो नया पुराने का ही कोई और सुसंस्कृत रूप होगा। और उससे अधिक कुछ नहीं। थोड़ी उसमें चमक ज़्यादा होगी। थोड़े उसने गहने पहन लिए होंगे। पुरानी दो तीन चीज़ों का कुछ मिश्रण हो गया होगा। बात समझ में आ रही है?

पर ये बात खतरनाक लगती है ना? कि कहीं एक रिक्तता न पैदा हो जाए। हमने अगर इतना ही कह दिया कि पुराना जाए, तो कहीं जो हाथ में है उस से भी न हाथ धो बैठें। कि पुराना चला गया और नया?

श्रोता: मिला भी नहीं।

आचार्य जी: वो तो सीखाया गया है न: (झाड़ी में दो चिड़ियों के होने से हाथ में एक चिड़िया का होना अच्छा है)

तो पुराना जैसा भी है, हाथ में तो है। अब नए की तो आपने परिभाषा ही यही कर दी कि नया वो जिसका कुछ पता ही नहीं। तो यहाँ तो ये भी पता नहीं कि चिड़िया झाड़ी में है भी की नहीं। और अगर वास्तव में नया है तो ये भी नहीं पता कि वो जो नया है वो चिड़िया भी है कि नहीं। क्योंकि नए के बारे में तो कुछ कहा ही नहीं जा सकता। न झाड़ी है, न चिड़िया है, पुरानी छोड़ दी, नई चिड़िया मिली नहीं। और पुरानी दी छोड़ (हँसते हुए)। तो तुम्हारा दिमाग लगाता है जोड़: हो गया घाटा। तो इसलिए नया कभी कुछ नहीं आता।

जो नया चाहेगा, सूत्र समझलो, वो हमेशा पुराने के ही चक्र में फँसा रहेगा। जिसने नया चाहा उसने पुराने को पुनर-पुनर स्थापित कर दिया। नए की इच्छा ही पुराने को प्राण देती रहती है। नए की इच्छा नहीं की जाती। जो है उसका अपमान है उसकी इच्छा करना। नए की इच्छा नहीं की जाती। पुराने को बस जाने देते हैं। पुराना स्वयं जाने के लिए तत्पर है और नया सदैव प्रस्तुत है। न पुराने को जाने के लिए किसी प्रयत्न की आवश्यकता है, न नए को आने के लिए किसी संकल्प की आवश्यकता है। पुराना स्वयं जाएगा और नया सदैव है ही। उसे बुलाना नहीं है। पुराना स्वयं जाएगा। पुराना समय का हिस्सा है वो स्वयं जाएगा। नया समय का हिस्सा नहीं है। ये अंतर भी साफ़ समझ लेना। जो भी कुछ पुराना है वो समय में है। नया जो है वो पुराने का द्वैत विपरीत नहीं होता। नया और पुराना ये द्वैत के दो सिरे नहीं है। पुराने का जो विपरीत है, वो एक और पुराना है। वो दुसरे किस्म का पुराना है।

बात समझ में आ रही है?

तुमसे अगर तुम्हारी व्याकरण कि शिक्षिका कहे कि पुराने का विपरीत लिखो तो तुरंत तुम क्या लिख दोगे?

श्रोता: नया।

आचार्य जी: नया। पर अस्तित्व में ऐसा नहीं होता। अस्तित्व में पुराने का विपरीत पुराना ही होता है। जो नया है वो पुराने और पुराने के द्वैत से बहार की बात है। तो पुराना समय का हिस्सा, भूत और भविष्य समय के हिस्से, नया भविष्य का हिस्सा नहीं है। भूत और भविष्य द्वैत के दो सिरे हैं। नया वर्तमान है, वो द्वैत में नहीं आता, वो अद्वैत है।

आ रही है बात समझ में?

जिसे भूत से आपत्ति होगी वो अपने लिए एक भविष्य रच लेगा। भूत से भागे भविष्य में अटके। जिसे न भूत से आपत्ति है, न भविष्य से कामना है, वो वर्तामान में जीता है। भूत-भविष्य का काम है आता-जाता प्रतीत होना। भूत जाता प्रतीत होता रहता है, भविष्य आता प्रतीत होता रहता है। ये खेल चलता रहता है और तुम लगातार नए में जीते रहते हो। समझ में आ रही है बात?

पुराने को जाने देना है और नए की चाहत नहीं करनी है।

ये जितनी बातें मैं बोल रहा हूँ ये हमारे साधारण शिक्षा से बहुत हटके हैं बल्कि उसके खिलाफ़ जाती मालूम पड़ती हैं। तुम्हें यही बताया गया है कि नए को लेकर के आओ जो पुरातनपंथी होते हैं, परम्परावादी, वो तुमसे कहते हैं पुराने में अटके रहो। जो ज़रा क्रांतिकारी किस्म के लोग होते हैं, जिनपर आधुनिकता का ठप्पा लगा हुआ होता है, वो तुमसे कहते हैं कुछ नया करो। भविष्य बनाओ। ये दोनों एक ही हैं और दोनों चुके हुए हैं। जो चूका हुआ होता है वो जल्द ही चुक भी जाता है,  उसकी मृत्यु हो जाती है, वो ख़त्म होता जाता है। और ये दोनों एक दुसरे के विरोध से ही अपनी उर्जा पाते हैं। ये दिखते हैं एक दुसरे के विरोधी पर है दोनों एक ही। वास्तविक क्रांति है कि तुम परंपरा से भूत से भी मुक्त हो और तुम नए की अपेक्षा से, भविष्य से भी मुक्त हो।

न तुम्हें पुराने से विद्रोह करना है, न नए की आकांक्षा, तब जीवन में वास्तव में कुछ नया घटित होता है।

नया जो है वो सुरक्षा सी देता है। तुम देखो न तुम्हें कुछ स्पष्ट दिख भी रहा होता है कि गड़बड़ है, तुम तब भी उसको तत्काल त्याग नहीं पाते। क्यों? क्योंकि तुम इंतज़ार करते हो कि उसका विकल्प ढूंढ लूँ। खालीपन से डरते हो। तुम कहते हो ठीक है मैं पीछे से कोई और ले आता हूँ तेरी जगह भरने के लिए। और जब तक तेरी जगह भरने के लिए मैं कोई और नहीं लेकर आता, तब तक तू चल। और अंततः पाते ये हो कि जो चल रहा है वही चलता रहता है। अगर तुम किसी को ले भी आते हो, जगह भरने के लिए, तो वो वही होता है, तो वो वैसा ही होता है, जैसा वो था जिससे तुम्हें आपत्ति थी। तो कोई बदलाव हुआ ही नहीं।

जिन्हें वास्तव में नया चाहिए वो नए कि आकांक्षा न करें। नए की आकांशा पुराने को कायम रखेगी। नए की आकांक्षा तुरंत नए को एक रूप दे देती है, एक आकार दे देती है, एक सीमा दे देती है। और फिर नए को जो रूप दिया गया है, आकार दिया गया है, सीमा दी गई है, ये जानना तुम्हारे लिए सहज होना चाहिए कि वो सब कुछ तुम्हारी ही कल्पना, स्मृति और अतीत से आ रहा है। फिर नए का निर्धारण पुराना कर रहा होता है इसलिए नए को नया कह ही नहीं सकते। उस नए को नया कहना भूल होगी।

अब श्रद्धा चाहिए। पुराना चला गया और नया आया अभी नहीं। अब दिल काँपेंगा। जो था हाथ में वो गवां दिया। नया कुछ पाया नहीं। अब काँपोगे। इस कंपन से गुज़रना पड़ेगा। इस भय के पार जाना पड़ेगा।  इससे गुज़रना पड़ेगा। यही तपस्या है।


शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: नया डराता है नया ही बुलाता है, नया मृत्यु है नया ही जीवन है

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १:  मात्र इन्द्रियाँ ही शरीर व संसार का प्रमाण

लेख २:  मन के बहुतक रंग हैं 


सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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