सच क्या कभी तुम्हें भाएगा?

new-microsoft-office-powerpoint-presentation-2गुरु नारायन रूप है, गुरु ज्ञान को घाट।

सतगुरु बचन प्रताप सों, मन के मिटे उचाट।।

~ संत कबीर

प्रश्न: सर, हम छात्रों को जवाब देते हैं, तो मौका मिल रहा है, आप जैसा बनने का। मन में बड़ी हलचल सी मची है इस बात को लेकर, कुछ कहें?

वक्ता: अच्छा है मौका मिल रहा है, तो दिक्कत क्या है? पर मौके का फिर पूरा-पूरा इस्तेमाल करना। कृष्ण कहते हैं: एक तो होता है वियोगी, वो ऐसा कि उसे कुछ आहट ही नहीं मिल रही योग की, वो ऐसा कि इतनी दूर है कि उसकी सम्भावना ही बड़ी क्षीण है। और एक होता है योगी, उसको भी कोई गति करनी नहीं है। जो होना था, हुआ पड़ा है। करना क्या है? कुछ रहता है क्या करने को? वियोगी की गति आरम्भ भी नहीं हुई; योगी के लिए गति का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। और इन दोनों के बीच एक होता है योगभ्रष्ट। योगभ्रष्ट वो, जिसकी गति आरम्भ तो हुई पर बीच में फिसल गया। जिसको शुरुआत तो मिली, पर अंत न मिला। जो शिष्य तो बना, पर कभी गुरुता को ना पाया। तो तुम्हें शुरुआत मिली है, इसमें तुम्हें दुविधा, अड़चन, झेप क्या हो रही है कि, ‘’सर आप जैसा बनने का मौका मिल रहा है?’’ बिलकुल मेरे समीप आने का, और औचित्य ही क्या है? यही है, बन जाओ ना मेरे जैसे। तुम इसलिए थोड़ी ना मेरे पास हो कि अमित तिवारी (प्रश्नकर्ता को इंगित करते हुए) बने रहोगे; बन जाओ। पर जब यात्रा शुरू करो, तो अंत तक जाना, योगभ्रष्ट मत हो जाना।

बाहर-बाहर से, दूर-दूर से, कई बार तुम्हें आकर्षक लग सकता है मेरे जैसा होना, पर जब यात्रा शुरू करो तो अनुभव कटु भी हो सकता है। दूर से इतना ही दिखाई देता है कि सर कुछ कहते हैं, लिखते हैं; लोग सवाल पूछते हैं, जवाब देते हैं, बड़ा मज़ा आता है लोग सुनते हैं। उसमें आदर-सम्मान है, मन को ये बातें भाती हैं, खींचती है। वियोग की दशा है ही ऐसी, वहाँ मन प्यासा है। किसका प्यासा है? उसे पता भी नहीं, तो उसे लगता है कि वो शायद आदर और सम्मान का ही प्यासा है। पर चलो ठीक है, यात्रा शुरू करने के लिए यही सही कि तुमको सम्मान की प्यास थी और तुमने देखा कि गुरुता में बड़ा सम्मान है, तो तुमने कहा, ‘’हम भी गुरु बन जाते हैं।’’ यात्रा तो किसी ना किसी बहाने ही शुरू होती है, चलो इसी बहाने ही शुरू हो गई कि सम्मान मिलेगा और वहाँ सम्मान मिलता है, पर तुम्हें नहीं।

‘तुम’ मिट करके जो शेष रहता है, सम्मान उसे मिलता है।

 तुम जैसे-जैसे मिटते जाते हो, वैसे वैसे सम्माननीय होते जाते हो। पर जब तुम दूर वियोग के बिंदु से देखते हो,  तो तुम्हें भ्रम ये हो जाता है कि, ‘’मैं जो हूँ, मुझे ही बड़ी इज्जत मिलने लगेगी’’; ऐसा होगा नहीं। तुम सर जैसा होना चाहते हो; सर जैसे नहीं, सर ही हो जाना। मिटना पड़ेगा तुम्हें, और याद रखना मिट के कुछ अन्यतर नहीं बनाना है कि, ‘’मैं मिट करके सर बन गया।’’ मिट करके ‘ना कुछ’ हो जाना है, मिट करके मिट्टी ही हो जाना है। कुछ नहीं, उसका कोई आकार नहीं। तो स्वागत है, आगे बढ़ो इससे ज़्यादा शुभ कुछ हो नहीं सकता। हाँ, लेकिन अभी से चेताय देता हूँ, आगे बढ़ोगे मार्ग वैसा नहीं है, जैसी तुमने कल्पना करी होगी। कहते हैं न कबीर:

प्रभुता को हर कोई भजे, प्रभु को भजे ना कोई

तुम्हें प्रभुता भा रही है, प्रभु नहीं भाएंगे। प्रभु तो बड़े ज़ालिम होते हैं, तुम्हें छोड़ते ही नहीं। उन्हें अपने अलावा और कोई पसंद ही नहीं है, स्वार्थी जैसे हैं। उन्हें अपने अतिरिक्त और कोई पसंद ही नहीं है। उनके करीब आते हो, तुरंत क्या करते हैं? तुम्हें अपने में समा लेते हैं।

अब सम्मान तो मिल रहा है, पर किसको मिल रहा है? प्रभु को मिल रहा है? सम्मान खूब मिलेगा पर अमित तिवारी को नहीं मिलेगा। चौबे जी छब्बे बनने निकले थे, चलो चौबे नहीं पर तिवारी तो हो ना! तीन तो हो, तो तीन से पाँच होने निकले थे, एक होकर रह जाओगे। अब वो स्वीकार हो तो बताओ? यात्रा तो इसलिए करने निकले हो कि तीन का पाँच हो जाए; वो पाँच नहीं होगा, एक बचेगा। जब मेरे जैसा बनना है, तो पूरा बनना फिर, घंटो-घंटो उनके साथ बैठना, अपने व्यक्तिगत जीवन को पूरा ही भुला देना। तुमने खाया है, पीया है, सोये हो कि नहीं सोये हो, इसका ख्याल ज़रा भी मत करना। तबियत कैसी है, घर परिवार में क्या समस्याएं चल रही हैं, इन सब विषमताओं के रहते हुए भी, धर्म पर ज़रा भी आँच मत आने देना। पूरा बनना सिर्फ़ इतना ही नहीं कि दूर-दूर से जो चमक दिखाई दे रही है, वो चमक-दमक ने आकर्षित कर लिया।

जितना आगे बढ़ोगे, उतनी अपनी आहुति देनी पड़ेगी, उतनी दिक्कतें आएँगी। भला है तुम्हें थोड़ी सी चुलबुलाहट हो रही है, बड़ा अच्छा सा लगता है। लिखा है तुमने @करके जवाब देना, तो लिखा @उदित, पर लिखोगे क्या? क्यूंकि अमित लिखेंगे, तो उदित (एक श्रोता की ओर इशारा करते हुए) को ना पसंद आएगा। गुरु को लिखना पड़ेगा, अमित- उदित संवाद, तो कोई बात बनी नहीं। सब्जियां भेजोगे, कट्टा (एक श्रोता की ओर इशारा करते हुए) मना कर देगा नहीं चाहिए! अब क्या करोगे बोलो? @कट्टा मेथी फॉर यू और वो मना कर रहा है। एक ही है, जो जब भेजता है तो कोई मना नहीं कर सकता, वैसा होना पड़ेगा। नहीं तो दो चार दिन में पूरा शौक उतर जाएगा। शुरू-शुरू में बड़ा अच्छा लगेगा कि लो, ‘’ये देखो कलियुग आ गया है। ये आज कल के शिष्य हैं, चेले हम इनको कितना कुछ कह रहे हैं और ये सुनते नहीं। अरे! पात्रता ही नहीं है, हम बता रहे हैं और ध्यान ही नहीं देते, पढ़ते ही नहीं है।’’ तो उधर से एक आवाज़ आती है ‘’पढ़ते हैं, और कहो तो जवाब भी दें, पसंद नहीं आएगा जवाब दे दिया तो।’’

 उस पर ध्यान मत दो जो लिखता हूँ, उस पर ध्यान दो जो लिखता है। जो लिखता हूँ, वो तुम्हें आकर्षक लग सकता है; जो लिखता है उसने कीमत अदा करी है और रोज़ करता है। उस पर ध्यान देना। कीमत अदा करने के लिए तैयार रहना, फिर जो लिखोगे उसमें धार रहेगी, फिर जो लिखोगे उसके पीछे तुम्हारी हुंकार रहेगी। फिर तुम यूँ ही शाब्दिक उपदेश नहीं दोगे, फिर जो तुम कुछ कहोगे, वो तुम्हारे जीवन से निकला होगा; फिर तुम जो कुछ कहोगे उसके पीछे तुम्हारा अपना सत्य होगा। ‘’मैंने जाना है, मैं कह रहा हूँ, पढ़ कर नहीं कह रहा। किसी और को उधृत नहीं कर रहा, मेरे वचन मेरी आत्मा से निकल रहे हैं।’’ पर आत्मा बोल पाए, इसके लिए मन को कीमत अदा करनी पड़ती है। मन के लिए तो वो कीमत बड़ी ही कीमत है क्यूंकि वो जितनी चीजों से अटका हुआ है, वही उसे कीमती लगती हैं। मन के लिए तो वो कीमत, बड़ी ही कीमत है। तो अब तुमने शुरुआत कर ही दी है, तुम्हें अच्छा सा लगने लग गया है, रुचि आने लग गई है, गुद-गुदी सी होती है, ‘’आहा! किसी ने पूछा जवाब देने को मिलेगा।’’ ये शुभ है, ये बड़ा अच्छा है तुम्हारे साथ हो रहा है, पर अब बात को उसके अंत तक ले करके जाना। चेता रहा हूँ योगभ्रष्ट मत हो जाना। रास्ते में ना फिसल जाना।

कई मायनो में योगभ्रष्ट, वियोगी से भी ज़्यादा अभागी होता है क्यूंकि वियोगी को तो अवसर मिला नहीं; योगभ्रष्ट को मिला और वो चूक गया। तुम यहाँ आए हो — अद्वैत में — मेरे समीप, ये सौभाग्य की भी बात है और बड़े से बड़ा खतरा भी है तुम्हारे लिए। सौभाग्य इसलिए क्यूंकि मौका है, अवसर है जान सकते हो, अपनेआप को पा सकते हो, और खतरा इसमें ये है कि ये ऊँची से ऊँची संभावना है, इससे अगर चूक गए, तो अब जिंदगी भर कुछ नहीं पाओगे। क्यूंकि जो उच्चतम तुम्हें मिल सकता था वो मिला, दैव्य मेहरबान हुआ, अनुग्रह हुआ, बारिश हुई; तुम्हीं भीग ना पाए। तो बढ़िया है, अच्छा है, कोई ख़ास ही घटना होगी, जो घटनी होती है। आमंत्रण सब को आते हैं; सब आमंत्रित नहीं हो पाते। तुम आमंत्रित हो रहे हो, सौभाग्य है।

पर अब जाना। उत्सव की ओर आमंत्रित हो रहे हो रास्ते में मत अटक जाना कि पार्टी को निकले थे और रास्ते में कहीं बैठ गये। और रास्ते में कीचड़, गन्दगी भी बहुत है और इधर-उधर के प्रलोभन भी बहुत हैं; फिसल के गिर भी मत जाना। वो बड़ा विशिष्ट उत्सव है, उसमें गंदे कपड़े पहन कर नहीं जाते; बिलकुल जो साफ़ होते हैं, उन्हीं को वहां पर प्रवेश मिलता है। चलते रहना, बताते रहना कैसा लाग रहा है।


शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर: सच क्या कभी तुम्हें भाएगा? (Will you ever like the Truth?)

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १:  माया की स्तुति में रत मन सत्य की निंदा करेगा ही 

लेख २: एक ही तथ्य है और एक ही सत्य; दूसरे की कल्पना ही दुःख है 

लेख ३:   सत्य किसको चुनता है? 


सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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