भक्ति का अर्थ

भक्ति बड़ी ईमानदारी के बिंदु से शुरू होती है। भक्ति कहती है कि, ‘’’वो’ जो कुछ है, उसके विषय में मुझे जो कुछ कहा गया है, और उसके विषय में जो भी मुझे झलकें मिलती हैं, उनके आधार पर इतना तय है कि मैं अपने आपको जो मानता हूँ, मुझसे वो सर्वथा भिन्न है। जब वो मुझसे इतना भिन्न है तो उचित यही है कि मैं उसे ‘तू’ कहूँ। मैं उसे ‘मैं’ नहीं कह सकता अभी, अभी तो नहीं ही कह सकता। इतने अलग- अलग हैं हम, मैं उसे कैसे कह दूँ ‘मैं’? नहीं कहूँगा, मैं नहीं कहूँगा; ‘तुम’ ही कहूँगा। ‘तुम’, ‘मैं’ उस दिन बनेगा, जिस दिन मैं उसके जैसा हो जाऊंगा और उसके जैसा होने का मतलब है कि अभी मैं जैसा हूँ जब ये विगलित हो जाएगा। तब मैं कहूँगा कि मैं और तू एक हुए। तब तक तो मेरी इतनी हैसियत नहीं, दुस्साहस होगा। तो मुझे तू ही कहने दो, यही भक्ति का आधार है। कि तू कहूँगा, मैं नहीं कहूँगा। ज्ञानी क्या कहता है? वो शुरू से ही ‘मैं’ कहता है; भक्त ‘मैं’ कहता ही नहीं, भक्त ‘तू’ कहता है।


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