शरीर को महत्त्व देना ही है उम्र का सम्मान

जितना तुम्हारा देह भाव गहरा रहेगा, उतना ज़्यादा तुम उम्र को इज्ज़त दोगे| सवाल ये नहीं है कि तुम्हारे भीतर ये संस्कार कहाँ से आ गया कि कोई बूढ़ा होते ही इज्ज़त का पात्र हो जाता है; सवाल ये है कि तुम अपनी देह को किस रूप में देखते हो? क्योंकि जो किसी दूसरे को इस कारण इज्ज़त देगा कि उसके बाल पक गए हैं, वो स्वयं भी यही अपेक्षा रखेगा कि, ‘’मुझे भी मेरी उम्र के अनुसार अब आदर मिले|’’

तुम्हारे मन से ये भावना हट जाए — दूसरे को छोड़ो — तुम्हारे मन से अपने लिए ये भावना हट जाए कि, “मैं शरीर हूँ, और मुझे मेरी उम्र के अनुसार व्यवहार मिलना चाहिए,” तो फिर तुम पूरे संसार को उसकी उम्र की मुताबिक नहीं देखोगे|

तुम अपने आप को उम्र के मुताबिक़ देखते हो ना, इसीलिए पूरी दुनिया को उम्र के मुताबिक देखते हो| तुम कहते हो, “अभी तो मैं जवान हूँ, अभी तो मेरी ये उम्र है, वो उम्र है|”

जब तुम अपने आप को कहते हो कि, ‘’मैं जवान हूँ. और जवान होने से ये निर्णय होता है कि मुझे क्या करना चाहिए,’’ तो तुम दूसरे को भी कहते हो कि, “अब ये जवान नहीं है और इसकी प्रौढ़ता से निर्णय होगा कि ये क्या करे?”


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