असली प्रेम कैसा?

प्रश्न: आचार्य जी, असली में प्यार क्या होता है?

आचार्य जी: वैसा बिलकुल नहीं होता जैसे तुमको दिखता है या जैसा तुम समझते हो। सजे बाग जैसा नहीं होता, सुन्दर बगीचे जैसा नहीं होता। बिखरा जंगल होता है।

जंगल की भयावहता और उसकी सुंदरता अलग अलग नहीं होते।

जंगली हाथी, या जंगली शेर – इनसे तो गले नहीं मिलते ना? वास्तविक जंगल देखा है? तुम्हारे लिए तो प्यार तितली है।

अब प्यार कहीं हो कि सिंह गले लगने आया है और गुर्रा रहा है और चूम रहा है तुम्हें । जानते नहीं हो तुम कि चूमेगा या चबायेगा – यह प्यार है।

कुछ बहुत अलौकिक बात है – शेर गले मिल रहा है। पर उसका गले मिलना मौत की आहट भी है। गले तो मिल रहा है पर जान लेकर जायेगा।

दिल वो तुम्हें अपना दे रहा है पर तुम्हारा दिल निकाल के फाड़ के खायेगा।

और तुम तैयार हो: “ठीक है, निकाल ही ले!”

तितली नहीं है प्यार। बहुत खौफ़नाक है। बच्चों के लिए नहीं है। वही तय करता है कि तुम बड़े हुए या नहीं।

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