परम का खेल

मत कहना कि, ‘’मेरे दिल में परमात्मा बैठा है, और उसने मुझे यहाँ खींच के बुला लिया|’’ न, जो कुछ घट रहा है, वो परमात्मा के भीतर घट रहा है|

परमात्मा तुम्हारे भीतर नहीं है, तुम परमात्मा के भीतर हो|

वो अपना खेल-खेल रहा है, उस खेल में तुम्हारे लिए कोई स्थान नहीं है| तुम्हारा उस खेल में पूरा स्वागत है| पर दिक्कत यह है कि वो स्वागत भी किसका करता है? बस अपना ही| अपनी याद किसको दिलाता है वो? अपनेआप को| अपने खेल में स्वागत भी किसका करता है? बस अपना ही|


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