दुनिया से अछूता कुछ है आपके पास?

अक्षयं गतसंतापमात्मानं पश्यतो मुने:।

क्व विद्या च क्व वा विश्वं क्व देहोअहम ममेति वा।।

(जो मुनि आत्मा को अक्षय व गतसंताप देखता है, उसके लिए कहाँ विद्या है और कहाँ विश्व है? उसके लिए कहाँ ‘मैं देह हूँ’, और कहाँ ‘देह मेरी है’ की भावना है?)

(अष्टावक्र गीता, १८.७४)

आचार्य प्रशांत: कुछ शब्द हैं – अच्छे शब्द हैं – लिख लीजिये: अक्षय, गतसंताप, मुनि। ‘अक्षय’ शब्द में जाना पड़ेगा, अपने भीतर कुछ ऐसा पाना पड़ेगा जो कभी कम नहीं होता तब आप इसके पास आ पायेंगे। देखिये ये श्लोक ऐसे ही नहीं हैं कि इनकी कोई आप तार्किक टीका कर दें या अनुवाद भर कर दें। ये महसूस करने की बातें हैं, ये गहराई से महसूस करने की बातें हैं।

‘अक्षय’ शब्द आपके लिए कोई मायने ही नहीं रखेगा जबतक आपने अपने भीतर कुछ ऐसा पाया ना हो जिसको दुनिया कभी हिला नहीं पाती, छोटा नहीं कर पाती। हम कैसे जीते हैं? हम ऐसे जीते हैं कि हमारा आकार उतना ही रहता है जितना हमारी परिस्थितियाँ अनुमति देती हैं। दुनिया में बड़ी ताकत होती है, परिस्थितियों में बड़ी ताकत होती है हमें छोटा कर देने की, हमें बड़ा कर देने की। हमारा क्षय बड़ी जल्दी हो जाता है।

हम लगातार उसमें जीते हैं जो टूट रहा है, जो गल रहा है, और फिर इसी कारण फिर वो लगातार बन भी रहा है; इसी बनते-बिगड़ते में हम जीते हैं| क्षय लगातार है; अक्षय को हमने जाना नहीं है, अक्षय को हमने ज़रा भी जाना नहीं है। होना ये चाहिए आप जैसे ही इस श्लोक को पढ़ें और शब्द सामने आये ‘अक्षय’ तो आपके भीतर से एक आवाज़ निकले, “हाँ मैं जनता हूँ, ‘अक्षय’ का मुझे पता है”, तब इसमें रस आएगा आपको अन्यथा आप कुछ ऐसा सा बोल देंगे जिसमें कुछ बात नहीं बनेगी, उसमें कुछ रस ही नहीं आएगा। ऐसा लगेगा ही नहीं कि कोई असली बात बोली गई है; ऐसा लगेगा जैसे कोई सिद्धांत बोल दिया गया है, जिसमें कोई जान नहीं है। ये शब्द सामने आयें तो आँखें चमक उठें, और वो यूँ ही नहीं चमक उठती हैं कि ‘अ’ ‘क्ष’ और ‘य’ लिखा हुआ है। वो तब चमक उठेंगी जब आपकी पहचान पहले से ही हो अक्षय से।

अगर आपके जीवन में अक्षय कुछ अभी है ही नहीं तो फिर अक्षय सिर्फ़ एक शब्द है। आप अक्षय का अर्थ बताने के लिए बस अंग्रेज़ी अनुवाद करके  बोल दोगे ‘इम्पेरिशेबल’ – वो इम्पेरिशेबल वैसा ही हो जाएगा जैसे की प्लास्टिक इम्पेरिशेबल होता है और फलपेरिशेबल  होता है| फ़िर आपने अभी अक्षय को जाना नहीं है। आप अभी बहुत निर्भर-निर्भर से हो, बात-बात में छोटे हो जाते हो, बात-बात में बड़े हो जाते हो, कोई भी आ कर के आपकी मनोदशा बदल देता है।

स्थिति अच्छी होती है तो आप फूले नहीं समाते हो और स्थितियाँ ख़राब होती हैं तो आप बिल्कुल संकुचित हो जाते हो। जो ऐसा है उसके लिए सिर्फ ये एक श्लोक है, कुछ शब्द हैं। उन शब्दों की कोई गूँज नहीं आएगी भीतर से। ऐसा नहीं होगा कि शब्द भीतर गया और गूँज की तरह फिर कुछ वापस भी आया। गूँज में यही होता है न – कुछ जाता है और फिर कुछ वापस भी आता है। आपको देखना होगा कि क्या आपके साथ ऐसा कुछ होता है कि आप एक शब्द पढ़ो और तुरन्त गूँज वापस आये कि “हाँ, मैं इसे जानता हूँ; हाँ, मैंने इसे जाना है कि आकाशवत अनुभव करना क्या होता है; हाँ, मैंने जाना है कि धुंएँ के बीच में रहकर भी काला न होना क्या है”।

अष्टावक्र कभी आपको कुछ नया नहीं दे सकते। अष्टावक्र तो बस आपके खुद के जाने हुए को प्रमाणित कर सकते हैं कि ‘जो तुझे अनुभव होता है वो मुझे भी हुआ है’। एक प्रकार का सत्यापन है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं कर सकते। सत्य किसी को दिया थोड़ी जा सकता है; पहले पाना होता है तब ग्रंथ आपके लिए अर्थवान होता है। जिन्होंने पाया है ग्रंथ सिर्फ उनके लिए अर्थवान है अन्यथा ग्रंथ आपके लिए एक बोझ है, जैसे जीवन बोझ है वैसे ग्रंथ एक और बोझ है। मज़ा तो तब आये जब आप इसे पढ़ें और चहक उठें और कहें कि “मुझे तो पता है; हाँ, ऐसा ही तो है; मैंने भी इसे जाना है, मेरा भी यही अनुभव है। मैंने इन शब्दों में नहीं जाना पर मैंने भी करीब-करीब यही जाना है, ये अनुभव होता है”।

समझ रहें हैं आप बात को? निर्विकल्पता आपने जानी है? अष्टावक्र बार-बार कह रहें हैं ‘निर्विकल्पता’।

अगर आपने अपने मन को समझा रखा है बार-बार कि आपके पास जितने विकल्प हैं उतनी आपकी शक्ति है; अगर आपने अपने आपको समझा रखा है कि विकल्प स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति हैं; अगर आप बात-बात में चिल्लाते हैं कि मैं चुनूँगा , तो फिर जो चुनाव करने पर लगा हुआ है वो निर्विकल्पता शब्द जब पढ़ेगा तो खिलेगा थोड़े ही।

श्रोता १: वो और छोटा हो जाएगा।

वक्ता: कोई अर्थ नहीं रहेगा।

गतसंताप: गतसंताप मतलब जिसके सारे संताप हर लिए गए हैं। इसी से मिलता-जुलता शब्द है ‘विगतज्वर’। यहाँ संताप कहा गया है, वहाँ ज्वर कहा गया है, पर बात एक ही है।

श्रोता २: सन्ताप का मतलब?

वक्ता: कष्ट, दुविधाएँ, ताप।
विगतज्वर- जिसके भीतर का बुख़ार ख़त्म हो गया है, विगतज्वर। गतसंताप – जिसके भीतर जितनी पीड़ा थी वो अब नहीं है। जिसके भीतर उत्तेजनाओं का ताप अब नहीं है|

और आप संताप से ही लगातार भरे हुए हैं। वही आपको ऊर्जा दे रहें हैं संताप, उन्हीं के कारण आप इधर-उधर अभी भाग रहें हैं तो कहाँ ‘गतसंताप’ से कोई गूँज उठेगी भीतर!

(व्यंग)“क्या आपने कहा गतसंताप? ये तो मैं हूँ ही! अष्टावक्र भी थे क्या? चलो बड़ी अच्छी हुई; अब यारी है।”

थोड़ा सा तो अनुभव हो, थोड़ा सा तो स्वाद मिला हो कि गतसंताप की अवस्था होती क्या है। कभी तो ये जाना हो, थोड़ी ही देर के लिए सही पर ये जाना तो हो कि बिलकुल हल्का हो जाना, कि एक बोझ नहीं है मन में, एक कष्ट अनुभव नहीं हो रहा है, एक शिकायत नहीं है दुनिया से अभी। थोड़ी देर के लिए तो ऐसा जाना हो, फिर गतसंताप शब्द आपके लिए मूल्यवान होगा, पहले उसको जानिए। अष्टावक्र रोते हुए आदमी थोड़े ही हैं, वो गतसंताप हैं। आप रोते हुए उन्हें पढ़ें तो आपको मिल क्या जाना है?

मुनि – तीसरा शब्द है जिसकी अष्टावक्र बात कर रहें हैं। महावीर से पूछा गया था, “कौन है मुनि”?

श्रोता ३: जिसमें मौन हो।

वक्ता: ठीक है, वो शास्त्रीय परिभाषा है। महावीर ने कहा था – जो सोया नहीं है, जो असुप्त है, वो मुनि है, और हम सोने के अलावा कुछ जानते नहीं।

‘आया था किस काम को सोया चादर तान,

सुरत संभल रे गाफ़िल आपना आप पहचान ’

कबीर कह गए हैं जिस काम को आये हो उसको जानो; जानो कि महत्वपूर्ण क्या है।

श्रोता ४: सर, ये बात कि महत्वपूर्ण क्या है ये भी हमें किसने बताई है?

वक्ता: ये बात तो आप मानते ही हो ना!

या तो सीधे उस जगह पर पहुँच जाओ जहाँ कुछ महत्वपूर्ण नहीं है और जब तक कुछ मान ही रहे हो कि कुछ महत्वपूर्ण है तो ठीक-ठीक जानो कि वाकई क्या महत्वपूर्ण है।

क्या तुम वहाँ पर खड़े हो जहाँ पर कुछ महत्वपूर्ण नहीं होता?

श्रोता ५: पूरी दुनिया में कुछ महत्वपूर्ण नहीं होता।

वक्ता: क्या वाकई ऐसा है कि कुछ महत्वपूर्ण नहीं है तुम्हारे लिए? ईमानदारी से देखिएगा। उस दिन यहाँ भजनों का कार्यक्रम चल रहा था। किसी ने आपसे आग्रह किया कि कम्प्यूटर खोलिए तो आपने इनकार करते हुए कहा कि अब आपके जाने का समय हो गया है। यदि वो कम्प्यूटर और समय आपके लिए महत्वपूर्ण ना होता तो क्या वही उत्तर देते? क्या वाकई कुछ महत्वपूर्ण नहीं है दुनिया में आपके लिए?

श्रोता ६: बहुत महत्वपूर्ण नहीं है।

वक्ता: ‘बहुत’ और ‘कम’ क्या होता है? है महत्वपूर्ण तो है। तो जब तक कुछ महत्वपूर्ण लगता ही है तो फिर उसको मानो — क्या महत्वपूर्ण है, वास्तव में क्या महत्वपूर्ण है। महत्वपूर्ण तो हमारे लिए बहुत कुछ है।

या तो सीधे कूद के वहाँ खड़े हो जाओ जहाँ दिख ही गया है कि कुछ नहीं है, महत्व का कुछ नहीं है, वो भी ठीक है — यदि वो छलांग लग सके तो, यदि वो छलांग लग सके तो।

“क्व विद्या च क्व वा विश्वं क्व देहोअहम ममेति वा”

‘विद्या’ यहाँ पर अष्टावक्र ‘ज्ञान’ को नहीं कह रहें हैं। ज्ञान तो पहले ही छोटी बात है। अष्टावक्र ज्ञान की बात भी नहीं कर रहे, अष्टावक्र विद्या की बात कर रहें हैं। कह रहें हैं विद्या में भी कुछ नहीं रखा है और विद्या का अर्थ है आत्मबोध, तो आत्मबोध में भी कुछ नहीं रखा है।

उस बिंदु पर आइये तो जहाँ आप कह सके ऊँचे से ऊँचा भी कुछ मायने नहीं रखता।

“मोक्ष चाहिए किसको? मैं मौज में हूँ।”

आप घूम रहे हैं, फिर रहे है, दौड़ रहे हैं, खा रहे हैं, और कोई पीछे-पीछे आये और कहे, “मोक्ष चाहिए क्या?”

और आप कहें, “हटो यार, ऐसे ही बहुत मज़ा आ रहा है!”

पहले वैसा थोड़ा हो के तो देखिये कि “नहीं यार, मोक्ष वगैरह नहीं चाहिए। हटाओ, क्या फालतू की बातें कर रहे हो! ऐसे ही कितनी मौज है, ये मोक्ष-वोक्ष का क्या करना है”

तब आप कह सकते हो “क्या करेंगे विद्या का, और क्या करेंगे विश्व का”।

अष्टावक्र बस याद दिलाने के लिए हैं कि ऐसा भी हो सकता है, तुम सबके लिए ये संभव है वो बस याद दिलाते हैं हल्के से। ऐसे भी हो सकते हो निश्चिन्त, बेफ़िक्र, तुम हो सकते हो ऐसे। इतना सड़े-सड़े मत घूमो। वो मौज संभव है।

अविश्वसनीय! हो ही नहीं सकता, झूठा आदमी है! ज़िन्दगी दुखों से खाली हो सकती है, ऐसा हो सकता है क्या? दुनिया में आयें हैं ज़हर तो पीना ही पड़ेगा।”

किसी का वचन है कि हमारा गहरा से गहरा डर ये नहीं है कि हम छोटे हैं, हमारा सबसे बड़ा डर ही यही है कि हमें पता है कि हम छोटे हैं नहीं। हम वही हैं (आकाश की ओर संकेत करते हुए)।

श्रोता ३: फिर हमें डर क्यूँ लगेगा ?

वक्ता: सोचो ना, मूर्खता है न!

यही तो मूर्खता है कि हमें हमारी विशालता ही डराती है। इस बात से डर किसे लगेगा? इस पर ध्यान दीजिये ना। ये मत पूछिए, ‘क्यों लगेगा?’, पूछिए, ‘किसे लगेगा, किसे लगेगा?’ विशाल से डर किसको लग सकता है?

श्रोता ४: अहंकार को।

वक्ता: लघु को, तुच्छ को।

श्रोता ५: जिसको हमेशा लगा रहता है कि मैं और बड़ा हो जाऊँ।

वक्ता: हमें हमारी विशालता ही बहुत डराती है।

हमारा सबसे गहरे से गहरा डर यही है कि भगवान मैं ही तो हूँ, ये कहीं मुझे पता न चल जाये। अब मुझे पता चल जाये मैं भगवान हूँ तो मैं ये फ़ालतू समोसा क्यूँ खाऊँ। इनको पता चल जाये ये भगवान हैं तो ये मुहँ खोल के कैसे सोएंगे।

यही डर है कि एक बार पता चल गया कि हम भगवान हैं तो फिर दिक्कत हो जानी है न!


‘शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: आचार्य प्रशांत, अष्टावक्र गीता पर: दुनिया से अछूता कुछ है आपके पास?

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: Acharya Prashant: दुनिया मुझ पर हावी क्यों हो जाती है? (Why does the world dominate me?)

लेख २: Acharya Prashant: मन जब आत्मा में दृढ नहीं होता तब वो अपनी ही बनाई दुनिया में भटकता है(Fickle mind)

लेख ३: Acharya Prashant: दुनिया के साथ-साथ तुम भी मात्र विचार हो ( You and the world are just thoughts)


सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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