खुद को जानने की कोशिश तुम्हें खुद से दूर ही ले जायेगी

शुद्धम बुद्धम प्रियं निष्प्रपंचं निरामयां। 

आत्मानं तं न जानंति तत्राभ्यासपरा जनाः।।

अष्टावक्र गीता,  अध्याय १८, श्लोक ३५

(आत्मा के सम्बन्ध में जो लोग प्रयास में लग रहे हैं, वे अपने शुद्ध, बुद्ध, प्रिय, पूर्ण, निष्प्रपंच और निरामय

ब्रह्म स्वरुप को नहीं जानते)

आचार्य प्रशांत: तुम ये सब हो, पर तुम्हें नहीं पता लगेगा कि ये सब तुम हो, जब तक तुम दुनिया भर के दूसरे अभ्यासों में लगे रहोगे। तुमने अगर कोई भी पद्यति पकड़ ली, तुम अगर किसी भी पंथ के हो गए, तुम अगर कुछ भी होने की दावेदारी करने  लगे, तो वो अभ्यास ही करते रह जाओगे। तुमको अपने शुद्ध, बुद्ध, प्रिय, पूर्ण, निष्प्रपंच रूप के बारे में कुछ पता नहीं चलेगा। फिर तुम रह जाओगे और तुम्हारी पद्यति रह जाएगी। तुम कोई भी अभ्यास करोगे तो तुम अपने को शुद्ध-चैतन्य के रूप में नहीं देख पाओगे। तुम्हारा अभ्यास तुम्हें दूर ही ले जाएगा, कभी पास नहीं ले जा सकता। हर विधि तुम्हें तुम्हारे अत्यांतिक रूप से दूर ही रखेगी। किसी भी विधि में मान्यता ही यही है कि, ‘मैं अपने शुद्ध रूप से दूर जा चुका हूँ’, और ये मान्यता ही झूठी है। क्योंकि दूर कोई जा ही नहीं सकता। तुम किसी विधि का पालन कर-कर के, इस मान्यता को मान्यता देते हो कि दूर जा चुके हो। एक आदमी जो पैसे और नौकरी के पीछे भाग रहा है, और एक जो आध्यात्मिक उपलब्धियों के पीछे भाग रहा है, दोनों का यही मानना है कि, “मेरे पास नहीं है”।

श्रोता १: विधियाँ इसलिए दी गयी हैं कि मेरा जो झूठा मानना है कि ‘मैं दूर जा चूका हूँ’, वो ठीक हो जाए?

वक्ता: अगर जान ही गए हो कि यह मान्यता झूठी थी तो फ़िर किसी विधि की क्या ज़रूरत? और अगर नहीं जाने हो कि ये ‘धारणाएं झूठी हैं’, तो कोई भी विधि तो उस मान्यता को मान्यता ही दे रही है। दोनों ही स्थितियों में तुम्हारे अभ्यास तो फ़िज़ूल ही हैं न।

अभ्यास का अर्थ है: ‘बंधा हुआ कर्म, एक ढांचा’। अभ्यास करने से एक कौशल आता है, आत्म-जागरूकता का ‘अभ्यास’ थोड़े ही किया जाता है! प्रेम अभ्यास कर-कर के करोगे? हाँ, कामसूत्र की कोई मुद्रा हो, उसका अभ्यास किया जा सकता है। तो अगर आपको कोई ये कहे कि, ‘आओ, शास्त्राभ्यास करें’, तो पागल है, हाँ शस्त्राभ्यास हो सकता है, फौज में वही कराया जाता है।

श्रोता २: लेकिन ये जो ध्यान की पद्यतियाँ बनायीं गयी हैं, ये क्यों?

वक्ता: देखिए, ध्यान-से-ध्यान की पद्यतियाँ निकलती हैं। ये पद्यति आपको कोई दे नहीं सकता। क्योंकि जब आप ही लगातार बदल रहे हैं, तो पद्यति कैसे एक हो सकती है? आप सुबह कुछ और हो, उस समय आपकी वो पद्यति काम ही नहीं करेगी, दोपहर में कुछ और हो, तब काम कर सकती है, शाम को नहीं करेगी, क्योंकि आप ही लगातार बदल रहे हो। आपके ऊपर क्या काम करेगा क्या नहीं, वो तो आपकी जागरूकता से बात निकलेगी ना, कोई और कैसे दे देगा? फिर, जो विधि बना रहा है अगर वो ज़िंदा है तो शायद फिर भी आपकी मदद हो जाएगी क्योंकि वो देख सकता है। कोई आपको कितनी विधियां दे देगा, सौ, दो-सौ? और मन के तो बहुतक रंग है, मन के अलग अलग रंगों पे तुम एक ही विधि कैसे लगा लोगे? तो क्या विधि लगनी है ये बात भी उसी समय की जागरूकता से सामने  आती है।

एक उदाहरण देता हूँ, एक पोशाक आती है पतला होने की, उसको पेट पर खूब दबाकर बांधा जाता है। उससे बस इतना ही होता है कि पेट का वजन नीचे, या ऊपर पहुँच जायेगा, कोई पतला नहीं होता। अगर आप किसी विधि को पकड़ कर ही बैठ गए तो आप मन को ऐसा कर लोगे कि वो उस तकनीक में बिल्कुल सही जमने लगे।

श्रोता ३: जैसे मच्छर को मच्छर भगाने वाली दवाई की आदत हो जाती है।

वक्ता: हाँ, मन ऐसा कर लोगे कि उसपर वो विधि हमेशा जमती रहे। तुम फ़िर उस विधि से आगे कभी जाओगे ही नहीं।

श्रोता ४: लेकिन मान लीजिये, हम किसी जेट-विमान में जा रहे हैं, तो लैंड करने से पहले उसकी गति मध्यम करनी पड़ेगी, तब सोचा जाएगा कि कहाँ लैंड करना है और कहाँ नहीं।

वक्ता: आप ये मान रहे हैं कि चालक होश में है? जेट-विमान अपनेआप कुछ नहीं करता, चालक करता है, तो ज़रा उस चालक की बात कीजिए। जेट-विमान के साथ तो बहुत बढ़िया खेल-खेला जा सकता है, अगर चालक होश में हो तो।

श्रोता ५: लेकिन वो होश में आएगा कैसे?

वक्ता: जो अष्टावक्र कह रहे हैं, वो हमारा स्वभाव है, उसे कहीं से आना नहीं होता। और वो इसलिए छुपा हुआ है क्योंकि तुम दस-प्रकार की मान्यताएँ लेकर बैठे हो, कि मुझे ये करना पड़ेगा, वो करना पड़ेगा। चूंकि तुम इधर-उधर भागते फ़िर रहे हो, इसलिए तुम कभी होश में आ ही नहीं सकते। अष्टावक्र कह रहे हैं कि तुम्हारी समस्या ही यही है कि तुम इधर-उधर भागते फ़िर रहे हो। भागना बंद करो, होश तो हमेशा प्रस्तुत है ही।

श्रोता ६: तो ये बात तो सुन ली, पर उससे बात फ़िर वहीं पर आ गयी, समाधान क्या हुआ?

वक्ता: सुनने से नहीं हुआ ना, भागना बंद करो ना। अब समय आएगा फ़िर से भागने का, मत जाना, भागना बंद करो। सुना कहाँ? कह भर दिया कि सुन लिया, पर सुना कहाँ? जब बीमार हो, नहीं तो क्यों बीमार बने हुए हो।


शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: खुद को जानने की कोशिश तुम्हें खुद से दूर ही ले जायेगी 

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: मरोगे अकेले ही (Death – a great reminder of aloneness)

लेख २: मैं मन का गुलाम क्यों? (Why am I such a slave of the mind?)

लेख ३: मैं मैं बड़ी बलाय (The ‘I’ illness)


सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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