न भाग्य, न कर्म, मात्र बोध है मर्म

new-microsoft-office-powerpoint-presentation-2श्रोता: सर, मेरा नाम वेदप्रकाश है और मेरा प्रशन यह है कि भाग्य नाम की भी कोई चीज़ होती है जो जिंदगी से जुड़ी होती है या केवल कर्म ही सब कुछ होता है?

वक्ता: वेदप्रकाश ने कहा कि क्या कर्म ही सब कुछ होता है या भाग्य का भी कोई महत्व है? वेदप्रकाश, दोनों में से कुछ भी नहीं। दोनों हैं, दोनों महत्वपूर्ण हैं पर दोनों में से आख़िरी कुछ भी नहीं। निःसंदेह भाग्य तो होता ही है। तुम किस घर में पैदा हुए हो, किस धर्म, किस जाति में पैदा हुए हो, किस आर्थिक वर्ग में पैदा हुए हो| सबसे पहले तो यही दिखना चाहिए कि यह तो बस भाग्य की बात है, किस्मत। देख नहीं रहे हो यहाँ जितने लोग बैठे हों सबके बालों का रंग काला है! यूरोप में यही बातचीत चल रही होती तो कम से कम सात-आठ अलग-अलग रंगों के बालों के रंग, पुतलियों के रंग होते। ये तुमने चुने थोड़े ही हैं| ये तो किस्मत की बात है। या चुना है? किस्मत है।

तुम में से किसी ने ये नहीं चुना था कि तुम्हें किस लिंग में पैदा होना है, तुम में से किसी ने ये नहीं चुना था कि तुम्हें पैदा होना भी है या नहीं, या कौन-सा धर्म होगा। किसी ने चुना था? इतना कुछ है बाहर, जो चल रहा है लगातार और वो सब कुछ तुम्हारी व्यक्तिगत मर्ज़ी से तो नहीं चल रहा। तो किस्मत तो है ही है, यदि उसे ही किस्मत कहते हो तो किस्मत तो है ही है| तुम यहाँ बैठे हुए हो, भूकम्प आ सकता है और कुछ का कुछ हो जाएगा। तुम कुछ नहीं कर रहे हो, सड़क पार कर रहे हो और कोई शराबी गाड़ी चला रहा है। उसने शराब तुम्हारी मर्ज़ी से तो नहीं पी थी पर शराब उसने पी, जान तुम्हारी गई। तुमने चाहा नहीं था, उसने तुमसे अनुमति नहीं ली थी, पर जान तुम्हारी गई। तो किस्मत तो है ही, महत्वपूर्ण है।

कर्म तुमने दूसरी बात कही, किस्मत बाहरी है यहाँ तक तो हम आम तौर पर देख लेते हैं और हम कहते भी यही हैं कि किस्मत ने बड़ा साथ दिया या किस्मत का मारा हुआ है। इससे हमारा आशय भी यही होता हैं कि बाहर के जो तत्त्व थे, वो अनुकूल बैठे कि प्रतिकूल। यही आशय होता है ना कि किस्मत ने साथ दिया या किस्मत विपरीत थी? लेकिन कर्म को हम अपना मानते हैं, उसको हम बाहरी नहीं मानते। हम कहते हैं किस्मत बाहरी है, कर्म अपना है। अब ज़रा ध्यान से देखो, कर्म क्या वाकई अपना है? हमें लगता तो है कि, ‘’कर्म मेरा है,’’ हमें लगता तो हैं, ‘’मैंने किया’’ और यह कह के हमें बड़ा संतोष भी प्राप्त होता हैं। ‘’मैं कर रहा हूँ, खोया पाया मैंने, करा या नहीं करा मैंने,’’ पर क्या वाकई हम करते हैं? हम करते हैं या अधिकांशतः यह होता है कि हमें पता भी नहीं है कि हमसे परिस्थितियाँ और बाहरी प्रभाव करवा रहे हैं। दावा हमारा यही रहता हैं, ‘’मैं कर रहा हूँ। क्या वाकई मैं कर रहा हूँ?’’

आज लोंगो से मिलो देखो तो लोग शिक्षा पूरी करेंगे उसके बाद वो कहेंगे कि हमें एम.बी.ए  करना हैं, प्राइवेट सेक्टर में नौकरी करनी हैं। उनसे पूछो क्यों, कहेंगे, ‘’नहीं, यही ठीक है। मैं ही ऐसा करना चाहता हूँ या मैं ही ऐसा कर रहा हूँ।‘’ 30 साल पीछे चले जाओ तो लोगों की पहली पसंद होती थी सरकारी नौकरी। सन 1984 से लेकर सन 1991 तक एक प्रकिया चली जिसमें भारतीय अर्थव्यवस्था को खोला गया, ख़ास तौर पर सन 1991 में, उसके बाद यह स्थिति बनी कि प्राइवेट सेक्टर में संभावनाएं भी बढ़ी, पैसा भी बढ़ा तो लोग उधर को जाने लगे। अब अगर तुम उधर को जा रहे हो तो तुम जा रहे हो या परिस्थितियों ने तुम्हें धकेला है? पर तुम मानोगे नहीं कि परिस्थितियाँ ऐसी थी तो हम इधर की तरफ़ चल दिए। तुम कहोगे, ‘’मैंने किया।‘’

ये थोड़ी दूर का उदाहरण हो गया, थोड़ा करीब का उदाहरण ले लो। एक बहुत कम उम्र का लड़का पकड़ा गया था ‘अजमल कसाब’। मुम्बई में जो त्रासद घटना हुई थी, उसे जितने लोंगो ने अंजाम दिया था उनमें बाकी सब तो मारे गए, एक पकड़ा गया था। फिर उसे फांसी हुई। उसकी उम्र कुल जानते हो कितनी थी? 17 साल या ऐसे ही शायद 19। मेरे विचार से 17 थी टीनएजर, ठीक। तुम अगर उससे जाके पूछो, किसने किया? वो कहेगा, ‘’मैंने किया,’’ तुम उससे पूंछो क्यों किया? वो कहेंगा, ‘’क्यूंकि यही ठीक है और उसे पक्का यकीन होगा कि जो किया मैंने किया, ठीक किया। पढ़ा लिखा नहीं था, एक छोटे गाँव का रहने वाला था। कम उम्र में ही एक ऐसे कैंप  में पहुँच गया, कुछ ऐसे लोगो के साथ फंस गया जिन्होंने उसके मन में हज़ार तरीके के विचार ठूस दिए। अब वो कर्म कर रहा है, और क्या कर्म कर रहा है? गोली चला रहा है। क्या हम यह कह सकते हैं यह कर्म उसने किया? उसने किया या उससे करवाया गया?

श्रोता: करवाया गया।

वक्ता: पर हम ये नहीं कहते ना! हम कहते हैं, ‘’कर्म मेरा है।‘’ किस्मत को तो हम मान लेते हैं कि बेगानी है। कर्म को हम कहने लगते हैं, क्या कहने लगते हैं? मेरा है। हम ये देखते भी नहीं हैं कि, ‘’कोई कर्म मेरा नहीं है। हर कर्म मुझसे इधर से उधर से करवाया जा रहा है गुलाम हूँ मैं।‘’ बड़ा बढ़िया अनुभव था। आई.टी. ब्रांच  की सीटें  सन 2006 तक सभी इंजीनियरिंग कॉलेजों में सबसे पहले भर जाती थी, 2007 तक भी 2008 में अर्थव्यवस्था डगमगाई, वही सीटें खाली रहने लग गई। 2008 से पहले तुम किसी कॉलेज  के आई.टी. डिपार्टमेंट  में जाओ और छात्रों से पूछों की क्यों पढ़ रहे हो आई.टी.? तो कहते, ‘’मैं पढना चाहता हूँ, मेरी पसंद है, ऐसा है, वैसा है।‘’ वो कहते, ‘’मैं पैदा ही हुआ आई.टी. पढ़ने के लिए, मैं रोया ही जावा में था। परिस्थितियाँ बदली, आई.टी के प्रति सारा प्यार उड़ गया। पिछले दो चार सालों से तुम जाओ कॉलेजों में आई.टी की सीटें ही नहीं भर रही। क्या जो आई.टी  में आ रहे थे, क्या वो खुद आ रहे थे? नहीं, मौसम उन्हें भेज रहा था। अब जो आई.टी में नहीं आ रहे क्या वो खुद नहीं आ रहे? नहीं, मौसम उन्हें रोक रहा है, पर हम कहते क्या हैं? ‘’कर्म हमारा हैं।‘’

बिरला होता है वो आदमी जिसका कर्म उसका होता है।

99.99% मामलो में हमारे कर्म हमारे होते ही नहीं। हमारे कर्म भी बस किस्मत से निकलते हैं, जिधर को हवा चली उधर को ही बह लिए ,’रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं।’ अब तुम क्या कहोगे, ‘’मैं इस दिशा जा रहा हूँ?’’ तुम इस दिशा नहीं जा रहे, हवा इस दिशा बह रही है। जिधर को हवा बहती है, उधर को पत्ता उड़ जाता है। अब पत्ता कहे क्या कि, ‘’मेरा कर्म है,’’ कह सकता है? लेकिन कोई ऐसा होता है जिसका कर्म वाकई उसका होता है, उसने उसको पा लिया है जो किस्मत और कर्म दोनों से बहुत बड़ा है। किस्मत तुम्हारी नहीं, बाहर से जो प्रभाव तुम पर पड़ रहे हैं वो तुम्हारे नहीं, लेकिन कुछ है जो तुम्हारा अपना है और वो किस्मत से बहुत-बहुत बड़ा है। किस्मत होगी महत्वपूर्ण, हम इनकार नहीं कर सकते, बेशक किस्मत बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन किस्मत से हज़ार गुना ज़्यादा वो महत्वपूर्ण है। उसके सामने किस्मत की कोई हैसियत ही नहीं। वो ऐसा है कि उसको पा लिया तो फिर आंधी तूफ़ान हो, तब भी तुम हँस रहे हो। अनुकूल है कि प्रतिकूल है; तुम्हारे लिए सब ठीक है कूल  ही कूल है फ़िर तुम यह कहोगे ही नहीं कि किस्मत बहुत बुरी चल रही है और ना तुम यह कहोगे किस्मत से फायदा हो गया। तुम कहोगे किस्मत जैसी हो वैसी हो, हम मस्त हैं।

वो मस्ती ही जीवन का रस है, वो मिलती नहीं आसानी से। ‘’हम तो डर और तनाव जानते हैं, बस!’’ वो आसानी से मिलेगी नहीं। ‘’हम मनोरंजन जानते हैं, मस्ती नहीं जानते!‘’ मनोरंजन तो सस्त्ती, घटिया चीज़ है, वो हम जानते हैं। जाकर के फिल्म देख लो, नाच लो, शराब पी लो, यार दोस्तों के साथ पार्टी  कर लो यह सब तो सिर्फ़ तनाव से निकलते हैं। आप जितने तनाव में होंगे आपको उतनी ज़्यादा जरुरत पड़ेगी मनोरंजन की, मस्ती चीज़ ही दूसरी है। किस्मत कैसी भी हो, क्या हो सकता है एक ऐसा आदमी जो मस्त रहे? जो ऐसा हो सकता हो, वही असली आदमी है। जो कह रहा है, ‘’ठीक किस्मत कब हमारी थी लेकिन हम तो हमारे हैं ना। सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख, अच्छा-बुरा, पाना-खोना इन सब में, हम तो मस्त हैं। बाहर-बाहर ये सब कुछ चलता रहता है, भीतर ये हमें स्पर्श भी नहीं कर जाता क्यूंकि भीतर, तो कुछ और है जो बैठा हुआ है। हमने भीतर की जगह खाली छोड़ी ही नहीं हैं किस्मत के लिए। किस्मत बड़ी ताकतवर है पर उसकी सारी ताकत हम पर बस बाहर-बाहर चलती है। किस्मत भी बाहरी और उसका ज़ोर भी हम पर बाहर-बाहर चलता है। भीतर तो हमारे कुछ और है, उस तक तो किस्मत की पहुँच ही नहीं है। किस्मत ‘उसे’ छू नहीं सकती, ‘वो’ किस्मत से कहीं ज़्यादा बड़ा, महत्वपूर्ण है।‘’ जानो उसको, पाओ उसको जो तुम्हें किस्मत ने नहीं दिया। मैं इनकार नहीं कर रहा हूँ किस्मत के महत्व से। मैं कह रहा हूँ किस्मत होगी महत्वपूर्ण लेकिन उस से कहीं-कहीं ज़्यादा कुछ और महत्वपूर्ण है, उसकी खोज करो, उसी के साथ जियोगे, तो वो मस्ती मिलेगी।


शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: आचार्य प्रशांत: न भाग्य न कर्म,मात्र बोध है मर्म(Neither destiny nor action,just pure realisation)

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १:  तुम्हारे कर्म ही बताएंगे कि तुम कौन हो 

लेख २:  क्या कर्मफल से मुक्ति सम्भव है? 

लेख ३: न ज्ञान न भाग्य 


सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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