किस्मत नहीं, अनित्य तक जाओ

आप जितने तनाव में होंगे, आपको उतनी ज़्यादा जरुरत पड़ेगी मनोरंजन की, मस्ती चीज़ ही दूसरी है।

किस्मत कैसी भी हो, क्या हो सकता है एक ऐसा आदमी जो मस्त रहे?

जो ऐसा हो सकता हो, वही असली आदमी है।

जो कह रहा है, ‘’ठीक किस्मत कब हमारी थी लेकिन हम तो हमारे हैं ना। सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख, अच्छा-बुरा, पाना-खोना इन सब में, हम तो मस्त हैं। बाहर-बाहर ये सब कुछ चलता रहता है, भीतर ये हमें स्पर्श भी नहीं कर जाता क्यूंकि भीतर, तो कुछ और है जो बैठा हुआ है।

हमने भीतर की जगह खाली छोड़ी ही नहीं हैं किस्मत के लिए। किस्मत बड़ी ताकतवर है पर उसकी सारी ताकत हम पर बस बाहर-बाहर चलती है। किस्मत भी बाहरी और उसका ज़ोर भी हम पर बाहर-बाहर चलता है। भीतर तो हमारे कुछ और है, उस तक तो किस्मत की पहुँच ही नहीं है। किस्मत ‘उसे’ छू नहीं सकती, ‘वो’ किस्मत से कहीं ज़्यादा बड़ा, महत्वपूर्ण है।‘’ जानो उसको, पाओ उसको जो तुम्हें किस्मत ने नहीं दिया।


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