मृत्यु का स्मरण – अमरता की कुंजी

new-microsoft-office-powerpoint-presentation-2साँझ पड़ी दिन ढ़ल गया, बाघन घेरी गाय

गाय बेचारी ना मरै, बाघ भूखा जाए

~ संत कबीर

 वक्ता: जीवन का संध्याकाल आता है। स्पष्ट एहसास होता है कि उम्र, अब बीत रही है, और मौत लगातार करीब आती जा रही है।

आदमी का पूरा जीवन ही, क्रमशः बीतते जाने की कहानी रहता है। प्रतिपल हम बीतते जाते हैं, और प्रतिपल, जिसे हम अपना अंतिम क्षण मानते हैं, वो करीब आता ही जाता है, आता ही जाता है। हम चैतन्य रूप से उसका विचार करें, चाहे न करें, पर हर बीतते क्षण, को मन जान ही रहा है। हर बीतते क्षण, के साथ, मौत की आहट, बढ़ती ही जा रही है। मन को विचार रूप में नहीं, तो वृत्ति रूप में, इसका पता है ही।

 क्यों है मौत की आहट? क्यों सुनाई देती है लगातार, मौत की पद चाप? मौत की पदचाप क्यों सुनाई देती है, ये समझना है, तो, समझना ये पड़ेगा कि समय ही क्यों है? जब तक समय है, तब तक मौत का डर रहेगा। जब तक भविष्य है, तब तक मौत का डर रहेगा। है ही क्यों भविष्य? है ही क्यों समय?

 जिसे हम जीवन कहते हैं, उसमें जो कुछ भी है, वो इसीलिए है, क्योंकि वो, भटका हुआ है, खोया हुआ है, टूटा हुआ है, बिछड़ा हुआ है। जीवन में जो कुछ भी ‘है’, जिसे हम होना कहते हैं, सकल संसार, समस्त पदार्थ, सारे विचार, सारे सम्बन्ध, वो मात्र बेचैनी है; दूर होने की बेचैनी, कुछ खोया हुआ होने की बेचैनी, किसी तरह उसको दुबारा पा लेने की बेचैनी।

सब कुछ एक इंतज़ार है, एक अनवरत प्रतीक्षा है दुबारा वहीं समाहित हो जाने की, जहां से सब उद्भूत हुआ था। समय भी इसीलिये है। समय भी मात्र तभी तक है, जब तक, उसका उसके स्रोत से मिलन नहीं हो गया। जीवन भी इसीलिए है, क्योंकि उसका भी उसके स्रोत से मिलन नहीं हो गया है। सारे डर इसीलिए हैं, क्योंकि अभी, बिछड़े हैं, भटके हैं, केंद्र से दूर हैं। यही हमारी सारी बेचैनी का कारण है, यही हमारे सारे विचारों का कारण है, यही हमारी सारी तलाश, का उद्देश्य है। कहते उसे हम चाहे जो हों, नाम उसे हम चाहे जो भी देते हों, पर समय, संसार, विचार, सब सिर्फ़ इसीलिए हैं, ताकि वो किसी न किसी रूप में, हमें याद दिला सकें कि हमें जाना कहां है। हमें वापस मोड़ सकें, हमारी अंतर्यात्रा शुरू करा सकें।

 डर, लगातार मौजूद रहता है, हमारी हर चेष्टा में, और वो डर है ही इसीलिए, ताकि अगर सद्बुद्धि हो, तो दिख जाए हमें  कि और भटकना कहीं पहुंचाएगा नहीं, कि राह बदलनी होगी, घर को वापस जाने वाली राह लेनी होगी। डर इसीलिए है। डर का और कोई उद्देश्य है नहीं। हम जो लगातार डरते रहते हैं, कदम-कदम पर संदेह रहता है, कभी कोई भय, कभी कोई भय, और अंततः मौत का भय रहता है। इस पूरे डर का औचित्य ही यही है कि आप मुड़ जाएं, अपने केंद्र की तरफ़।

 साँझ पड़ी दिन ढ़ल गया, बाघन घेरी गाय।

 ये बाघ इसीलिये आकर आपको घेरता है, और ये बाघ कुछ नहीं जानता, और इस बाघ की कोई इच्छा नहीं है। इस बाघ की भूख ही इसी में है कि गाय मुड़ जाए, अपने घर की तरफ़। बाघ, गाय को खाना नहीं चाहता है। बाघ, गाय को दुबारा मोड़ देना चाहता है कि, ‘’तू जा, मालिक के घर जा।’’ हमें लगता ऐसा है जैसे इच्छा हो कि गाय को मार कर खा जाएगा। नहीं, वो सिर्फ़ ऊपर-ऊपर की बात है।

 ये जो भय रूपी बाघ है, ये जो मृत्यु रूपी बाघ है, ये इसलिए नहीं सताता क्योंकी ये आपको मार ही देना चाहता है। ये आपको इसलिए सताता है, ताकि आप, मृत्यु के पार हो जाएं। साधारणतयाः सोचते हम उल्टा हैं। हम सोचते हैं कि मौत — और मौत माने मौत का खौफ़, सोचते हम ये हैं कि मौत — का खौफ, इसीलिए है, मौत इसीलिए है, ताकी जीवन समाप्त हो जाए। मौत को हमने माना भी यही है, जीवन की समाप्ति। जीवन की? समाप्ति।

 पर ध्यान से देखेंगे आप, तो आपको पता चलेगा, कि मृत्यु, मृत्यु का भय, मृत्यु का स्मरण, इसलिए नहीं है कि जीवन समाप्त होगा, बल्कि इसलिए है क्योंकि जीवन कभी शुरु ही नहीं हुआ। बात को समझिएगा। आम नजरें देखेंगी, तो उन्हें ये दिखाई देगा कि बाघ इसलिए है कि गाय को मार देगा। साधारणतया हम सोचेंगे तो हमें ऐसा लगेगा कि मौत इसलिए है कि जीवन का अंत हो जाए। तथ्य विपरीत है इसके। मृत्यु इसलियए है ताकि आप, जी उठें। मृत्यु इसलिए है ताकि आप, मृत्यु के पार चले जाएं।

 मृत्यु रूपी बाघ को देख कर के आपको, जीवन की नश्वरता, जीवन का सत्य, बिलकुल स्पष्ट दिखाई देने लग जाए। आपको दिखाई देने लग जाए कि आप, जो कुछ कर रहे हैं, उसमें नहीं है सार्थकता, उसमें नहीं है कोई नित्यता, वो नहीं चलना है आपके साथ। भय इसीलिए, बहुत अमूल्य भी हो सकता है। एक दूसरी जगह पर कबीर कहते हैं कि ‘निर्भय होय न कोय।’ भय की बड़ी उपयोगिता है। क्या उपयोगिता है? संभव है ये, कि मृत्यु को सामने देख कर के आप अमर हो जाएं। ये है उपयोगिता भय की। ये होगा ही।

 जिसने मौत से आंखें चार कर लीं, वो मौत के पार पहुंच जाएगा।

 जिसने मौत से आंखें चार कर लीं, वो मौत के पार पहुंच जाएगा। कठोपनिषद् में, नचिकेता, चला जाता है यमराज के पास और अमरत्व पा जाता है। मज़ेदार बात है। हम जीवन भर, यमराज से भागते हैं, और अंततः काल का ग्रास बन जाते हैं, और नचिकेता अपने पांव चल कर के, खुद मांग-मांग के यमराज के पास पहुंच जाता है, और मृत्यु के पार चला जाता है।

 साँझ पड़ी दिन ढ़ल गया, बाघन घेरी गाय।

गाय बेचारी ना मरै, बाघ भूखा जाए

 यदि हम ये कर ही लें कि स्पष्ट साक्षात्कार, मृत्यु से। तो अब मृत्यु का कोई प्रश्न नहीं पैदा होता, ‘गाय बेचारी ना मरै ।’ अब नहीं आएगी मृत्यु, और, जिस कारण थी, सारी बेचैनी, उस कारण का भी उद्देश्य हो गया पूरा। जिस कारण सताता था सारा भय, वो कारण पा गया सार्थकता।

 भय इसलिए नहीं था कि वो, आपके शरीर को नष्ट कर देना चाहता था। इस बाघ की इच्छा ही नहीं थी, कि गाय का शरीर खा ले। क्योंकि शरीर तो कितने ही बार खाए गए हैं। शरीर आ जाते हैं। जब तक अज्ञान रहेगा, तब तक शरीरों का आना जाना, आवागमन लगा ही रहेगा। तो शरीर के खा लिए जाने, से, न तो गाय नष्ट होती है, न बाघ का पेट भरता है, क्योंकि वास्तव में अगर, बाघ की, इच्छा हो ही यही कि गाय को नष्ट करना है, तो शरीर को मारना, गाय को नष्ट करने, का बड़ा घटिया तरीका है। शरीर को मारने, से आप, नष्ट हो भी कहां जाते हैं? कबीर से पूछें, तो वो कहेंगे कि एक शरीर जाता है, तुम दूसरा शरीर ले लेते हो। बात समझ में आ रही है? तो वास्तव में अगर कोई तुम्हें मिटाना चाहता हो, तो वो ऐसे भी तुम्हारा शरीर क्यों मारेगा? शरीर के मिटने से तुम मिटे कहां हो? कब मिटे हो? तुम्हें मिटाने के तरीके दूसरे होते हैं। तुम्हें मिटाने का तरीका ही यही है कि तुम वहां पहुंच जाओ, जहां अमरता है। बात ध्यान से समझिएगा।

 तुम्हें अगर मार दिया गया, तो तुम्हारे लिए समय ज़िन्दा रहेगा, क्योंकि समय का तो अर्थ ही था, भय। शरीर को तुम्हारे जब-जब चोट पहुंची है, जब-जब तुम्हारे शरीर को नष्ट किया गया है, तब-तब तुम्हारा भय और बढ़ा है। भय बढ़ेगा जितना, भविष्य उतना ज़्यादा ताकतवर हो जाएगा। जितनी तुमको चोट पड़ेगी, जितना तुम डरोगे, उतना ज़्यादा तुम भविष्य में आगे बढ़ते जाओगे। ये कह लो कि उतना ज़्यादा, तुम्हारी उम्र बढ़ती जाएगी। जो व्यक्ति जितना डरा हुआ होता है, वो भविष्य में, उतना आगे तक मौजूद हो जाता है, और जो व्यक्ति, जो मन, अमर ही हो गया सिर्फ़ उसका भविष्य नष्ट हो जाता है। भविष्य नष्ट हो गया, मतलब भविष्य के लिए मर गया।

यही कारण है कि कबीर दो बातें कहते हैं, जो सतह पर, विरोधाभासी लग सकती हैं। एक तरफ़ तो कहते हैं, ‘मैं कबिरा ऐसा मरा, दूजा जनम न होय।’  दूसरी तरफ कहते हैं, ‘एक कबिरा ना मरे, जाके राम आधार।’ आपने गौर किया? एक तरफ तो कबीर कहते हैं कि बैद मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार। एक कबीरा ना मरे जाके राम आधार।।

 एक कबीरा? ‘ना मरे।’

 दूसरी ओर वो कहते हैं कि:

 मरण मरण सब कहैं, मरण जाने कोय।

   मैं कबीरा ऐसा मरा, दूजा जनम होय।।

अब दोनों बातें विपरीत हैं, दोनों में से कौन सी बात ठीक है? पहली बात क्या है? ‘मैं कबिरा ऐसा मारा।’

दूसरी बात क्या है? ‘एक कबीरा न मरे।’ दोनों बातें विपरीत नहीं हैं, दोनों बातें एक ही हैं। जो भविष्य के लिए मर गया, वो अमर हो गया। मरने में अमरता है। मरना ही अमरत्व है। इसीलिये दोनों बातें, बार-बार कहते हैं।

 खेत बुहारया सूरमा, मुझे मरण का चाव।

 कहते हैं मरो मरो मरो,क्योंकि जो मरा वो अमर हो गया। किसके मरने की बात कर रहे हैं, मरो? उस अब को मर ही जाने दो तुम्हारे भीतर, जो मरण धर्मा है। जो मर सकता है, उसे मर जाने दो। तुम पाओगे कि उस सब के जाने के बाद तुम अमर हो। वो सब कुछ जो नष्ट हो सकता है, उसे नष्ट हो जाने दो; और वो चला जाएगा, तुम पाओगे कि कुछ बिगड़ा नहीं तुम्हारा, हल्के और हो गए तुम। कुछ बिगड़ा नहीं, हल्के और हो गए।

 …बाघ न भूखा जाए ॥

सारे भय, की जिसमें सार्थकता थी। भय ने वो मुकाम हासिल कर लिया। भय था ही इसीलिये, ताकि तुम भय के पार जा सको। जीवन है ही इसीलिये, ताकि तुम जीवन के पार जा सको। समय है ही इसीलिये, ताकि समय के पार जाया जाए। यही इनके होने का उद्देश्य है। यही इनका औचित्य है। ये हो गया पूरा, तो बाघ भूखा नहीं गया।

 मौत आई, मौत ने सताया; तमाम डर उठें, उन डरों ने सताया, और बहुत अच्छा हुआ इन डरों ने सताया। ये डर जिस कारण थे, उस कारण की उपलब्धि हो गई। बहुत अच्छा हुआ कि हम डरे। ये डरना शुभ था। ये डरना, शुभ था। ये डरना हमें वापस ले आया, हमारे केंद्र की तरफ। यही कारण है कि कई धार्मिक परम्पराओं में, डर का स्थान है। इसाई, मुसलमान, सब कहते हैं, खुदा का खौफ़ खाओ। खुदा का खौफ़ खाओ। ये खौफ़, लाभप्रद है। ये खौफ़ शुभ है। और ये खौफ इसलिये नहीं है क्योंकि आपको डराने में, अस्तित्व को कोई मज़ा आता है। इस बाघ की ये भूख नहीं है कि आप डरे ही रहो, आप डरे ही रहो, समझिएगा। ये डर आपके भीतर उठता ही इसीलिये है, ताकि आप अपने ढर्रे बदल सको। ताकि आप अपनी दिशाएं बदल सको। आप में से जो भी लोग, लगातार, डर के साये में जीते हों, जैसे कि अधिकांश मानवता जीती है। वो समझे इस बात को।

 डर भीतर इसीलिए उठता है, क्योंकि जीवन बदलाव मांगता है। जो दिन-रात की बेचैनी, व्यग्रता, हमें जकड़े रहती है, ये जो बिना बात की एक धुंध सी छाई रहती है। वो इसीलिये छाई रहती है, ताकि आपको सद्गति प्राप्त हो। अस्तित्व को कोई शौक नहीं है आपको डराने का। बात फिर समझिएगा।

 गाय बेचारी ना मरै, बाघ भूखा जाए

 बाघ गाय को खाने आया ही नहीं है। इसीलिये गाय नहीं भी मर रही, तो भी बाघ भूखा नहीं है। क्योंकि गाय का शरीर, इस बाघ का पेट नहीं भरेगा। इस बाघ को तो कुछ और चाहिए। ये गाय को नहीं मारने आया है, ये गाय के भ्रमों को मारने आया है, और गाय के भ्रम जाते हैं तो गाय वहां पहुंच जाती है, जहां कोई मृत्यु है ही नहीं।

 गाय बेचारी ना मरे।

 गाय नहीं मरेगी, बाघ का काम हो गया। हमें लगता ये है कि, ‘’बाघ हमें मारने आया था,’’ वो मारने नहीं, हमें अमर करने आया था। हमें लगता है, ‘’यम मृत्यु के देवता हैं,’’ यम मृत्यु के नहीं, अमरता के देवता हैं, नचिकेता से पूछिए। यमराज से हम डरते हैं क्योंकि हमने आपने आप को शरीर मान रखा है। तो हमें लगता है कि यम, नष्ट कर देंगे हमें। यम इसलिए नहीं हैं कि आपका शरीर नष्ट करें, यम इसलिये हैं ताकि आपका शरीर-भाव नष्ट करें। अंतर समाझिएगा। जब तक आपको ये लग रहा है कि यम आपका शरीर नष्ट करेंगे, तब तक यमराज मौत के देवता हैं। पर जिस दिन आप ये जान लें कि यमराज आपका शरीर-भाव नष्ट करेंगे, देहभाव, देहाभिमान नष्ट करेंगे, उस दिन यमराज अब मौत के देवता नहीं हैं। वो अमरता के देवता हैं।

 ये बाघ गाय को अमरता देने आया था। गाय व्यर्थ ही डर रही थी। गाय व्यर्थ ही डर रही थी। जीवन में जो कुछ भी, आपके सामने चुनौती बन कर खड़ा होता है। वो आपको किसी दूसरे तल पर ले जाने के लिये खड़ा होता है। हर चुनौती, आपकी चेतना को, और साफ़ करती है। उसकी ज्योति को और निखारती है। और इंसान के सामने जो बड़ी से बड़ी चुनौती है, उसका नाम होता है, ‘मौत’। जिसने मौत की चुनौती को हल कर लिया, उसको भारत ने, जीवनमुक्त कहा है। और बड़ी मज़ेदार बात है। मौत की चुनौती को कैसे हल करते हैं? ऋभु कहते हैं,

 नमेजीव इति ज्ञात्वा सजीवनमुक्त इतियोच्य्ते।।

 नमेजीव इति ज्ञात्वा सजीवनमुक्त इतियोच्य्ते।।

जो ये जान ले कि मैं जीव हूं ही नहीं, वो जीवनमुक्त कहलाए।

जीवनमुक्त कौन? जो ये जान ले कि, ”मैं जीव हूं ही नहीं।”

 जो गाय ये जान ले कि मैं शरीर हूं ही नहीं, कौन सा बाघ अब उसे खाएगा? कौन सा बाघ उसे खाएगा? अमर हो गयें। होगा शरीर, मृत्यु नहीं हुई, नहीं कोई दूसरी दुनियां है कि जहां, मौत के बाद जाएंगे, फिर, मोक्ष मिलेगा। शरीर होगा, चल रहा होगा, शरीर के रहते, जीवनमुक्त हो गये।

 खेल अजीब सा ही है। जो मरने से भागा है, उसने पाया है कि वो जहां गया है, मौत ने उसका वहीँ इंतज़ार किया है। जो अपने किसी भी डर से भागा है, उसने पाया है कि वो, जहां गया है, एक और, बड़े से बड़े डर ने उसका इंतज़ार किया है, और भागने के साथ, उसके डर, बढ़ते ही गए हैं। कोई तरीका नहीं है भाग के जाने का। कोई जगह नहीं है, जहां भाग कर के छुपा जा सकता हो। जहां भी जाओगे, तुम ही जाओगे न? तुम्हारा होना ही डर है। तो डर से छुपोगे कहां?

 जो भागा है, उसके डर बढ़ते ही गए हैं, और जो सम्मुख खड़ा हो गया है, डर के, मृत्यु के, उसने पाया है, कि डर है ही तभी तक, जब तक उससे भाग रहे हो। लगातार भागते रहने का ही नाम डर है। डर का अपना कोई वजूद नहीं, तुम्हारे योगदान के बिना। एक तरीके से हम कहें तो, डर तुम्हें नहीं दौड़ाता है, तुम्हारा अज्ञान तुम्हें दौड़ाता है। अज्ञान भीतर है, पर दोष देने की आदत है, तो तुम बाहर कोई वस्तु, व्यक्ति, कोई इकाई पैदा कर लेते हो, जिसके माथे सारा दोष मढ़ देते हो कि उसका डर है। किसी वस्तु का डर है, किसी विचार का डर है, किसी घटना का डर है, किसी व्यक्ति का डर है। वास्तव में कुछ है ही नहीं बाहर, जिससे डरा जा सके। तुम्हारे अपने भ्रमों का ही नाम डर है। वही तुम्हें दौड़ा रहें हैं लगातार। और जितना दौड़ते हो, उतना अपने ही भ्रमों को ताकत देते हो; तो डर का जितना उपचार करोगे, डर बढ़ता ही जाएगा, क्योंकि उपचार कर-कर के तुम, डर को मान्यता देते जाओगे। जो है ही नहीं, उसका उपचार करना, बड़ी से बड़ी भूल है। उसका तो सिर्फ़ सामना किया जा सकता है। उससे तो बस आंखें चार की जा सकती हैं, और तुमने ये किया नहीं कि वो तत्क्षण विलीन हो जाएगा।

 सपना कब रुका है खुली आँखों के सामने?

 सपने को, उपचार कर कर के नहीं मारा जाता। सपने को तो बस आंख खोल दी, हो गया। और पूरा जीवन क्या रहता है? पूरा जीवन, हमारा डरों से भागने की कोशिश है। चाहे हम, घर बनवाते हों, चाहे हम तमाम तरह की सुरक्षा हासिल करना चाहते हों। चाहे हमारे जितने उद्देश्य और महत्वाकांक्षाएं हैं। वो सब, कुछ नहीं हैं वो डर से बचने की हमारी नाकाम कोशिशें हैं। किसी तरीके से डर से बच सकें, और ये कोशिशें कर कर के हम अपने डर को और गहरा ही करते हैं। करने वाले सोचते हैं, होशियार हैं। पैसा इकट्ठा हो जाएगा, मानसिक सुरक्षा के कुछ आयोजन हो जाएंगे, तो, थोड़ा अच्छा सा लगेगा, सुरक्षित अनुभव करेंगे। ऐसा कभी हुआ नहीं। ऐसा कभी हुआ नहीं, क्योंकि आपको, जो डर आया था। आया वो वहीँ से था, जहां से सब कुछ आता है, उसी केंद्र से आया था। एक संदेशवाहक की तरह था कि वापस लौटो। वो इसलिए नहीं था कि जहां हो, वहीँ पर सुरक्षा का आयोजन कर लो। याद है न, कृष्ण बोलते हैं, “मम माया” मेरी माया, डर भी वहीँ से आया था। उन्होंने ही भेजा था। डर तो भेजा था, एक संदेशवाहक की तरह कि जाओ और इस भटके हुए को, वापस लेकर के आओ। लेकिन भटके हुए की बुद्धि, कुछ इतनी मलिन हो जाती है कि वापस आने की जगह डर कर के, जहां होता है, वहीँ पर बैठ जाता है, जैसे लकवा मार गया हो,जैसे सुन्न हो गया हो, जैसे कि तुम किसी को ज़ोर से आवाज दो, ‘आओ’, और वो तुम्हारी ही आवाज़ से भयाक्रांत होकर के, जहां है, वहीँ पर बिलकुल ठिठक जाए। समझ रहे हो बात को? हमारी वो स्थिति हो जाती है।

 डर तो पुकार है, वापस लौटने की। डर का कोई इरादा नहीं है, तुम्हें कष्ट देने का, या कि तुम्हें डर में ही लगातार रखने का। डर उठता इसलिये है ताकि डर मिट जाए, और तुम खिल जाओ। दोहरा रहा हूं, मृत्यु का भय, हमें इसलिये दिया गया है, ताकि हम जीना शुरू कर सकें। इसीलिये इतना ज़ोर दिया है, संतों ने कि मृत्यु को लगातार याद रखो। जितना संत, ये कहते हैं, कि परम को याद रखो, उतना ही ज़ोर देकर के ये भी कहते हैं कि मृत्यु को याद रखो। दोनों एक ही बात है, क्योंकि मृत्यु, भूलिएगा नहीं, परम की ही संदेशवाहक है। तो मौत को याद रखा, चाहे परम को याद रखा, एक ही बात है। बिलकुल एक ही बात है। तुम मौत को ही याद रख लो।

 परम को याद रखोगे, तो अनन्त जीवन में प्रवेश कर जाओगे। मृत्यु को याद रखोगे, तो नश्वर जीवन से बाहर हो जाओगे। दोनों एक ही बात है, कोई अंतर नहीं है।

 बात आ रही है..?

 “मौत अंत नहीं है तुम्हारा। मौत घोषणा है इस बात की, कि अंत हो नहीं सकता तुम्हारा।”जिस किसी ने अपने आप को, पैदा हुआ माना, जिस किसी ने अपने आप को पदार्थ माना, उसी को आता है न मौत का डर? और इसीलिए आता है तुम्हें मौत का डर, ताकि तुम जान सको कि तुमने आपने आप को गलत माना। अगर तुमने सही माना होता, तो उसकी तुम्हें सजा तो नहीं मिलती? जिसने सत्य को जाना, उसे सत्य को जानने की सज़ा तो नहीं मिलेगी न? तुमने अपने आप को कुछ गलत माना, इस कारण तुम्हें ये सज़ा मिलती है, कि डरो। तुमने अपने आप को जन्मा हुआ माना, शरीर माना, पदार्थ माना, उसकी सज़ा मिलती है कि अब डरो। अगर तुम जन्मे हुए हो, तो अब डरो कि मरूंगा।

 चिंतन को, उचित दिशा दें; मौत को देख कर ये न सोचें, ‘’मैं मरने वाला हूं।’’ मौत को देख कर के यही जानें कि, ‘’मैं पैदा ही नहीं हुआ था कभी। अरे भूल कर रहा हूं कि अपने आप को पैदा हुआ समझा, उसी भूल की सजा मिल रही है अब, कि डरना पड़ रहा है मौत से।’’ तो मौत आपकी नासमझी की सज़ा है। मौत वास्तविकता नहीं है। मौत वास्तविकता नहीं है, मौत तो वैसी ही है कि जैसे, आप अपने आप को, कुछ ऐसा मान लें, जो आप हैं नहीं। और फिर उस कारण, ऐसे-ऐसे डरों, को पाल लें, जिनकी कोई सार्थकता नहीं है।

 आप कह दें कि, ‘’मैं वो नन्हा कीड़ा हूं, जो रात में ही पैदा होता है, और अंधेरे में ही पलता है।’’ आप कर लें गहराई से यकीन, और आप बुरी तरह खौफ़ खाएंगे सूरज से। आप कहेंगे, सूरज का आना, मौत है। आपको डर तो लग रहा है सूरज से, पर वास्तव में, ये जो आपका डर है, ये आपका अज्ञान है। आप कह रहे हो, सूरज निकलेगा, मर जाऊंगा। अरे! जब वो, तुम हो ही नहीं, जो अपने आप को समझते हो, तो मर कैसे जाओगे?

 पहले तो तुम एक मान्यता बनाओ, जो मान्यता आधारहीन है। फिर इस मान्यता के आधार पर डरे जाओ। फिर तुम कहो कि, ‘’आदमी का बड़ा दुर्भाग्य है, पैदा होता है, मर जाता है।’’  सोचो, अगर मौत का डर न होता, तो स्थिति, और बड़ी विकट हो जाती।

 कैसे?

अभी तो कम से कम डरते हो, तो तुम्हें एक मौका मिलता है, चेतने का। तुम्हें एक मौका मिलता है, आत्ममंथन का कि कहीं कोई भूल तो नहीं कर रहा हूँ। ये मुझे सज़ा किस बात की मिल रही है? और डर से बड़ी सजा दूसरी नहीं। दिन-रात जीये जा रहे हो खौफ़ में, उससे बड़ी सजा और क्या हो सकती है? तो डर तो तुम्हें एक मौका देता है, अंतर्गमन का। डर शुभ है। डर न होता, तो तुम तो अपनी मान्यताएं लिये ही चले जाते। क्या डरना है? क्या परेशान होना है? क्यों अपने आप को देखना है? सब ठीक चल रहा है, सब ठीक चल रहा है।

 बाघ की भूख, परम का पैगाम है। बाघ की भूख परम का पैगाम है। उसे एक ही भूख है कि तुम वापस आ जाओ, और कोई भूख नहीं है उसे, और उसकी भूख, वास्तव में, तुम्हारी अपनी भूख है, क्योंकि वो तुमसे अलग नहीं है। जितनी व्यग्रता से, तुम वापस जाना चाहते हो, वो वही व्यग्रता है, जिससे वो तुम्हें वापस बुला रहा है। तुम्हारी सारी बेचैनी, उसकी पुकार का ही तो ज़ोर है। वो तुम्हें पुकार न रहा होता, तो तुम बेचैन कैसे होते? इसी को प्रतीकात्मक तौर पर कहा गया है कि जब कृष्ण की बांसुरी बजती थी, तो राधा बेचैन हो जाती थी।

 कृष्ण पुकार न रहे होते, तो राधा बेचैन कैसे हो जाती थी? तुम भी लगातार बेचैन हो, समझो इस बात को कि कोई है जो तुम्हें लगातार पुकार रहा है, इसी कारण बेचैन हो। वो पुकार, वो बेचैनी, हमारी मलिन आंखों को, विकृत रूप में, मौत के भय के रूप में दिखाई देती है। इस मौत के भय को, जिसने सही रूप में जान लिया, वो ये नहीं कहेगा, अरे, मौत! वो कहेगा, कृष्ण की बांसुरी बज रही है, बड़ा अच्छा लग रहा है। ये तो प्रेमी की पुकार है, इससे डरना कैसा? इससे डरना कैसा? परम आनंद है ये, इससे डरना कैसा?

 जिस मरने से जग डरे, मेरो मन आनंद।

कब मरिहौं कब भेटिहौं, पूरन परमानन्द।।

और यही तुम न जानो मौत को, तो मौत से, ज़्यादा बड़ा, दु:स्वप्न कोई नहीं। नाईट मेयर! जान जाओ मौत को, समझ जाओ कि क्या है? उसका बुलावा है। मौत परम का बुलावा ऐसे नहीं होता कि मारने के बाद तुम जाते हो, और कहीं कोई ईश्वर बैठा है, और उससे मिल जाते हो। ये मूर्खतापूर्ण मिथक है। ये जो हमनें कल्पनाएं गढ़ लीं हैं कि मरने के बाद ईश्वर से मिलन होता है, ये पागलपन की बात है। हाँ, मौत का और परम का गहरा रिश्ता ज़रूर है। वो इस तरीके से है कि

उसकी पुकार का नाम है, मौत।

मौत का डर तुम्हारे भीतर इसीलिए है ताकि तुम उसकी ओर मुड़ सको। मरने के बाद नहीं मिलोगे जाकर के। मरने का डर ही काफ़ी है, मरने के बाद की तो छोड़ो। मरने का डर ही काफ़ी है, उससे मिला देने के लिए। समझ रहे हो? तो, मृत्यु को लगातार याद रखें।

 मृत्यु का स्मरण, अमरता की कुंजी है। जिसने मृत्यु को याद रख लिया, वो अमरता में प्रवेश कर जाएगा। वो अपनी अमरता को पा लेगा।


 ~ ‘शब्द-योग सत्र’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Acharya Prashant on Kabir: मृत्यु का स्मरण – अमरता की कुंजी (Immortality in Remembrance of death)

लेख १:   तुम्हें तो मृत्यु पूरा ही मिटा देगी

लेख २:  मृत्यु में नहीं, मृत्यु की कल्पना में कष्ट है 

लेख ३:  जो मौत से नहीं भागता उसे ज़िन्दगी मिल गई 


सम्पादकीय टिप्पणी:

कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।

गगन दमदमा बाजिया 

kbir