साधुता विशेषता नहीं सहजता

दृष्टि का अर्थ ये नहीं है कि तुमने बादलों को चीर कर के सूरज देख लिया।

दृष्टि का अर्थ है कि बादल हैं ही नहीं, कहाँ हैं बादल? मात्र खुला आकाश है और कुछ है नहीं। बात आ रही है समझ में?

इसी लिए साधुता, निर्मलता या दृष्टि विशेष होने का नाम नहीं है, वो और ज़्यादा सहज, सामान्य हो जाने का नाम है। उसका अर्थ है कि तुम पीछे आ गए, तुम केंद्र की तरफ़ आ गए, पीछे घर की तरफ़ आ गए। जो पूरी यहाँ व्यवस्था थी, स्वरचित, वो टूटी। कुछ नया नहीं आ गया है। साधु उसको मत मान लेना जिसके पास कुछ विशेष है, साधु वो है जिसके पास वो भी नहीं है, जो तुम्हारे पास है।

समझो बात को और फिर यही बात उसकी बाहरी व्यवस्था में भी दिखाई देती है। भीतर से भी वो खाली है, उसके पास वो कुछ भी नहीं जो तुम्हारे पास है। तुम्हारे पास क्या है भीतर? तुम्हारे खौफ़ हैं, तुम्हारे सम्बन्ध हैं, तुम्हारे मोह हैं, तुम्हारे आकर्षण हैं, तुम्हारी आसक्तियाँ है। वो भीतर से खाली है, इन सब से और चूँकी वो भीतर से खाली है इन सब से, तो वो बाहर से भी उन सब चीज़ों से खाली हो जाता है जो तुम्हारे पास हैं।


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