निजता वो अदृश्य रौशनी है जो सब कुछ दिखाती है

new-microsoft-office-powerpoint-presentation-2वक्ता: सिर्फ निजता है, जो हक के साथ कह सकती है कि “मैं हूँ, बाकि कुछ है नहीं।’’ ‘है’ शब्द का प्रयोग करने का हक़ सिर्फ़ निजता को है; बाकि सब तो बस लगता है कि है। ‘वो’ वास्तव में है, सब कुछ उसी से उठता है। दो शब्द हैं इसके लिए: निजता और अविभक्तता।

निजता का अर्थ वो, जो पूरी तरह आपका है।

निजता शब्द इस दृष्टि से उचित है कि, बाक़ी कुछ भी आपका निजी नहीं है, वो आपको किसी और ने दिया है।परिस्थितियों ने दिया है या समाज ने दिया है। निजी तो वो न जो आपका अपना हो? उसी को तो आप कहोगे निजी? आपकी आत्मा ही आपकी अपनी से अपनी है, उसके अलावा तो बाकि सब पराया है। तो इसीलिए इन्डिविजुएलिटी  के लिए उचित शब्द है निजता, क्योंकि वही है जो पूरी तरह अपनी है।
दूसरा उचित शब्द है अविभक्तता, इस अर्थ में कि वो विभक्त नहीं हो सकती। वो काटी नहीं जा सकती, उसके टुकड़े नहीं किए जा सकते। ब्रह्म के लिए एक शब्द प्रयोग होता है निरअव्यव, कि उसके हिस्से नहीं होते। तो ये वही है, अविभक्तता, वो विभाजित नहीं की जा सकती, इन्डिविसिब्ल  है, विभाजन नहीं होता उसका। आदमी के मन से जो कुछ निकला है, सब विभाजित हो जाएगा। आदमी के काटने की क्षमता का कोई अंत नहीं है, उसके और टुकड़े करो, और टुकड़े करो, सूक्ष्म से सूक्ष्मतर करते जाओ, और। मात्र वही है जिसका कोई टुकड़ा नहीं हो सकता। क्योंकि वो है ही नहीं इस अर्थ में, जिस अर्थ में हम बाकी चीज़ों को कहते हैं “कि है”, वो है ही नहीं। न वो चीज़ है, न वो है। और मज़ेदार बात ये है कि मात्र वही है, जो वास्तव में है।

तो कुछ अर्थों में देखिए हम जिस दुनिया में रहते हैं, वो कितनी उल्टी है। जो नहीं है वो हमें लगता है कि है और जो है उसके होने का कोई पता ही नहीं चलता। जो नहीं है, वो लगातार प्रतीत होता है कि है, और जो वास्तव में है उसके होने का कोई पता ही नहीं चलता।
तो जिसने पूछा था ये सवाल उसने आगे भी पूछा था “कि कहाँ से आती है?” क्या कहा? कहीं से नहीं आती। आएगी कहाँ से? कोई बाहरी चीज़ है कि आएगी? ठीक है न? ये बात भी बिल्कुल चाक़ू की तरह उतर जाए सीने में कि हम जो भी कुछ कहते हैं, सोचते हैं उसमें कुछ भी नहीं हमारा। और अगर आप इस बात को सिर्फ़ सुनेंगे नहीं, गहराई से भीतर जाने देंगे, तो ठीक इसी समय जीवन बदल सकता है। आपको दिखाई देगा कि आपकी ज़िन्दगी में आप भिखारी के अलावा कुछ भी नहीं है, सब बाहरी है और बाहरी हटा दिया जाए तो आप बिल्कुल नंगे होकर घूमेंगे। कुछ भी नहीं है आपका, जो आपको बाहर से न मिला हो। तब अपनी पूरी निर्धनता सामने दिखाई देती है।
कबीर कहते हैं कि, “सूरमा वो है, जो धनी के लिए लड़े।” परम के लिए कबीर, धनी शब्द का भी बहुत बार इस्तेमाल करते हैं। धनी, इसी अर्थ में कि ‘वही’ है सिर्फ़ जिसके पास अपना कुछ है, हम तो पूरे ही निर्धन हैं। सब दूसरों से मिला है, जो कुछ आपने अपना माना वो दूसरों का दिया हुआ है। जिन तत्वों से मिल रहा है वो तत्व हटा दिए जाएं, एक क्षण आप खड़े नहीं रह सकते। और यही तो ध्यान है न! और क्या है ध्यान? यही तो है कि जीते जा रहे हैं और देखते जा रहे हैं कि एक-एक सांस बाहर से आ रही है, एक एक विचार बाहर से आ रहा है। और हो गया, हो गए मुक्त, जहाँ ये देखा बिल्कुल हो गए मुक्त।
इतनी गहरी निर्भरता है, इतनी गहरी गुलामी है, कुछ नहीं है जिस पर आप न निर्भर हो। आप जानवरों पर निर्भर हो, आसमान पर, धूप पर, हवा पर, सूरज पर, माँ- बाप पर, दोस्त यार पर, पूरे समाज पर। हर जगह से लिया ही लिया है, और परत दर परत लेते जा रहे हो, लगातार लेते जा रहे हो। और जब ये भाव कचोटता है, तब जीवन में कुछ बदलता है कि, ‘’इतने ठाठ से मैं जिसको अपना बोल देता हूँ, उसमें किंचित भी कुछ नहीं मेरा। कुछ नहीं मेरा! एक शब्द नहीं मेरा, एक भाव नहीं मेरा। और मैं अकड़ में घूम रहा हूँ, सब उधार का, इतनी गरीबी! और मैं इस दम पर शेखी बघारता हूँ।”
आप देखेंगे, शरीर को और तरस आएगा आपको, “इस पर फूलता रहता हूँ मैं।” डी.एन.ए  बाहर का, सारी प्रक्रियाएं बाहर की, सब बाहर का, काहे की अकड़ है? एक ज़रा सी गोभी में इतनी ताकत है कि आपको जीवन दे रही है। आप में तो इतनी भी ताकत नहीं कि अपने भोजन का भी खुद निर्माण कर सको। निर्भर हो एक छोटे से पौधे पर। और अभी वो पौधा न हो, तो कहाँ से वो खाते जो अभी खाया? कहाँ गयी सारी अकड़? और ये जिसको आप कहते हो कि “मेरी धारणाएं हैं, मेरे विचार हैं, मेरी दृष्टि है, पूरी ही उधार की। कुछ तो ऐसा है नहीं, जो निकलता हो स्रोत से। कुछ उधर से उठाया, कुछ इधर से उठाया। ‘कहीं की ईट, कहीं का रोड़ा, भानूमति ने कुंबा जोड़ा’ और फिर कह दिया कि, “मेरा कुंबा है, आपका क्या है?’’ कुछ यहाँ से सुना, कुछ वहाँ से सुना और वो सब अधकचरा एक गोदाम में पड़ जाता है, जिसको आप बोलते हो, “मेरा मन है।” आपका मन है?
जैसे डस्टबिन  हुआ कोई, सार्वजनिक डस्टबिन, सड़क पर रखा हो; कभी कोई आया उसमें कुछ डाल दिया, कभी कोई आया उसमें कुछ डाल दिया। और आपका दावा है, “ये मेरा मन है।” और डस्टबिन  इतराता है “देखो, मेरे पास क्या-क्या है। क्या क्या नहीं है, बताओ कौन सा ब्रांड, सारे ब्रांड मेरे पास ही तो आते हैं। बोलो क्या कमी है मेरी जीवन में?” और बड़ा उत्साहित डस्टबिन है, घूम-घूम के कचरा इकट्ठा करता है। शहर के कोने-कोने में जाएगा, देश के कोने-कोने से कचरा इक्कठा करेगा। देश से मन नहीं भरेगा तो विदेश चला जाएगा, वहाँ से भी लेकर आएगा, इंटरनेशनल  कचरा। सी.वी पर लिखने के काम आता है। अहंकार थोड़ा और भारी हो जाता है, और जीवन थोड़ा और बदबूदार।
तो कूड़ेदान ही है जीवन, और उसी का नाम पर्सनैलिटी  होता है, कि लोग आते गए और डालते गए मन में। आपने देखें हैं वो वाले डस्टबिन जो कई बार आदमी की शक्ल में होते हैं, और पाओं से उसका पैडल दबाओ तो उसका सर खुल जाता है? देखा है? और फिर आप उसमें गंदगी डाल देते हो, वो हम हैं। लोग आते जाते हैं, दिमाग खोलते जाते हैं, और उसमें डालते जाते हैं और आप बोलते हो “मेरा जीवन, मेरी धारणाएं।” पैडल दबा, सब अन्दर। “मेरी मान्यता है भाई, होता होगा।” पता भी नहीं है कौन डाल गया, क्योंकि वो रसीद तो देता नहीं है कि डाली है तो ये रही रसीद। आपको ज्ञान भी नहीं है कि किसने कब क्या डाल दिया, जिसको आप अपना समझ के बैठ गए हो। ये मूर्खताएं, ये लालच, ये जलन; आप सदा से ऐसे थोड़ी थे, आपको सिखाया गया है। तुम्हें पता भी नहीं किसने सिखा दिया ये सब, और उसको अपना मान लिया है कि, ‘’ये तो मेरा स्वभाव है।” ये स्वभाव नहीं है, कचरा है, किसी ने भर दिया है। नादान थे, मासूम थे, पता भी नहीं चला कि भर गया।
और अपना मान के बैठो हो। और लड़ाका डस्टबिन  है, उसको साफ़ करो तो गाली देता है। उसमें एक ऑडियो मशीन लगी है, फिल तो हो जाता है पैडल  दबा के, अनफिल करने जाओ तो गाली देगा। अनफिल का बटन दबाओ, तुम बटन दबाओगे कि कचरा निकले; कचरा नहीं गाली निकती है पहले तो। क्योंकि ये वो डस्टबिन है जो सालों से साफ़ नहीं हुआ है। किसी को जान मरानी है साफ़ कर के! ज्यो ही साफ़ करने आएगा उसी को गाली दोगे कि, ‘’मेरी ज़िन्दगी बर्बाद किए देता है, अरे ब्रेन वाश  कर रहा है।”
श्रोता: धोना ही तो है उसको।
वक्ता: इसकी तो चालाकी भी अपनी नहीं है। है बड़ा चालाक, पर वो चालाकी भी सिखा दी गयी है, वो भी अपनी नहीं है। वो भी अपनी होती तो कुछ बात बनती, कि, ‘’चलो स्वभाव है इसका चालाक होना।’’ उसका स्वभाव तो वो भी नहीं है।
अब दिक्कत क्या है? कि उसके सामने अगर कोई ज़रा भी जगा हुआ आदमी जाएगा तो वो डस्टबिन  से सम्बन्ध थोड़ी बना सकता है, बात थोड़ी कर सकता है। उसको हँसी आएगी, वो कहेगा, “किस से बात करूँ? तुम जो कुछ बोल रहे हो सब उधार का है, मैं तुम से रिलेट ही कैसे करूँ? मेरे लिए तुम से कोई भी सम्बन्ध रख पाना असम्भव है, क्योंकि तुम हो ही नहीं, मैं किस से सम्बन्ध रखूं? एक सी.डी प्लेयर से सम्बन्ध रखा जा सकता है क्या? उसकी सी.डी बदल दो वो कुछ और बोलना शुरू कर देगा। उससे मैं क्या सम्बन्ध रखूं? मैं कैसे बोलूं कि सी.डी प्लेयर  मेरा दोस्त है? उसकी सी.डी बोल रही है, थोड़ी देर में दूसरी सी.डी लग जाएगी, दूसरी भाषा बोलने लगेगा। अभी दोस्ती की सी.डी  लगी है, थोड़ी देर में बीवी की सी.डी लग जाएगी, भाषा बदल जाएगी, सब बदल जाना है। कैसे दोस्ती करूँ? कैसे तुमसे बात भी करूँ? तुम्हारे साथ तो एक ही काम कर सकता हूँ, तुम्हारी सफाई; उसके लिए तुम तैयार नहीं हो। तुमसे सम्बन्ध थोड़ी बना सकता हूँ, कैसे बनाऊं बताओ? तुम हो ही नहीं, मैं चाहता हूँ तुम से सम्बन्ध बनाना, पर तुम हो ही नहीं, किससे बनाऊं? तुम तो धारणाओं का पिंड हो एक, उससे कैसे सम्बन्ध बनाऊं? जैसे आते जाते सपने — आज है, कल नहीं — क्या दोस्ती करूँ उनसे? क्षण में बदलेंगे। जैसे रेल का मुसाफ़िर, सामने बैठा है, अभी भाग जाएगा। पता नहीं कहाँ उतर जाना है उसे। कोई स्थायित्व थोड़ी है, कोई नित्यता थोड़ी है। हज़ार तुम्हारे चेहरे हैं, कब बदल जाएंगे कोई भरोसा नहीं। किस चेहरे से सम्बन्ध बनाऊं? किस चेहरे से? मूंगफली के पैकेट से दोस्ती करूँ जो तुममें पड़ा हुआ है? या बर्गर के छिल्के से? थोड़े से सड़े हुए छोले भटूरे पड़े हैं, उनसे यारी करूँ? या थोड़े से अमरिकन हॉट डॉग  पड़े हैं, उनसे दोस्ती कर लूँ?”
पर्सनैलिटी  में सम्बन्ध नहीं बनते। आ रही है बात समझ में? क्योंकि सम्बन्ध बनाने के लिए कोई होना चाहिए। इसीलिए जब भी व्यक्तित्व से व्यक्तित्व का मिलन होगा, पर्सनैलिटी  से पर्सनैलिटी  का, तो जो सम्बन्ध बनेगा वो झूठा ही होगा। दो दिन में टूट जाएगा। मुझे बड़ा मज़ा आता है स्टूडेंट  से बोलने में कि जब मास्क से मास्क मिलता है तब तो एक दूसरे को चूम भी नहीं सकते। चुम्बन के लिए भी नकाब उतारना पड़ता है। और क्या हो रहा है? पति है, पत्नी है दोनों के नकाब हैं और इसलिए कोई सम्बन्ध नहीं है, आपस में। व्यक्ति है और दूसरा व्यक्ति है, दोनों के नकाब हैं उनका कोई सम्बन्ध नहीं है आपस में। ऐसा ही सम्बन्ध है, जैसे भारी कवच पहन के दो लोग गले मिलना चाहें। सोचिए दो योध्दा हैं और दोनों ने खूब ऊपर से लेकर नीचे तक वस्त्र पहने हुए हैं — ऊपर डाल रखा है हेल्मट और नीचे तक पूरा कवच पहल रखा है — और ऐसे ऐसे चल रहे हैं जैसे गोल-कीपर  चलता है, और वो कोशिश कर रहे हैं गले मिलने की। और मिल पाएंगे गले? तो आप से कैसे मिला जाए गले? पूरे ही नकली हो! कैसे?
कुछ तो असली हो जिससे सम्बन्ध बनाऊं। फ़ेक, फ़ेक, एंड फ़ेक। बस यही सज़ा है आपकी कि आपको जीवन में कभी प्रेम नहीं उपलब्ध हो पाएगा; यही सज़ा है। और इससे बड़ी सज़ा हो नहीं सकती, इससे बड़ी सजा नहीं हो सकती। ये श्राप है आपको, “यू विल लीड अ लवलेस लाइफ ।” छोटा मोटा मुद्दा नहीं है, बहुत बड़ा मुद्दा है, कि आप सोचें कि चार पैराग्राफ में खत्म हो गई बात कि पर्सनैलिटी  वो, जो बाहर से आती है और इन्डिविजुएलिटी  वो जो कहीं से नही आती, खत्म।
तो पर्सनालिटी  को जानना ही इन्डिविजुएलिटी  है, ये बात बिल्कुल साफ़ साफ़ समझ लीजिए। निजता यही है कि उसको जान लिया जो मेरा नहीं है। ये जानना ही निजी है। अविभक्तता यही है कि उसको जान लिया जो बाहर से आया है, ये जानना ही सब कुछ है। ध्यान रखिएगा लेकिन कि ये जानना, विचार करना नहीं है। इस जानने का अर्थ नहीं है कि आपने विचार करना शुरू कर दिया कि “मैं ‘मैं’ हूँ, मैं समझ हूँ, मैं बोध हूँ, मैं इंटेलिजेंस  हूँ।” ये विचार नहीं है, ये कोई भाव नहीं है, ये कोई इन्ट्यूशन  नहीं है। ये सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर है, इसका होना न होने के बराबर है। ये आपके जीवन की एक एक तस्वीर को रंग देगा, लेकिन खुद कभी नजर नहीं आएगा। ये रौशनी की तरह है, जो सब कुछ दिखाती है पर खुद कभी नज़र नहीं आती। समझ रहे हैं बात को?
इन्डिविजुएलिटी  वो रौशनी है, जो पर्सनैलिटी  को पूरी तरह रंग देगी। निखर उठेगी पर्सनैलिटी  उससे, जीवन निखर उठेगा, पर उसका अपने आप में कोई अस्तित्व नहीं है। आप जानते हैं आप कभी रौशनी को नहीं देख सकते? आप हमेशा उन पदार्थों को देखते हैं जिन पर रौशनी पड़ती है। पर रौशनी खुद कभी नहीं देखी जा सकती। तो समझ लीजिए कि इन्डिविजुएलिटी  वो रौशनी है। जो है नहीं पर जिसके होने से सब कुछ है। वो अपने आप में कुछ नहीं है, पर जिसके होने से बाकि सब कुछ है। फकीरों ने बड़े मज़ेदार तरीकों से उसका वर्णन किया है, वो कहते हैं “वो पानी का गीलापन है।” खोज के आओ पानी में गीलापन कहाँ होता है? कह रहे हैं “जैसे पानी का गीलापन है, कहीं दिखेगा नहीं, पर है। वो आग की आंच है।” खोज के लाओ आग में आंच में कहाँ होती है? “वो शक्कर की मिठास है।” खोज के लाओ, शक्कर में मीठापन कहाँ है? अलग करो उसको? वो एसेंस है, वो मूल तत्व। वो आसमान का खालीपन है। किसी संत से पूछिए, वो कहेगा “वो कपास का सफ़ेद होना है।” कॉटन  का सफ़ेद होना है। बताओ कहाँ है उसकी सफ़ेदी? अलग करो, दो हाथ में रख दो सफ़ेदी? नहीं कर सकते। वो मूल तत्व है। वो वैसा ही है जैसे शरीर में प्राण। वो प्राण कहीं दिखाई नहीं देते। क्या दिखाई देते हैं?

श्रोतागण: नहीं।

वक्ता: पर उसके होने से ही शरीर है, अन्यथा शरीर किसी काम का नहीं है। तो व्यक्तित्व, पर्सनैलिटी अगर शरीर है, तो इन्डिविजुएलिटी  उसका प्राण है। और जिस शरीर में प्राण नहीं होते, कैसा लगता है, सड़ जाता है, किसी काम का नहीं होता। कहते हैं कबीर:

सो घर शमशान बराबर, जिस घर न ही राम।

जैसे खाल लोहार की, सांस लेत बिन प्राण।।

तो वैसा होता है वो शरीर। लोहारों के पास पहले समय पर एक लैदर बैग होता था, एक खाल होती थी। उसमें वो हवा अन्दर बाहर करते थे, उनकी प्रक्रिया में एक हिस्सा होता होगा। तो वो जो खाल जब उसमें हवा अंदर बाहर होती थी तो वो फ़ूलती थी, पिचकती थी तो उसको आप देखो तो ऐसा लगेगा जैसे सांस ले रही हो, फ़ूल रही है, पिचक रही है। तो कबीर कह रहे हैं “हम भी वैसे ही हैं। शरीर हमारा फूलता है पिचकता है, पर प्राण नहीं है।’’ जिस घर राम नहीं है वो घर शमशान जैसा है, ऐसा जीवन है शमशान जैसा, मुर्दा। जैसे खाल लुहार की सांस लेत बिन प्राण। सांस चल रही है पर प्राण नहीं है, जैसे वेंटीलेटर  पर पड़ा हो कोई, सांस चल रही है।

कि किसी ने कुछ बता दिया और आप उस बात को अपना मान के जीये जा रहे हो, जीये जा रहे हो। इस से बड़ी गुलामी हो सकती है, कि आपने गुलामी हो ही अपना समझ लिया है? आपने गुलामी को ही आज़ादी मान लिया है, यही है आखिरी गुलामी कि मैंने गुलामी को ही आज़ादी मान लिया।
तो चक्र का जो केंद्र है, यदि उसका नाम है इन्डिविजुएलिटी, तो चक्र का जो बाकि पूरा क्षेत्र है उसका क्या नाम होगा?

सभी श्रोता: पर्सनैलिटी ।

वक्ता: आ रही है बात समझ में? ये भी एक तरीका हो सकता है समझाने का। तो बिना केंद्र के कोई चक्र नहीं, और जो चक्र बिना केंद्र के हो, वो चक्र किसी काम का नहीं। भूलिएगा नहीं, उस केंद्र पर आप कुछ हैं नहीं। अगर आप उस केंद्र पर भी कुछ हो गए, तो वो फिर से क्या बन गई?

श्रोतागण: पर्सनैलिटी

वक्ता: इसीलिए समझ किसी की नहीं होती है। कल रात को मैं बोल रहा था कि इन्डिविजुएलिटीज़ अगल-अलग नहीं होती हैं, कि आप बोलें, ‘’मेरी इन्डिविजुएलिटी और तेरी इन्डिविजुएलिटी ।’’ वहाँ कोई पहचान ही नहीं है तो मेरी तेरी क्या? नॉन पर्सनल। हाँ, उसके रंग में जो पर्सनैलिटी रंगेगी वो पर्सनल होगी, वो अलग-अलग होंगी, और बढ़िया है अलग-अलग हो। समझिए बात कुछ ऐसी है कि कहा जा रहा हो कि गेंदे के फूल का और गुलाब के फूल का तत्व एक ही है, पर वो प्रकट अलग-अलग रूप से हो रहा है। तो हम उस तत्व की बात कर रहे हैं, वो तत्व क्या है? वो जो मूल तत्व है दोनों फूलों का, वो क्या है? वो इन्डिविजुएलिटी है। और वो जिस रूप में अपने आपको प्रकट करता है वो क्या है?

श्रोता: पर्सनैलिटी

वक्ता: वो पर्सनैलिटी  है। वो अलग हो, बहुत बढ़िया बात है कि अलग हो, सुंदर हैं, दोनों ही सुंदर हैं।
‘शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।


शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: आचार्य प्रशांत:  निजता वो अदृश्य रौशनी है जो सब कुछ दिखाती है (Imperceptible individuality)

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: समाज द्वारा संस्कारित मन निजता से अनछुआ

लेख २: निजता कहाँ से आती है? 

लेख ३: क्या तुम सिर्फ शरीर हो? 

 


सम्पादकीय टिप्पणी:

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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