जितना पकड़ कर रखोगे, वो उतना दूर होता जाएगा

आपका कोई करीबी है, एक उदाहरण ले रहा हूँ, कोई प्रियजन है आपका, कोई मित्र है, कि रिश्तेदार है, आपको लगता है वो आपसे दूर हुआ जा रहा है। एक ही तरीका है उसको करीब लाने का, उसको बाँट दीजिए, उसको जगत को समर्पित कर दीजिए। आप उसको जितना दे दोगे दुनिया को, वो उतना आपको मिल जाएगा वापिस।

उसको पकड़ कर रखोगे, वो दूर ही दूर होता जाएगा, उसको बाँट दो। मन बहुत काँपेगा, डर जाओगे — “बाँट दूँ? वैसे ही भागा जा रहा है! कह रहे हो कि ‘बाँट दूँ’। भग ही सा गया, बचा ही नहीं है, और ऊपर से कह रहे हो कि बाँट और दूँ, फिर तो एक दम ही नहीं रहेगा।” मैं कह रहा हूँ: “बाँट कर देखो”, बाँटोगे, पूरा मिल जाएगा वापिस। पकड़ कर रखोगे, तो बस अब आख़िरी कील ठोकी जानी बाकी है। ताबूत पूरा तैयार है, आख़िरी कील ठोके जाने की देर है।

बाँट दो।

देखना हो कि किसी ने राम को पाया कि नहीं पाया, तो बस ये देख लो कि उसके चित में उदारता आ गयी है या नहीं आ गयी है। अगर आप अभी भी ऐसे हो कि हाथ में रोटी है, पर सामने से कोई जानवर आ गया, गाय आ गयी और आप आधी उसको नहीं दे पा रहे, तो आपने कुछ नहीं जाना।

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