सत्य न पढ़ा जाता है, न सुना जाता है, सत्य मात्र हुआ जाता है

new-microsoft-office-powerpoint-presentation-2हे स्वान, क्लियर योर माइंड इन दा मोर्निंग, दे हैव सेट मैनी स्नेर्स, निट द नेट ऑफ़ थ्री क्वालिटीज़ एंड ट्रैप दा वर्ल्ड। इफ़ द लैंड लार्ड इज़ बुचर वाई थिंक अबाउट द टेनेंट्स। दोस हु हैव नो डिवोशन आर कॉल्ड डिवोटीस। दे फ्लिंग अवे नेक्टर एंड स्वेलो पोइज़न। दा ब्राइटेस्ट वन हैव संक नॉट लिसनिंग टू व्हाट आई सैड। वाट आई सैड वास टाई यौर बंडल टाइट, एंड स्टे अलर्ट डे एंड नाईट। कलियुग्स क्राफ्टी गुरु एंटाइसेस द वर्ल्ड टू डिस्ट्रॉय इट। वेद एंड क़ुरान आर ट्रैप लेड फॉर पूअर सोल टू टम्बल इन। कबीर सेस इफ़ यू मीट दा वन, हू कैन एक्स्त्ट्रीकेट यू, यू वोंट फॉरगेट इट।

वक्ता: ‘हे स्वान ’, किसको संबोधित कर रहे हैं? आपके भीतर ‘वो’, जो बैठा है, जो समझ सकता है, उससे बात कर रहे हैं। आपकी मूर्खताओं से बात नहीं कर रहे। शुरू में ही बता दिया कि जाहिलों की तरह मुझे मत सुनना, नहीं तो समझ ही नहीं पाओगे। अगर अपना कुत्सित मन ले कर आओगे, तो कुछ सुन नहीं पाओगे इसीलिए फिर सुनो ही मत। हंस की तरह सुन सकते हो तो ही सुनो, ठीक है?

‘हे स्वान, क्लियर योर माइंड इन दा मोर्निंग, दे हैव सेट मैनी स्नेर्स, निट द नेट ऑफ़ थ्री क्वालिटीज़ एंड ट्रैप दा वर्ल्ड। ‘हंस साफ़-साफ़ सुन, शुद्ध मन के साथ मेरी बात को समझ। उन्होंने तुझे फ़साने के लिए बड़े जाल बुन रखे हैं, हंसा। हंसा, जाल बिछा दिया गया है कि जिसमें तू फंस जाए और ये जाल तीन गुणों से बुना गया है। नेट ऑफ़ थ्री क्वालिटीज़, तो ये पूरा संसार है, ये उन्हीं तीन गुणों का विस्तार है। तो हंसा तुझे फ़साने के लिए ये पूरा संसार बुन दिया गया है। बच, बच!`

‘इफ़ द लैंड लार्ड इज़ बुचर वाई थिंक अबाउट द टेनेंट्स’, जब इस पूरे खेल का तत्व ही छल है तो उसकी बारीकियों में क्या जाना? जब पता ही है कि जो पूरी छवि आपके सामने लाइ जा रही है, वो छवि ही स्वप्न मात्र है। तो फिर उस स्वप्न में कौन-कौन से चरित्र हैं, इस पर क्या ध्यान देना? इन बारीकियों पे क्या गौर करना? बड़ा जबरदस्त सपना चल रहा है, है तो सपना ही, क्या करोगे याद कर के कि सपने में कौन-कौन था और उससे तुम्हारा क्या सम्बन्ध था? जो भी हो, जैसा भी हो, है तो सपना ही।

पूरी कहानी सुन कर क्या होगा? तुम्हारी पूरी कहानी ही झूठी है। ‘’क्या करूँगा उसके दाव-पेंच समझ के?’’ ‘दोस हु हैव नो डिवोशन आर कॉल्ड डिवोटीस। ‘ ऐसा लग रहा है कबीर नहीं लाओ त्सू बोल रहे हैं। जब भक्ति ख़त्म हो जाती है, तो भक्त पैदा होते हैं। यही भाषा है ना लाओ त्सू की? ‘दोस हू हैव नो डिवोशन आर कॉल्ड डिवोटीज़ ’। जो असली भक्त होगा, वो पाया ही नहीं जाएगा मंदिर में, जो वास्तव में धार्मिक होगा, बड़ा मुश्किल है कि वो मस्जिद में दिख जाए आपको।

बुल्ला सौम सलात दुगाना, मद पियाले दिन कणाल नी।

उसको याद ही नहीं रहेगा सौम और सलात। असली भक्त को कहाँ से याद रहेगा कि किस प्रतिमा के सामने सर झुकाना है और कब पूजा करनी है और कब उपवास रखना है? कैसे याद रहेगा उसे कि दिन में पांच बार ही सर झुकाना है और सर झुका के क्या-क्या बोलना है? कैसे याद रहेगा? तोते हो तुम? रट-रट के परम को पा लोगे? ईट-पत्थर के मंदिर और मस्जिद की ओर कदम बढेंगे तुम्हारे? होश वहाँ ले जाएगा? ईट-पत्थर में बस्ता है खुदा?

ये भक्ति नाम मात्र की है। वही कह रहे हैं कबीर, दोस हु हैव नो डिवोशन आर कॉल्ड डिवोटीस।

काकंड पाथर जोड़ी के, मस्जिद लिए चुनाए।

तापे मुला बांग दे, बहरा हुआ खुदाए।।

मंदिर के सामने गए, जूते उतार दिए और जिस ज़मीन पर जूते उतार के गए हो वो क्या है? वो राम नहीं है? या राम बस गर्ब-ग्रह में हैं? और मंदिरों के सामने अब तो व्यवस्थित रूप से जगह होती हैं, जहाँ पर आप जूता दीजिए और टोकन वगैरह लीजिए और जिसके हाथ में जूता थमा के आए हो, वो राम नहीं है?

भक्त तो तब, जब जिस के हाथ में थमा रहे हो उसके पांव पड़ गए। नहीं, ये कर नहीं पाओगे। भक्ति तो तब जब जिसके हाथ में जूता थमा रहे हो उसके पाओ पड़ गए कि “राम”। कर नहीं पाओगे। मंदिर, पंडित से और भजन से और मूर्ति से नहीं बनता। ईट और पत्थर की ख़ाली जगह का नाम मस्जिद नहीं हो सकता। कबीर में और पंडित में यही अंतर है: पंडित को अच्छे से पता है कि धर्म क्या है? और धर्म का अर्थ, सिर्फ़ रिवांज़ और अनुष्ठान जानता है, कबीर धर्म नहीं जानते, कबीर ‘उसको’ जानते हैं। ये कहलाती है आध्यात्मिकता।

कबीर किसी दृष्टि से धार्मिक नहीं हैं, कबीर सच्चे अर्थो में आध्यात्मिक हैं। ‘दोस हु हैव नो डिवोशन आर कॉल्ड डिवोटीस । दे फ्लिंग अवे नेक्टर एंड स्वेलो पोइज़न।  जो असली चीज़ थी, जो अमृत तत्व था उसको तो छोड़ देते हैं और इधर-उधर का कूड़ा-कचरा इक्कठा कर के रख लेते हैं। अभी मैंने कहा कि धर्म सिर्फ़ रिवांज हैं, अनुष्ठान हैं और असली चीज़ है आध्यात्मिकता। धर्म की शुरुआत ऐसे ही होती है कि वो आपको, उससे मिला सके। जब धर्म आता है तो उसके केंद्र में आध्यात्मिकता ही बैठी होती है, लेकिन जल्दी ही केंद्र गायब हो जाता है और उसके आस-पास जो कूड़ा-कचरा जो है, वो बच जाता है। वही बात कबीर कह रहे हैं।

‘दे फ्लिंग अवे नेक्टर,’ अमृत को तो फ़ेक देते हैं और जो कूड़ा-कचरा है, उसको इक्कठा करे रहते हैं। एक बड़ी बढ़िया बात, आपको पता ही होगा कि कुछ सालों पहले तक ही मंदिर ऐसे होते थे जिसमें कुछ जातियों का प्रवेश वर्जित होता था। शायद अभी भी होते हों, कोई बड़ी बात नहीं है। सुनने को ये मिला है कि अब मस्जिदों में भी ये होने लग गया है, कि वो अशराफ़ हैं उनकी अलग मस्जिद है, बिचारे जो नीचे वाले हैं उनकी अलग मस्जिद है, सूनी मस्जिद अलग, सिया मस्जिद अलग और ये सब। है ऐसा?

श्रोता: हाँ सर, है ऐसा।

वक्ता: तो एक बेचारा सीधा-साधा ख़ुदा के पास पहुंचा। उसने ख़ुदा से कहा “मस्जिद जाना चाहता था, आपकी पूजा करना चाहता था, लोगों ने घुसने नहीं दिया, लोगो ने कहा, ‘’न, न तुम हमारे जैसे नहीं हो। ये सिर्फ अशराफ़ो की मस्जिद है”, अशराफ़ माने उच्च वर्गीय। तो मुझे निकाल दिया मस्जिद से और मार-पीट कर निकल दिया। भगा दिया, कहा, ‘’तुम नहीं आ सकते।” फिर बोलता है कि “देखिए ये घाव हैं तमाम, मारा है मुझे।” अब ख़ुदा ने उससे कहा “जरा मुझे ध्यान से देख।” ठीक वैसे-वैसे घाव उनके शरीर पर भी थे। उन्होंने कहा “तुझे तो आज निकाला है। मुझे तो सैकड़ो सालों से उस मस्जिद से निकाल दिया था।”

(सब हँसते हैं)

“और जब भी घुसने की कोशिश करता हूँ तो मार-पीट के निकालते हैं, कि तू कैसे आ रहा है यहाँ पर? अरे! ये हमारी साधना की जगह है, खुदा क्या करेगा यहाँ पर?” ‘दे थ्रो अवे नेक्टर एंड स्वालो पोइज़न।‘ मस्जिद याद है, ख़ुदा को भूल गए हैं। मूर्ति याद है और उस मूर्ति में कोई प्राण नहीं है अब, राम कहीं है ही नहीं, मूर्ति है। कौन तो बता रहा था कि वो कृष्ण बड़े-बड़े आते हैं, उन्हें लड्डू गोपाल बोला जाता है। और उसको कोई खीर चटाता है, कोई दूध पिलाता है और रात में ऐसे-ऐसे सुलाते भी हैं। तो यही है अब कृष्ण कहीं नहीं है, ये सब जो कर रहे हैं, इन्हें गीता का ग नहीं पता।

‘दा ब्राइटेस्ट वन हैव संक नॉट लिसनिंग टू व्हाट आई सैड।‘ यहाँ कबीर अगर कह रहे हैं, ‘’व्हाट आई सैड’’ तो कबीर नहीं कह रहे हैं, समझिएगा। कबीर के माध्यम से सच बोल रहा है, कबीर के माध्यम से अस्तित्व की आवाज़ है ये, बिल्कुल भोली, साफ़। और कबीर कह रहे हैं जो उसको नहीं सुनेगा उसका डूबना पक्का है। व्हाट आई सैड वाज़ टाई यौर बंडल टाइट स्टे अलर्ट डे एंड नाईट, टाई यौर बंडल टाइट स्टे अलर्ट डे एंड नाईट। क्या है बंडल तुम्हारा? मन। अरे ज़रा पकड़ के रखो उसको, अपनी गट्ठरी संभालो। सुना है ना, ‘तेरी गट्ठरी में लागा चोर मुसाफ़िर’ उसी बंडल की बात कर रहे हैं।

टाई योर बंडल टाइट, स्टे अलर्ट डे एंड नाईट, जागते रहो। अरे! होश कायम रखो ज़रा। देखिए मज़ेदार बात है, आप गिनतें हैं कबीर को भक्ति के कवियों में, भक्ति के संतो में और कबीर सीधे-सीधे कह रहे हैं “एक ही तरीका है, होश में रहो।” यही बात थोड़ी देर पहले भी कही थी, जहाँ भक्ति है, जहाँ प्रेम है और होश नहीं है, वहाँ बड़ी दुर्दशा होनी है। ‘टाई यौर बंडल टाइट, स्टे अलर्ट डे एंड नाईट।

‘कलियुग्स क्राफ्टी गुरुस एन्टाइस दा वर्ल्ड टू डिस्ट्रॉय इट। वेद एंड क़ुरान और ट्रैप लेड फॉर पुअर सोल्स टू टम्बल इन।’ याद रखिए वो ऋषि नहीं है अब आपके सामने जिसके मुँह से रिचाएं निकली थीं। याद रखिए पैग़म्बर नहीं है अब आपके सामने। उनकी बात अलग थी, उनकी खुशबू अलग थी, उनके होने में कुछ था। उनके होने में वो था कि जिससे रिचाएं निकली थी और आयतें निकली थी, उनके होने में कुछ था। बात सीधी है, समझिए, आज आपके सामने जो बैठे हुए हैं, उनके होने में कुछ नहीं है। ये दो रिचाएं नहीं लिख सकते।

क्यों उपनिषद लिखे जाने बंद हो गए? कोई दैवीय फ़रमान तो नहीं आया था कि कोई अब नया उपनिषद नहीं लिखा जा सकता। कहाँ है कोई उपनिषद अब? और ऐसा गुरु किस काम का जो स्वयं उपनिषद ना लिख सकता हो? नहीं, वो खुद नहीं लिख पाएगा, क्योंकि उसके भीतर वो झरना है ही नहीं, जिससे उपनिषद बहे। तो वो क्या करेगा? वो वेद को और क़ुरान को इस्तेमाल करेगा। यही कह रहे हैं कबीर ‘वेद एंड क़ुरान आर ट्रैप लेड फॉर पुअर सोल्स टू टम्बल इन।’ वो कोट  करेगा, वो स्मृति पे चलेगा, वो इधर से उधर से रट के रखेगा।

उससे पूछो कुछ तेरा भी है? जिस ऋषि को रिचाएं मिली थी, उसने उधार नहीं माँगी थी। वो उसके ध्यान से निकली थी, उसके मौन से निकली थी। तुझसे क्यों नहीं निकलती? एक मात्र सवाल यही है, तुझसे क्यों नहीं निकलती? ख़ुदा मोहम्मद से बोले थे, तुझसे क्यों नहीं बोलते? अपनी बात बता? तूने कौन से पाप करे हैं, वो गिना? वो ऋषि थे उनसे बोले, तू ऋषि क्यों नहीं है? तुझे हक़ ही नहीं है वेद छूने का, अगर तू स्वयं उस वेद का सृजन नहीं कर सकता।

समझिए बात को। तुझे वेद छूने का हक क्या है अगर खुद तेरे भीतर से वेद नहीं निकल सकता? क्योंकि तुझसे नहीं निकल रहा तो वेद तुझे वैसे भी समझ आएगा नहीं। तू ये कर क्या रहा है कि उधारी का उठा लिया और उसको बांच रहा है? जिस दिन खुद तेरे भीतर से ‘वो’ बोलने लगेगा, उस दिन उपनिषद् भी तेरे लिए सार्थक हो जाएंगे। ये बड़ी अजीब सी बात है:

उपनिषद् सार्थक ही उसी के लिए हैं, जो स्वयं उपनिषदों के करीब पहुँचने लग गया हो।

क़ुरान की आयतें समझ में ही उसको आएंगी, जो स्वयं कुछ-कुछ मोहम्मद जैसा होने लग गया हो। अगर आपके भीतर का कृष्ण ज़रा भी नहीं जगा है, तो आपको गीता समझ नहीं आएगी।

बांच-बांच के आप कहीं नहीं पहुँच जाएंगे, कि आप दिन में पचास बार बांचे या पाँच सौं बार बांचे, कुछ नहीं होना है उससे। कबीर कह रहे हैं ‘‘इफ़ यू मीट दा वन, हू कैन एक्स्त्ट्रीकेट यू, यू वोंट फॉरगेट इट।” एक्स्त्ट्रीकेट यू  का मतलब है जो आपको तार सके, जो आपको बचा सके, मुक्ति दे सके। कबीर कहते हैं, ”बड़ा तुम्हारा सौभाग्य होगा, अगर वास्तव में मिल जाए कोई ऐसा, जो तुम्हें तार सके। पोथियाँ तो बहुत बिखरी हुई हैं, पोथियों को बांचने वाले भी बहुत बिखरे हुए हैं, पर ऐसा कोई बिरला ही है जो स्वयं पोथी ही बन गया हो। जो स्वयं ग्रंथ बन गया हो, जिसके भीतर से ग्रंथ अब फूटने लग गया हो।”

देखिए, बड़ा सुविधाजनक होता है मन के लिए ग्रंथो की शरण में चले जाना। यही कह रहे हैं कबीर, ‘’वेद एंड क़ुरान आर ट्रैप लेड फॉर पूअर सोल्स।” मन को बड़ा सुविधाजनक लगता है कि मैं अष्टावक्र को पढ़ रहा हूँ, क्यों? क्योंकि अष्टावक्र आज हैं क्या? अष्टावक्र कहाँ है? अष्टावक्र मात्र क्या बचे अब? एक किताब। ये किताब, किताब आपके कान पकड़ने नहीं आएगी अब। आप करते रहिए बदतमीज़ियाँ, किताब उठ के नहीं बोलेंगी कि “कर क्या रहे हो?” आप किताब का करते रहिए कुछ भी अर्थ, किताब नहीं कहेंगी कि “मैंने ये कब कहा?” किताब आपकी रोज़-मर्रा की हरकतों पर नज़र नहीं रखेंगी।

तो बड़ा आसान है “कि भाई, हम तो किसी फ़लानी किताब को पढ़ते हैं” बड़ी सुविधा है। वही ऋषि, जब तक ज़िन्दा था, अपने शिष्यों को प्रकाश दे सकता था। पर उसके जाने के बाद अब शिष्य राजा है, वो तो अब उस ऋषि के कहे हुए को भी अपने अनुसार अर्थ दे देगा। कोई कृष्णमूर्ति, कोई ओशो आज आपके सामने खड़े हो कर आपको दिशा नहीं दिखा सकते, इसीलिए तो ये होता है ना कि जब तक वो ज़िन्दा थे, उनको पूछने वाले लोग सीमित थे। उसके मरने के बाद उनके अनुयाइयों की संख्या बड़ी बढ़ गई है।

आज जो लोग कहते हैं कि “हम ओशो के भक्त हैं”, अगर वो वास्तव में ओशो के सामने पड़ जाते, तो उन्हें छुपने के लिए जगह नहीं मिलती, डंडा ले के मारे जाते। आज बड़ा आसान है आपके लिए, बड़ी सुविधा है, ओशो आएंगे ही नहीं आपसे कुछ कहने, आप बने रहो ओशो भक्त। होते ओशो तो तुम्हारा होता क्या, ये बता दो? कहाँ ठौर मिलता मुँह छुपाने को? ऐसा पीटे जाते! ओशो जब तक जिन्दा थे, लोग उनसे भागते रहे। यही हाल सबका होता है।

ग्यारह लोगों के साथ जीसस  मरे थे, आज दो अरब ईसाई हैं। जब ईसा थे तब ग्यारह मिले उन्हें और बाकी पूरे जेरुसलेम ने चिल्ला-चिल्ला के कहा “मारो इसको।” आज जेरुसलेम में ईसाई-ईसाई भरे हुए हैं। मरने के बाद सुविधा है ना! मोहम्मद थे तो कितने लोग मुसलमान हो गए? जिंदगी भर लड़ते ही रहे, और दुनिया भर के कर्म कर डाले लोगों ने उनके साथ। तुम्हें क्या लगता है उनकी बड़ी इज्ज़त होती थी? लोगो ने इस हद तक बद्तमीज़ियाँ करी कि उनकी पत्नी तक को नहीं छोड़ा। तुमने पैग़म्बर की पत्नी तक के साथ अभद्रता करी है, और अब आज डेढ़ अरब मुसल्मान हैं।

ज़िन्दे के सामने बैठना खतरनाक है, वहाँ अहंकार को चोट लगती है। किताब में बड़ी सुविधा है, इसीलिए वेद और पुराण खूब चलते हैं। ज़िन्दा तो पकड़ लेगा तुमको, बाल खींचेगा, थप्पड़ मरेगा, कहेगा “बेवकूफ किसको बना रहे हो?” तुम जिन्दा से भागोगे, तुम किताब की शरण में जाओगे, हमेशा। बिल्कुल यकीन मानिए इससे ज़्यादा मज़ेदार दृश्य नहीं होगा कि आज कृष्ण आ जाएँ, कृष्ण भक्तों के सामने। यदि उतर पड़े, तो फिर देखिए भक्त क्या करते हैं। मारेंगे, नोचेंगे, खसोटेंगे, डरेंगे, भागेंगे, छुपेंगे, प्रेम नहीं कर पाएंगे।

मूर्ति के सामने नाच लेने में बड़ी सुविधा है। वास्तव में कृष्ण नाच रहे हों तो उनके सामने नाच के दिखाओ। मूर्ति के सामने क्या ये ता-ता थइया है? मूर्ति कुछ करेगी नहीं ना, पर कृष्ण का कोई भरोसा नहीं है वो कुछ भी कर सकते हैं। वो तो हरि हैं, हर ले जाएंगे तुमको, अपहरण कर ले जाएंगे, तुम्हारी इज्ज़त को ख़तरा है। मूर्ति के सामने क्या है? मूर्ति के सामने जा कर नाचो, मूर्ति के गले लग जाओ, मूर्ति करेगी क्या? कृष्ण के गले लगोगे फिर भरोसा नहीं है। तो इसीलिए कृष्ण से हमेशा बचोगी तुम, वहाँ बड़ा खतरा है।


~ ‘शब्द-योग सत्र’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Acharya Prashant on Kabir: सत्य न पढ़ा जाता है,न सुना जाता है,सत्य मात्र हुआ जाता है(Being in Truth)     

लेख १:  वो तो तुम्हें देख ही रहा है, तुम उसे कब देखोगे ? 

लेख २:  मंदिर- जहाँ का शब्द मौन में ले जाये

लेख ३:   आत्म-ज्ञान ही आत्म-सम्मान  


सम्पादकीय टिप्पणी:

कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।

गगन दमदमा बाजिया 

kbir

                                                                                                                     

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