हम तो हो गए उसके आशिक़, और वो रहा बेपरवाह

हम तो हो गए उसके आशिक़, और वो रहा बेपरवाह। उसकी आशिकी ऐसी कि कहते हैं न कबीर: ऐसा रंगा रंगरेज ने, लालम लाल कर दीनी, कि वो जैसा है, वैसा ही हमको कर देगा। वो बेपरवाह है, तो हमें भी हो ही जाना है। और जो उसके इश्क में पड़ा, उसी के जैसा बेपरवाह न हो जाये, ऐसा होता नहीं। डर लगता है मेरा होगा क्या, क्योंकि ‘मैं’ तो परवाहों का ही पिंड हूँ। परवाह माने: फिक्र, चिंता, उलझन, परेशानी, गम्भीरता, महत्व। मैं और हूँ क्या? जो इसकी परवाह करता है, उसकी परवाह करता है, ये हासिल करना है। और अब लग गया इश्क का तीर! और खत्म होते जा रहे हैं, मरते जा रहे हैं,  दिल में आ के लगा है बिल्कुल! बेपरवाह होते जा रहे हैं।

हम मिटते जा रहे हैं, मिटते जा रहे हैं, डर लगता है। जो कोई मिट रहा है, सम्भव ही नहीं है कि उसको ये डर न लगा हो, न लगता हो। कभी-कभी तो बहुत ही ज़ोर से लगता है, ‘मेरा होगा क्या! ये किस रास्ते जा रहा हूँ!’ ऐसा लगता है जैसे अचानक से किसी ने गला पकड़ लिया हो। अचानक से जैसे कुछ याद आ गया हो कि कुछ छूट रहा है, कुछ छूट रहा है। जैसे तुम किसी के साथ गाते-गाते चले जा रहे हो और बहुत दूर निकल गए हो, तभी अचानक गीत टूटे और तुम खौफ़ में इधर-उधर देखो कि गाते-गाते आ कहाँ गए, ऐसा-सा डर।