सत्य का मार्ग अति सहज है

सत्य का मार्ग अति सहज है, उसमें साहस चाहिए ही नहीं। साहस और डर तो द्वैत युग में है। ये इकट्ठे चलते हैं — जहाँ डर है, वहीं साहस की मांग है। और सत्य में कहीं डर होता नहीं। किसी को अगर डर लग रहा है, वह साहस की मांग कर रहा है, इसका अर्थ एक ही है, क्या? कि उसको जो भी विचार आ रहा है वो निरर्थक ही है। और विचार अधिकांशत: निर्थक होते ही हैं। कोई साहस नहीं चाहिए। जितना अपनेआप से ये कहोगे कि मुश्किल है रास्ता, उतना तुम अपनेआप को यकीन दिला रहे हो कि मुझे चलने की ज़रूरत नहीं। मैं चल ही नहीं पाऊंगा, मेरे बूते से बाहर की बात है, अति कठिन है रास्ता।

डर को समझ जाओ, साहस की कोई ज़रुरत पड़ेगी ही नहीं। जो होगा, सहजता में हो जाएगा। डर बीमारी है; साहस भी बीमारी है। पर चूकि ये समाज द्वैत और अद्वैत के फर्क को समझता ही नहीं, तो ये डर का एक ही इलाज जानता है: कि डर का जो विपरीत ध्रुव है, वहाँ कूद कर पहुँच जाओ। डर का विपरीत ध्रुव है साहस — दोनों में विशेष अंतर नहीं है। डर के पार जाने की शिक्षा नहीं दे पाते; डर के दमन की शिक्षा जरुर दे देते हैं। और वो और ज़्यादा खतरनाक है।