पशुओं पर दया नहीं, उनसे मित्रता

अक्सर जब हम बोलते हैं, ”पशुओं पर दया करो तो हम बड़े कृपालु भाव से बोलते हैं।” बड़ा उसमें अहंकार होता है कि दया करो। अपने पर दया कर लो, पशु को तुम्हारी दया की नहीं, दोस्ती की ज़रुरत है।

दोस्ती कर सकते हो तो करो और दोस्ती में दोनों बराबर होंगे।

दोस्ती में यह नहीं होगा कि ”मैं ऊपर हूँ और पशु नीचे है।’’ तो उस भ्रम से भी बचना है। गाय को रोटी दे रहे हो, क्यों दे रहे हो? गाय पर दया कर के?

गाय पर दोस्ती करके दे रहे हो तो अलग बात है पर अगर गाय पर दया करके दे रहे हो तो देख लेना फिर गड़बड़ ही हो रही है। दोस्ती बिलकुल दूसरी चीज़ है। दोस्ती और प्रेम बिलकुल आस पास की चीज़ें हैं।