गुरु नहीं,गुरु की छवि आकर्षित करती है

वक्ता: बुद्ध से पूछा गया था एक बार कि सच क्या है? ऐसे ही बड़ा गहन प्रश्न कि: सत्य क्या है? उन्होंने एक लाइन में जवाब देकर मामला ख़तम कर दिया। बोले: जो काम आजाये, वही सत्य है।

जो काम करे, उसी को सत्य मानना; बाकी सब बेकार। क्योंकि तुम इंसान हो, तुम्हें जीना है। तुम्हें अवधारणायें नहीं चबानी हैं। तुम्हें जीना है।

जो जीने में मदद कर सके, वही सत्य है; बाकी सब मिथ्या है।

xs

देखिये, एक बात समझिएगा, एक कृष्णमूर्ति को कहना पड़ता है कि “कोई प्रक्रिया होती है किसी के होने में”। मैं कुछ नहीं, मैं जितना कह रहा हूँ, मैं उतना ही कह रहा हूँ, उसके आगे मैं कुछ कह नहीं रहा हूँ, कोई आरोप मत लगाइयेगा मेरे ऊपर। एक कृष्णमूर्ति को कहना पड़ता है कि “मैं किसी प्रक्रिया से गुज़रा”, और उनका प्रोसेस (प्रक्रिया) जानते हैं क्या था? उनकी रीढ़ की हड्डी में यहाँ से यहाँ तक दर्द उठता था, और वो करीब-करीब बेहोश हो जाते थे। घंटों, दिनों-दिनों तक बेहोश पड़े हैं। उनका कहना था कि यही वो रहस्यमय प्रक्रिया थी जिसके द्वारा उन्हें ज्ञान मिला।

एक ओशो को कहना पड़ता है कि उनको जिस दिन बोध प्राप्त हुआ था, उस दिन भी बड़ी महत्वपूर्ण घटनायें घटी थीं। और उसके बाद उन्होंने पाया कि उनकी नाभि से एक चाँदी की एक नाल निकली और वो पेड़ पर बैठे थे, और वो पेड़ से बेहोश होकर गिर पड़े। एक बाग में ये सब चल रहा था।

एक जीसस को कहना पड़ता है कि, “मैं ईश्वर का पुत्र हूँ”।

मोहम्मद को कहना पड़ता है कि “फ़रिश्ते आये थे, वो मुझे कुरान दे गये”।

क्या कह रहा हूँ समझ रहे हैं?

सच कोई सुनेगा नहीं। जो जानना चाहते हों, वो जानें। पर जब आप सार्वजानिक जीवन में उतरते हैं तो आपको बोलना वो पड़ेगा जो काम का हो।

श्रोता १: काम का मतलब?

वक्ता: जो सुना जा सकता हो। और अगर आप वो नहीं बोलोगे जो काम का है, जो सुना जाएगा, तो बहतर है कि आप चुप ही रहो, आप समय नष्ट न करो अपना।

वेदों को पढ़ने वाले बहुत कम बचेंगे अगर ये दावा न किया जाए कि वेद ब्रहमा के मुख से आये हैं। हालाँकि, वेदों में कीमत तब भी उतनी ही रहेगी। क्या फर्क पड़ता है कि किसके मुँह से आये हैं। वेदों की कीमत तो जितनी है उतनी ही रहेगी, पर वेदों को पढ़ने वाले बहुत कम बचेंगे अगर ना दावा किया गया कि ब्रहमा के मुँह से आये हैं।

ओशो से ज़्यादा इस बात को कोई नही जानता था कि मोक्ष जैसी बेवकूफी की बात और हो नहीं सकती। लेकिन उन्हें भी ये दावा करना पड़ा कि मैं मुक्त-पुरुष  हूँ। यही नहीं कि मैं मुक्त-पुरुष हूँ, उन्हें वो दिन भी बताना पड़ा कि इस दिन हुआ था और इस इस जगह हुआ था।

जो नहीं हैं, वो भी है, और उसको इज्ज़त देनी पड़ती है। जब इस बात को समझोगे न तो दुनिया में बहुत सारी बातें खुलेंगी, कि क्यों कुछ ऐसे-ऐसे हुआ। ऐसे-ऐसे क्यों कहा गया। किसी व्यक्ति ने ऐसे काम क्यों करे।

देखो, एक मीरा होना और बात है। वो तो अपने में मग्न नाच रही हैं। उनका किसी को प्रवचन देने का कोई इरादा नहीं है। पर जब आप गौतम बुद्ध हो, तो बात बिल्कुल दूसरी है, क्योंकि अब आप सार्वजनिक जीवन में हो। आपने अपना एक ये लक्ष्य ही बना रखा है कि सत्य मेरे द्वारा दूसरों तक फैलेगा। और जिस किसी ने ये जाना कि मेरे द्वारा दूसरों तक सत्य जाना है, उसको ये समझना पड़ेगा कि जो नहीं है, वो भी है, और उसे उसी हिसाब से इज्ज़त देनी पड़ेगी। लोग अगर सिर्फ़ मुक्त-पुरुष की बात को सुनते हैं, तो आपको घोषणा करनी पड़ेगी कि मैं मुक्त-पुरुष हूँ। क्योंकि जब तक आप ये कहोगे नहीं कि मेरा भी हो गया, कोई आपको सुनने आएगा नहीं। तो या तो आप कह दो कि मुझे किसी से कुछ कहना नहीं। मैं जाग गया, इतना काफ़ी है। और ऐसे भी होते हैं, बहुत हैं, हज़ारों हैं, उनका कोई नाम नहीं जानता, अपने में मस्त हैं।

तो या तो आप ऐसे हो जाओ, अन्यथा, आधे-अधूरे से काम नहीं चलता। आपको भ्रमों को भी इज्ज़त देने पड़ती है। वही कह रहे हैं आष्टावक्र, “जो नहीं है, वो भी है”। माया है, और माया को इज्ज़त देनी पड़ेगी।

जब ये देखोगे तो समझ में आएगा की क्यों ओशो के पास सौ फरारी कार थीं। कौनसी थीं? रोल्स रॉयस कार थीं। और क्यों उनको वो कपड़े पहनने पड़े जो कपड़े वो पहनते थे। वही आदमी था जो एक धोती बांध कर घूमता था। क्यों उसने अपनी वो हालत कर ली जो उसने करी थी। क्योंकि वो जान गए थे कि जो नहीं है, उसमें बड़ी ताकत है; उसमें ‘है’ जितनी ही ताकत है।

कृष्णमूर्ति को कोई सुनने न आता अगर पहले ऐनी बेसेन्ट ने ये घोषणा न कर रखी होती कि ये तो भगवान बुद्ध के अवतार हैं। ‘ऑर्डर ऑफ़ दा स्टार’ उनके पीछे न होता तो यकीन जानिए, कृष्णमूर्ति को एक आदमी न सुनने आता। और आप उसको अगर टेस्ट करना चाहते हो तो अभी जाके कर लीजिये। युवा वर्ग से ही तो आप मिलते हो न, उनके बीच में कृष्णमूर्ति का वीडियो लगा दीजिये और फ़िर देखिये क्या हालत होती है। लोग आपको तभी सुनेंगे जब पहले ही ये उद्घोषणा की जा चुकी हो कि ये तो भगवान बुद्ध के अवतार हैं। अन्यथा, कौन सुनने आ रहा है आपको? कौन उत्सुक है अपना समय लगाने को? तो इसीलिए वो बात को समझ जाते हैं, वो कहते हैं कि फ़िर तो मैं तुम्हारी माया को इज्ज़त दूंगा। तुम माया में जी रहे हो न, तो मैं माया को इज्ज़त दूंगा। पूरी-पूरी इज्ज़त दूंगा। तुम बुद्ध को ही सुनना चाहते हो न, तो लो मैं घोषणा कर रहा हूँ: “मैं बुद्ध हूँ, अब आओ और सुनो मुझे।” जिद्दु कृष्णमूर्ति को तो कोई नहीं सुनेगा, पर मैत्रेय अवतार को तो सुनोगे न? “तो अब आओ, मैं मैत्रेय अवतार हूँ।” जिद्दु कृष्णमूर्ति की क्या औकात है।

श्रोता २: यही कारण हो सकता है कि महावीर को नग्न होना पड़ा।

वक्ता: देखो, महावीर प्रचारक नहीं हैं। उनको तो तुम अवधूत जैसा ही मानो करीब-करीब। उनको तो मौन रहने में ही ज़्यादा रस था। तो वो एक दूसरी श्रेणी के हैं।

जीसस, जोसफ़ के पुत्र की क्या हैसियत है। तो जब दो-तीन हफ्ते पहले पूछा कि ,”क्या है जो छात्र को शिक्षक की ओर लेकर के आता है?”, तो छूटते ही मैंने जवाब दिया था: “शिक्षक की छवि”। और उस छवि पर ज़रा धब्बा नहीं लगना चाहिए क्योंकि छात्र आपके पास फ़िर आएगा नहीं। देखिये, आपको अपना निजी जीवन जीना है तो बिल्कुल कोई बात नहीं, आप कुछ करिए। कुछ करिए। हज़ार रहस्यवादी हुए हैं। भारत की गली-गली में घूमें हैं। पहाड़ों पर रहे हैं। गुफाओं में रहें हैं। वो अपनी मौज में रहे हैं। फ़िर आप जैसे भी रहिये। लेकिन अगर आपको गुरु बनना है, और रहस्यवादी और गुरु में अंतर होता है न; मात्र ज्ञानी नहीं, गुरु। ज्ञानी का ज्ञान उसके लिए होता है। गुरु का अर्थ  है: “जो दूसरे को भी दे सके”। अगर आपको गुरु बनना है, तो आपको अपनी छवि के प्रति भी बड़ा सतर्क रहना पड़ेगा, क्योंकी जो नहीं है, वो भी है। हम जानते हैं कि छवि फालतू बात है, पर  जिससे  आप मिल रहे हो, वो तो छवियों में ही जी रहा है न। उसका ख्याल नहीं रखा तो बात खत्म हो जाएगी। (मुस्कुराते हुए) खत्म  हो गयी न। सतर्क रहिएगा।

मन, मन से ही कटता है। मन का उपयोग करना नहीं जानते हैं आप तो बात बनेगी नहीं।


शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: गुरु नहीं,गुरु की छवि आकर्षित करती है(Teacher’s Image)

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: किसको गुरु मानें? (Whom to take as a Guru?)

लेख २: ग़ुलामी है अपनी छवि के लिए दूसरों पर निर्भरता(To borrow a self-image is slavery)

लेख ३: हर छवि में छवि तुम्हारी (The Imageless in all images)