आत्मज्ञान

विचार सदा संसार की ओर उन्मुख रहता है। हम दृश्य से बंधे रहते हैं और दृष्टा की ओर ध्यान नहीं दे पाते।

बोध की ओर पहला कदम है कि हम संसार की जगह ज़रा अपने आप को ध्यान से देखें।

यही आत्मज्ञान है – अपने कर्मों और विचारों का संज्ञान।

और आत्मज्ञान गहराता जाए तो आत्मबोध होने की संभावना है। वहाँ विचार की तरंगें निर्विचार के मौन महासमुद्र में शांत होती जाती हैं।

 

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