सारे धर्मों के त्याग के बाद क्या?

new-microsoft-office-powerpoint-presentation-2श्रोता: आचार्य जी,  कृष्ण कहते हैं ‘’ सर्वधर्मान्परित्यज्य मोमकं शरणं व्रजः’’ मतलब कि सब धर्म छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ| अष्टावक्र कहते हैं कि सभी धर्म और बंधन त्याग दो, उसके बाद क्या करना होगा, वो कभी नहीं कहते हैं| कृपया, यह स्पष्ट कीजिए|

वक्ता:  कृष्ण कौन है? कृष्ण क्या कोई नया धर्म है? कृष्ण जब अर्जुन से कह रहे हैं- ‘सर्व धर्मम्परितज्य’| तो यहाँ  तक तो ठीक है| यह बात तो अर्जुन के दायरे की है कि ‘’अर्जुन तू है और तेरे द्वारा पालित सारे धर्म हैं| तू है, तेरे धर्म हैं’’ और कहा कि ‘’तू अपने पाले सारे धर्मों को छोड़ दे|’’ यहाँ तक तो बात अर्जुन की थी| इसके आगे की बात कृष्ण की है|

इसके आगे की बात क्या है? ‘मोमकं शरणं व्रजः’, मैं जो एक हूँ, मेरी शरण में आ| अब बात अर्जुन की तो नहीं है,  तो यानी कि अर्जुन की भाषा में तो नहीं की जा सकती| अब बात अर्जुन के मन से आगे की है| अर्जुन के व्याकरण और इस संसार से आगे की है| अब बात कृष्ण की है| कृष्ण कौन है? क्या कृष्ण, जो अर्जुन के दायरे के भीतर जो अनेका-नेक  धर्म हैं, उन्हीं धर्मों में से कोई और नया धर्म है? अर्जुन का दायरा क्या है| अर्जुन का दायरा संसार है, भाषा है, अर्जुन का दायरा भाषा है| अर्जुन का दायरा पूरी मानवता है, हम सब हैं| कृष्ण कह रहे हैं- उसको छोड़|

कृष्ण कह रहे हैं-  ‘उसको छोड़’| फिर आगे तीन शब्द और लगा देते हैं- ‘मेरे पास आ’|

‘अब मेरे पास आ’, क्या वैसा ही है कि उस खम्भे के पास जा, उस पेड़ के पास जा, उस तालाब के पास जा, उस मंदिर के पास जा, उस पुजारी के पास जा, उस शास्त्र के पास जा? उन सब को तो कृष्ण ने छोड़ने को बोल दिया है| कृष्ण  ने कहा है- ‘सर्वधर्म’| जितने धर्म तू जान सकता था| जितने धर्म मानव कृत हो सकते थे, जितने धर्म तेरे दिमाग में आ सकते थे, उन सब को तो तू छोड़ दे| तो उन सब को तो छोड़ दिया| अब बचा कौन? क्या अर्जुन भी बचा? वो सब कुछ छोड़ते ही क्या बचा?

श्रोता: कृष्ण|

वक्ता: तो कृष्ण यह दूसरी बात कह रहे हैं, वो न भी कहते तो चलती| कृष्ण ने यह नहीं कहा है कि सब कुछ पुराने पाँच दस छोड़कर, अब छठे और ग्यारहवें में आ जा| कृष्ण ने कहा है- ‘’सर्व- सब कुछ|’’ सब कुछ माने- अर्जुन की पूरी हस्ती| ‘’छोड़ वो सब कुछ जो तू है, तेरे दिमाग में हो सकता था| उसको भी छोड़ दे जो कहीं जाता|’’ कह ज़रूर रहे हैं कि मेरी शरण में आजा| पर वो आएगा कैसे? क्यूँकी आने के लिए अर्जुन शेष तो बचना चाहिए| जब सारे धर्म छोड़ दिए अर्जुन ने तो अर्जुन भी कहाँ बचा|

अर्जुन कौन? जो समस्त धर्मों में बंधा हुआ अनुभव करता है अपनेआप को| जब सारे कर्तव्यों का त्याग कर दिया, तो अर्जुन जैसा कुछ बचा कहाँ| कृष्ण कौन है फिर? जब अर्जुन गया, तो जो शेष है वही कृष्ण है| अब कहीं जाना थोड़ी है कृष्ण के पास| अर्जुन के हटते ही जो बचा वो कृष्ण| पूरी गीता और क्या है? अर्जुन अड़ा हुआ है, कृष्ण हटा रहे हैं| बाण क्या अर्जुन ने चलाए? अर्जुन तो अड़ा था कि नहीं चलाऊँगा|

कृष्ण कौन? अर्जुन का अभाव ही कृष्ण है |

तो इसमें कोई दो मत नहीं हैं| अष्टावक्र और संक्षिप्त में कह रहे हैं, जो बात कृष्ण ने खोलकर ही बयान की है| अष्टावक्र इतना ही कह देते हैं- ‘छोड़ दो’| कृष्ण ने पुछल्ला जोड़ दिया है कि छोड़कर, इधर आ जाओ| और इधर किधर? इधर-किधर कुछ बचा ही नहीं है| तो मतलब छोड़ना ही सब कुछ है| आप पूछ सकते हैं तो फिर कृष्ण ने ऐसा बोला ही क्यूँ? व्यर्थ ही क्या शब्दों का उपयोग किया? नहीं, व्यर्थ ही नहीं किया| जिससे कह रहे हैं, क्या अभी उसने छोड़ा है? जिस अर्जुन से कह रहे हैं, क्या अभी उसने छोड़ा है? जल्दी बोलिए?

सभी श्रोता: नहीं|

वक्ता: जिस अर्जुन से बात कर रहे हैं, क्या अभी उसने समस्त धर्मों का त्याग किया है? नहीं किया है| यह अर्जुन क्या छोड़ने के लिए उत्सुक है?

सभी श्रोता: नहीं|

वक्ता: आप क्यूँ नहीं छोड़ना चाहते हो?

श्रोता: आगे का पता नहीं|

वक्ता: आगे का पता नहीं| आगे का पता हो, तो छोड़ने में सुविधा रहती है न| अगर आपसे कोई कहे कि बस छोड़ दो और छोड़ने के बाद कुछ मिलेगा नहीं, तो क्या छोड़ोगे? पर अगर कोई कहता है कि छोड़ दो पर छोड़ने के बाद कुछ बहुत बड़ा और मीठा, सुन्दर, कृष्णमय ही मिल जाएगा, तो छोड़ने में आसानी होती है न| तो समझ लीजिये उसके लिए आसान बना रहे हैं कि अर्जुन सारे धर्मों को छोड़ दे| मेरे पास आ न! आ न!

(सभी श्रोता हँसते हैं)

अब यह अलग बात है कि जब सब कुछ छोड़ देगा, तो कौन है जाने वाला और किसके पास जाएगा? जब तक यह बात उसे समझ आएगी, तब तक सब कुछ छूट चुका होगा| हाँ? सहारा दिया जाता है| गुरु को अक्सर सहारा देना पड़ता है| इस तरह की बातें बोलनी पड़ती हैं कि सब अच्छा होगा, सब भला होगा| होगा कुछ नहीं|

तो यह सहारा देने वाली बात है कि कोई बात नहीं, कोई नहीं बचेगा तेरे लिए, मैं तो रहूँगा न| अरे! जब कुछ नहीं बचेगा, तो गुरु भी कहाँ बचेगा|


‘शब्द-योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Shri Prashant on Krishna and Ashatvakra: सारे धर्मों के त्याग के बाद क्या?

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: तुम मूल में निर्गुण हो

लेख २:  कर्त्तव्य सज़ा है नासमझी की 

लेख ३:  जीवन- धर्मों का धर्म


सम्पादकीय टिप्पणी:

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

https://prashantadvait.com/books-in-hindi/