मत बताओ कि क्या जानते हो, दिखाओ कि तुम हो क्या

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कुलवन्ता कोटिक मिले, पण्डित कोटि पचीस।
सुपाच भक्त की पनहि में, तुलै न काहू शीश।।
~ संत कबीर

वक्ता: पंडित भक्त से क्यों निम्नतर है? पंडित कौन है? किसको पंडित कह रहें हैं? हर ज्ञान पंडिताई है क्योंकि ज्ञान होता है मानसिक और जीवन मानसिक नहीं होता, तो ऐसा नहीं है कि कुछ पंडित तोते जैसे होते हैं, जो भी पंडित है वो तोता है। पंडित माने ज्ञान। जहाँ भी ज्ञान है वहां ही तोता-पन है इसीलिए कह रहा था  कि अगर कुछ शब्द पकड़ लोगे जैसे – द्वैत की मार, समर्पण,  तो तुम तोतिया जाओगे। शब्द तो मिल गए हैं पर उन शब्दों का जीवन से क्या लेना देना है।

श्रोता: सर ज्ञान मानसिक  है?

वक्ता: मानसिक क्या है? मानसिक माने वो जो काल्पनिक है । अब जीवन है यथार्थ। और पंडित के पास क्या है?

श्रोता: ज्ञान

वक्ता: और भक्त के पास क्या है?

श्रोता: भाव

वक्ता: भाव नहीं है भक्त के पास। पंडित के पास है  स – म – र – प – ण  (सिर्फ़ शब्द)और भक्त के पास है समर्पण—ये अन्तर है। समझ में आ रही है बात?

पंडित के पास क्या है?
स – म – र – प – ण

भक्त के पास क्या है?
समर्पण

पंडित जिन शब्दों को सिर्फ़ छू सकता है, भक्त उनमें जीता है, और अगर पूछोगे कि क्या चल रहा है तो ज़्यादा अच्छे से कौन बता पाएगा? पंडित। क्या चल रहा है इसका ज़्यादा अच्छा वर्णन हमेशा पंडित करेगा। भक्त तो थोड़ा बेवकूफ जैसा लगेगा, यदि पूछो उससे कि, ‘क्या चल रहा है?’ उस बेचारे के पास शब्द ही नहीं होंगे बता पाने के लिए। वो बताएगा भी तो उल्टा-सीधा कुछ बता देगा। तुम कहोगे कि इस आदमी को कुछ ख़ास पता नहीं है। भाषा साफ़-सुथरी नहीं है, इसकी तो अभिव्यक्ति ही गड़बड़ है। पंडित की अभिव्यक्ति बिलकुल साफ़ होगी। एक-एक शब्द उसका घिसा हुआ, निखरा हुआ होगा।

घिसा होगा, निखरा होगा लेकिन नया नहीं होगा। पंडित की भाषा ठीक वही होगी जो दूसरे पंडितों की भाषा होती है। भक्त की भाषा मौलिक होगी, बिलकुल नयी। सही बात तो यह है कि भाषा को भी भक्तों ने ही आगे बढ़ाया है। पंडित तो सिर्फ पुराने के बीच में चलता है, पुराने शब्द हैं उन्हीं के साथ खेलता है। भाषा में भी नए शब्द जब जुड़ते हैं तो ऐसे ही लोगों से जुड़ते हैं। कबीर की भाषा को इसीलिए कहते हैं सधुक्कड़ी भाषा। वो क्या कर रहें हैं? वो उसमें कई ऐसे मुहावरें जोड़ रहें हैं जो कबीर से पहले थे ही नहीं।

पंडित उधार की भाषा बोलेगा। पंडित कहेग – ये बात शास्त्रों में कही गई है और उसमें लिखि गई है तो चलो बोल दो। भक्त कुछ बिलकुल नया बोल जाएगा। कबीर माया को कभी ठग नहीं बोलेंगे, कभी पूँछ बोलेंगे, मन को कभी कौवा बोलेंगे। अब किसी शास्त्र में नहीं लिखा है कि मन कौवा है। कबीर ने बोल दिया कि मन कौवा है। किसी शास्त्र में नहीं लिखा है कि गूढ़ ब्रह्म ज्ञान देने के लिए तुम कुराल का और सूप का प्रयोग कर सकते हो पर कबीर करते हैं। किसी शास्त्र में नहीं लिखा है कि शरीर झीनी-झीनी चदरिया होती है पर कबीर ने देख लिया। पंडित कभी नहीं कह पाएगा ये सब। भक्त बोल लेगा, भक्त जीता है।

उसका नतीजा क्या होगा? नतीजा ये भी होगा कि ठीक तब जब विशेष ज़रूरत होगी, जब जीवन ही परीक्षा ले रहा होगा तब पंडित की आवाज़ बैठ जाएगी। सभा में, महफिलों में, शेखी बखारने में तो पंडित की ज़बान खूब चल लेगी पर ठीक तब जब जीवन परीक्षा ले रहा होगा तब पंडित के होंठ सिल जाएँगे। तब भक्त बोलेगा, क्योंकि जीवन नया है और पंडित का ज्ञान पुराना।

जीवन की प्रत्येक परिस्तिथि नई है और पंडित का ज्ञान काम ही नहीं आ रहा उसके, वो जवाब कैसे दे। पर भक्त को तो स्मृति से नहीं बोलना है उसको तो ताज़ी परिस्तिथि का ताज़ा उत्तर देना है। स्मृति से क्या करना है? पुराना पढ़ा-लिखा नहीं याद है, कोई बात नहीं। अभी एक स्तिथि आई और ये लो उत्तर।

श्रोता: इसका अर्थ है कि, पंडित के पास परिस्तिथियाँ तो आयीं पर उसने रटा हुआ  है

वक्ता: बेटा, बहुत सूक्ष्म अन्तर है। जिसको तुम रटना बोलते हो और जिसको तुम समझना बोलते हो, दोनों एक ही हैं। तुम अभी-अभी अपनी पढ़ाई से बाहर आए हो वहाँ तुमने दो भेद करें हैं। तुमने एक भेद किया है उन लोगों का जो रटते हैं और दूसरा, तुम उन लोगों को जानते हो जिन्होंने सिर्फ रटा नहीं समझ भी लिया।

श्रोता: समझना तो एक सोच आधारित प्रक्रिया है।

वक्ता: उसके अलावा और क्या होता है? कोई तीसरी चीज़ भी है क्या?

श्रोता: सर, अगर मैंने यहाँ पर कुछ सुना और समझा और अगर मैंने उसे अपने जीवन में लागू ही नहीं किया तो मुझे कैसे समझ में आएगा?

वक्ता: बिलकुल ही गलत कह रहे हो। सुन कर उसे जीवन में लागू करना तो पूरी तरह से रटना है – पंडित ये खूब कर लेता है। पंडित शास्त्रों से जो कुछ सुनता है वो उसे जीवन में पूरी तरह लागू कर लेता है। भक्त ऐसा नहीं होता, इसीलिए कह रहा हूँ कि जिनको तुम रटटू  जानते हो वो तो रटटू हैं ही पर जिनको तुम समझदार जानते हो वो भी रटटू हैं। तुम सिर्फ रटटूओं को ही जानते हो।

समझने का तात्पर्य ये नहीं होता कि शब्द का उचित अर्थ कर लिया, समझने का ये भी तात्पर्य नहीं होता है कि जो सुना उसपर अमल करना शुरू कर दिया;

समझने का अर्थ ये होता है कि  ‘मैं’  ही बदल गया।

मैं अमल कैसे करूंगा? जब अमल करने वाला ही बदल गया। मैं कैसे अमल करूँगा उस बात पर? अगर तुम इस कमरे में आए, तुमने मेरी बात सुनी और जा कर तुम ही उसको कार्यान्वित करने लगे तो क्या फायदा हुआ?

नहीं समझ में आ रही बात?

तुम आए, तुमने कुछ सुना और तुम कह रहे हो कि मैं जा कर इसको अपनी ज़िन्दगी में लागू करूँगा, तो कुछ नहीं हुआ, पर तुम्हें ऐसा लगेगा कि सब कुछ हो गया। सुना भी और कर भी दिया, पर कुछ नहीं हुआ, क्यों नहीं हुआ? सुनने वाले तुम, करने वाले तुम, तो क्या हुआ? सिर्फ रटा है।

समझ का अर्थ ये होता है कि गल गया और समझ में तुम्हें कुछ करने की ज़रूरत नहीं होती है, तुम नहीं अमल करोगे सुनी हुई बात पर, तुम नहीं कहोगे कि – “देखो भाई बात समझ ली है अब ज़रा इसे करेंगे”। वो बात तुम्हारे रेशे-रेशे में समां जाएगी। क्या तुम कहते हो कि मैं अब सांस लूँगा? वो तो अपने आप होने लगता है। तुम्हें उसको लागू नहीं करना पड़ता।

जब तक विचार के कारण कर्म हो रहा है, तब तक समझ नहीं आई है।

जब तक करने से पहले सोचना पड़ रहा है, तब तक समझ का कोई प्रश्न नहीं उठता।

जब तक तुम्हारे कर्म के पीछे कोई कारण मौजूद है, तब तक तुम कुछ नहीं समझे।

बात पर गौर करियेगा

आम तौर पर आप कहते हो कि, “मैं तब समझा जब मैं पूरे तरीके से तर्क दे पाऊं कि कोई कर्म क्यों हो रहा है”। आपसे किसी बात के बारे में पूछा जाए कि ये बात क्या है, और आप पूरा-पूरा उसका अर्थ कर पाओ, उसके सारे कारण बता पाओ, उसके सारे तर्क दे पाओ तो समझ लेना कि आप कुछ नहीं समझे हो।

समझे तब हो, जब तर्क मुक्त आकाश में आ गए।

समझे तब हो जब सत्र से उठ कर जाओ और कुछ नया और विचित्र होने लग जाए ,

और कोई पूछे कि, ‘ये क्या कर रहे हो?’ तो तुम्हारे पास कोई कारण ही न हो बताने के लिए—तब तुम समझे।

अगर तुम्हारे पास कारण है, तुम यहाँ से गए और जाकर उपनिषद का पाठ शुरू कर दिया और किसी ने पूछा कि क्यों पढ़ रहे हो? तो तुमने कहा हम गए थे एक सत्र में वहाँ वक्ता ने कहा कि पढ़ने से फायदा होता है तो हमने पढ़ना शुरू कर दिया। तो तुम क्या समझे? तुम रट के आ गए हो बस। तुम पंडित हो। तुम बहुत बड़े पंडित हो। तुम्हारे पास कारण है, वो कारण क्या है? कारण हमेशा अतीत में होते हैं। तुम्हें भी एक अतीत का कारण मिल गया, क्या कारण मिल गया? किसी दुसरे व्यक्ति ने तुमसे कह दिया कि पढ़ने से लाभ होगा – ये कारण है।

पर अगर तुम यहाँ से उठ कर गए और अचानक कुछ होने लग गया, क्या होने लग गया? कुछ भी हो सकता है या कुछ नहीं भी हो सकता है; तलाश मत करने लग जाना कि कुछ नया अब होना ही चाहिए, अगर समझे होंगे तो कुछ नया होगा। अब नया तो कुछ हो नहीं रहा तो कर के दिखाना है। मन कुछ भी पकड़ सकता है। कोई पूछेगा कि ऐसा क्यों कर रहे हो और तुम कहो कि, ‘पता नहीं अकारण है’, और इतना कह कर उसकी और देखो कि ‘सही बोला है न मैंने!’

(सभी हँसते हैं )

और फिर अगर उसको याद नहीं रहा तो तुम याद दिला दोगे कि, ‘बोला था न अकारण – ये अच्छा वाला होता है। गंदा – कारण और अच्छा – अकारण और ‘हम अकारण हैं’। मन किसी भी चीज़ को पकड़ के बैठ सकता है।


~ ‘शब्द योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Acharya Prashant on Kabir: मत बताओ कि क्या जानते हो, दिखाओ कि तुम हो क्या (Knowledge is not being)

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: न जानने में बड़ा जानना है 

लेख २: ख्याल को तथ्य मत समझ लेना 

लेख ३: समझ और ज्ञान में अन्तर 


सम्पादकीय टिप्पणी:

कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।

गगन दमदमा बाजिया 

kbir