न जानने में बड़ा जानना है

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उद्धरण:

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते

शांति मंत्र को तार्किक मत समझ लीजियेगा, ये तो घोर अतार्किक है;
अतार्किक कहना भी बड़ी तार्किक बात हो गयी।
ये तर्क की सीमा के ही पार है—न तार्किक है न अतार्किक है।

प्रश्न: सर, आप जब अभी शांति मंत्र समझा रहे थे: “पूर्ण मदः पूर्ण मिदं”(पूर्ण से ही पूर्ण आया है) तो एक प्रत्युत्तर तर्क चल रहा था मेरे मन में कि क्या ये तार्किक पूर्ती नहीं कर दी गयी है अंतिम प्रश्न की? क्योंकि हम तो  कार्य-कारण में फँसे रहेंगे तो तार्किक रूप से इसे कह दिया गया हो?

वक्ता: असल में तर्क जहाँ भी होता है वहां पर कार्य और कारण होते हैं। जब कहा जा रहा है कि पूर्ण से पूर्ण आया है तो उसमें तर्क है ही नहीं, वो वैसी ही बात है जब कोई पूछे कि, ‘ये क्या?’ और कोई जवाब दे कि, ‘ये’। कहा जा रहा है पूर्ण से पूर्ण आया है, ‘अ’ से ‘अ’ आया है, ‘ब’ से ‘ब’ आया है , ‘स’ से ‘स’ आया है तो इसका अर्थ है कि कुछ कहीं से नहीं आया है  ! पूर्ण से पूर्ण आया है इसको ऐसे समझिये कि कुछ भी कहीं से नहीं आया है, जो है सामने है।

तुम उसकी उत्पत्ति जानने की चेष्टा मत करो क्योंकि उसकी कोई उत्पत्ति हुई ही नहीं है।

उत्पत्ति हमेशा समय में होती है; जब भी उत्पत्ति कहते हो हमेशा दूरी बना देते हो। दो अलग-अलग बिंदु स्थापित करते हो, जबकि कोई उत्पत्ति हुई ही नहीं है तो इसमें कोई तर्क नहीं है,  तर्क में आप कहते हो कि इसकी वजह से वो हो रहा है – अब ये बात तर्कयुक्त है पर यदि आपसे कोई पूछे कि, ‘ये क्यों हो रहा है?’ और आप बोलो ‘ये बस हो रहा है’ तो क्या ये बात तार्किक है? कोई आपसे पूछे आप क्यूँ हो? आप बोलो ‘बस हैं’, इसमें तर्क कहाँ है? इसमें कोई तर्क नहीं है, इसमें तो गहरी श्रद्धा है।

शांति मंत्र को तार्किक मत समझ लीजियेगा, ये तो घोर अतार्किक है; अतार्किक कहना भी बड़ी तार्किक बात हो गयी, ये तर्क की सीमा के ही पार है—न तार्किक है न अतार्किक है। देखिये, तर्क क्या बोलता ह? तर्क कहता है कि, ‘अ’ बराबर ‘ब’ और ‘स’ बराबर ‘ब’,  तो तर्क क्या कहेगा ?

श्रोतागण: ‘अ’ बराबर ‘स’

वक्ता: अब शुरू में ही कहा जा रहा है कि “यह पूर्ण” और “वह पूर्ण” और दोनों को मिला दिया तो ‘यह’ बराबर ‘वह’, अब क्या ये बात तार्किक लग रही है? ‘यह’ और ‘वह’ तो परिभाषा में ही अलग-अलग हैं, तभी तो आप कह रहें हैं ‘यह’ और ‘वह’। पर आप दोनों को मिलाईये – यह पूर्ण, वह पूर्ण तो दोनों को मिलाते ही क्या निकल आया? “यह बराबर  वह”— ये बात बात तार्किक कहाँ से है? ये तो कहा जा रहा है ‘यह’ और ‘वह’ अलग अलग हैं हीं नहीं।

सीधे सीधे कहा जा रहा है कि तूम बेवकूफ हो

(सभी हँसते हैं)

इधर-उधर की बातें ही छोड़ो, तुम जो कुछ भी सोचते हो, जो कुछ भी देखते हो, जो भी तुम्हारी विचारणा है, जैसा तुमने संसार को जाना है— सब मिथ्या। इसीलिए कहा था कि ये नेति-नेति  का परम वक्तव्य है। उठा उपनिषद से है और वाणी बुद्ध की है और बुद्ध ने जो कुछ भी कहा वो यही था।अब ये मज़ेदार बात है कि शांति मंत्र में कहीं बुद्ध का नाम नहीं जुड़ा हुआ और बुद्ध की वाणी में कहीं पूर्णता शब्द आता नहीं लेकिन बात ये बिलकुल वही है।

श्रोता: सर, ज़रूरी तो नहीं कि वैसा न ही हो जैसा हमें दिख रहा है

वक्ता: आज तक हुआ है ऐसा कि कुछ भी जो प्रतीत हुआ हो वही हो? कभी हुआ है? अनुभव क्या इस बात का साक्ष्य देता है? ठीक अभी, एक प्रयोग कर लेते हैं – क्या मैं वही कह रहा हूँ जो सुन रहे हो?

श्रोतागण: नहीं

वक्ता: यही तो कह रहा है शांति मंत्र कि जो भी तुम्हें लग रहा है वो है ही नहीं। कुछ पक्का है क्या कि मैं क्या कह रहा हूं? कुछ पक्का है तुम कौन हो सुनने वाले ? कुछ पक्का है मैं कौन हूँ कहने वाला? लेकिन तुम्हें पक्का है, अपनी ओर से पक्का है। हम ऐसे लोग हैं जिन्हे कुछ पता नहीं पर जिनका दावा लगातार यही है कि उनको पता है।

शांति मंत्र तुम्हें बता रहा है कि ज़रा विनय धारो, जब नहीं जानते तो चुपचाप कहो कि नहीं जानते और इस न जानने में बड़ा जानना है। जिसने ये जान लिया कि ये सब जानना मूर्खता है वो तत्काल जान गया और जो जानता रह गया वो कभी नहीं जानेगा ।


~ ‘शब्द योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Acharya Prashant on Upanishads: न जानने में बड़ा जानना है (The splendor of not knowing)

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लेख १: शान्ति कैसे पाएँ?

लेख २: बोध और शान्ति पाए नहीं जाते

लेख ३: शान्ति का प्रयास ही अशांति है