किसको गुरु मानें?

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उद्धरण:

ये कितना अश्लील तरीका है कहने का कि, ‘मैं गुरु बनाऊंगा’, यह करीब-करीब वैसी ही बात है जैसे कोई कहे कि ‘मैं ब्रह्म बनाऊंगा।’

आप गुरु करोगे क्या? गुरु क्या है? कामवाली है क्या आपकी?

टैक्सी करी जाती है ऐसे ही गुरु कर रहें हैं पर यही होता है – जैसे दुकानों में जाकर आप अन्य चीज़ें करते हो, ख़रीदते हो वैसे ही आजकल गुरु शौपिंग हो रही है; एक दूकान दो दुकान, ‘मैंने ख़रीदा है!’

वक्ता: ये पूर्वनिर्दिष्ट है कि आपको गुरु मिलेगा पर इस प्रारब्ध को आप मानते कहाँ हो! आपको तो जब मिल रहा होता है तो आप छोड़-छोड़ के भागते हो। प्रारब्ध का अर्थ होता है होता है वो जो टल नहीं सकता, वो जो होकर रहेगा; वो नहीं जो होगा। प्रारब्ध का अर्थ होता है ‘जो है ‘; जो आपकी नियति है, जो होना ही होना है, जो हो ही रहा है पर आप उसके आगे समर्पित कहाँ रहते हो? (व्यंग करते हुए) आप तो कहते हो “न, प्रारब्ध कुछ और कहता होगा हम कुछ और करके दिखायेंगे, हमारे पास पुरुषार्थ है। प्रारब्ध हमारा भले ही मुक्ति हो पर हम गुलाम बन के दिखायेंगे; जी साहब हमारी भी कोई हस्ती है कि नहीं!”

श्रोता: सच्चे और अच्छे गुरु की क्या परिभाषा है? कैसे जानें कौन सा सच्चा है?

वक्ता:  न वो सच्चा लगेगा न अच्छा लगेगा

(सभी हँसते हैं)

श्रोता: तो फिर किसको गुरु बनायें फिर?

वक्ता: जिसको भी आप  बनायेंगे वो सच्चा और अच्छा होगा, और ठीक इसीलिए न वो सच्चा होगा न अच्छा होगा।
आप गुरु बनाओगे तो ठीक तो वैसे ही बनाओगे जैसे आप खिचड़ी बनाते हो।

श्रोता: मिलना चाहिए ऐसा गुरु जो सच्चा हो और अच्छा हो तो उसी को बनायेंगे, वो कैसे ज्ञात हो?

वक्ता: आपको तो बहुत कुछ ज्ञात हुआ है और जो कुछ आपको आज तक ज्ञात हुआ है उसी ने आपको बीमार किया है। आपको ज्ञात हुआ कि किसको दोस्त बनायें? वो दोस्त आप पर भारी पड़े; आपको ज्ञात हुआ कि जीवन कैसे जियें, अब जीवन आपको भरी पड़ा; अब आपको ज्ञात हुआ है कि किसको गुरु बनायें, तो वो गुरु आप पर भारी पड़ेगा।

ये कितना अश्लील तरीका है कहने का कि ‘मैं गुरु बनाऊंगा’, यह करीब-करीब वैसी ही बात है कि ‘मैं ब्रह्म बनाऊंगा।’ आप गुरु करोगे क्या? गुरु क्या है? कामवाली है क्या आपकी? टैक्सी करी जाती है ऐसे ही  गुरु कर रहें हैं। पर यही होता है, जैसे दुकानों में जाकर आप अन्य चीज़ें करते हो, ख़रीदते हो वैसे ही आजकल गुरु शौपिंग हो रही है; एक दूकान दो दुकान; ‘मैंने ख़रीदा है!’

अंततः आप उसी को गुरु बनाते हो, जैसे आप होते हो, जैसे आप हो वैसे किसी को पकड़ लाओगे। जिसकोआपने  चुना है, वो कभी भी आपको आपके चुनाव से आगे नहीं ले जा पायेगा क्योंकि वो आया ही कैसे है? वो आपके चुनाव द्वारा ही आया है।आपने चुना ना, तो आपको आपसे आगे कैसे ले जाये पायेगा?

वास्तविक गुरु को आप नहीं चुनते, वो आपको चुनता है और आपको पता भी नहीं चलेगा कि उसने आपको क्यों चुन लिया है। वो अचानक आएगा, आपके सिर पे हाथ रख देगा और चूँकि वो अचानक आएगा तो बहुत सम्भावना होती है कि आप उसे ठुकरा दो।

श्रोता: लेकिन गुरु अगर सच्चा है तो वो तो छोड़ेगा नहीं, वो तो पकड़े रक्खेगा।

वक्ता:  बहुत सारे सच्चे नहीं होते ना। गुरु अगर सच्चा है  माने क्या  होता है?

श्रोता: नहीं-नहीं, वो नहीं छोड़ेगा भाई। आप भटकने भी लगोगे, गुरु का काम ही यही है कि वो आपको भटकने भी नहीं देगा, आपको पकड़ के दुबारा सही रस्ते पर लेकर आएगा।

वक्ता: कोई गुरु आपकी स्वतंत्रता में बाधा नहीं डालता, अहंकार भी यदि उन्मत्त स्वतंत्र घूमना चाहता  है तो गुरु उसे घुमने देता है। गुरु आपको बस उतना ही देगा जितना लेने के लिए आप सहज भाव से तैयार हो। गुरु आपको बन्धन भी दे सकता है, नियम कायदे भी दे सकता है पर वो तभी देगा जब आप मांगो। जब आप कहोगे कि आप मुझे व्यवस्था दें और आप जो भी व्यवस्था देंगे मैं पालन करूँगा तब दे देगा पर वो आपके पीछे नहीं दौड़ेगा व्यवस्था देने के लिए। अगर तुम इसी में खुश हो कि तुम्हें इधर-उधर दौड़ मचानी है, कूद-फांद, तो करो। वो दूर बैठा देखता रहेगा की ठीक है, जब मन भर जाये तो आ जाना।

श्रोता: सर क्या ये ज़रूरी है कि गुरु शारीरिक रूप में ही हो या निराकार रूप में ?

वक्ता: आपके लिए कुछ भी ऐसा है जो शारीरिक रूप में ना हो? कोई भी ऐसी चीज़ बताइए जो आपको हो और फिजिकल ना हो।

श्रोता: ईश्वर

वक्ता: ईश्वर आपके लिए शारीरिक नहीं है तो क्या है? जब आप इश्वर बोलते हो तो क्या आपके सामने कोई भी छवि नहीं आती ? जब आप कहते हो भगवान, ईश्वर या जो भी कहते हो, यह कहते ही क्या आपके मन में कोई छवि नहीं आती ?

श्रोता: आती है।

वक्ता: इसका मतलब आप जिसे भगवान बोलते हो वो बस एक शारीरिक चीज़ ही है। जब सब कुछ आपके लिए शारीरिक है तो गुरु को भी शारीरिक होना पड़ेगा अन्यथा आपके लिए उसका क्या अस्तित्व? गुरु वास्तव में आत्मा है, विशुद्ध, निराकार लेकिन आपको निराकार से क्या लेना-देना, आप तो मात्र साकार में जीते हो, आप तो सिर्फ उसको जानते-समझते, खाते-पीते, साथ रहते हो जो आकार  युक्त हो तो गुरु भी आपके काम तभी आ सकता है जब वो आकार युक्त हो, वरना निराकार से आपका क्या लेना देना? निराकार यदि आपके काम आसकता तो आ गया होता। निराकार कहीं गया है? वो तो है, आपके क्या काम आया ? आपके काम तो साकार ही आएगा।


 

~ ‘शब्द योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Acharya Prashant: किसको गुरु मानें? (Whom to take as a Guru?)

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लेख १: गुरु तुम्हारी बीमारी के कारणों का कारण जाने

लेख २: गुरु वचन – अहंकार नाशी

लेख ३: गुरु से मन हुआ दूर, बुद्धि पर माया भरपूर