अपने ऊपर भरोसा क्यों नहीं है?

प्रश्न: सर, मैं किसी भी काम में कॉन्फिडेंट महसूस क्यों नहीं कर पाता ?

वक्ता: हम्मकॉन्फिडेंस पर बात करें? कॉन्फिडेंस का मतलब है – ‘यकीन’ । कुछ पक्का जानना । विश्वास, कि ऐसा ही है । हम पाते हैं कि हमें किसी भी बात पर यकीन ही नहीं रहता । अक्सर हम यह शिकायत करते हैं कि आत्मविश्वास की कमी है । शिकायत हमारी यही रहती है ना? कॉन्फिडेंस को तुम लोग आत्मविश्वास के नाम से जानते हो । तुम्हारे शिकायत के शब्द रहते हैं कि हममें आत्मविश्वास नहीं है । लेकिन अगर गौर से देखोगे तो पाओगे कि हमें विश्वास ही नहीं है ।

बात सिर्फ़ आत्मविश्वास की नहीं है । ‘हमें विश्वास ही नहीं है । हमें किसी भी व्यक्ति पर, चीज़ पर, घटना पर, किसी भी बात के होने पर यकीन ही नहीं है । हमें यह भी ठीक-ठीक यकीन नहीं है कि हमारे पाँव-तले ज़मीन है कि नहीं है । यह सुनने में अतिश्योक्ति लगती है, पर बात ऐसी ही है । तुम जिन भी बातों पर बड़ा गहरा यकीन करते हो, कोई आकर, कुछ भारी और तीख़े तर्क देकर, उन सब यकीनों को हिला सकता है । तुम्हारे पास ऐसा कुछ भी नहीं है, जो जड़ से उखाड़ा न जा सकता हो ।

तम्हें किसी की दोस्ती पर यकीन है और तुम्हें पक्का पता है कि वो तुम्हें धोखा नहीं देगा, तुम्हारे साथ रहेगा, लेकिन आकर दस तर्क दिए जायें, तो ऊपर से तुम भले ही यह कहते रहो “नहीं, नहीं, नहीं, मुझे फर्क नहीं पड़ता । मुझे मेरे दोस्त पर विश्वास है” । लेकिन तुम आन्तरिक रूप से हिल चुके होगे । तुमने कोई पेपर बहुत अच्छा दिया हो, लेकिन कोई तुम्हें आकर बताये कि तुम उसमें फेल हो गए हो, तो भले ही तुम कितना विरोध करो, भले ही तुम कहो कि यह तो हो ही नहीं सकता लेकिन अंदर ही अंदर शक़ का, संदेह का कीड़ा बुलबुलाने लगेगा । तुमको लगेगा कि क्या पता, कोई चूक हो ही गयी हो मुझसे और क्या पता जाँचने वगैरह में कोई गड़बड़ हो गयी हो ।

“हमें किसी भी बात पर यकीन नहीं है क्योंकि जो कुछ भी हम जानते हैं वो हमारा अपना नहीं है । उसे हमने खुद कभी जाना नहीं है ।

वो हमें लगातार इधर से, उधर से, बाहर से ही मिलता रहा है और हम उसको स्वीकार करते गए हैं । जो कुछ भी बाहर से आता है ना, सुना-सुनाया है या पढ़ लिया है या बस परम्परा के रूप में पालन किया है, उसका तुम कितना भी अनुसरण कर लो, उसको तुम कितने भी दिन तक जी लो लेकिन उसकी वैधता में, उसके होने में तुम्हें कभी गहरा यकीन आ नहीं सकता । वो ज़रा-सा संदेह बचा ही रह जाता है और वो ज़रा-सा संदेह काफी होता है ज़िन्दगी को बिल्कुल विषाक्त कर देने के लिए । जैसे ज़हर की एक बूँद काफ़ी होती है ना? एक बड़ा-सा पात्र हो, उसके लिए ज़हर की एक बूँद ही काफ़ी होती है । वैसे ही मन के लिए एक ज़रा-सा संदेह काफ़ी होता है । सब ख़त्म हो जाएगा ।

तो फिर बात यहाँ पर आती है कि हमारे पास हमारा कुछ है क्यों नहीं? हमारे पास जो भी कुछ है, जो भी कुछ मन में, दिमाग में चलता रहता है, वो बाहर से ही क्यों आया है? तो हम पहले यह साफ कर लें, हम किसकी बात कर रहे हैं । क्या है हमारे पास जो हमारा हो सकता है? हम दुनिया की ही तो बात कर रहे हैं ना? आपके पास बाहर से भी जो बातें आती हैं, जो धारणाएं आती हैं, वो दुनिया के बारे में ही तो आती हैं ना? यही तो कहा जाता है ना तुमसे कि दुनिया ऐसी है, दुनिया वैसी है; जीवन में ये करना चाहिए । घर ऐसा है, परिवार ऐसा है, समाज ऐसा है, देश ऐसा है, स्कूल-कॉलेज ऐसे हैं, ऑफिस ऐसे हैं, आदमी ऐसा है, औरत ऐसी है, हिन्दू ऐसा है, मुसलमान ऐसा है । यही सब बातें तो आती है ना? जो भी बातें तुम्हें आज तक कहीं से भी मिली हैं, उन सब का विषय एक ही है । क्या है विषय? ‘दुनिया’, ‘संसार’ । तुम्हें जो कुछ भी ज्ञान, सूचना, जानकारी दी गयी है, वो किस विषय के बारे में दी गयी है? संसार के बारे में ही तो दी गयी है । संसार के बारे में जानकारी तुमने कहाँ से ली है? बाहर से ले ली है ।

एक बात मुझे थोड़ा हैरत में डालती है, तो मैं तुमसे यह पूछना चाहता हूँ- ‘संसार को जानने के लिए किसी के भी पास क्या उपकरण हैं, पहली बात । और दूसरी- जिस संसार को जानना है, वो कहाँ पर है? हम कह रहे हैं कि हमने जो भी सूचना ली है बाहर से , वो संसार के बारे में ली है । संसार के बार में हमने इधर से, उधर से, दायें से, बायें से, तमाम अप्राथमिक स्रोतों से सूचनाएं इकठ्ठा कर ली हैं, सुनकर, देखकर । अब मैं तुमसे पूछ रहा हूँ, कोई भी अगर तुम्हें संसार के बारे में सूचना देता है, तो उसके पास वो सूचना कहाँ से आई होगी? कैसे?

श्रोता १: उसने भी कहीं देखा होगा या सुना होगा ।

(सब एक स्वर में जवाब देते हैं )

वक्ता: देखा होगा या सुना होगा । तो संसार को जानने का किसी के भी पास माध्यम यही है, या तो आँखें या कान या छूना; इन्द्रियाँ और मन । इसके अलावा तो कोई तरीका नहीं है किसी के भी पास संसार को जानने का; यह हुई पहली बात । और दूसरी बात- जिस संसार के बारे में तुम्हें इतनी सूचनाओं से भर दिया गया है, वो संसार है कहाँ?

सभी श्रोता: हमारे आसपास ।

वक्ता: तुम्हारे ही आसपास है । इसी दुनिया के बार में ही तुम्हें ज्ञान दिया गया है । क्या यह तुमसे बहुत दूर है? क्या यह किसी और ग्रह पर है?

श्रोता २: नहीं ।

वक्ता: तो यह थोड़े ताज्जुब की बात नहीं है कि जो संसार तुम्हारे बिल्कुल इर्द-गिर्द है, सामने है और जिस संसार को जानने के साधन तुम्हारे पास मौजूद हैं, उस संसार के बारे में तुमने जानकारी कहाँ से इकठ्ठा करी? किसी और से पूछकर ।

यह ऐसी ही बात है कि मेरे सामने रोहित बैठा हो (एक श्रोता को इंगित करते हुए), सामने बैठा है और मैं उसका नाम किसी और से पूछ रहा हूँ । रोहित उपलब्ध है । मैं खुद जान सकता हूँ और मेरे पास ज़बान है पूछने के लिए, आँख है देखने के लिए और कान है सुनने के लिए । रोहित सामने था और मेरे पास ताकत थी, साधन थे ख़ुद जानने के, पर मैंने क्या किया?

श्रोता २: दूसरे से पूछा ।

वक्ता: अब दूसरा मुझे जो भी जवाब देगा, उस जवाब में अगर मुझे विश्वास न हो, तो हैरत क्या है? क्योंकि जवाब मुझे रोहित से तो मिला नहीं है । मुझे जवाब किससे मिला है? मुझे जवाब किसी और से मिला है । तुम्हारे पास भी बहुत जानकारी है दिमाग में और जो कुछ है तुम्हारे दिमाग में, उसका तुम्हें पक्का यकीन नहीं है । वही विश्वास की कमी कहलाती है । आत्मविश्वास उसी से सम्बंधित है । जब तुम्हें किसी बात पर विश्वास नहीं, तो फिर अपने ऊपर कैसे हो जाएगा? यकीन होने के लिए तुम्हारी मौजूदगी होनी चाहिए ना उस सूचना में? तुमने जो भी कुछ जाना है, क्या खुद जाना है? और क्या ख़ुद जानना मुश्किल था?

जिस संसार के बारे में तुमने सौ बातें इकट्ठी कर ली हैं, इतनी सारी कल्पनाएँ कर ली हैं, वो संसार तो लगातार तुम्हारे साथ है । क्या तुमने ख़ुद उसे देखा, जानना चाहा? तुमसे कह दिया गया कि “दुनिया जरा गड़बड़ जगह है और यहाँ पर अपनी सुरक्षा के बड़े इंतजाम करने पड़ते हैं । नहीं तो तुम लुट जाओगे, तुम पर आक्रमण होंगे” । क्या तुमने इस बात को जाँचा? क्या तुमने तथ्यों को खोजा? तुमने तो बस भीतर ले लिया है ।

एक छोटे बच्चे को देखना, वो कितना उत्सुक होता है । लगातार पूछे ही जाता है । कुछ भी हो, वो उसको जाकर छूकर देखेगा । गर्म तवा भी रखा हो, तो उसको जानने का तरीका उसके पास यह नहीं है कि पहले पूछे । पहले वो क्या करेगा? वो पास जाएगा और छूयेगा और दो-चार बार अगर जल गया, तो फिर वो पूछेगा । कुछ मिट्टी रखी है, कुछ रखा है, वो भी उसको जानना है, तो वो पहले उसे खाकर देखेगा । वो यह नहीं करेगा कि गूगल कर रहा है । वो कहेगा, जो भी चीज है, मेरे सामने है । जब मेरे सामने है, तो मैं जान सकता हूँ ना । और भी कोई मुझे बताएगा, वो भी तो आँखों से देखकर बतायेगा । तो यह रही आँखें, भाई ।

संसार को जानने के और कोई उपकरण तो होते नहीं, यही होते हैं । और उसके विश्लेषण का और कोई उपकरण तो होता नहीं, यही होता है । तुम्हें किस पर भरोसा नहीं है? इन्द्रियों पर भरोसा नहीं है? या बुद्धि पर भरोसा नहीं है? एक छोटा बच्चा भी सीधे-सीधे, सहज और सरल तरीके से संसार को देखना जानता है । पर एक दुर्घटना घटती है । दुर्घटना यह घटती है, छोटा बच्चा जो एक सामाजिक परिवेश में होता है, समाज से, बड़ों से घिरा रहता है । जो बात उसको सीधे दिख रही होती है, बड़ों को बुरी लग जाती है । छोटे-से बच्चे को बात दिख रही है, सीधे-सीधे दिख रही है । पर जो सीधी बात है, वो इतनी नग्न है कि बड़ों को परेशान कर जाती है ।

अभी मैं एक जगह मिलने गया, तो मेरी एक परिचित थीं, उनके छोटा बच्चा है । तो उसने गिनती सीखी है; उसे ९९ तक गिनती आ गयी है । तो वो माँ से पूछ रहा है कि मैं जब ९९ साल का हो जाऊँगा, तो आप कहाँ होगे? आप कैसे होगे? माँ ने वही जवाब दिया जो बच्चे को दिया जाता है कि “बेटा जब तुम ९९ साल के हो जाओगे, तब मैं भगवान के पास जा चुकी होऊँगी और वहाँ मैं तारा बन जाऊँगी” । माँ ने जवाब तो दे दिया, पर फ़िर पूछती है कि “मुझे मिस करोगे? मुझे याद करोगे?” बच्चा है छोटा, तीन-चार साल का, बोलता है- “नहीं, मैं तो अपनी वाइफ के साथ होऊँगा । मैं आपको क्यों याद करूँगा?”

(सब हँसते हैं) माँ का दिल टूट गया और बोली- “बात तो इसने ठीक कही थी । होता तो यही है । सबकी ज़िन्दगी में यही होना है । लेकिन मुझे किसी और उत्तर की अपेक्षा थी “।

जो बच्चे ने बोला, वो संसार का नियम था । और संसार का यह नियम उसने तीन-चार साल की उम्र में ठीक-ठीक देख लिया था । पर उसको माँ का उतरा हुआ चेहरा भी दिख गया । उसको यह भी दिख गया कि मेरा जवाब सुनकर माँ मुरझा गयी, कोई और जवाब देना चाहिए था । यह वो क्षण होता है, जब बच्चा यह सीखना शुरू करता है कि जो आँखों से देखा, जो प्रकट और सरल तथ्य है, वो कई लोगों को स्वीकार नहीं है । धीरे-धीरे बच्चा अपनी आँखें बंद करना शुरू कर देता है । वो कहता है- “जब मुझे जो सीधा दिख रहा है, जो ऑब्वियस, स्पष्ट बात है, वो इन बड़े लोगों को जँचती ही नहीं, तो मैं देखूँ कैसे?” उसको न देखने की प्रेरणा दी जाती है । “तुम देखो नहीं, और अगर देखो, तो कहा जाता है कि ज्यादा होशियार हो रहे हो, तुम ही ज्यादा समझदार हो” । पर आँखें हैं तो देखेंगीं । मन पर कितनी भी बंदिशें लगा दो, जो बात है, वो तो दिखाई देगी ।

अब तुम बँटते हो । एक वो चीज़ है, जो तुम्हें दिख ही रही है । और एक वो चीज है, जो तुम्हें पढ़ाई जा रही है । तुम्हें साफ़-साफ़ दिख रहा है कि दुनिया कैसी है पर तुम्हें पढ़ाया कुछ और जा रहा है । तुम फँस गए । अब तुम कैसे यकीन करोगे । न तुम अपने ऊपर यकीन कर पाते हो और न तुम पढ़ाई हुई बात पर ही यकीन कर पाते हो । अपने ऊपर यकीन करो, तो दुनिया का दिल टूटता है ।

तुम्हें तो दिखाई दे रहा है साफ़-साफ़ कि पड़ोस के अंकल-आंटी एक-दूसरे से नफरत करते हैं, पर तुम जाओ और खुलेआम यही बोल दो कि “चाचा आप तो चाची से बड़ी नफरत करते हो” ।

(सब हँसते हैं) तो पहले तो चाचा-चाची में लड़ाई होगी और उसके बाद तुम्हारा उनके घर जाना वर्जित हो जाएगा । होगा कि नहीं होगा? और दिखता है साफ़-साफ़, बात बिल्कुल छुपाने की नहीं है । तुम्हें दिख ही रहा है । दो लोग अगर दिन-रात खिच-खिच कर रहे हैं, तो यह नफ़रत के अलावा और क्या है? वो उसकी शक्ल नहीं देखना चाहता, वो उसकी शक्ल नहीं देखना चाहती । यह मोहब्बत तो नहीं कहलाती । पर यह बात बोली नहीं जा सकती क्योंकि वो चाचा हैं और वो चाची हैं । तुम्हारे रिश्ते में हैं । और उनका आपस में बकायदा विवाह हुआ है, तो ऐसी बातें बोलनी नहीं चाहिए ।

अब बच्चा फँसने लगता है । दुनिया उसे जो बता रही है, वो उसे दिख रहा है कि यह ठीक नहीं है । खुद उसे जो दिख रहा है, वो उसे दुनिया बता रही है कि ठीक नहीं है । यकीन करे तो किस पर करे? हम सबकी यही हालत है और इसलिए हमें किसी की बात पर कोई विश्वास नहीं है । हम एक सीमा के बाद फिर कोशिश यही करने लगते हैं कि “छोड़ो! अपनी आँखों से देखना बिल्कुल ही छोड़ दो । जो दुनिया कहे उसी को मान लो । लेकिन तुम चाहकर भी यह कर नहीं पाओगे क्योंकि जिंदा हो । और जब तक जिंदा हो चैतन्य हो ।

चैतन्य समझते हो? चेतना, जानना । जानना तुम्हारा स्वभाव है । तथ्य तुम्हारे सामने आ-आकर प्रकट होकर खड़े होते रहेंगे । तुम उन्हें कब तक झुठलाओगे? तुमसे भले ही कह दिया जाए कि बहुत सुन्दर भविष्य ऐसा-ऐसा होता है । पर तुम्हें तो साफ़-साफ दिख रहा होगा कि मुझे जिस ओर आकर्षित किया जा रहा है, वहाँ अंधेरा ही अंधेरा है । तुमसे भले ही कह दिया जाए इस प्रकार के जीवन में बड़ा सुख है पर तुम्हारे पास भी बुद्धि है और मन है, जो देख रहा होगा कि इसमें सुख नहीं मिल रहा । “कोई कमी है । कोई कमी है” । अब तुम किस पर यकीन करोगे? पूरी दुनिया तुम्हें बताने में लगी हुई है कि यही तो है सुख । और तुम्हें वो सुख महसूस ही नहीं हो रहा । तो कई बार तुम्हें अपने ऊपर संदेह होगा कि शायद मुझमें ही कोई खोट है । सब तो खुश रहते हैं ऐसे ही । मैं क्यों बेचैन रहता हूँ? कई बार तुम्हें दुनिया पर संदेह होगा कि लोग जो बता रहे हैं, वो मामला जरा गड़बड़ है । और तुम जानोगे ही नहीं कि कहाँ जाऊँ और कहाँ को न जाऊँ ।

तो एक विकल्प तो यह है कि पूरी तरह दुनिया की ही बात सुन लो । पर मैं तुमसे कह रहा हूँ, वो तुम तरह कर नहीं पाओगे क्योंकि जिंदा हो, चैतन्य हो । मशीन नहीं हो कि तुम्हारी प्रोग्रामिंग कर दी जाए । मशीन नहीं हो कि कोई आकर सुचना भर दे और तुम उस सुचना को दोहराते फ़िरो । तुम्हारे पास अपनी कोन्शिअसनेस (चेतना) है  । और दूसरा तरीका कि ‘विश्वास में जी पाओ और यकीन में जी पाओ, श्यौरनेस में जी पाओ, निःसंदेह होकर जी पाओ’ । दूसरा तरीका यह है- ‘छोड़ ही दो दुनिया की बात और कहो, हमारे पास आँखें हैं, देख सकती हैं और हमारे पास बुद्धि है, जो विश्लेषण कर सकती है और बोध हमारा स्वभाव है, हम जान सकते हैं’ । इन्ही दो विकल्पों में से कोई एक विकल्प तुम्हें चुनना होगा अगर तुम्हें यकीन में जीना है ।

वो दो विकल्प क्या हैं, मैं दोहरा रहा हूँ । पहला विकल्प है कि ‘पूरी तरह मशीन ही हो जाओ, मुर्दा हो जाओ, पूरी तरह मुर्दा हो जाओ’ । और दूसरा विकल्प है- ‘पूरी तरह ज़िन्दा हो जाओ’ । आधा-अधूरा नहीं चलेगा, तुम आधे-अधूरे हो । तुम ऐसी मशीन हो जो थोड़ी बहुत ज़िन्दा है । इसलिए तुम्हें इतना कष्ट है । या तो मर जाओ, पूरे मर जाओ, मशीन हो जाओ अगर हो सकते हो तो । या फिर पूरे ज़िन्दा हो जाओ । बोलो क्या होना है?

सभी श्रोता( सब एक स्वर में ): पूरा ज़िन्दा होना है ।

वक्ता: पूरा ज़िन्दा होना है? वास्तव में? आफ़त का काम है । दुनिया पसंद नहीं करती उनको, जो ज़िन्दा हो जाते हैं पूरे तरीके से । ख़तरा उठाना है । उठाना है ख़तरा?

(सभी श्रोता मुस्कुराते हैं)

ऐसे उठाओगे? पूरी तरह ज़िन्दा होने का मतलब है कि “हम नहीं जानते आपने हमें क्या बताया । हम नहीं जानते कि आजतक हमने क्या लिखा, पढ़ा और सुना । हमें अतीत की सूचनाओं को अपना पूर्वाग्रह नहीं बनने देना है । हम बायस्ड (पूर्वाग्रही) नहीं रहेंगे । हम नहीं कहेंगे कि इस बात का यही अर्थ है । हम नहीं मानेंगे कि ज़िन्दगी तो ऐसी ही जी जानी चाहिए । हम नहीं मानेंगे कि जीवन में इस प्रकार के आदर्श, नियम- कायदे चलने ही चाहिए । हम ज़रा देखेंगे । हम ज़रा परखेंगे । क्योंकि अगर देखा-परखा नहीं, तो हम उसका अपमान कर रहे हैं, जिसने हमें देखने, परखने की शक्ति दी है । अगर तुम्हें बनाने वाला यही चाहता होता कि तुम चुपचाप सारी बातें मानते चलो, तो वो तुम्हें क्यों यह ताकत देता कि तुम विचार कर सको और समझ सको? बोलो, जल्दी बोलो । फिर तो तुम्हें विचार की ताकत दी ही नहीं जानी चाहिए थी ना? फिर तो समझ जैसी कोई चीज होनी ही नहीं चाहिए थी, बस संस्कार होने चाहिए थे । कि संस्कारित कर दो, कंडिशन्ड कर दो । खेल आगे बढ़ेगा । और तुम्हारे रचनाकार ने तुम्हारे मूल-स्वरुप में तुम्हें यह ताकत दी है कि तुम जान सको । रट सको नहीं, याद कर सको नहीं, सुन सको नहीं, स्मृति में ले सको नहीं । जान सको । स्वयं जान सको । तुम्हें यह ताकत दी गयी है । तुम कहो कि “मैं इसी ताकत में जीयूँगा ।

और मैं तुमसे कह रहा हूँ, जो कुछ भी तुम्हारे पास ऐसा होगा, जो तुम्हारे पास, तुम्हारे जानने से आएगा, उस पर तुम्हें पूरा विश्वास रहेगा, पूरा विश्वास रहेगा । तुम यह शिकायत करोगे ही नहीं कि मुझे विश्वास की कमी रहती है । देखो जब तुम्हें किसी भी चीज पर विश्वास नहीं रहता ना, तो तुम कौन हो; वो, जिसे किसी भी चीज पर विश्वास नहीं है । तो तुम्हारा अपने ऊपर भी विश्वास नहीं रहता । जब ज़िन्दगी अपनी आँखों के देखे जीने लगोगे, तो अपने ऊपर यकीन आएगा कि “मैं जी सकता हूँ अपने मुताबिक । मैं जान सकता हूँ अपने मुताबिक ।

अभी तो तुम्हारी हालत यह है कि तुमने कोई सवाल भी कभी हल किया है, तो वो ठीक वैसे ही हल किया है जैसे लिखा हुआ था कि पहला कदम, दूसरा कदम, तीसरा कदम और हेंस प्रूव्ड । तुमने कभी दायें या बायें जाकर सवाल भी हल नहीं करा । मैं ज़िन्दगी की बात नहीं कर रहा, मैं किताब की और कागज़ की बात कर रहा हूँ । तुमने कागज़ पर भी आज तक ऐसा कुछ नहीं करा, जो तुम्हारा अपना हो । कागज़ पर भी तुमने हमेशा वही उतारा है, जो दूसरों ने चाहा है कि तुम लिख दो । ऐसा हुआ है कि नहीं हुआ है, बोलो?

अपना जब तुम्हारे पास कुछ है नहीं, तो क्यों फिर शिकायत करते हो कि हममें आत्मविश्वास नहीं रहता? आत्मविश्वास का तो अर्थ ही होता है- ‘मैं’ का विश्वास । आत्म माने- ‘मैं’ । ‘मैं‘ तो कहीं है ही नहीं । ‘मैं’ तो विलुप्त है । मैं तुमसे कहूँ कि दिखाओ तुम्हारे जीवन में ‘मैं’ कहाँ मौजूद है । मैं तुमसे कहूँ दिखाओ कि तुम्हारे पास कुछ भी ऐसा है, जो तुम्हें बाहर से न मिला हो, तो तुम्हारे लिए जरा दिक्कत हो जाएगी । कुछ नहीं ला पाओगे, जो तुम्हारा हो । जब तुम्हारा कुछ है नहीं, तो यकीन में कैसे जिओगे? बोलो?

तुम्हारी हलत तो बड़ी ख़राब है । तुम्हें तो यह भी पता नहीं लगता कि तुम वास्तव में आनंदित कब हो । तुम्हें ये भी पूछना पड़ता है लोगों से कि “मैं ठीक-ठाक लग रहा हूँ?”

(श्रोता हँसते हैं)

जैसे कपड़ा पहनकर करते हो । तुम कपड़े पहनने के बाद कहाँ जान पाते हो कि यह कपड़ा मेरे लिए ठीक है कि नहीं? पाँच और लोगों को  दिखाकर यही पूछते हो कि “ठीक है? देखा है?” तुम्हारी तो प्रेम भी यही हालत रहती है, तुम्हें पक्का पता ही नहीं चलता कि हुआ है कि नहीं हुआ है?

(सब हँसते हैं)

वो देखा है ना कि वो फूल लेकर बैठी हुई है- “ही लव्स मी, ही लव्स मी नॉट” । उसको यह भी पक्का यकीन नहीं । तुम्हारी फेसबुक प्रोफाइल्स पर वो पड़ा रहता है- कमल, कामिनी : ८४% लव

(फिर से सब हँसते हैं)

तुम्हें तो तुम्हारे दिल का हाल ही नहीं पता । दुनिया का क्या पता होगा? फिर कहते हो यकीन नहीं है । जब तुम अपने को नहीं जानते, तो तुम्हें दुनिया का कैसे यकीन आएगा? बोलो? वो बातें जो नितांत निजी होती हैं, वो तक तुम्हें दूसरों से पूछनी पड़ती हैं । दिनभर बैठकर यहाँ पढ़ाई करते हो ना । शायद ही कोई ऐसा होगा, जिसने यहाँ पर प्रवेश स्व-इच्छा से लिया हो । इससे पूछा, उससे पूछा, इसका दबाव, उसका तनाव, इधर की खिंचाई, उधर को धक्का और तब चले आए कि “अब चलो” । जो काम तुम पूरे दिन कर रहे हो, वो भी तुम इसलिए नहीं कर रहे कि तुमने चाहा था । वो भी तुम कैसे कर रहे हो कि “दुनिया ने चाहा था” । अब तुम्हें यकीन कैसे हो? बोलो?

और अभी तो तुम्हारे साथ एक इससे भी जबरदस्त त्रासदी होने वाली है । बी.टेक में तो तुम कॉलेज के साथ चार साल रहते हो और यह चार साल तुम एक ऐसी इकाई के साथ हो, जिसके साथ होना तुमने नहीं निर्धारित किया था । अभी तो तुम शादी-ब्याह करोगे और वहाँ भी तुम्हें नहीं पता होगा कि तुम क्या कर रहे हो । तुम्हें बिल्कुल नहीं पता होगा कि तुम यह चाहते भी हो या नहीं चाहते हो  । तुम्हारे भीतर संदेह होगा । लेकिन तुम एक ऐसे व्यक्ति के साथ जीवनभर रहने के लिए राजी हो जाओगे, जिसका तुम्हें पक्का पता नहीं  । अब पूरा जीवन अगर नरक ही बन जाए, तो आश्चर्य क्या है?

चार साल के बी.टेक में तुम कहने लग जाते हो कि “अरे! पता नहीं किसने दिलवा दी केमिकल, कि सिविल, कि मैकेनिकल । फँस गए” । पर चालीस साल? और जिन माँ-बाप ने इस तरीके से अपना सम्बन्ध बनाया हो । बिना जाने, बिना पक्का हुए, बिना किसी आंतरिक गहरे विश्वास के, बिना दिली प्रेम के । उनके बच्चे हों और उन बच्चों को यही शिक्षा दें कि जो हम कह रहे हैं, बस वही मानना, तो इसमें भी ताज्जुब क्या है? वो यह करेंगे क्योंकि उन्होंने खुद यही किया है । उनका संबंध ही सामाजिक है, तो उससे जो बच्चा पैदा होगा, उसको भी वो पूर्णतः सामाजिक ही बना देते हैं । खौफ़नाक बात है वैसे यह, कि एक पुरुष और एक स्त्री का संबंध निजी न होकर सामाजिक हो । बहुत खौफ़नाक बात है ।

सामाजिक संबंध समझते हो? जिसमें बहुतों की भागीदारी हो ।

(सब हँसते हैं)

जिसमें कहा जाए कि दो व्यक्तियों का नहीं, दो परिवारों का मिलन हो रहा है । यह सामाजिक संबंध होते हैं । कि “देखिये साहब, रिश्ते दो लड़के-लड़कियों के नहीं, दो परिवारों के होते हैं “। बड़ी खतरनाक बात हो गयी । चाचा, ताऊ यह सब… जीजे, साली, फूफियाँ, बुआएं… भीड़ का दिल लग रहा है । हिंदी फिल्मों में इसलिए होता है कि आगे हीरो-हीरोइन नाच रहे होते हैं और पीछे पचास-साठ, और वो परिवारजन होते हैं । अकेले कुछ होता ही नहीं ।

(बीच-बीच में हँसी छूटती है)

अब कैसे पक्का होगा तुमको? और तुम इस बात को अपने चरित्र का बड़ा परिमाण भी मानते हो कि “वो तो माँ ने दबाव दिया तो मैं तुझे ब्याह लाया” ।

(सब हँसते हैं)

“वो तो पिताजी ने बाँध दिया मुझे तुम्हारे साथ, नहीं तो मैं कहाँ आती” । यह तुम्हें लगता है कि यह तुम्हारी बड़ी प्रशंसनीय योग्यता है कि तुमने किसी और के कहने पर अपना पूरा जीवन चला दिया । तुम्हें लगता है कि यह बड़े चरित्र की बात है ।

यह चरित्र की बात नहीं है । यह तुम्हारी त्रासदी है । यह तुमने अपने जीवन में आग लगाई है । और वो घटना एक दिन नहीं घटती । चाहे वो घटना यह है कि तुम नौकरी ऐसी कर रहे हो, जिसमें तुम्हारे हृदय के लिए कोई स्थान नहीं, पर हाँ सामाजिक इज्जत खूब मिलती है । जानते हो ना कि सरकारी नौकरियों के लिए कैसी भीड़ लगती है । तुम्हें क्या लगता है कि जो लोग सरकारी नौकरियों के लिए भीड़ लगा रहे हैं, वो इसलिए लगा रहे हैं क्योंकि उन्हें उस काम से प्यार है । “आह, बैंक! बैंक मेरा मंदिर है “। हाँ? बोलो? कि “सरकारी दफ़्तर में पहुँचकर मुझे समाधि लग जाती है “। कुछ ऐसा है?

अधिकांश लोग जो किसी सरकारी नौकरी की कोशिश कर रहे होते हैं, उन्हें ठीक-ठीक यह तक नहीं पता होता कि उसमें तनख्वाह कितनी है । फ़र्क ही नहीं पड़ता । उनसे पूछो- ठीक-ठीक बता दो कि तनख्वाह कितनी मिलेगी । उन्हें पता नहीं होगा । कुछ गोलमोल जबाव दे देंगे । उनसे कहो- यह भी ठीक-ठीक बताना कि क्या काम होगा । अधिकांश तो बता नहीं पाएंगे । कुछ बता देंगे । जो बता दें उनसे फिर पूछना कि तुझे यह काम वाकई ही पसंद है ? तुझे वाकई ही दिल से यही करना है ? इसी में तेरे जीवन की सार्थकता है ? वो सिर नीचे कर लेगा । नौकरी क्या करनी है, यह तुम अपनी आँखों से नहीं देख पा रहे । यह तुम्हें किसी और से सुनना पड़ रहा है । और बड़े लम्बे समय तक तुम नौकरी करते हो । दो-चार दिन की बात नहीं है । वो काम तुमने क़रीब-क़रीब जीवनभर के लिए चुन लिया ।

डिग्री तुम्हारी नहीं । पत्नी तुम्हारी नहीं । नौकरी तुम्हारी नहीं । तो तुम्हें कैसे किसी पर यकीन आये? तुम्हें अपने जीवन पर ही यकीन कैसे आये? तुमसे तो कोई आकर यह भी कह दे कि यह परिवार तुम्हार नहीं है, माता-पिता तुम्हारे नहीं हैं और ये बच्चे तुम्हारे नहीं हैं । तो तुम्हें तो इस पर भी संदेह हो ही जाना है । पक्का हो जाना है । पर याद रखना संदेह कहीं बाहर से नहीं आता । संदेह मौज़ूद हमेशा रहता है मन में । बस बाहर से किसी ख़बर के आने पर वो संदेह खड़ा हो जाता है । वैसे वो सोया पड़ा रहता है, बाहर से कुछ उत्तेजना मली तो खड़ा हो जाता है ।

जिन्हें आत्मविश्वास चाहिए हो, वो ज़रा आत्म में जीना शुरू करें । जरा ‘मैं’ के साथ रहें । भले ही ‘मैं’ के साथ रहने का यह अर्थ हो कि अकेले पड़ गए । वो अकेलापन बड़ा खूबसूरत अकेलापन है । उस अकेलेपन से भागिए मत । दुनिया के हो गए और अपनेआप को खो दिया, तो क्या पाया? बोलो? दुनिया मिल गयी और खुद को खो दिया, तो क्या पाया? कुछ पाया? बड़ा घटिया सौदा कर लिया ना? अपने को पाना शुरू करो ।

उसमें दिक्कतें भी आएँगी, ठोकरें भी लगेंगी, गिरोगे भी कई बार । क्योंकि तुम्हारा जो ‘मैं’ है, वो बड़ा त्रांत हो चुका है । उसके ऊपर बड़े दाग-धब्बे लग चुके हैं । तो अभी तो तुम्हें ठीक-ठीक समझ में भी नहीं आएगा कि तुम्हारा ‘मैं’ क्या बोल रहा है । तुम उसकी आवाज सुनना चाहोगे, उसकी आवाज़ बहुत दब गयी है । तुम पूछोगे कि क्या उचित है, क्या अनुचित । तुम्हें कोई उत्तर ही नहीं मिलेगा । उत्तर मिलेगा भी तो बड़ा दबा, कुचला-सा; जैसे कोई बीमार चिड़िया, उसकी जैसी आवाज, वैसा-सा उत्तर आएगा भीतर से । और वो उत्तर भी हो सकता है कि शुरू-शुरू में रटा-रटाया आये । लेकिन जो भी आये, ज़रा उसके साथ चलो । जैसे-जैसे उसका साथ देना शुरू करोगे, भले ही उसमें तकलीफें हों, भले ही उसमें ठोकरें लगें, भले ही उसमें कुछ निर्णय उल्टे-पुल्टे हो जाएँ । पर जैसे-जैसे उसके साथ चलना शुरू करोगे, वैसे-वैसे तुम पाओगे कि तुम उस चिड़िया को ताकत दे रहे हो । वो दोबारा चहचहायेगी । फिर वो जो बोलेगी, वो उसकी अपनी नैसर्गिक आवाज़ भी होगी और उस आवाज़ में दम भी होगा ।

मैं तुमसे शुरू में ही कह दे रहा हूँ; सावधानी की तरह कि अभी जब तुम कोशिश करोगे कि अपने अनुसार चलें, पड़ोसी के अनुसार नहीं, दुनिया के अनुसार नहीं, तो यह अपने अनुसार चलना तुम्हें दिक्कत देगा । क्योंकि अपना है क्या, यह तुम्हें पता ही नहीं चलेगा । तुम्हारे सामने एक शर्ट भी रखी होगी तो तुम्हें समझ में ही नहीं आएगा कि यह मेरे ठीक है कि नहीं ।  पर जो भी समझ में आये आधा-अधूरा, उल्टा-सीधा जैसा भी समझ में आये, चल लो अपने अनुसार ।

धीरे-धीरे यह समझ के ऊपर जो गंदगी जमा है, वो सब साफ़ होने लगेगी । फिर भीतर से जो निर्णय निकलेंगे उनमें ताकत भी होगी, स्पष्टता भी होगी । तुम उन्हें ज़्यादा आसानी से स्वीकार कर पाओगे । तुम उन पर यकीन कर पाओगे । और फिर एक बिंदु ऐसा आता है, जब आत्मविश्वास ऐसा हो जाता है कि वो विश्वास से आगे श्रद्धा बन जाता है । तब तुम कहते हो- “आँख मूँद कर अपने पर यकीन करता हूँ’ । क्योंकि अब जो उठता है भीतर से, वो मेरा है ही नहीं । सबसे पहले समाज का था । फिर मेरा हुआ । अब मेरा भी नहीं है । अब तो वो किसी और का है” । यह आत्मविश्वास फिर श्रद्धा का रूप ले लेता है । या ऐसे कह लो कि यह आत्मविश्वास विगलित हो जाता है, जो बचती है वो श्रद्धा कहलाती है । वो ज़रा आगे की बात है तो उसको अभी छोड़ो ।

और मैं तुमसे कह रहा हूँ आत्मविश्वास बड़ी मजेदार चीज है । बहुत हल्का करके रखती है तुमको । तुम्हें किसी की ओर देखना नहीं पड़ता । तुम जो कर रहे वो ठीक कर रहे हो । तुम्हें बार-बार ऐसे देखना नहीं पड़ता- “ठीक कर रहा हूँ ना” । अभी तो ऐसी हालत रहती है कि जो भी करते हो इधर-उधर मुड़-मुड़कर तहकीकात करते चलते हो- “ठीक कर रहा हूँ? ठीक कर रहा हूँ? यह निर्णय ठीक लिया? इससे बात किया ठीक किया?” माँओं को देखा है अक्सर क्या करती हैं? बच्चों को आँख दिखाती हैं । कभी देखना छोटे बच्चों को, वो कुछ भी करते हैं वो माँ की आँख की ओर देखते हैं । और माँ ने आँख दिखा दी तो समझ जाते हैं कि ऐसे नहीं करना है । उनके भीतर जो अपने निर्णय लेने की क्षमता है, माएँ उसका गला घोट देती हैं ।

तुम कभी देखना कि कोई मेहमान आये अपने बच्चे को लेकर और खाने-पीने की कुछ चीजें रख दी जाएँ, अक्सर जो बच्चा होता है, वो सहज भाव से खाने-पीने की चीज नहीं उठा पाता । वो कुछ उठाएगा फिर माँ की ओर देखेगा । और माँ ने अगर कुछ कहा नहीं तो ठीक है खा लेगा और माँ ने आँख दिखा दी तो वापस रख देगा । यह उसके अपने विवेक की हत्या की जा रही है । अब वो जीवन भर कभी कोई निर्णय स्वयं नहीं ले पायेगा । उसे जो भी निर्णय लेना होगा, वो माँ की ओर देखेगा । “माँ बर्फ़ी ले लूँ?” यह तनाव की हालत होती है ।

आत्मविश्वास में मज़ेदार बात यह रहती है कि तुम्हें किसी की ओर नहीं देखना । तुम हल्के हो । सहज भाव से जो कर रहे हो, तुम्हें पता है कि जो भी कहेंगे, वही ठीक । जो भी करेंगे, वही ठीक । बड़ी मुक्ति है । दूसरों पर निर्भर नहीं हो, अपने पर भी निर्भर नहीं हो । एक सहज भाव है । बोलने से पहले सोचना नहीं पड़ रहा कि यह बात ठीक है कि बोलें कि न बोलें । बस खड़े हो, कह रहे हो, जी रहे हो । देखो कितना हल्कापन है । कदम जिधर को बढ़ते हैं, चल देते हो । जाँचना नहीं, परखना नहीं । ठीक कर रहा हूँ कि नहीं कर रहा हूँ! दो-चार किताबों से मिलान नहीं करना है ।

तो इस पूरी बात में जो आख़िरी बात तुमसे कही वो यही है- अपने ‘मैं’ को ताकत दो । उसकी कीमत तुम्हें चुकानी पड़ेगी । क्योंकि अभी तुम्हारा ‘मैं’ बड़ा कमजोर है । यह उम्मीद मत रखना कि शुरू में ही तुम्हें बड़े मीठे-मीठे फल मिलना शुरू हो जायेंगे । शुरू में हो सकता है कि चीजें थोड़ी उलट-पुलट हो जाएँ । शुरू में हो सकता है कि ठोकरें लगें लेकिन यह कीमत अदा करने जैसा है । यह कीमत बहुत छोटी है । इसके बदले में जो तुम्हें मिलेगा, वो बहुत बड़ा है । तो यह कीमत तुम निःसंकोच अदा करो  । ज़रुर अदा करो । गलत या सही, हम आश्रित नहीं रहेंगे अब किसी पर । करेंगे, डूबेंगे पर हाथ-पाँव बस अपने ही चलाएंगे । बोलो? करना है सौदा?

सभी श्रोता(सब एक स्वर में): जी सर, करना है ।

वक्ता: करो! अभी थोड़ी देर पहले तुम क्या कर रहे थे? मैं पूछ भी रहा था कि क्यों आये हो यहाँ पर तो तुम ज़वाब नहीं दे रहे थे । मालुम है क्यों नहीं ज़वाब दे रहे थे? “पता नहीं सही ज़वाब है या नहीं” । तुम्हें इसमें भी लगता है कि कोई सही या कोई ग़लत ज़वाब होता है । बोलो यही बात थी कि नहीं? तुम मेरे सामने यहाँ अकेले बैठे हो और पूछूँ कि क्यों आये हो, तो तुम जबाव दे लोगे । अभी तुम्हें लग रहा था कि “इतने लोग बैठे हैं, इनको सही जबाव पता हो, क्या पता । मुझे तो नहीं पता । और मैं जबाव दे दूँ तो बेवकूफ़ कहलाऊँगा” । तो तुम छुपे जा रहे थे । और जिंदगी-भर तुम्हारा यही हाल रहता है । जिंदगी तुम्हारे सामने मौके लाती है और तुम… छुप जाते हो । “अरे बाप रे! यह तो जन्म गँवाने वाली बात हो गयी ना कि एक-एक करके मौके आते जा रहे हैं और हम… ‘कुछ गड़बड़ है’, यही मान कर बैठे होते हैं ।

“ख़बरदार, बर्फी मत खाना” (एक श्रोता को देखते हुए)

यह खौफ़ जाता नहीं है भीतर से । लोग चालीस-चालीस साल के हो जाते हैं, उनके भीतर से नहीं जाता । यह बचपन में हुआ होता है और बिल्कुल दिल को दहला देता है और गहरे तक घुंस कर बैठ जाता है ।

और हिन्दुस्तान में तो इसकी बड़ी प्राचीन परंपरा है । टीचर स्केल लेकर मार रही है । और भांति-भांति के तरीके होते हैं टार्चर करने के- कलम यहाँ(उँगलियों के बीच दिखाते हुए) लगा दो और दबाओ । (सब हँसते हैं) यह सब खौफ़ भीतर से निकलते नहीं हैं । तुम कितने भी उम्र के हो जाओ तुम्हारे मन पर वो अथॉरिटी (सत्ता) बैठी ही रह जाती है कि एक बार मैंने कुछ करा था अपनी मर्ज़ी से और बड़ी सज़ा मिली थी, अब जीवन-भर अपनी मर्जी से कुछ नहीं करूँगा । बड़ी सजा मिली थी; दिनभर धूप में खड़े रहे थे ।

~ ‘संवाद‘ पर आधारित । स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त है ।

संवाद देखें: Prashant Tripathi: अपने ऊपर भरोसा क्यों नहीं है? (Why am I not sure of myself?)

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लेख १: जीवन – अवसर स्वयं को पाने का

लेख २ : असली जीना माने क्या?

लेख ३: मेरा असली स्वभाव क्या है?