मन के मूड़े देखि करि, ता संग लीजै औट

कवि तो कोटिक कोटि है, सिर के मूडे कोट । 
मन के मूड़े देखि करि, ता संग लीजै औट ॥

~ कबीर

वक्ता: तो दोनों बातों को यहाँ पर कबीर ने पकड़ लिया है। कवि कौन? जिसकी कल्पना खूब भागती है। और सर मुंडाने वाला कौन? जो कल्पना भी नहीं चला रहा है। जो कह रहा है, “मुझे बता दो कि किस तरीके के रिवाजों, आचरणों का पालन करना है, मैं वही कर लूँगा”। इन दोनों ही श्रेणियों के लोग, किसी काम के नहीं।

एक कौन है? जो कह रहा है, “न, न, न, मैं कल्पना भी नहीं कर सकता, मैं इतना जड़ हूँ कि मेरा मन कल्पना के लिए भी नहीं भाग सकता। तो श्रीमान बता दीजिये कि मुझे क्या करना चाहिए। अच्छा ठीक है, सुबह उठ कर नहा लेना चाहिए। और क्या कर लेना चाहिए? उस जगह पर खड़े होकर नमस्कार कर लेना चाहिए। और क्या करना चाहिये? इस तरीके का खाना खाना चाहिये”। तो ये सब बता दिया गया, तो ये सब सिर मुंडे हुए लोगों के काम हैं।

एक श्रेणी है, जो इनसे थोड़ी-सी अलग है, वो क्या है? वो कह रहे हैं, “दुनिया हमें क्या बता रही है, हम वो नहीं मानेंगे, जगत का अधिकार अपने ऊपर नहीं स्वीकार करेंगे, हम तो अपनी चाल चलेंगे”। और ‘अपनी चाल’ से उनका अर्थ क्या है? अपनी कल्पना ।

पहला कौन है? जिसने जगत को मालिक स्वीकार कर लिया है। दूसरा कौन है? जिसने अपने मन को ही मालिक स्वीकार कर लिया है। इन दोनों में ज़्यादा गया-गुज़रा कौन है? वो जिसने अपने मन को अपना मालिक स्वीकार कर लिया है, क्योंकि उसके पास अब एक तर्क रहेगा। क्या तर्क रहेगा? “मैं अपनी मर्ज़ी पर चल रहा हूँ”। वो अपनी कल्पना को ‘अपनी मर्ज़ी’ का नाम देता है, वो अपने विचारों को ‘अपनी मर्ज़ी’ का नाम देता है, बिना ये समझे कि विचार कहाँ से आते हैं।

विचारों की व्युत्पत्ति को वो बिल्कुल नहीं समझता। वो कहेगा, “ये मेरी मर्ज़ी है, ये मेरे विचार हैं, ये मेरा मत है, मैंने कल्पना की है”। कवियों को अपनी कृतियों से बड़ा प्यार होता है, और उनसे कहा जाए, “तुम्हारी तो है ही नहीं ये,” तो बड़ी दिक्कत होगी उन्हें।

जो सिर मुंडा हुआ है, वो कम से कम स्वीकार कर लेगा आसानी से कि, “मैं सिर्फ़ वही कर रहा हूँ जो मुझे दूसरों ने मुझे बता दिया है”, कवि यह स्वीकार भी नहीं करेगा, इसलिये कवि ज़्यादा ख़तरनाक है। और हम सब कवि ही हैं। हम या तो मर्यादा के पाश में रहते हैं, या मन के पाश में रहते हैं, बंधे लेकिन सदा रहते हैं। कभी हमें मर्यादा बाँधती है, कभी हमें मन बाँधता है। मुक्ति हम नहीं जानते, मुक्ति का हमें कुछ पता नहीं।

कवि तो कोटिक कोटि है, सिर के मूडे कोट । 
मन के मूड़े देखि करि, ता संग लीजै औट ॥

जिसने मन ‘मुंडा’ लिया हो। ‘मन के मुंडाने’ से क्या अर्थ है? ये जो बाल हैं, ये क्या हैं? बाल हैं शरीर का विस्तार – यहीं से पकड़ लेते हैं चीज़ को। और एक बात समझियेगा, बाल बहुत हद तक धोखा देने के और सुरक्षा के काम आते हैं। प्रकृति ने बालों के रूप में बहुत सारे जानवरों के ऊपर, और इंसान के ऊपर एक उपकरण लगाया है। उस उपकरण का काम क्या है, प्रयोजन क्या है? इसका प्रयोजन दो तरफ़ा है। एक – ये जो शरीर के नाज़ुक हिस्से हैं, उन्हें सुरक्षा देते हैं। दूसरा – ये आपके आकार को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाते हैं। आप जितने बड़े हैं नहीं, ये आपको उससे ज़्यादा बड़ा दिखाते हैं।

मनुष्यों में ये बात आपको बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं लगेगी, पर बहुत सारे जानवर हैं, अगर आप गौर करेंगे तो आप पाएँगे कि अगर उनके बाल आप हटा दीजिये, तो उनका आकार एक चौथाई हो जाएगा, और वो बहुत आसानी से शिकार हो जायेंगे। बालों के कारण उनकी रक्षा हो पाती है, बालों के कारण वो पूरी दुनिया को वो धोखा दे पाते हैं कि, “हमारा आकार ज़्यादा बड़ा है”।

कुछ हद तक एक तीसरा प्रयोजन भी है। बाल आकर्षित करते हैं। तो बाल क्या हैं? शरीर पर भी बालों का क्या काम है? बालों का काम यही है – असुरक्षा से मुक्ति, जो है नहीं वो दिखाना, आकार बड़ा करके दिखाना और आकर्षित करना या भयानक दिखाना, दोनों ही। सिंह के बाल उसको आकर्षक नहीं बनाते, भयावह बनाते हैं।

‘बालों के न होने’ से तात्पर्य यही है – मन अब विस्तार चाहता नहीं। जो बात है, उसे वैसा ही जान लेने में, और रख देने में, मन को अब कोई बाधा नहीं है। मन को झूठ नहीं बोलना है, मन को एक नकली चेहरा नहीं दिखाना है। खोपड़ी साफ़ है, खाली है, लंबे-लंबे केशों की आवश्यकता ही नहीं है। किसके सामने आकर्षण पैदा करना है? और न मन को आवश्यकता है सुरक्षा की, क्योंकि मन वहाँ पहुँच गया है जहाँ पहले ही पूर्ण सुरक्षा उपलब्ध है।

मनमन मूंड दिया गया है, मन से जितने विस्तार निकल रहे थे, मन से जितने झाड़-झंखाड़ निकल रहे थे, उनको काट दिया गया है, और कुछ ऐसा काट दिया गया है कि दोबारा वो अब कभी उगेंगे ही नहीं। मन अब क्या रह गया है? मन बस सत्व का एक ठोस पिंड रह गया है, जिसमें कुछ अनर्गल उग नहीं सकता, जिसमें कुछ भी उगने की संभावना नहीं है। मन बंजर हो गया है, उसमें कुछ अब आप डालते रहिये, आप दुनिया भर के इन्द्रियगत विषयों का आक्रमण करते रहिये उस पर, उसमें कुछ उगेगा ही नहीं अब।

मन अब पूर्णतया बंध्या हो गया है, मन में अब ये चाह रही ही नहीं कि, “मैं संसार से मिलूँ, और उस मिलन के फलस्वरुप कुछ और पैदा हो। मन अब इनर्ट गैस (अक्रिय गैस) जैसा हो गया है, उसका कोई रिएक्शन (प्रतिक्रिया) नहीं होता। तो ऐसा जिसका मन हो, सिर्फ़ उसी की संगति से तुम्हें सहारा मिलेगा।

जिसका मन अभी ऐसा है कि उसमें तुमने कुछ डाला, और डालते ही कुछ प्रतिक्रिया हो गई, वो तुम्हारे काम कैसे आएगा? वो अपने ही काम नहीं आ सकता। उससे तुम्हें ओट कैसे मिलेगा, वो तो स्वयं को ही ओट नहीं दे सकता। उसकी संगति मत करना। वो अभी अपने ही काम का नहीं है, उसको तो खुद अभी आवश्यकता है कि कोई सहारा दे। मन कैसा हो? “मन बंजर, मन ऊसर, मन बंध्या” अर्थ समझिये इसका।

श्रोता १: सर बंध्या क्या है?

वक्ता: जिसमें कुछ नहीं उग सकता।

श्रोता २: सर, ऐसे इंसान तो वास्तविकता में मिलते ही नहीं हैं।

वक्ता: ‘तुम्हारी’ वास्तविकता में। तुमने जिनकी संगति पाल रखी है, वहाँ नहीं मिलेंगे। क्योंकि तुमने जिनकी संगति बना रखी है, उनको तुमने ही चुना है। जब तक तुम, ‘तुम’ हो, तुम्हें ऐसे व्यक्ति कैसे मिलेंगे? व्यक्तियों का चुनाव ही गड़बड़ रहेगा ना। क्योंकि उन्हें चुन कौन रहा है? तुम। तो तुम, ‘तुम’ रहते हुए तुम्हें ऐसा कोई कहाँ से मिलेगा? थोड़ा बदलो तो मिल भी जाए। हो सकता है इतना असंभाव्य न हो उसे ढूँढना, पर उसके लिए तुम्हें बदलना पड़ेगा ना।

अभी तो हालत ये है कि वो तुम्हें मिल भी जाए, तो तुम्हें भाएगा नहीं, सुहाएगा ही नहीं। जो आसानी से उत्तेजित हो जाता हो, जिसका मन लगातार भागने के लिए तैयार रहता हो, ये वो है जिसने अभी मन को नहीं मुंडाया, जिसके मन से प्रक्षेपण निकल-निकल कर भाग रहे हैं। बाल क्या हैं? शरीर का प्रक्षेपण, विस्तार। जैसे कि शरीर कहीं पहुँच जाना चाहता हो, कि “हम तो यहीं तक बैठे हैं, पर हमारी ज़ुल्फ़ें वहाँ तक जाती हैं। जहाँ हाथ नहीं पहुँच सकते, वहाँ तक हमारी ज़ुल्फ़ें पहुँच जाएँ”। जैसे कि शरीर कहीं पहुँच जाना चाहता हो, उसी प्रकार मन की इच्छा का द्योतक हैं – मन के बाल।

कबीर कह रहे हैं कि, “उन्हें मुंडाओ, मन ऐसा न रखो कि वह लगातार कहीं पहुँचने की इच्छा रखता हो, जिसके भीतर महत्वकांक्षाएँ भरी हुई हों। जिस पर जब इधर-उधर से आक्रमण होते हों, विषयों के, वासनाओं के, इच्छाओं, कामनाओं के, दृश्यों के, ध्वनियों के, तो वो जो जल्दी से बहक जाता हो। ये बेचारा तो खुद बेसहारा है, तुम्हारे काम कैसे आएगा?

कवि तो कोटिक कोटि है, सिर के मूडे कोट । 
मन के मूड़े देखि करि, ता संग लीजै औट ॥

अब ये आपके ऊपर है। आप भी अपने आसपास वाले लोगों को देखें और पूछें, ईमानदारी से अपने आप से पूछें, “इनमें से कितने ऐसे हैं जो ‘मन के मुंडे’ हैं? और अगर नहीं मन के मुंडे हैं, तो मैं इनकी संगति में कर क्या रहा हूँ? और फिर मैं क्यों शिकायतें करता हूँ कि जीवन में ये दिक्कत है और वो दिक्कत है? जब मैंने अपने वातावरण को ऐसे लोगों से भर रखा है, जिनका मन अभी फुदकता ही रहता है, जहाँ अभी कोई संयम, कोई विवेक नहीं है, तो ये लोग अगर मुझे भी कंपित करते रहते हैं, हैरान परेशान करते रहते हैं, तो ताज्जुब क्या है? किसकी ओट ले रखी है मैंने?”

“ओट तो एक की ही होती है, उसके अलावा जिसकी भी मैंने ओट ले रखी है, निराशा ही मिलेगी”।

~‘शब्द-योग’ सत्र पर आधारित । स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: Prashant Tripathi on Kabir: मन के मूड़े देखि करि, ता संग लीजै औट (What is right company?)

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