वहीँ मिलेगा प्रेम

मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान् विषवत्यज।

क्षमाज्जर्वदयातोषं सत्यं पियूषवद् भज।।

अष्टावक्र गीता (अध्याय १, श्लोक २)

वक्ता: अष्टावक्र दया की बात क्यों कर रहे हैं? अष्टावक्र कह रहे हैं कि “यदि मुक्ति की इच्छा हो मेरे बच्चे, तो इन्द्रियों के विषयों का परित्याग करो, जैसे वो विष हों और क्षमा, आर्जव, दया, संतोष एवं सत्य का पान करो।”

तो प्रश्न है कि दया की बात क्यों की है? क्या अर्थ है दया का? बातचीत अभी शुरू हो रही है, गुरु शिष्य मिले हैं। बस पहला ही सोपान है अभी, कोई ऊँचाइयाँ नहीं हासिल हुई हैं। पहला अध्याय, दूसरा श्लोक है। अभी तो अष्टावक्र बस ये देख रहे हैं कि, क्या है जो शिष्य के मन को आच्छादित ही किये हुए है, मन पर चढ़ा ही बैठा है, मन को ढ़के हुए है।

तो वो कह रहे हैं कि “वो सब विचार, ख्याल, वो सारी बातें, वो सारे भाव, जो तुम्हारे मन से उतरते ही नहीं हैं, जिनके बारे में तुम लगातार सोचते हो, जो चक्कर काटते रहते हैं भीतर, सबसे पहले तो जरा उनके प्रति चेत जाओ। “

जनक अभी मुक्ति शब्द का आत्यांतिक अर्थ समझते भी नहीं हैं।  उनके पास तो मुक्ति का बस ख्याल है।  उसको ले करके वो आ गए हैं अष्टावक्र के पास और प्रार्थना की है कि “गुरु, मुक्ति चाहिए”। जब शिष्य आता है गुरु के पास और कहता है, “मुक्ति चाहिए”, तो कृप्या यह  न समझें कि कोई खरीददार किसी दुकानदार के पास आया है कि दाल-चावल चाहिए। अंतर क्या है? खरीददार दुकानदार के पास आता है तो उसे पता होता है कि उसे क्या चाहिए। और उसे उसके अतिरिक्त कुछ दिया भी नहीं जा सकता। क्योंकि वो कुछ लेने आया है और वो उसको लेने के बाद भी वही रहेगा; बस उसको हाथ में एक सामान होगा जिसे वो एक वस्तु की भाँति इकठ्ठा करके वापस लौट जाएगा।

गुरु के पास जब शिष्य आता है तो वास्तव में उसे पता भी नहीं होता कि वो क्या लेने आया है। पर चूँकि कुछ तो कहना ही है, तो कह देता है कि मुक्ति लेने आया है। कोई यह न सोचे कि मुक्ति दाल-चावल है, कि वो ठीक-ठीक बता पाएगा कि “गुरु मुझे मुक्ति चाहिए और मुक्ति ऐसी-ऐसी होती है”। शिष्य अगर इतना ही जानता होता कि मुक्ति क्या चीज़ है, तो मुक्त ही होता। वो तो कुछ भी आ करके यूँही बोल देता है और गुरु बहुत ज्यादा महत्व भी नहीं देता कि यह बोल क्या रहा है? वो आकर बड़बड़ा-सा रहा है। “प्रेम चाहिए, आनंद चाहिए, मुक्ति चाहिए, ये चाहिए, वो चाहिए”। गुरु कहता है, “ठीक है-ठीक है, जो चाहिए मिलेगा, अभी तू बैठ जा”।

(व्यंग्य कसते हुए) अब बोल दें कि नहीं मिलेगा तो भाग ही जाएगा।  तो कह देता है कि “ठीक है, जो चाहिए मिलेगा। बोल क्या चाहिए?” प्लेसमेंट चाहिए तो वो भी मिलेगा, बैठ जा- बैठ जा, तू बैठ तो जा एक बार”।

(सब हँसते हैं)

तो अष्टावक्र बोलना शुरू करते हैं, कहते हैं कि “देखो, अगर मुक्ति चाहिए तो यह इन्द्रियों के जितने विषय हैं, उनको विश्वस्त जानना और क्षमा का, आर्जव (सरलता) का, दया का, संतोष का और सत्य का पान करना।”

(मुस्कुराते हुए) आप ये भी न सोचिए कि जनक को क्षमा या दया या आर्जव या सत्य का अभी आत्यांतिक अर्थ पता है। जैसे उन्हें मुक्ति का कुछ नहीं पता, वैसे उन्हें इसका भी कुछ नहीं पता। अभी तो बात ऐसे चल रही है जैसे कोई आसमान से बोल रहा हो, किसी धरती वाले से। उसके लिए बातों के अर्थ ही अलग हैं और ये धरती पर है। संवाद हो पा रहा है, यही चमत्कार है। बातचीत हो पा रही है, यही बड़ी विरलता है।

अनाड़ी मनअसल में ये सब भाषा का धोखा है। गुरु जानबूझ के ये धोखा कायम रखता है ताकि शिष्य को लगे कि उसकी बात समझी जा रही है। नहीं तो जब शिष्य बोलता है ‘प्रेम‘ और जब गुरु बोलता है ‘प्रेम‘, तो दोनों एक ही बात थोड़े ही कह रहे हैं। जब दो अलग-अलग बातें हैं, तो तब दोनों के लिए अलग-अलग शब्द भी होने चाहिए। पर भाषा का धोखा यह है कि वो जमीन के लिए और आसमान के लिए शब्द एक ही रख लेती है।

ये बड़ा अच्छा धोखा है, बड़ा प्यारा धोखा है, बड़ा उपयोगी धोखा है। इसी के कारण कोई किसी की मदद कर पाता है। तो सत्य क्या है? ये जनक नहीं जानते। शून्यता क्या है? ये भी जनक नहीं जानते। आर्जव क्या है? ये भी जनक नहीं जानते। लेकिन जनक का मन इनसे हट करके बाकी चीजों से तो भरा ही हुआ है ना? प्रेम क्या है? ये जनक नहीं जानेंगे, लेकिन मोह और घृणा क्या है, ये जनक जरूर जानेंगे।

जनक का मन मोह और घृणा से तो भरा ही हुआ है? सत्य क्या है? ये जनक नहीं जानेंगे, पर मिथ्या क्या है और तथ्य क्या है, इन बातों से तो जनक का मन भरा ही हुआ है। द्वैत में जो कुछ होता है उससे तो शिष्य का मन भरा ही हुआ है ना? शिष्य सँसार से ही तो उठ कर आ रहा है। अब भाषा की प्यारी विडंबना ये है कि भाषा में घृणा का द्वैत-विपरीत मोह नहीं है, प्रेम है। एक संसारी की भाषा में घृणा का विपरीत है, प्रेम और एक ज्ञानवान की भाषा में घृणा का विपरीत है, आसक्ति, मोह।

जो जानता है, उसके लिए प्रेम क्या है? वो जो घृणा और मोह दोनों से हटकर है। जो नहीं जानता, उसके लिए प्रेम क्या है? वो जो घृणा का विपरीत है। अब गुरु को बड़ी सुविधा है। अब गुरु को अगर ये कहना पड़ता कि “द्वैत दुनिया को छोड़ कर तू जरा अद्वैत में आजा”। तो शिष्य को न कुछ समझ में आता, न शिष्य को कुछ भरोसा आता और न शिष्य गुरु के पास आता। पर भाषा ने काम आसान किया, अब गुरु को बस इतना बोलना है कि “तू एक काम कर, तू घृणा छोड़ दे या तू एक काम कर, तू प्रेम का पान कर। ” शिष्य को लगेगा, “ठीक। ये तो ठीक बोला।बात जो भी कही, वो मेरे क्षेत्र के भीतर की कही। मुझसे क्या कहा गया है? प्रेम कर और प्रेम तो मैं जानता हूँ।  और प्रेम क्या है? घृणा का विपरीत । या मुझसे क्या कहा गया है? घृणा  छोड़ दे।  घृणा क्या है? वो जिससे मेरा मन भरा रहता है।”

तो शिष्य को लगता है कि “ठीक है! मैं कर देता हूँ।” अब शिष्य चूँकि शिष्य है, नादान, तो वो एक बात नहीं समझता कि द्वैत का एक सिरा कभी छूटता नहीं। जो तुमसे घृणा छुड़वा रहा है, वो तुमसे आसक्ति भी छुड़वा रहा है। अष्टावक्र कह रहे हैं, ऐसा करो कि क्षमा का पान करो। क्षमा करने का अर्थ होता कि बदला, स्पृहा, मत्सर, ये सारे भाव जो मन में भरे हुए हैं, उन्हें छोड़ो।

राजा हैं जनक। हज़ार नियम बनाते हैं। उन नियम को फिर तोड़ने वाले भी होते हैं। इतने शत्रु हैं। इनको जीतना है। यह कह रहे हैं, “इन्हें छोड़ो।जो सारी बातें जो मन में भरी हुई हैं, उनको छोडो। क्षमा की ओर आओ”।  जनक अगर सुन रहे हैं, ‘क्षमा, तो जनक के लिए क्षमा का अर्थ है, ‘बदले की भावना ख़त्म करो।’ प्रतिकार नहीं करना है।’ जनक के लिए क्षमा का यही अर्थ है। और अभी इतने से ही शुरुआत की जा सकती है कि द्वैत का एक सिरा छोड़, एक छोड़ेगा तो दूसरा अपनेआप छूट जाएगा।  फिर तू दोनों से छूट कर वास्तविक क्षमा में प्रवेश करेगा।

(श्रोतागण की ओर इशारा करते हुए) इसे समझिए आप। अभी अष्टावक्र जिस क्षमा को जानते हैं, जनक उस क्षमा को जानते ही नहीं। जनक क्षमा बस इतनी जानते हैं कि “किसी के बदला लेने का मन कर रहा था, मैंने बदला नहीं लिया, तो इसको माफ़ी कहते हैं”। जनक इतना ही जानते हैं। अष्टावक्र के लिए क्षमा का कुछ और अर्थ है, उनके लिए क्षमा का अर्थ है कि “ऐसा हो जाना कि फिर क्षमा करने की जरूरत ही न पड़े, ऐसा हो जाना कि चोट ही न लगे, उस अटूट में स्थित हो जाना, जिसमें दरार पड़ती ही नहीं।

तो अब कोई कितनी भी चोट पहुँचता रहे, हमें बदला क्या लेना है? हमें चोट लगती ही नहीं। पर ये अर्थ अष्टावक्र के लिए है। जनक यह अर्थ नहीं जानेंगे। लेकिन जो अष्टावक्र के वचन हैं, वो जनक के लिए, नए-नवेले शिष्य के लिए सुविधा पूर्ण हैं। ये उपाय है गुरु का, “ये अभी-अभी आया है, इसको तो कोई सरल काम ही दो, जिससे ये शुरुआत कर सके”। तो उसको ये काम दे दिया गया है कि “भाई, संतोष का पान करो”।राजा है और राजा को पता है कि उसकी इच्छायें पूरी होती हैं। जब बड़ी इच्छा पूरी होती है, तो इच्छा और बड़े की हो जाती है। राजा को जरूरी है ये कहना कि “तुम संतोष का पान करो” क्योंकि राजा की इच्छाओं का कोई अंत नहीं हो सकता। तुम्हारी जो इच्छायें होंगी, राजा की इच्छायें उनसे १०० गुना बड़ी होंगी क्योंकि ९९ तक वो पहले ही पहुँचा हुआ है। तो उसको बोला गया- “तू संतोष कर ले। तेरा मन इच्छाओं से भरा हुआ है।”

संसारी मन के लिए इच्छा होती है, नहीं तो अनिच्छा होती है।

(श्रोतागण की ओर इशारा करते हुए) समझो बात को! हमारे साथ ऐसा होता है कि “या तो मेरा वो करने का मन है, या तो मेरा वो करने का मन नहीं है। मनातीत को मैं जानता नहीं।” तुमको कोई काम बताया जाए तो तुम्हारे पास दो ही उत्तर होंगे। तुम कहोगे कि “मेरे करने का मन है” या तुम कहोगे कि “मेरे करने का मन नहीं हैं”। इन दोनों के अलावा एक तीसरा जवाब भी हो सकता है; उसको तुम जानते नहीं। गुरु उस तीसरे जवाब में स्थित होता है।

पर उस तीसरे में शिष्य आ सके, उसके पहले उसे इन्हीं एक-दो में घुमाना पड़ता है। एक-दो में ऐसे घुमाना पड़ता है कि ये एक-दो जरा साफ़ ही हो जायें। फिर उसको तीसरे में खींचा जा सकता है कि “अब तू आ, कि तू एक-दो से मुक्त हुआ, अब ज़रा तीन में पहुँच”। यही कारण है कि इस विधि का गुरुओं ने ख़ूब उपयोग किया है।

कुछ सूफियों ने कहा कि “इश्क़-ए-मज़ाज़ी, इश्क़-ए-हकीकी की सीढ़ी बन जाता है। वो ऐसे ही कहा। कहा कि “तुमसे जब हम बोलते हैं, ‘प्रेम’, तो तुम प्रेम का एक ही अर्थ जानते हो – किसी दूसरे इंसान के प्रति खिंचाव। तो चलो तुम ऐसा करो कि तुम वही कर डालो। हम नहीं एतराज़ करते। तुम माँ-बेटे का या भाई-भाई या दोस्त-यार या प्रेमी-प्रेमिका का, तुम ये ही खेल डालो। जितनी जान है, उतनी जान से खेलो। ये खेल तो तुम हार जाओगे। पर ये खेल तुम्हें थका-थका कर कहीं और पहुँचा देगा।”

ये खेल ऐसा नहीं हैं जो कोई भी जीत सके। इश्क़-ए-मज़ाज़ी हमेशा हारेगा क्योंकि जो तुम खोज रहे हो, वो तुम्हें किसी इंसान में मिल ही नहीं सकता। तो इसीलिए जब तुम अपने प्रेम-प्रसंग बनाने निकलते हो, तो उन्हें असफल होना ही होना है। लेकिन वो असफलता तुम्हें दूसरे खेल में जिता देगी। तो सूफी कहते हैं कि “ठीक! तुम जाओ। यही कर लो”।

संसारतुम रूमी के वचन देख लो। कभी-कभी जीसस के भी। जब वो ‘प्रेम’ की बात करते हैं तो जो बात आदमी और परमात्मा के लिए कही जानी चाहिए, वो ऐसी कही होती है कि आदमी और औरत के लिए भी उपयुक्त हो जाती है। यह संयोगवश नहीं है। ये गुरु की बहुत गहरे बोध से उठी हुई विधि है। या मीरा को ले लो। मीरा जिस भाव से कृष्ण के लिए गाती हैं, कोई प्रेमिका अपने शरीरी प्रेमी के लिए भी ऐसे ही गा सकती है। ये भी विधि ही है कि तुम इसी भाव से किसी इंसान को भी पुकार लो। पर इंसान से बहुत नहीं पाओगे। वहाँ तो हारोगे। लेकिन कुछ और मिल जाएगा।

अनाड़ी मन जो होता है उसके लिए जमीन का प्रेम, जमीन से बंधे रहने की जंजीर बन जाता है। और जो ज्ञानी होता है उसके लिए ज़मीन का प्रेम, आसमान में उड़ने का पंख बन जाता है। अनाड़ी मन के लिए तथ्य सिर्फ एक बंद कोठरी रह जाते हैं, मुर्दा तथ्य। और जागृत मन के लिए, यही तथ्य सत्य का द्वार बन जाते हैं। जमीन तुम्हारा बंधन भी है और तुम्हारा अवसर भी। इसी से चिपके रह गए और ध्यान न दिया और समर्पित न हुए, तो इससे बड़ा बंधन नहीं है।

सँसार महा बंधन है, पर यही सँसार, मुक्ति का अवसर भी है। सब-कुछ तुम पर निर्भर करता है।

सत्र देखें: Prashant Tripathi on Ashtavakra: वहीं मिलेगा प्रेम (Thence is love)

इस विषय पर अधिक स्पष्टता के लिए पढ़ें:-

लेख १: संसारी कौन? जो संसार से पूर्णतया अज्ञानी हो

लेख २: भ्रांत कौन, और किसके लिए?

लेख ३: ज्ञानी-जो निर्विशेष है