आप ही मूल आप ही शूल आप ही फूल

आपे बीजि आपे ही खाहु ॥ 

~जपुजी साहिब, नितनेम

वक्ता: आपे बीजि आपे ही खाहु”- सीमित, बँटी हुई दृष्टि होती है वो, जो बीज को और अंकुर को अलग-अलग देखती है । जो कहे कि “बीज और उससे अभी-अभी उभरा अंकुर अलग-अलग हैं”, वो पागल होगा कि नहीं होगा? अंकुरित चने देखे हैं? देखे हैं, स्प्राउट्स? उसमें से अभी-अभी वो ज़रा-सा अंकुरित हुआ है; वो दोनों अलग-अलग हैं क्या?

अगर वो अलग नहीं हैं, तो वो अब थोड़ा-सा, नन्हा-सा पाँच इंच का पौधा बना । बीज, बड़ा सूक्ष्म-सा होकर रह गया है, उसके भीतर जो कुछ था, उसने पौधे को दे दिया है। बीज के बस अवशेष बचे हैं, चिन्ह-भर बचा है बीज का। पौधा अब हो गया है, एक-आधे हाथ का। वो पौधा और बीज अभी-भी अलग-अलग हैं क्या? थोड़ा-सा वो और बढ़ेगा, बीज का नामोनिशान शेष नहीं रहेगा। बीज गया, अब खोजोगे तो बीज मिलेगा नहीं। बीज कहाँ है?

अनाड़ी दृष्टि होगी तो कहेगी, “बीज मिट गया,” और कृतज्ञ दृष्टि होगी तो कहेगी, “बीज…?

श्रोता १: पेड़ बन गया ।

वक्ता: समय आ गया है बस बीच में, और कुछ नहीं हुआ है। नज़रों का धोखा है, समय बीच में आ गया, हुआ कुछ नहीं है। कभी कुछ होता ही नहीं, कुछ हुआ नहीं, वही है बात। बीज रहा ये, रूप बदल दिया है। पेड़ बड़ा होगा, फल लगेंगे, उन फलों को तुम खाओगे। तुम अलग हो गये अब उस पेड़ से?

अब बात को थोड़ा फैलाओ। एक पेड़ को नहीं लो, ‘पेड़’ को अब ज़रा ‘पेड़ों’ बना दो। ‘पेड़’ से अब यह अर्थ कर लो कि – पेड़ों का पूरा समुदाय, कि जैसे धरती के सारे पेड़ ‘एक पेड़’ हों, या धरती पर एक ही पेड़ हो। तुमने जो खाया उसी पेड़ से खाया ना? क्योंकि एक ही है, उसके अलावा खाओगे किस से? तो तुम और पेड़ अलग-अलग हो क्या? तुम ख़त्म हो गये, तुम मिटटी हो गये। और एक मिटटी है, मिटटी को भी अलग-अलग मत देखना । वो मिटटी और बीज, अलग-अलग हैं क्या? बिना मिटटी के बीज हो सकता था? और बीज ही तो मिट के मिटटी हो रहा है ना?

यह पूरा एक विशाल तंत्र है, जो एक है । तंत्र एक है, उसमें विभाजन, देखने वाली नज़र करती है। नज़रों का धोखा है, चीज़ एक है – जैसे कि यहाँ बैठे, तो सिर्फ़ एक कमरा देख सकते हो, थोड़ा ऊपर जाओगे तो बिल्डिंग, इमारत देख सकते हो, थोड़ा और ऊपर जाओगे तो यह सेक्टर देख सकते हो, थोड़ा और ऊपर जाओगे तो यह शहर देख सकते हो, थोड़ा और ऊपर जाओगे तो यह प्रांत, फिर यह देश, फिर समूची पृथ्वी देख सकते हो।

जब तुम सिर्फ़ यह कमरा देख रहे हो, तब क्या समूची पृथ्वी मिट गयी है? पर क्या तुम्हें दिख रही है? मिटी नहीं है, बस दिख नहीं रही है। बस देखने वाली नज़र की सीमितता है। उसका असामर्थ्य है, वो नहीं देख पा रही, है तो। तुम अभी यहाँ बैठे हो, सिर्फ़ तुम दिखाई देते हो, क्योंकि हम जो देखते हैं, वो समय में देखते हैं। पर जो ज्ञानी की दृष्टि होगी, वो तुम्हें नहीं देखेगा। तुम में मानवता का पूरा इतिहास, और पूरा भविष्य भी है। तुम अपने साथ अपनी हज़ार पुश्तें यहाँ लेकर के बैठे हुए हो। वो सब मौजूद हैं यहाँ पर, सब मौजूद हैं, पर दिखाई नहीं देतीं, क्योंकि हमारी आँखें सिर्फ़ स्थूल को देख पातीं हैं।

जब हम बीज को देखते हैं, तो क्या हमें पेड़ दिखाई देता है पूरा? हम बच्चे को देखते हैं, तो क्या हमें जवान व्यक्ति दिखाई देता है? तो फिर हमें उस जवान व्यक्ति को देखते हुए, उसकी सत्तर पुश्तें कैसे दिखाई देंगी? और याद रखना सत्तर पुश्तें उस व्यक्ति की नहीं हैं, वो समष्टि की हैं। वो व्यक्ति मर सकता है, बिना एक भी बच्चा किये । समझ रहे हो?

समष्टिकुछ बँटा हुआ नहीं है, सब एक है। बँटा हुआ दिखता है, क्योंकि मन बँटा हुआ हैऔर जिस क्षण मन बँटा हुआ नहीं रहता, उस क्षण वो समय के पार देखने लगता हैइसीलिए संतों को अक्सर भारत में ‘त्रिकाल-दर्शी’ कहा गया। ‘त्रिकाल-दर्शी’ का अर्थ यह नहीं है कि – वो यहाँ बैठे-बैठे भविष्य देख रहे हैं, घटनाएँ देख रहे हैं। ‘त्रिकाल-दर्शी’ का अर्थ यही है कि – वो बँटा हुआ नहीं देखते, वो समय के गुलाम नहीं हैं वो बीज में पेड़ को, और पेड़ में बीज को, और दोनों में समष्टि को देखते हैं 

इसी बात को अलग-अलग कहानियों के माध्यम से ऐसे ही प्रस्तुत किया गया है कि – एक छोटा-सा बीज है, और उसको एक बुद्ध पुरुष उठाता है, और उस बीज को देखता है और कहता है, “ये परमात्मा”। अब बात समझ में आ रही है? जब वो बीज को देख कर कहते हैं, “परमात्मा”, या किसी पेड़ के गिरे हुए पत्ते को देख कर कहते हैं, “ये परमात्मा”, या किसी चींटी को देख कर कहते हैं, “ये परमात्मा,” तो बात को समझो।

उनके लिए चींटी, ‘चींटी’ है ही नहीं। हमारे लिए चींटी, ‘चींटी’ है, क्योंकि हमारी नज़रें सिर्फ़ उतना ही देख पाती हैं। वो चींटी में संपूर्ण ब्रह्माण्ड देख रहे हैं। और भूलना नहीं कि संपूर्ण ब्रह्माण्ड उस चीटी में समाया हुआ है। ‘पूर्ण’ दिखाई दे रहा है उन्हें उसमें, तो ज़ाहिर ही है, “परमात्मा” ही तो कहेंगे। और क्या कहेंगे? ‘पूर्ण’ को और क्या नाम दोगे?

तो उनका रेत पर पाँव पड़ेगा, तो बोलेंगे, “नारायण-नारायण”। इसको अन्धविश्वास मत समझ लेना, यह गहरी आंतरिक प्रतीति है। और पक्का कह रहा हूँ कि आपको भी होगी, जिस क्षण आप थोड़ा अपनेआप से हटना सीखेंगे। बहुत मुश्किल नहीं है। ऐसा नहीं है कि आप उछलना शुरू कर देंगे, आनंदमग्न हो जाएँगे, और नाचना वगैरह शुरू कर देंगे। आप कोई उद्घोषणा नहीं करना चाहेंगे दुनिया को कि, “अभी-अभी पाँव रेत पर पड़ा, और ऐसा लगा कि..” । क्या बताओगे? तुम्हें खुद पता ही नहीं चलेगा कि क्या लगा। लगेगा भी, और पता भी नहीं चलेगा कि क्या लगा । और वही तो है…

जो असली है वो तुम्हें मन के माध्यम से नहीं मिलेगाजो असली है वो आँखों से, और कान से, नहीं मिलेगा इसलिए कहता हूँ कि मेरी ओर इतनी पैनी नज़र न दौड़ाया करो, मुझसे कुछ नहीं मिलेगा। यहाँ सिर्फ़ एक शरीर दिखाई देगा। जो असली है, वो इन दरवाज़ों से नहीं भीतर आएगा। वो तो चोरी-छिपे आता है, तुम्हें पता भी नहीं चलता, और आकर बैठ जाता है। चोर है वो

आत्मा के लिए एक नाम यह भी हो सकता है, ‘चोर’। सेंध मार के आती है। अगले दरवाज़े से कभी आती ही नहीं। यह जो नौ-दस दरवाज़े हैं शरीर में, इनसे उसका कभी पता ही नहीं चलता। वो पता नहीं कौन से गुप्त दरवाज़े से घुसी बैठी है।

तुम्हारे ही घर में घुस कर कोई बैठ गया है, तुमसे भी पहले से बैठा हुआ है, और ऐसा शातिर है, चालाक है, कि उसके होने का पता भी नहीं चलता। कभी-कभार ऐसा लगता तो है, जैसे खटपट हुई। कभी ऐसा लगता है, जैसे बगल के कमरे में कोई धीरे-से गा गया हो। अँधेरी रातों में ऐसा कहने का मन करता तो है- “श्श्श…कोई है”। कौन है, पता नहीं चलता। जब तक ढूँढने जाते हैं, गायब हो जाता है। चुप होते हैं, एहसास कराता है। कैसे पकड़ा जाए उसको? चिढ़ाता है – “सो रहे हो, सो रहे हो,” जगा देगा। और जग जाओगे, तो गायब हो जाएगा। इस कमरे में जाओगे, तो लगेगा कि उस कमरे में है, दौड़ाएगा। कोई है, कोई तो है।

रूमी कहते हैं: “तुम ऐसे हो कि तुम होते हो, तो सोने नहीं देते । और तुम नहीं होते, तो नींद आती नहीं”। जगाए ही रखता है, स्वभाव है उसका- जगाना। होता है, तो सोने नहीं देता । जाता है, तो नींद आती नहीं।

‘कोई है’, इसे सहेज कर रखा जाता है। नाज़ुक मसला है। चौराहे पर नुमाइश नहीं की जाती। बोलते नहीं हैं, फुसफुसाते हैं ताकि, सिर्फ़ वही सुने जो जगा हुआ है।

~ ‘शब्द-योग’ सत्र पर आधारित । स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं ।

सत्र देखें: Prashant Tripathi on Nanak: आप ही मूल आप ही शूल आप ही फूल (You the root You the shoot You the fruit)

इस विषय पर अधिक स्पष्टता के लिए पढ़ें:-

लेख १: फूल-मूल की अभिव्यक्ति

लेख २: अलग-अलग धर्म क्यों हैं?

लेख ३: इक्को रंग कपाई दा- बुल्ले शाह