मैं

मैं
क्यों इतना शक्तिहीन,
चाहता हूँ कहना कवि स्वयं को,
पर शब्दावरण झीन,
ढाँप नहीं पाता- शब्द को,
शब्द के अर्थ को,
भावुक शब्द की कोमलता को,
आहत शब्द की वेदना को,
क्षुब्ध शब्द के व्यंग को,
कुपित शब्द के क्रोध को ।

कह कर भी वह कुछ नहीं कहते,
मैं सदा कुछ अधिक ही हूँ कहता,
ऐसा पुनः वे कहते,
“शर्म करो,
कितने कमज़ोर हो तुम,
छिः, इतने नग्न शब्द ”
और मैं, अपने नग्न शब्दों को
ह्रदय ही में छुपाकर
होंठ भींच लेता हूँ ।

पर हाय रे शक्तिहीन,
होंठों का ताला भी
नग्न शब्दों को ढाँप नहीं पाता;
प्रकट हो जाते हैं वे
अपने पूर्ण वीभत्स रूप में ।
“शर्म करो, कितने अक्खड़ हो तुम
लज्जा आती है हमें,
छिः, इतने नग्न शब्द! ” ।

लज्जा आती है तुम्हें !
हँह ! तुम्हें यदि लज्जित कर देते हैं
मेरे नग्न शब्द
कहीं वे मेरी शक्ति ही तो नहीं ?
~ प्रशान्त (जून, १९९५)


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