मैंने पूछा

मैंने पूछा डूबते हुए सूरज से
तुम्हें देख वह पक्षी क्यों घर लौटता है ?

मैंने पूछा उड़ते हुए पक्षी से
क्यों तुम व्यर्थ गगन गुंजाते हो?

मैंने पूछा विस्तृत श्याम गगन से
क्यों तुम मेघों के पीछे मुँह छुपाते हो ?

पूछा मैंने मेघों से
क्यों तुम धरती पर छाये-छाये जाते हो ?

धरती से पूछा- बोलो तुम
क्यों बोझ मेरा उठाती हो
क्यों इन नन्हे पौधों को
जन्म दे हर्षाती हो ?

नन्हे पौधों से बोला – बोलो तुम
किस हेतु यूँ सर उठा लिया ?

सरों से पूछा – बताओ तो
तनने ही में आनंद क्या भला ?

तने हुए पर्वत से पूछा-
क्यों उस झरने को झर-झर बहाते हो ?

बहते झरने से पूछा-
इतनी तड़प से क्यों इतने दौड़े भागे जाते हो ?

उत्तर कहीं बाहर से नहीं
स्वयं से ही मिला
सोचा- अरे व्यर्थ ही तो भरमाता हूँ
वह कौन? वह क्या ? वह कहाँ ?
का उत्तर पाने जाता हूँ ?

~ प्रशान्त (२६.६.९७)


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