घड़ी

घड़ी
क्यों चलती हो
निरुद्देश्य
क्या पगला गयी हो
या
यह उम्र का असर है
पर तुम तो
बचपन से ही हो ऐसी
बिलकुल बुद्धिहीन
इतनी समयबद्धता
दिखने पर भी
तुम चल नहीं पाती हो
साठ साल
नहीं तो कहता कि
सठिया गई हो।

क्या है यह ?
शकल तो देखो
अपनी आईने में
पर तुम तो
अरे हाँ
चल भी नहीं सकती
एकदम निठल्ली
लगती हो
इतना काम करने पर भी ।

यह जो तुम्हारे हाथ हैं
क्या
लड़ते रहते है
आपस में ही
या निरर्थक दौड़ लगाते है
आगे-पीछे, पीछे-आगे
नालायक नहीं तो ।

टंगी हुई हो
टंगी रहो
बड़ी शिष्ट हो न
उठो
क्रांति में
बजाओ बिगुल
पर तुम तो बोलोगी भी
अपने नियत समय पर
धिक्कार है ऐसी जीवन पर
जानती हो –
‘ पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं ’
समय ?
लगता क्या है तुम्हारा
बस उसी के साथ चलोगी
मानो मेरी बात
थोड़ी उच्छृंखलता
आवश्यक है
जीवन के लिए
अरे परजीवी
तुम्हारा तो भोजन भी
हमें ही देना पड़ता है
इतनी अनासक्ति फिर भी विवशता!

कुछ भी नहीं
मिला है तुम्हें
इन आदर्शों पर चल कर
भूल जाओ उस समय को
इस समय के साथ चलो
सुखी रहोगी
आखिर
तुम्हारा अपराध क्या है
जो तुम्हें
यूँ
लटका दिया गया है
दीवार पर,
या कह सकती हो
सलीब पर

क्यों जीवन व्यर्थ करती हो
दूसरों के लिए।

आशा है
तुम्हें मेरी बात
समझ आयी होगी
अब चलता हूँ
वक्त हो रहा है ।

~ प्रशान्त (मई २०, १९९६)


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