असली जीना माने क्या?

प्रश्न : पंचदशी में वर्णन किया गया है कि इन्द्रियों द्वारा जिन विषयों का ज्ञान होता है उन विषयों की उपेक्षा और अनादर कर देने पर जो ज्ञान-रूपी स्फूर्ति दिखने लगती है वही ब्रह्मतत्व है । तो फिर वस्तुओं के साथ कैसा सम्बन्ध रहे ?

वक्ता : किसका कैसा सम्बन्ध रहे ? पूछ रहे हो कि वस्तुओं के साथ कैसा सम्बन्ध रहे । जो तुम्हें बता रहा है कि वस्तु है, उसको सम्बन्ध रखने दो वस्तु के साथ । कौन तुमसे आकर कहता है कि वस्तु पड़ी है ? कौन तुमसे आकर कहता है कि स्थान है, समय है जहाँ वस्तु का अस्तित्व  है ? वस्तु के लिए स्थान चाहिए, समय चाहिए न ? कौन तुमसे आकर कह रहा है ? कौन तुम्हें दिखाता है कि वस्तु है ? कौन ?

श्रोता १ : आँखें ।

वक्ता : ठीक है । उनको सम्बंधित रहने दो वस्तु से । वो बेचारी और करेंगी क्या ? आँख तुम्हें क्या दिखाएगी ? स्मृति तुम्हें कहाँ ले जाएगी ? चित्त में क्या संगृहीत रहेगा ? बुद्धि क्या करेगी ? इन्हें इनका काम करने दो न । इनका तो वस्तुओं से एक तयशुदा सम्बन्ध ही होना है । ये उससे ज़्यादा कुछ  कर सकते हैं क्या ? तुम्हारी आँख सूँघेगी क्या ? तुम्हारी नाक देखेगी क्या ? ये तो वही करेंगे जो इन्हें करना है । इन्हें करने दो ।

तुम सत्य में रहो, लगातार । तुम उस बिंदु पर बैठो जहाँ समय की नदी चल ही नहीं रही है, जहाँ से तुम सिर्फ देख रहे हो इस पूरे प्रवाह को । हाँ, आँख है, वो वस्तुओं को देख रही है । मन है, वो समय से संयुक्त है। हम नहीं संयुक्त हैं । हम तो उस जगह पर बैठे हैं जहाँ पर ये प्रवाह हमको नहीं छू पा रहा । अपने अहम् को, वस्तुं से, विषयों से, इन्द्रियों से विच्छिन्न करके अकेला कर दो । केवल अहम् ।

अभी अगर उसमें तकलीफ आती हो, तो उसे किसी ऐसे से जोड़ दो जो अभी वस्तु ही है, पर ऐसी वस्तु जो बड़ी जल्दी लुप्त हो जाएगी । जिसका स्वभाव ही है अनासक्ति । वो जुडी रहेगी नहीं। वो तुम्हें बाकियों से काटकर स्वयं भी लुप्त हो जाएगी । तुम केवल अहम् की स्थिति में रहो, अकेला, अनछुआ ।

आँख तुम्हें दीवार के अलावा कुछ और नहीं दिखाएगी, कुछ और नहीं दिखा सकती । किसी की आँख नहीं दिखा सकती । कान से स्पर्श नहीं कर पाओगे । आँख खोलोगे तो ‘व्यक्ति’ ही दिखेगा, ‘वस्तु’ ही दिखेगी । तुम बोध में जीना सीखो । उसी को संतों ने बार-बार ‘सुरति’ कहा है । एक मधुर, सूक्ष्म, पार्श्व संगीत जैसा ।

परसों एक बड़ी मज़ेदार घटना हुई थी । हम एक स्थान से आ रहे थे, और मैं मोटरसाइकिल चला रहा था । रात का समय था ।मोटरसाइकिल की गति अच्छी थी । अल्मोड़ा के आसपास बारिश होने लगी, और सड़क गीली थी । तभी मैं देवेश जी का गाया हुआ गाना गुनगुना रहा था- ‘नेहरवा’ । मैं उस गाने की पंक्तियों को घंटे दो घंटे से गुनगुनाते हुए मोटरसाइकिल चला रहा था । तो गाड़ी एक जगह फिसल गई, गिरी नहीं, फिसल गई । अच्छी गति में थी, फिसली । उतनी ही गति से पाँव लगा कर रोकने पड़ी, तो एड़ी में कुछ चोट लगी, फिर आगे बढ़ लिए ।

आगे बढ़ने के थोड़े समय बाद ख्याल आया कि  इतना सब कुछ हो गया, और मैं तब भी गाता रहा । एक क्षण को भी गाना रुका नहीं था, और ये ख्याल भी नहीं आया कि अभी भी गाए ही जा रहा हूँ । बात समझ रहे हो ? अब कहाँ तो दो सौ किलो की मशीन को संभाल रहे हो, और ये रहा है, वो हो रहा है, और कहाँ साथ में गाना गुनगुना रहे हो ? जैसे दो अलग-अलग व्यक्ति हों । एक वो जो अपना संसारी कामकाज कर रहा है, और दूसरा जो अपना काम कर रहा है । उस दूसरे को मतलब ही नहीं कि ‘दुनिया’ में क्या हो रहा है ।

उपनिषदों में इसी बात को बहुत खूबसूरती के साथ कहा गया है, ‘एक डाल पर दो चिड़ियाँ बैठी हैं । एक खाने में मगन है, और दूसरी देखने में ।’ बड़ा प्यारा प्रतीक है । एक डाल पर दो पक्षी बैठे हैं । एक खाने में मगन है, और दूसरा सिर्फ़ देख रहा है । जैसे दो अलग-अलग व्यक्ति हों । ऐसे जियो ।

और दो तो हैं ही- प्रकृति और पुरुष । प्रकृति को प्रकृति का काम करने दो, तुम पुरुष की भाँति जियो । वो नाद अहर्निश बजता रहे । उसी को मृत्यु के पार होना भी कहते हैं । क्योंकि ‘तुम’ नहीं गा रहे हो उसको, तो तुम्हारी मृत्यु के बाद वो रुक भी नहीं सकता । तुम नहीं रहोगे, वो गीत स्वयं को गुनगुनाता रहेगा ।

और याद रखना जब प्रकृति सिर्फ़ अपना काम करती है, तो जीवन से एक चीज़ तुरंत चली जाती है- गंभीरता । तुम्हें यह अहसास होना शनः शनः कम हो जाता है कि कुछ भी महत्वपूर्ण है । आँखें देख रही हैं, हाँ ठीक है, दीवार है । जो महत्वपूर्ण है, वो नाद तो पीछे बज ही रहा है न ? वो असली चीज़ है । दीवार है, दुनिया है, संसार है, ठीक है । कामधंधा है, रोज़ी-रोटी है, देखभाल है, ठीक है । मधुर लगे तो कह दो, ‘लीला है’ । आढी-तिरछी लगे तो कह दो, ‘प्रपंच है’। जो कहना है कह दो । पर जो भी है, परदे पर चलता खेल है ।

श्रोता २ : पर सर, दिक्कत तब आती है जब वह दूसरी वाली जो चिड़िया है, खाने वाली, मन उससे ज़्यादा जुड़ जाता है कि यह है, प्रकृति है । जब यह है, तो दूसरी वाली पर बात कैसे आएगी ?

वक्ता : देखो दो भी तभी तक हैं, जब पहले वाली विचार के भीतर है । क्योंकि अभी पहली वाली का वर्णन किया जा सकता है, इसलिए दूसरी भी है । जिस ऋषि ने ये सूत्र लिखा उसने किसी ऐसे मन के लिए लिखा जो अभी पूर्ण साक्षीभाव को प्राप्त नहीं हुआ है । क्योंकि पूर्ण साक्षित्व में दूसरी चिड़िया को देखने वाला कौन बचेगा ? अगर आपने देख ही लिया कि दो चिड़ियाँ हैं, तो तीसरी भी है, जो इन दोनों को देख रही है । तो दो नहीं हैं, एक भी नहीं हैं । (हँसते हुए) है तो कुछ भी नहीं । न प्रकृति है, न पुरुष है ।

तुम्हें समझाने के लिए बोला था पर तुम समझना नहीं चाहते । सत्य तो ऐसा ही है जो शब्दों में आएगा ही नहीं । पर जो शब्दों में नहीं आएगा, उससे तुम्हारी मदद भी नहीं हो पाएगी । दो नहीं हैं, एक भी नहीं है । कहीं कोई चिड़िया नहीं है । पर इससे क्या मिला तुम्हें, बेचारी दोनों चिड़ियाँ की जान चले गई । (हँसते हुए) खाने देते, देखने देते ।

श्रोता २ : सर एक स्थिति में समझाया जा रहा है, उसे हम सच समझ रहे हैं । अगली स्थिति में जा कर वो भी असत्य हो जा रहा है । फिर ये सत्य भी सत्य नहीं हुआ ?

वक्ता : (व्यंग्य करते हुए) सत्य है सवा दो इंच का । निकल तो तुम्हारे मन से ही रहा है न ? कैसा होगा ‘आख़िरी’ ? ‘आख़िरी’ होता, ‘निर्दोष’ होता, ‘विराट’ होता, तो तुम्हारी पकड़ में आ जाता ? सत्य ही होता तो तुम  जान जाते ? कोई आकर कहे, ‘मैं जान गया हूँ सत्य को’, वो असत्य ही होगा । वो कहे, ‘कैसे पता?’ तुम कहो, ‘नहीं तो तुम  कैसे जानते ?’ ( ‘तुम’ शब्द पर ज़ोर देते हुए)

श्रोता २ : तो इसका मतलब यह हुआ कि हम सत्य को जान ही नहीं सकते कभी । असत्य ही जान सकते हैं ?

वक्ता : ऐसे कह लो, ‘मेरा जाना  हुआ सब असत्य है ।’

श्रोता २ : मेरा—जाना—सत्य है, मैं खुद सबसे बड़ा असत्य हूँ ।

वक्ता : मेरा  जाना हुआ  सत्य हो नहीं सकता, पर ‘मेरा जाना‘ सत्य है । (मुस्कुराते हुए) ‘जाना हुआ’ नहीं, ‘जाना’ ।

श्रोता ३ : सर जब सब कुछ आत्मा में है, मतलब जब सब आत्मा है, तो हम जा कहाँ सकते हैं ?

वक्ता : कहीं नहीं । इतना मत सोचो । उसमें आसमान नहीं समाएगा । (व्यंग्य करते हुए) इतना ज़रूर होगा कि एक कटोरा ज़रूर टूट जाएगा ।

श्रोता ४ : सर एक बार आपने कहा था कि आँखों का भी क्या दोष, उनका काम है देखना, वो देखती हैं । कान का काम है सुनना, सुन लेते हैं । पर सब तो जाकर मन पर रुक जाता  है ।

वक्ता : मन जो तंत्र है, उसका काम सोचना है, वो सोचता ही है । किसी का कोई दोष नहीं है ।

– ‘बोध-सत्र’ पर आधारित । स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं ।

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सत्र देखें: https://www.youtube.com/watch? v=T6GDc9d8sLU