अवलोकन और ध्यान में अंतर

प्रश्न: सर, शुरू से दो शब्द बहुत उपयोग हो रहें हैं यहाँ पर: ध्यान और अवलोकन। उनका मतलब समझ नहीं आ रहा है। अवलोकन – खुद को देखना। ख़ुद को देख लेने से क्या हो जाएगा? देखने का मतलब क्या है?

वक्ता: दो बातें हैं। पहला- देखने का मतलब क्या है? और दूसरा- देखने से हो क्या जाएगा? पहली बात – ध्यान का, अवलोकन का मतलब क्या है? दूसरी बात – ये हो भी गया तो इससे होता क्या है?

मतलब कुछ ख़ास इनका है नहीं। दोनों ही जो शब्द हैं, ये बड़े सीधे-साधे हैं। दिक्कत क्या आ जाती है कि हमने ये शब्द पहले से सुन रखे हैं। हैं तो दोनों ही शब्द शब्दकोष से ही है न? तो हमने ‘ध्यान’ शब्द भी पहले से सुन रखा है, और ‘अवलोकन’ भी सुन रखा है। तो जो पहले से मतलब पता है, वो बीच-बीच में आकर मिलना शुरू कर देता है। उसकी वजह से थोड़ी-बहुत उलझन आना लाज़मी है, कोई बड़ी बात नहीं। ठीक है?

अवलोकन बिल्कुल वही है जो तुम जानते हो। अवलोकन का मतलब होता है – देखना। हम जब आमतौर पर अवलोकन की बात करते हैं तो आँखों से देखने की बात करते हैं। जब जीवन के  संदर्भ में अवलोकन की बात होती है तो उसका मतलब होता है- जिन भी इन्द्रियों से जान रहे हो वो सतर्क हैं।

तुम संगीत का भी अवलोकन ही करते हो। अवलोकन में लेकिन एक चीज़ होती है कि कोई ‘विषय’ होता है। तुम हमेशा यही कहोगे, मैं इस चीज़ का अवलोकन कर रहा हूँ। वो जो चीज़ है न, वो उस अवलोकन का क्या है? मैं अभी इस माइक का अवलोकन कर रहा हूँ, इस पैन का अवलोकन कर रहा हूँ, दोस्त का अवलोकन कर रहा हूँ, सड़क का अवलोकन कर रहा हूँ;उसका कोई केंद्र होगा, कोई चीज़ होगी जिसका तुम कह सकोगे कि अवलोकन चल रहा है।

अवलोकन हम करते ही रहते हैं। लेकिन जो अवलोकन तुम्हें आज तक पता था और जिस अवलोकन की बात कोर्स में की गयी है, उनमें बस अंतर इतना है कि हमारा जो अवलोकन है वो आमतौर पर साफ़ नहीं होता है।

आँखें देखती हैं और मन उस में हस्तक्षेप कर देता है और कोई मतलब डाल देता है। कान सुनते हैं, पर जो सुनते हैं वो आया नहीं कि उसका एक नामकरण हो जाता है, छवि बहुत जल्दी बन जाती है। ये अवलोकन में अवरोधक हैं, ये अवलोकन को रोक देते हैं,वरना अवलोकन बिल्कुल वही है- आँख से देख लिया, अवलोकन हो गया; कुछ बड़ी बात नहीं। कान से सुन लिया, अवलोकन हो गया।

लेकिन हम सिर्फ देखते या सिर्फ सुनते हैं नहीं। जब हम देखते हैं तब उसमें ‘देखना जोड़ (+) कुछ और’ हो जाता है। हम जब सुनते हैं तो उस में ‘सुनना जोड़ (+) कुछ और’ हो जाता है। और ये जो ‘जोड़ (+)’ है, ये वास्तव में जो देखा, जो सुना उसमें से कुछ कम कर देता है, ‘घटा (-)’ कर देता है।

तुम लोग कृष्णमूर्ति के कुछ लेख पढ़ चुके हो न कोर्स में? कृष्णमूर्ति ने एक बार बड़ा अजीब सवाल पूछा। उन्होंने पूछा क्या कभी वाकई किसी पेड़ को देखा है? ये बात किसी बच्चे से नहीं पूछी, ये बात उन्होंने एक ज्ञानी से पूछी  कि कभी पेड़ देखा है? तुम कहोगे बड़ी अजीब बात है। पेड़ तो सब ने देखा है। कौन ऐसा है जिसको पेड़ नहीं दिखाई देता? पर सवाल को समझो।

तुम कभी पेड़ नहीं देखते। हम सब जब भी पेड़ देखते हैं तो हमने कभी देखा ही नहीं होता। हम बोलते हैं, “अरे! ये तो पेड़ है”; अब छवि बन गई न? हमें पहले से पता है कि ये पेड़ है। तो अब उस में देखने लायक कुछ बचा ही नहीं, अब अवलोकन नहीं हो सकता, स्मृति ने अपना काम कर दिया। अवलोकन की जगह स्मृति ने ले ली। अवलोकन गया, स्मृति ने काम शुरू कर दिया। जो चीज़ आँखों को साफ़-साफ़ दिखनी चाहिए थी वहाँ कुछ और है जो आ गया, हम नहीं कर पाए अवलोकन।

बात तो बड़ी सीधी थी, “आँख खोलो और पेड़ देख लो” पर वो छोटी सी चीज़ भी हमारे साथ हो नहीं पाती है। अब  मैंने तुम से एक बात कही, “छोटी-सी चीज़ हो नहीं पाती है।” शब्दों को अवलोकन करने के लिए प्रयोग कर लेते हैं, मज़ा आएगा।

मैंने एक शब्द कहा – ‘चीज़’। सब लिखो, “चीज़ माने क्या?” शब्द एक ही है जो सबसे बोला गया है- चीज़ माने क्या? एक शब्द है- चीज़, और एक ही आदमी ने बोला। जो चीज़ लिखी है, उसका चित्र बनाओ ज़रा। चीज़ माने क्या? उसका चित्र बनाओ।

श्रोता १: सर, दिख नहीं रहा कैसे छवि बनाएँगे? नहीं हो सकता सर।

वक्ता: करो-करो। ऐसा तुम करते हो। मन तो करता है क्योंकि जैसे ही मैंने कुछ बोला मन का काम ही यह है की उसकी एक छवि बना दे, छवि बनाना तुरंत होता है। अब बनाओ चीज़। अब अपना और अपने पड़ोसी का जो चित्र है उसको देखो कि क्या वो एक ही हैं? क्या एक ही चीज़ बनाई है?

श्रोतागण: नहीं सर।

वक्ता: जिन्होंने कुछ बनाया ही नहीं है वो कान में बता दें दूसरे को कि मैं सोच क्या रहा था। इशारा समझ में आ रहा है? एक ही शब्द है जो कहा जा रहा है पर तुम एक ही चीज़ सुन नहीं रहे। एक ही शब्द कहा गया है। कितने वक्ता यहाँ बैठे हुए हैं? पंद्रह-बीस तो नहीं बैठे हुए हैं? एक वक्ता है और एक शब्द कह रहा है, पर जितने भी यहाँ लोग बैठे हैं, वो सब अलग-अलग सुन रहे हैं।

आँखों से जैसे तुम अवलोकन करते हो, वैसे ही कानों से ‘सुनना’ होता है, वो एक ही चीज़ हैं। अब वो हो नहीं पाया। तुम मेरे शब्द को ‘सुन’ नहीं पाए और इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है। मन का प्रशिक्षण ही ऐसा है कि कुछ सुना नहीं कि वो उसमें कुछ विषय जोड़ देगा।

तुमने अलग जोड़ा, तुम्हारे पड़ोसी ने अलग जोड़ा, ये जोड़ा, वो जोड़ा और बड़ी खतरनाक चीज़ हो रही है। बात कही तो एक जा रही है,और पहुँच कितनी रही है? जितने लोग बैठे हैं उतनी बातें पहुँच रही हैं। इस बात की गहराई को समझो।

अवलोकन और ध्यानइसका मतलब है हम सब अपनी-अपनी दुनिया में जी रहे हैं। इसका मतलब यहाँ पर एक वक्ता नहीं, पचास वक्ता बोल रहे हैं। तो फिर बातचीत कैसे होगी?  क्योंकि तुम कुछ समझ रहे हो, वो कुछ समझ रहा है और कोई और कुछ और समझ रहा है।

तुम्हें इसको अगर और ज़्यादा जाँचना है, तो अभी जब मैं अपनी बात पूरी करूँगा, तो सब ज़रा लिख लेना कि मैंने क्या कहा, और अपने-अपने पड़ोसी से फिर मिला कर देख लेना। तुम हैरान रह जाओगे यह देखकर कि दोनों ने अगर एक ही बात सुनी है, तो दोनों के सुनने में इतना फ़र्क कैसे आ गया। सुनी तो दोनों ने एक ही बात है।

दोनों ने एक ही बात नहीं सुनी। हम सबके अपने मन हैं। हम सबके मन की अपनी एक दुनिया है और हम उसी में जीते हैं। समझ रहे हो? तो अवलोकन बड़ी साधारण-सी चीज़ होकर भी बड़ी नामुमकिन-सी हो जाती है, इसीलिए बार-बार तुम से यह शब्द कहना पड़ता है – अवलोकन।

अवलोकन का मतलब है बिना नतीजा निकाले देखना, बिना कोई छवि बनाये देखना। पर हमारी आँखों की, कान की ऐसी तैयारी हो चुकी है कि वो असंवेदनशील हो गयी हैं, हम ठीक से देख ही नहीं पाते। हमारी इन्द्रियाँ भी कमज़ोर पड़ गयी हैं। अभी भी मौका है क्योंकि हम अभी जवान हैं।

अब ‘ध्यान’ पर आते हैं। हमने कहा अवलोकन का हमेशा एक विषय होता है। ध्यान थोड़ी-सी अलग चीज़ है क्योंकि उसका कोई विषय नहीं होता। वो मन की एक स्थिति है जिसमें मन जानता है, जिसमें मन से मुक्त होता है; जो भी वो कर रहा होता है। उसका कोई विषय या केंद्र नहीं होता।

तुम ये नहीं कहोगे, “मैं इस चीज़ के ध्यान में हूँ।” अवलोकन में तुम क्या कहोगे? “मैं किसी चीज़ का अवलोकन कर रहा हूँ।” ध्यान में तुम ये नहीं कह सकते, “मैं किसी चीज़ के प्रति ध्यान में हूँ अगर तुमने यह कह दिया तो फिर ये ध्यान नहीं है, वो एक तरह की एकाग्रता है और एकाग्रता ध्यान नहीं होती।

ध्यान का मतलब है होश- मैं होश में हूँ। ऐसे समझ लो कि यह रोशनी जल रही है इस कमरे में, ये चुनाव नहीं कर रही है न कि रोशनी किस वस्तु पर पड़ेगी और किस वस्तु पर नहीं पड़ेगी। इस कमरे में ये रोशनी है, ये चुनाव तो नहीं कर रही है न? ये ध्यान है। ये वस्तु पर निर्भर नहीं है। इस कमरे में जो कुछ हो रहा होगा उसी पर ये रोशनी पड़ेगी।

तुम यहाँ चलो – तुम ध्यान में चल रहे हो, तुम रोशनी में चल रहे हो। इस रोशनी को ध्यान बनने दो। तुम यहाँ सो भी जाओ तो तुम ध्यान में सो रहे हो, तुम ध्यान में बोल रहे हो, तुम ध्यान में सुन रहे हो, तुम ध्यान में बैठे हो; तुम जो कुछ भी करोगे उस पर ये रोशनी पड़ रही है। इस कमरे में जो कुछ भी होगा उस पर यह रोशनी पड़ रही है; यह ध्यान है।

अवलोकन वस्तु-विशिष्ट हो जाता है। रोशनी सब पर पड़ रही है पर तुम चुनाव करते हो कि अभी मैं सिर्फ कुर्सी को देख रहा हूँ। फ़र्क को समझ रहे हो? रोशनी हर एक चीज़ पर पड़ रही है पर तुम फैसला करते हो कि तुम किसको देख रहे हो, कुर्सी को देख रहे हो। अब ये ‘कुर्सी को देखना’ क्या हो गया? यह अवलोकन हो गया। यही असली अवलोकन है क्योंकि इस अवलोकन के पीछे क्या बैठा हुआ है?ध्यान।

ये रोशनी जल रही है। ये रोशनी न जले, तुम कुर्सी को देखोगे भी तो वो धुंधली-सी दिखाई देगी। तुम ठीक-ठीक देख नहीं पाओगे क्या है इसीलिए क्योंकि तुम्हारी कल्पना बीच में आ जाएगी, यद्दाश्त बीच में आ जाएगी। बात स्पष्ट हो पा रही है?

ध्यान एक पृष्ठभूमि-प्रकाश की तरह है जो मन की पूरी दुनिया को रोशन कर देती है। जो भी हो रहा है ध्यान में हो रहा है। उसके पास विषय के लिए कोई विकल्प ही नहीं है। ध्यान ये नहीं कहता कि ‘मैं ये करता हूँ तो मैं ध्यान में आ जाता हूँ’। बस ध्यान है और ध्यान में बहुत सारे काम होते रहते हैं; पूरी ज़िन्दगी चलती रहती है। और जब ध्यान में जीवन आगे बढ़ता तो अवलोकन साफ़ रहता है, सुनना साफ़ रहता है। ध्यान में अवलोकन कैसा रहेगा?

श्रोतागण: साफ़।

वक्ता: ध्यान में सुनना कैसा रहेगा?

श्रोतागण: साफ़।

वक्ता: अभी तुम मुझे सुन रहे हो, जो लोग ध्यान में सुन रहे हैं वो मेरे शब्दों का अवलोकन कर पाएँगे और जिनका मन ध्यान में नहीं है वो नहीं कर पाएँगे। उसमें एक दूसरी बात भी है कि जिनका मन अभी ध्यान में है वो सिर्फ़ मेरे शब्दों का अवलोकन नहीं कर रहे। जो कुछ हो रहा है वो हर चीज़ के प्रति जागरूक हैं क्योंकि जब रोशनी जल रही है, जब हर चीज़ पर रोशनी पड़ रही है, तो इस वक़्त उनका पड़ोसी अगर थोड़ी-सी भी आवाज़ करता है, तो वो आवाज़ उनको बड़ी ज़ोर से सुनाई देगी।

तुमने कभी ये गौर किया है कि जब तुम ध्यान में बैठे हुए होते हो तब अगर हलकी-सी भी आवाज़ हो तो वो आवाज़ बड़ी ज़ोर से सुनाई देती है, बहुत बड़ा विघ्न बन जाती है। अभी इस समय इस कमरे में कोई कलम-पैन गिरा दे तो उसकी आवाज़ तुम्हें परिवर्धित-एम्प्लिफाई होकर सुनाई देगी। और आमतौर पर जब पैन गिरता है, तो किसी को क्या फ़र्क पड़ता है। ऐसा इसीलिए हो रहा है क्योंकि इस वक़्त मन जो है, मन ध्यान में है।

जब मन ध्यान में होता है तो जितनी घटनाएँ होती हैं वो बहुत साफ़ और बहुत स्पष्ट सुनाई और दिखाई देती हैं। समझ में आ रही है बात? तुमने पूछा था, “इससे क्या हो जाएगा? ध्यान से हो क्या जाएगा? अवलोकन से क्या हो जाएगा?”

सब कुछ हो जाएगा। मूलभूत बात यह है कि- देखना ही करना है। जब तुम कहते हो कि हो क्या जाना है, तुम्हारा उससे अर्थ है कि उससे घटना क्या घटेगी, कि उससे कर्म क्या हो जाएगा। तुम कर्म को महत्व दे रहे हो। देखना ही करना है। जो समझ में आ गया वो कर्म में उतरता ही उतरता है। जो समझ आ गया वो कर्म में उतरेगा ही उतरेगा। तुम चाह कर भी उसे रोक नहीं पाओगे। तुम पूरी कोशिश कर लो रोकने की तब भी उसे रोक नहीं पाओगे।

इस बात की कोशिश करनी ही नहीं चाहिए कि तुम बहुत प्रयास करके कर्म करो। तुम सारा प्रयास कर लोगे अगर एक बार तुमको बात समझ में आने लग जाए। तुमको एक बार समझ में आ जाए कि तुम बीमार हो, तुम खुद कोशिश करोगे दवाई खाने की, डॉक्टर के पास जाने की, रोगनिदान की।

पहले लेकिन समझ में आना चाहिए कि ‘मुझे बीमारी है’। जिसको समझ में ही नहीं आया कि- मैं बीमार हूँ , वो स्वस्थ होने की कोशिश भी शुरू नहीं करेगा। जो भी कर्म होगा वो समझ से ही तो निकलेगा न? अगर बिना समझ के तुम कोशिश कर भी रहे हो तो वो कोशिश तुम्हारे काम नहीं आएगी, इसीलिए ध्यान, अवलोकन सब कुछ है। ध्यान से ही निकलती है समझ।

अवलोकन अगर साफ़-साफ़ हो रहा है, अभी अगर साफ़-साफ़ सुन रहे हो तो समझ पैदा होगी, स्पष्टता आएगी और उस स्पष्टता से बड़ा तेज़ कर्म निकलता है। उस स्पष्टता से बहुत ऊर्ज कर्म निकलता है। इतनी ऊर्जा जितनी तुम अपने प्रयास से नहीं ला सकते।

आमतौर पर हम सोचते हैं ऊर्जा के लिए दृढ़-संकल्प चाहिए, इच्छाशक्ति चाहिए। यही कहते हो न कि पूरी कोशिश चाहिए? ऊर्जा के लिए यह सब नहीं चाहिए। ऊर्जा के लिए स्पष्टता चाहिए। जैसे ही स्पष्टता आती है, समझ आती है तो तुम्हारा पूरा जो अस्तित्व है,उसका सारा बहाव, उसकी सारी ऊर्जा समझ से प्रवाहित होती है। और वो तुम्हारी कोशिश से नहीं होता, वो अपने आप हो जाता है।

एक बार जो व्यक्ति यह जान जाता है कि क्या आवश्यक है और पूरी स्पष्टता से जान जाता है कि ये आवश्यक है, उसको कोई रोक नहीं सकता। अब उसको रोका नहीं जा सकता क्योंकि उसने खुद जान लिया है कि क्या आवश्यक है। उसने सुन नहीं लिया है कहीं से, उसे किसी और ने आकर नहीं बता दिया है; उसने खुद जान लिया है कि यही आवश्यक और मूल्यवान है। अब तुम उसे रोक कर दिखाओ,अब तुम उसे मना कर के दिखाओ। तुम अब उसे रोक ही नहीं सकते।

अगर हम ये पाते हैं कि हमारी ज़िन्दगी में ऊर्ज कर्म नहीं रहता, अगर हम ये पाते हैं कि हम अक्सर उदास रहते हैं, बोझिल रहते हैं,ऊर्जाहीन हैं, तो इसका अर्थ क्या हुआ? हमने कहा स्पष्टता से निकलती है ऊर्जा, और अगर किसी के जीवन में ऊर्जा का अभाव हो,तो इसका क्या मतलब है? कि स्पष्टता-क्लैरिटी नहीं है। और एचआईडीपी कोर्स इसीलिए है ताकि तुम जैसे जवान लोग ऊर्जाहीन न बने रहें, उदास न रहें, शक्तिहीन न रहें, निर्जीव न रहें।

ऊर्जा कूदने-फांदने से नहीं आएगी, प्रेरणा से नहीं आएगी कि कोई आकर तुमसे अच्छी-अच्छी बातें बोले और तुम ऊर्ज हो जाओगे। ऊर्जा तो सिर्फ समझ से, क्लैरिटी से आती है। ऊर्जा तो सिर्फ तभी आती है जब बात साफ़-साफ़ दिख रही हो, कि मैंने पकड़ लिया बात को। फिर देखो कितनी ऊर्जा उठती है। और वो ऊर्जा उपयुक्त ऊर्जा होती है, वो ऊर्जा बिखरी हुई नहीं होती, वो ऊर्जा दिशाहीन नहीं होती, कि कहीं को भी भाग लिए। वो ऊर्जा एक नुकीले तीर की तरह होती है जो बिल्कुल सही दिशा में जाता है, पूरी रफ़्तार से जाता है, और जाकर बस लग जाता है।

श्रोता २: क्या इसका मतलब हर विचार की अपनी ऊर्जा होती है? तभी जब कहते हैं कि मन में विचलन है, बहुत ज़्यादा विचार आ रहे हैं तो हमारी ऊर्जा दिशाहीन होती है। फिर जब हममें समझ आ जाती है, क्लैरिटी आ जाती है तो सारी…

वक्ता: हाँ, बढ़िया, बहुत बढ़िया। अवलोकन में भी ऊर्जा लगती है, और वही ऊर्जा जब बिखर जाती है, अपना केंद्र खो देती है तो वो बिखरे हुए विचारों की ऊर्जा हो जाती है। हमारी ही ऊर्जा क्योंकि एक दिशा में नहीं होती है इसीलिए सौ तरीके के विचारों में इधर-उधर बंटी रहती है।

क्लैरिटी में, समझ में वो ऊर्जा पूरा नुकीला तीर बन जाएगी, एक दिशा में जाएगी और वही तुम्हारे लिए सही दिशा होगी। वो क्या दिशा होगी, वो तुम्हें देखना है क्योंकि ज़िन्दगी तुम्हारी है। पर जो भी दिशा होगी वो सही ही होगी, बढ़िया होगी।

श्रोता 3: सर, ये पता कैसे चलेगा कि हम ध्यान में है या नहीं?

वक्ता: जो ध्यान में होता है उसको ध्यान का विचार नहीं आता। समझो बात को। जो ध्यान में होता है न वो ये सवाल ही नहीं उठाता कि ध्यान है या नहीं है। हर विचार अपने आप में विघ्न है। तुम्हें कैसे पता चलता है कि तुम बीमार नहीं हो?

श्रोता 2: जब उस बीमारी के लक्षण नहीं होते।

वक्ता: लक्षण तो बीमारी के होते हैं।

श्रोता 3: सर, जब हम आराम में होते हैं।

वक्ता: हाँ, जब तुम आराम में होते हो। तुम बीमार हो इसके तो लक्षण हो सकते हैं। चिकित्सा-विज्ञान, मेडिकल साइंस ने जितने भी लक्षण उठाए हैं, वो बीमारी के ही उठाए हैं। स्वास्थ्य का क्या लक्षण होता है? स्वास्थ्य का यही लक्षण है कि – मैं शांति में हूँ, मैं भारी महसूस नहीं कर रहा हूँ।

तुम्हें ये तो पता चल जाता है कि प्यास लगी है, जैसे ही प्यास लगती है, गला संकेत देना शुरू कर देता है। पर तुम्हें ये कैसे पता चलता है कि प्यास नहीं लगी है? बस नहीं लगी है। उसका और कोई संकेत नहीं हो सकता; बस नहीं लगी है प्यास।

श्रोता 3: विचलन नहीं है।

वक्ता: तुम विचलित नहीं हो। तुम अपने साथ हो, केंद्र से जुड़े हुए, स्थिर; और बस यही है। और यह कोई बड़ी बात नहीं है। कुछ और नहीं है कि बहुत बड़ी बात हो जाएगी कि जब तुम ध्यान में हो तो फूल खिलने लगेंगे और तुम्हारे प्रभामंडल बन जाएगा और कोई दिव्यदृष्टि आ जाएगी; ऐसा कुछ नहीं हो जाएगा। बस यह हो जाएगा कि आराम में रहोगे। चलोगे तो आराम में, पढ़ोगे तो आराम में, हंसोगे तो आराम में और खेलोगे तो आराम में।

तब वहाँ एक शांत, स्थिर नदी होगी जिस पर तुम तैर रहे होंगे। जब तक संदेह है – और हमे संदेह बहुत रहते हैं, बात-बात में संदेह रहता है, किसी भी चीज़ पर सौ प्रतिशत विश्वास तो हमें होता नहीं – जब तक संदेह है, तब तक समझ-क्लैरिटी नहीं है। बस यही है। जब तक ये पाओ कि बार-बार सोचना पड़ रहा है तब तक जान लेना कि समझ नहीं है।

– ‘बोध-सत्र’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: अवलोकन और ध्यान में अंतर 

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लेख १ : यथार्थ है सहज जानना

लेख २ : अभ्यास नहीं ध्यान

लेख ३ : ध्यान है मन का स्वरस में डूबना