ज्ञानी-जो निर्विशेष है

क्व प्रारब्धानि कर्माणि जीवन्मुक्तिरपि क्व वा।
क्व तद् विदेहकैवल्यं निर्विशेषस्य सर्वदा।।

                          -अष्टावक्र गीता(२०.४)

वक्ता: एक तो वो आदमी होता है जो दुनिया में इस कदर खोया होता है कि उसको समझने की कोई कोशिश ही नहीं करता है। वो कहता है, “इसमें समझना क्या है? यह तो ऐसा है ही। ऐसा होता ही है। यह तो एक अनिवार्य सत्य है।”

उससे ऊपर एक दूसरा आदमी होता है जो सोचता है कि दुनिया को इस तरह समझ लिया कि संसार को सिद्धांतों में बांध लिया। तो संसार में अगर कोई घटना घटेगी, तो जो पहले किस्म का आदमी है, उससे पूछो, “क्यों घटी?,” तो कहेगा, “मुझे पता नहीं, घटनी थी तो घट गई, मैं नहीं जानता।” वो यह भी कह सकता है, “कोई कारण होता भी है क्या? कोई वजह होती है क्या, कोई सिद्धांत होता भी है क्या?”

जो दूसरे किस्म का आदमी है, जिसने दुनिया को समझने की थोड़ी तो कोशिश की है, जिसने दुनिया को सिद्धांतों में बाँट लिया है, वो कहेगा, “यह घटना इसलिए घटी क्योंकि प्रारब्ध था।” वह कहेगा, “तुम्हारे साथ जो भी हुआ वह इस कारण हुआ क्योंकि तुम्हारा कर्मफल था।” उसने जीवन को समझने की कोशिश में जीवन को सिद्धांतों में बाँध लिया है।

मैं दोहरा रहा हूँ, पहला आदमी है, जो ज़िन्दगी पर नज़र ही नहीं डाल रहा। उसको कहीं कोई सूत्र, कहीं कोई धार, कहीं कोई तारतम्य दिखाई ही नहीं दे रहा है। उसको कहीं दो कड़ियाँ आपस में जुड़ी हुई दिखाई ही नहीं पड़ती हैं। वह इतना स्थूल जीवन जी रहा है कि घटनाएँ आपस में जुड़ी भी हो सकती हैं, कि एक ताल के नीचे दूसरा तल भी हो सकता है, इसकी उसको भनक भी नहीं लगती है। तो यह तो पहले किस्म का आदमी है।

दूसरे किस्म का आदमी वो है जो दुनिया को सिद्धांतों में बाँधने की कोशिश कर रहा है। वह कई सिद्धान्त निकालेगा, कर्म का सिद्धांत उसमें से एक है।
प्रारब्ध का सिद्धान्त दूसरा है। फ़िर उसी के साथ वो कुछ शब्दों को भी गढ़ता है। ‘जीवन-मुक्त’ एक शब्द है, ‘विदेह-मुक्त’ दूसरा शब्द है, और वह कहता है, “जीवन-मुक्त होना एक परम लक्ष्य है, विदेह-मुक्त होना भी एक परम लक्ष्य है।”

आप लोगों को याद होगा जब हम वो वीडियो देख रहे थे जिसमें में एक मृत-शरीर था, तो उसमें जो पुजारी थे उन्होंने एक शब्द प्रयोग किया था, दो बार, सिस्टम-पद्धति। उन्होंने कहा ठाट कि यही सिस्टम है, यही पद्धति है कि प्राण अमर होते हैं। प्राण यहाँ से छूटते हैं, जाते हैं और फिर प्राण वापस भेज दिए जाते हैं, और वो कर्मानुसार किसी और योनी में जन्म लेते हैं, चौरासी लाख योनियाँ हैं। यह दूसरे तल का व्यक्ति है।

इसने जीवन को सिद्धांत बना लिया है। तो इसने जीवन को समझने की कोशिश की, बड़ा अच्छा किया, लेकिन समझने की कोशिश एक जगह आकर ठहर गई, यह कुछ ठीक नहीं हुआ। जहाँ ठहर गई उस बिंदू को इसने सत्य का नाम दे दिया। तो यह कहेगा कि जीवन का एक लक्ष्य है। क्या लक्ष्य है? मोक्ष। और जब मोक्ष मिलता है तो वो कोई बड़ी घटना है, कोई ख़ास बात है क्योंकि व परम लक्ष्य है। ठीक है न? वो कहेगा कि तुम्हें जो कुछ करना पड़ रहा है, वह अपने पूर्व कर्मों के कारण करना पड़ रहा है। तो कर्म बड़ी बात है। वो भेद पैदा करेगा। वो कहेगा, “मोक्ष ख़ास है और जिन्हें मोक्ष नहीं मिल रहा, वो ख़ास नहीं हैं।” वो कहेगा, “कर्म अच्छे होते हैं और बुरे भी होते हैं। तो वो भेद पैदा करेगा।

अष्टावक्र क्या कह रहे हैं? अष्टावक्र गीता का बीसवाँ अध्याय है, चौथा सूत्र। सूत्र है:

क्व प्रारब्धानि कर्माणि जीवन्मुक्तिरपि क्व वा।
क्व तद् विदेहकैवल्यं निर्विशेषस्य सर्वदा।।

कह रहे हैं, “कैसा प्रारब्ध? कैसा कर्म? और यह जीवन मुक्त क्या लगा रखा है? और विदेह-मुक्ति की तो हमसे कोई बात मत करो! हम तो सर्वदा निर्विशेष हैं।”

ध्यान दीजियेगा, बीसवाँ अध्याय, अंतिम अध्याय है अष्टावक्र महागीता का। अंत में आकर अष्टावक्र यह बात कह रहे हैं, “यह तुमने क्या बात लगा रखी है कि जीवन-मुक्त हो सकते हो, विदेह-मुक्त हो सकते हो। कभी तुम बात करते हो कर्मफल की, कभी तुम बात करते हो संचित कर्म की, कभी आगामी कर्म की, कभी प्रारब्ध कर्म की।” ज्ञानी-जो निर्विशेष है, ज्ञानी-जो निर्विशेष है। कह रहे हैं, “यह सब बातें हमसे करो मत। हमें इनसे कोई मतलब नहीं। यह तो तुमने फालतू ही मानसिक भेद खड़े कर रखे हैं।”

वो कह रहे हैं, “कैवल्यं निर्विशेषस्य सर्वदा”।

कहीं कुछ अलग-अलग हमें दिखता ही नहीं है। सब निर्विशेष है। हमें कोई भेद कहीं दिखाई ही नहीं पड़ रहा। हमें नहीं लग रहा कि मोक्ष में कुछ ख़ास है। हम ऐसे ही खुश हैं। हम मान ही नहीं रहे कि जीवन-मुक्ति कुछ होती है और विदेह-मुक्ति कुछ होती है।

श्रोता १: विदेह-मुक्त का अर्थ क्या है?

वक्ता: ‘जीवन-मुक्त’ वो समझ जो मानसिक तौर पर मुक्त हो गया। ‘विदेह-मुक्त’ वो जिसने अपने आप को अब शरीर मानना छोड़ दिया। वो कह रहे हैं कि हमसे बड़ी-बड़ी बातें करो ही मत। हमें नहीं चाहिए निर्वाण क्योंकि निर्वाण सिर्फ़ एक सिद्धांत है।  हम किसी सिद्धांत में उत्सुक नही हैं। बात समझ में आ रही है?

अष्टावक्र कह रहे हैं, “सबसे निम्न तल पर तो वो बैठा है, जिसने संसार को ही गंभीरता से ले लिया और कह रहा है कि संसार ही सबसे बड़ा सत्य है, संसार के आगे कुछ नहीं है। उससे थोड़ा हट कर वो है जो कहता है, “संसार से आगे एक दूसरा सत्य जिसका नाम है ‘कैवल्य पद’, जिसका नाम है ‘मोक्ष’, या ‘जीवन-मुक्ति’।”

अष्टावक्र कह रहे हैं, “हमें वहाँ भी नहीं होना है। न मेरे लिए संसार गंभीर बात है, और न ही मेरे लिए मोक्ष गंभीर बात है।” संसार में न फंसना तो ठीक है कि चलो फँसे कौन, पर संसार से मुक्ति की भी हमें कोई अभीप्सा नहीं है। “न फँस ही रहे हैं, न मुक्त ही हो रहे हैं, और हमारे सामने ये सब बड़ी-बड़ी बातें तो करो ही मत। ये दावे तो करो ही मत कि हम कुछ भी समझते हैं।” हमने कैसे-कैसे सिद्धान्त पड़ रखे हैं! कर्म का सिद्धांत! और आप किसी से बात करेंगे जो कर्मफल में बड़ा यकीन करता हो, और आप उससे पूछेंगे कि कोई तुम्हारे साथ घटना क्यों घटी, या तुम्हारी ऐसी अवस्था क्यों है, तो वो कहेगा, “मेरे पहले के कर्म ऐसे हैं।”

और आप उससे पूछें की पहले के कर्म वैसे क्यों हैं, और उससे पहले के वैसे क्यों हैं, तो वो कहेगा की क्योंकि पहले जन्म के वैसे थे। फ़िर आप उससे पूछें कि पहले जन्म के वैसे क्यों हैं, तो वो अंततः निरुत्तर हो जाएगा, अटक जाएगा। तो कर्मफल का सिद्धांत मूढ़ता का ही सिद्धांत हुआ न।जो सिद्धान्त आपको आख़िर तक न ले जा सके, वो आपको सिर्फ गोल-गोल घुमा ही भर रहा है, वो छलावा है। बात समझ में आ रही है?

तो अष्टावक्र कहते हैं, “हमें इसीलिए तुम्हारे सिद्धान्तों को सुनना ही नहीं। कोई भी सिद्धान्त तुम्हारे मन से ज़्यादा बड़ा तो हो नहीं सकता क्योंकि वो सिद्धांत तुम्हारे मन से ही निकला है। तो हमें ये सब बातें बताओ ही मत। व्याख्या हमें चाहिए ही नहीं। जीवन का विश्लेषण करने में हम उत्सुक ही नहीं हैं।

तुम्हारा कोई भी विश्लेषण सत्य को छू नहीं सकता। तो हमें मत दो। परम पूजनीय सिद्धांत हैं, अष्टावक्र उनको ही ख़त्म कर रहे हैं। अष्टावक्र कह रहे हैं, “तुमने यही जाना है न कि ऊँचें से ऊँचा लक्ष्य, मोक्ष हो सकता है। मैं तुमसे कह रहा हूँ कि मोक्ष पागलपन है!”

तुम तो छोटे-मोटे लक्ष्यों के पीछे भागते हो। जो आदमी पैसे के पीछे भागे, प्रतिष्ठा के पीछे भागे, उसको पंडित जा कर के कहेगा, “तू पैसे और प्रतिष्ठा के पीछे मत भाग। तू मोक्ष के पीछे जा,” और अष्टावक्र जाकर पंडित से कह रहे हैं, “जैसे वो आदमी पागल है जो पैसे और पद के लिए भाग रहा है, तू उससे बड़ा पागल है जो तू मोक्ष के लिए भाग रहा है।” पैसा पद तो छोड़ ही, ये मोक्ष भी तूने क्या लगा रखा है, इसको भी छोड़।

अष्टावक्र कह रहे हैं, “यह तूने क्या बातें पकड़ रखी हैं कि ब्रह्म और आत्मन! क्या ब्रह्म आकर कह रहा है कि मैं ब्रह्म हूँ! ये ब्रह्म शब्द भी कहाँ से निकला? तेरे मन से निकला।” वो उत्सुक ही नहीं हैं किसी भी प्रकार का ढाँचा खड़ा करने में। अष्टावक्र आपको वहाँ ले जा रहे हैं जहाँ आसमान पूरी तरह खुला हुआ है। जहाँ कोई संरचना है ही नहीं। और जिन्हें खुले आसमान को देखने का स्वाद मिल जाये, उन्हें उस आसमान में खड़ा हुआ कुछ भी बस एक पिंजरा ही दिखाई देता है। आपको पिंजरा अच्छा ही नहीं लगेगा।

तो सत्य खुला आसमान है। उसमें आप जो भी ढांचा खड़ा करते हैं, जो भी शब्द खड़े करते हैं, जो भी सिद्धांत खड़े करते हैं, यह कह कर कि यह बातें सत्य हैं, वो बातें बड़ी कुरूप लगती हैं। जिसको आदत हो मुक्त आकाश में घूमने की, वो कहेगा, “क्या फालतू बातें! हटाओ, नहीं बात करनी।” अष्टावक्र वही कह रहे हैं, “हटाओ ये सब, नहीं बातें करनी हैं। तुम्हारी ऊँची से ऊँची बात और तुम्हारी नीची से नीची बात, है तो अंततः बात ही!” समझ रहे हो न?

तुम ऊँचे से ऊँचा बोल लो कि मोक्ष चाहिए, और तुम नीचे से नीचा बोल दो कि मोह में फँसा हुआ हूँ, मोह हो या मोक्ष हो, दोनों बातें ही हैं। बातें हैं, बातों का क्या! इधर की बात करो, चाहे उधर की बात करो, तो हमसे बातें तो तुम करो ही मत। ठीक है? मखौल उड़ा रहे हैं। और जो आदमी इनको सत्य मन कर बैठा है वो तिलमिला जाएगा। जिसने जीवन ही मोक्ष की तलाश में लगा दिया हो, किसी अष्टावक्र जैसे से जब वो मिलेगा, तो बड़ा भड़केगा। वो कहेगा, “कुछ तो दे दो पकड़ने के लिए। कोई सहारा तो दे दो।” और अष्टावक्र उससे उसका आख़िरी सहारा भी छीन रहे हैं।

वो कहेगा, “अच्छा मोक्ष नहीं तो कुछ और; शून्यता! मौन!” अष्टावक्र उसे एक सूत्र और बता देंगे, “शून्यता? कैसी फालतू बात है!” तो कोई संबल ही नहीं छोड़ रहे हैं। तुम टिकोगे कहाँ? मतलब इतना ही है कि अहंकार के छुपने के लिए कोई जगह नहीं छोड़ रहे हैं। मन की प्रक्रियाएँ जहाँ जा कर कर आश्रय पा लें, ऐसे कोई ठिकाना नहीं छोड़ रहे हैं। तुम किसी चीज़ को सत्य समझ लो, ऐसा कुछ भी वो तुम्हारे पास शेष ही नहीं रहना देना चाहते। जहाँ कहीं भी तुम साधन जुटाओ छोटे हो जाने का, उसको ही वो उड़ा देना चाहते हैं।

इसीलिए अक्सर बातें भी विरोधाभासी करनी पड़ती हैं। यही अष्टावक्र किसी जगह पर कहेंगे कि मुक्ति से बड़ा कुछ नहीं हो सकता, और कहीं अन्यत्र आकर कह देंगे, “मुक्ति! क्या फालतू की बात कर रहे हो! किसे चाहिए मुक्ति!”

कबीर एक जगह पर कहते हैं, “जो तू चाहे मुक्त को, छोड़ दे सब आस” और दूसरी जगह पर कहते हैं, “मुक्ति को क्यों रो रहा है? हमें राम मिला ही हुआ है। मुक्ति किसे चाहिए?”

तो बातें विरोधावासी करनी ही पड़ेंगी जो झूठ में जी रहा है उसको कहना होगा, “सत्य की ओर देखो”, और जब वो किसी और दिशा में देखने लगेगा और सोचेगा कि सत्य की ओर देख रहा हूँ, तो कहना पड़ेगा, “सत्य क्या होता है? फालतू!” जो दायीं तरफ का सहारा लेकर चल रहा है उससे कहना पड़ेगा, “अरे! तू बहुत दायीं तरफ को झुक रहा है, चल ज़रा बायें को हो जा”, और जब बायीं तरफ को झुकने लगे तो कहना पड़ेगा, “अरे! जो लोग बायें को झुकते हैं, वो लोग पागल होते हैं।” तो ऐसा करना ही पड़ता है क्योंकि अंततः आप जो भी बोलेंगे वो सच नहीं हो सकता। तो इसलिए आपको अपनी ही बातों को काटना पड़ेगा।

जो इस सूत्र को समझता है, वो इन विरोधाभासों में मज़े लेगा कि देखो वो बात कही थी, अब वो भी कट गई। उसको इसी में बड़ा लुत्फ़ आएगा। और जो इनको नहीं समझता, जो निरंतरता की तलाश कर रहा है, वो तुरंत उठेगा और कुतर्क करेगा, और कहेगा, “पिछले अध्याय में यही अष्टावक्र कुछ और कह रहे थे और देखो अब कुछ और कह रहे हैं। जहाँ देखो काट देते हैं, कभी इधर कभी उधर। शुरुआत जब हुई तो बोला, ‘सारे विषय छोड़ दो, और जब अंत हो रहा है तो कह रहे हैं कि छोड़ने को है ही क्या?’ अरे! ये तो ख़ुद ही कुछ नहीं समझते हैं!”

(श्रोता हँसते हैं)

“पहले तुम जाओ और अपनी एक पक्की धारणा बना कर आओ कि तुम किस तरफ खड़े हो, छोड़ने की तरफ या पकड़ने की तरफ, उसके बाद हम तुमसे वाद-विवाद करेंगे।” जो आपका आम बुद्धिजीवी है, वो बिल्कुल यही बात कहेगा। वो कहेगा, “जाओ पहले तुम तय करके आओ कि तुम्हें क्या कहना है।एक बात तय कर लो, एक स्थान।” क्यों एक स्थान तय कर लो? क्योंकि ठहरे हुए पर निशाना लगाना ज़्यादा आसान होता है। आप कहीं एक तरफ हैं, तो आप पर निशाना लगाया जा सकता है। अष्टावक्र पर तुम निशाना लगा ही नहीं पाओगे क्योंकि जब तुम इधर निशाना लगाओगे, वो तो उधर बैठ जाएँगे, और तुम कहोगे, “धोखा।”

(श्रोता हँसते हैं)

वो इधर भी हैं और उधर भी हैं। और जो इधर भी है उधर भी है, वो कहीं नहीं होता। वो बस मुक्त होता है। (‘मुक्त’ शब्द पर जोर डालते हुए) वो ‘मुक्त’ भी नहीं होता!

(श्रोता हँसते हैं)

वक्ता: तो अष्टावक्र के साथ अब आ रहे हैं आप लोग। पंद्रह-बीस दिन से सब लोग अष्टावक्र के साथ ही हैं। एक बात उनकी है जो हम तक पहुँचनी ही चाहिए, वो है विरोधाभासों में जीना। अगर आप अभी भी किसी एक सत्य की तलाश में हैं, अगर आप का रुझान द्वैत के किसी एक सिरे की ओर है, तो समझ लीजिये कि कुछ बात बनी नहीं है। अष्टावक्र कहते हैं, “कभी इधर, कभी उधर, दोनों तरफ। और जब दोनों तरफ हो, तो?

श्रोतागण: कहीं भी नहीं।

वक्ता: कहीं भी नहीं। कभी ऐसे भी हो सकते हैं, और कभी वैसे भी हो सकते हैं। आपका जो बुद्धिजीवी होगा वो कहेगा, “बड़ा दोगला आदमी है। कभी ऐसा भी होता है, कभी वैसा भी हो जाता है,” और अष्टावक्र जैसे लोगों पर यह आक्षेप हमेशा लगेगा ही लगेगा कि यह आदमी बड़ा दोगला है। कभी इधर की बात करता है, कभी उधर की बात करता है। अब कुतर्क मत कर लीजियेगा। अगर मैं यह कह रहा हूँ कि अष्टावक्र दोगला लगेंगे, तो इसका मतलब ये नहीं है कि हर दोगला आदमी अष्टावक्र हो जाता है।

(श्रोता ज़ोर से हँसते हैं)

वक्ता: (व्यंग्य करते हुए) फ़िर आप कहें कि देखो हमको बचपन से ही सब कहते थे कि तुम दोगले हो, तो इसका मतलब हम अष्टावक्र हैं। नहीं ये नहीं कहा है। जो संत होता है वो कई बार पागल जैसा ही लगता है। इसका ये अर्थ नहीं है कि सब पागल, संत होते हैं। फ़िर आप कुतर्क करने लगें कि संतत्व तो मिला नहीं, चलो पागल जैसे ही लगने लगें, इसी बहाने हमें ऐसा लगेगा कि हम संत हैं।

– ‘बोध-सत्र’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

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सत्र देखें: https://www.youtube.com/watch?v=yQKSpJRToC8