संसारी कौन? जो संसार से पूर्णतया अज्ञानी हो

तवैवाज्ञानतो विश्वं त्वमेकः परमार्थतः।
त्वत्तोऽन्यो नास्ति संसारी नासंसारी च कश्चन॥
-अष्टावक्र गीता (१५.१६)

अनुवाद: अज्ञानवश तुम ही यह विश्व हो पर, ज्ञान दृष्टि से देखने पर केवल एक तुम ही हो, तुमसे अलग कोई दूसरा संसारी या असंसारी किसी भी प्रकार से नहीं है।

वक्ता: तुम्हें न जानने के कारण ही ब्रह्माण्ड विश्व दिखाई देता है। पारमार्थिक बात, आख़िरी सत्य तो ये है कि तुम ही हो, ‘त्वमेकः’। तुम्हारे अतिरिक्त न जीव है, न आत्मा है। प्रश्न है, ‘मैं कौन हूँ?’

तुम्हें न जानने के कारण ही विश्व दिखाई देता है, तुम्हें न जानने के कारण विश्व, विश्व जैसा लगता है, तुम्हें न जानने के कारण विश्व का वास्तविक स्वभाव पता नहीं चलता। तुम ने न जानने के कारण उसे आख़िरी मान लिया है, जो आख़िरी है नहीं। जैसे कि कोई परदे पर पड़ रही छाया को पकड़ने दौड़े, और उसे असली ही मान ले, जैसे कि कम उम्र के बच्चों को परदे पर आ रहे चरित्रों से प्रेम हो जाये।

ऐसा देखा है या नहीं? हम सब कम उम्र के बच्चे ही हैं। खबरें आती हैं ना कि तेरह-चौदह साल की लड़कियाँ किसी कसबे से भाग गईं, किसी अभिनेता से मिलने के लिए। हम वैसे ही हैं। पहली बात- जो परदे पर है वो, वो अभिनेता है ही नहीं। दूसरी बात- अभिनेता भी वो है नहीं, जो तुम उसे समझते हो।

धोखा देखिये कई तलों पर है। आपने तो बहुत आंशिक तथ्य देखा है। आप किसी अभिनेता की कोई फिल्म देखते हो, तो उसमें वो एक चरित्र अभिनीत कर रहा होता है, और दूसरे ही पल हो सकता है बगल के ही परदे पर, वो कोई और चरित्र अभिनीत कर रहा हो। यहाँ वो बना हुआ है एक दीवाना आशिक़, और बगल के परदे पर वो बना हुआ है एक कॉलेज का विद्रोही छात्र। पर आप चरित्र को देखते हो और सोचते हो कि यही बात पूरी है, हमने सत्य को जान लिया। आपको ये ज़रा भी पता होता कि यह सत्य नहीं है, तो आप कैसे अपने प्रेम को गंभीरता से ले सकते थे। आप अपने ऊपर ही हँसते कि ये कैसे आकर्षण में फँस रहा हूँ।

मैं बात भले ही उन तेरह-चौदह साल की लड़कियों की कर रहा हूँ, लेकिन हम सब वही हैं। ध्यान से समझियेगा। तो आप उस चरित्र के प्रेम में पड़े हो। आप कहें, ‘नहीं साहब, हम चरित्र के प्रेम में नहीं पड़े, हम तो वास्तविक व्यक्ति के प्रेम में पड़े हैं’। ठीक। आप उस वास्तविक व्यक्ति का भी सत्य जानते हो क्या? व्यक्ति माने क्या? जीव माने क्या? जिसे हम कहते हैं ‘व्यक्ति’, ये जो हाड़-माँस का चलता-फिरता पिण्ड होता है, ये क्या है, क्या ये आपने कभी समझा है?

हम जानना चाह रहे हैं कि अष्टावक्र क्यों कह रहे हैं कि अज्ञान के कारण ही विश्व दिखाई पड़ता है। क्या आपने कभी समझा है कि ये जो सामने व्यक्ति घूम रहा है, जिससे मैं दावा कर रहा हूँ कि मुझे प्रेम हो गया है, वो व्यक्ति क्या है? पहले तो बहुत कम लोगों में इतना भी विवेक होता है कि वो चरित्र से व्यक्ति के तल पर आएँ। आमतौर पर तो हम चरित्र से ही प्रेम कर बैठते हैं। व्यक्ति के तल पर आने के लिए भी आप में इतनी सत्य-परखता होनी चाहिए कि आप तथ्य माँगें। जिसे हम सामान्य आदमी कहते हैं, वो कल्पनाओं में जीता है, वो तथ्य भी नहीं माँगता ।

आप किसी से दो घंटे को मिलते हैं और आप दावा करते हैं कि आपको प्रेम हो गया। क्या आपको उसके तथ्य भी पता हैं? आपको तथ्य भी नहीं पता। खैर चलिये, आप तथ्य के तल पर भी आए, तो तथ्य ये है कि आपके समक्ष एक व्यक्ति है, उसका एक नाम है, एक शरीर है, उसका इतिहास है। वो, वो है जिसे जीव कहा जाता है। अब जीव क्या? जीव क्या? वो क्या है, ये जानने के लिए आपको ये पूछना पड़ेगा कि वो ऐसा मुझे दिखाई क्यों दे रहा है। सीधे समझिये, यदि आपको कोई आकर्षित करता है और आप बात को समझना चाहते हैं, तो सवाल तो आपको यही पूछना पड़ेगा न कि ‘मैं क्यों आकर्षित हो रहा हूँ उसके प्रति?’ तो आप जांच-पड़ताल किसकी करने निकले थे? उसकी। लेकिन जल्दी ही घूमकर आपको किस पर आना पड़ेगा? अपने ऊपर।

कल्पना से तथ्य में जाने तक ठीक है, वहाँ तक जो रास्ता है वो बाहर-बाहर का है। आप व्यक्ति की जाँच-पड़ताल कर सकते ह, लेकिन तथ्य से सत्य पर जाने तक का जो रास्ता है, अब वो बाहर-बाहर का नहीं रहता। तथ्य से सत्य पर जब जाना हो तो फिर अपने भीतर से होकर गुज़रना पड़ता है, दृष्टि भीतर करनी पड़ती है। क्योंकि यदि आप जानना चाहोगे कि ‘वो कौन है?’, तो आपको इस प्रश्न का उत्तर देना ही पड़ेगा कि ‘मैं कौन हूँ‘? क्योंकि वो वही है, जो आप हो।

यदि वो जीव है, यदि आपको उसका एक शरीर दिखाई पड़ रहा है, दो हाथ दिखाई पड़ रहे हैं, मस्तिष्क है, बाकी सब कुछ है, गतिविधियाँ हैं, तो वही गतिविधियाँ तो आपकी भी हैं। आप उसे कैसे समझ लोगे बिना अपने आप को समझे? आप ही हैं जिसके मन में आकर्षण है, आप ही हैं जिसके मन में सवाल हैं, तो आपको अपने मन को ही तो समझना पड़ेगा न। आपको अपने आप को ही जानना पड़ेगा, अपने ऊपर आना ही पड़ेगा। अब विश्व, विश्व जैसा रहा नहीं ।

संसार का मतलब क्या है? संसार का मतलब यही है न कि जितने भी संसार में विषय हैं व्यक्ति, वस्तु, इन्हीं सब का तो संकलन कर के हम नाम देते हैं- संसार, विश्व। अष्टावक्र कह रहे हैं अज्ञान के कारण ही विश्व भासित होता है । मैं कह रहा हूँ  कि अष्टावक्र कह रहे हैं कि अज्ञान के कारण ही विश्व, विश्व जैसा भासित होता है। विश्व भासित होता भर नहीं है- इस बात को थोड़ा-सा फैला लीजिये। अज्ञान के कारण ही विश्व, विश्व जैसा भासित होता है ।

जब ज्ञान आएगा तो आप ये कहोगे ही नहीं कि ‘ये विश्व है’, क्योंकि ज्ञान में आप अपनी ओर मुड़ चुके हो। जानने तो निकले थे कि विश्व क्या है, और सवाल ये पूछना पड़ गया है कि ‘मैं कौन हूँ?’ जानने तो ये निकले थे कि मुझे जो इतना लुभा रहा है, वो कौन है, लेकिन सवाल ये पूछना पड़ गया है कि ‘मैं कौन हूँ?’ अब विश्व, विश्व जैसा नहीं दिखाई देगा। अब पता चल जाएगा कि विश्व मेरी परछाई है। मुझसे अतिरिक्त विश्व कुछ है ही नहीं, तो विश्व क्या बोलें। और ये ‘मैं’, जिसकी परछाई है सब कुछ, उसी का नाम ‘परमात्मा’ है। उसी को ‘परमात्मा’ कहते हैं, वो अलग नहीं है। विश्व दिखाई ही उनको पड़ता है जिन्होंने विश्व को आज तक देखा नहीं। विश्व दिखाई ही उनको पड़ता है जिन्होंने विश्व की आज तक जांच-पड़ताल ही नहीं की।

जो लोग बार-बार आ कर दुनिया के नाम की दुहाई देते हैं कि दुनिया में ये, दुनिया में वो, उनसे तो मैं एक ही सवाल पूछता हूँ, ‘दुनिया माने क्या?’ और उसके बाद वो बात करना पसंद नहीं करते, क्योंकि राज़ खुल जाएगा। आप जिसको दुनिया कह रहे हो, आपने उसे कभी समझा ही नहीं। आप आते हो और खूब बातें बताते हो। अभी कल ही तुम में से एक की माताजी का कह रहीं थीं, कि नहीं देखिये साहब दुनियादारी भी तो निभानी पड़ती है न। तो ऐसे समझाया, वैसे समझाया, फिर जब बात बनी तो मैंने पूछा, ‘क्या निभानी पड़ती है?’ तो बोलीं, ‘दुनियादारी’। मैंने कहा, ‘वो क्या है?’। अब बात होगी नहीं क्योंकि ये सवाल ही वर्जित है।

ये मत पूछना कि दुनिया क्या है, बस दुनियादारी निभाओ। मतलब क्या करो? तुम कह रहे हो कि बिना ये जाने कि ये रास्ता क्या है, किसने बनाया है, और किधर को जाता है, मैं उस रास्ते पर चलता जाऊँ। नहीं, ये तो हम स्वीकार नहीं कर पाएँगे। बिना जाने कि जिसको तुम दुनिया कहते हो वो है क्या, मैं उस दुनिया के ढर्रों पर कैसे चल लूँ?

तुम जो कुछ कहो, मुझे सब स्वीकार है। तुम आओ, तुम मुझसे कहो, ‘देखिये भविष्य तो बनाना पड़ता है न, आगे की चिंता तो करनी पढ़ती है न’, तो मैं कहता हूँ, ‘ठीक, आपकी बात सिर-माथे, बस मुझे ये बता दो कि भविष्य माने क्या’। पर जैसे ही ये सवाल पूछो तो दावा करने वाले गायब हैं। गए कहाँ? अब खोजो तो भी मिलेंगे नहीं। वो कहेंगे, ‘आप ये गलत सवाल न पूछा करिये कि भविष्य माने क्या, ये न पूछियेगा’।

बड़ी दिक्कत हो गयी थी अभी। एक दिन एक सज्जन बोले कि मैं बहुत गहराई से प्रेम में हूँ। तो जैसी मेरी आदत है, मैंने पूछा, ‘किसमें हो?’, तो बोले, ‘प्रेम में हूँ’। मैंने कहा, ‘किस में हो? क्या है वो? क्या होता है? कैसे पता कि प्रेम में हो?’ तो वो बोले, ‘कुछ-कुछ होता है’। कुछ-कुछ होता है से प्रेम कैसे? मतलब तो बताओ कि किस चीज़ को प्रेम बोल रहे हो। क्या कहीं खुजली होती है, कुछ नाचता है, कोई तरंग उठती है? किसको प्रेम कहते हो? बोले, ‘वही जिसे प्रेम कहा जाता है’। मैंने कहा, ‘नहीं, मैं नहीं जानता किसे प्रेम कहा जाता है, ज़रा मुझे बताओ। प्रेम माने क्या?’ बोले, ‘दिल पर हाथ रख कर वो तो दिल की बात है’। मैंने कहा, ‘तो ई.सी.जी. करा लाओ’। बोले, ‘फिर तो बात नहीं हो पाएगी’। मैंने कहा, ‘मैं बात करना चाहता हूँ इसीलिए तो सवाल पूछ रहा हूँ, तुम बात छिपा रहे हो’।

मैंने कहा, ‘दिल की धड़कन बढ़ जाती है, पसीने आते हैं, इससे तो यही पता चलता है कि तला-भुना ज़्यादा खाते हो, कोलेस्ट्रोल बढ़ रहा है, दौरा और आएगा, मरोगे । इसको प्रेम क्यों बोल रहे हो?’ बोले, ‘नहीं वो जब एक इंसान अच्छा-अच्छा लगने लगे उसको कहते हैं, प्रेम’। मैंने कहा, ‘तो वो तो जलेबी भी अच्छी लगती है, और दस चीज़ें तुम्हें अच्छी लगती हैं, नाम गिनाऊँ?’ तो समझ गया था अब तक की बात। बोला, ‘नहीं वो ठीक है, बोध सत्र में ही आएँगे, सवाल पूछ लेंगे तो बता दीजियेगा’। बोध-सत्र में सुविधा रहती है, वहाँ पीछे कहीं छिप कर इधर-उधर बैठ जाओ। आमने-सामने तो बड़ी दिक्कत थी, और मैं बड़ा साधारण सवाल पूछ रहा था, ‘प्रेम माने क्या?’

ये वैसा ही सवाल है जो अष्टावक्र ने पूछा है, ‘विश्व माने क्या?’ आप जवाब नहीं देना चाहते और आपको सबसे ज़्यादा उलझन ही इसलिए होती है क्योंकि मैं वो सवाल पूछता हूँ, जो बच्चे पूछते हैं। आप मेरे पास आते हो, आप कहते हो, ‘परिवार की सुध लेनी है’। मैं पूछता हूँ, ‘माँ माने क्या?’, अब आप जवाब नहीं देना चाहते। मैं तो बस इतना सा पूछता हूँ, ‘माँ माने क्या?’ और आप जवाब नहीं देते।

अभी कुछ दिन एक छात्र के अभिभावक आए। बोलते हैं, ‘देखिये और सब तो होना चाहिए, लेकिन मेरा बच्चा बहस बहुत करने लगा है। बच्चों को माता-पिता का आदर तो करना ही चाहिए न’। बिल्कुल यही वचन थे उनके, ‘बच्चों को माता-पिता का आदर तो करना चाहिए न, ये बहस बहुत करने लगा है’। मैं बस उनसे पूछने ही वाला था, ‘आदर माने क्या?’ इसके अलावा पूछूँ तो क्या पूछूँ कि आदर माने क्या। जिस शब्द का इतना प्रयोग किये जा रहे हो, उससे तुम्हारा आशय क्या है, ये तो स्पष्ट कर दो। और ‘बहस’ माने क्या, ये भी बताओ ।

तो संसारी वो, जो ज़रा भी संसार को न जाने। संसारी की परिभाषा ये नहीं है कि जो संसार से बड़ा मोहित है, आकर्षित है, और आसक्त है। संसारी की परिभाषा ये है कि जो संसार के विषय में पूर्णतया अज्ञानी है, उसी का नाम ‘संसारी’ है । संसारी वो है जो संसार को ज़रा भी नहीं जानता। उससे संसार के बारे में तुम कुछ पूछो, वो कुछ भी बता नहीं पाएगा। उससे पूछो, ‘नींद में क्या होता है? ये सपने कहाँ से आये तुम्हारे? डर क्यों उठता है और तरक्की क्यों चाहिए?’, वो कुछ भी नहीं बता पाएगा। जिस-जिस को तुम संसार का नाम देते हो, जो-जो लक्षण हैं तुम्हारे संसार के, जो-जो इसकी विशेषताएँ हैं और इसका चरित्र है, इसके विषय में जो सर्वथा अबोध है, वही ‘संसारी’ है। जो संसार में रहे बिना समझे कि संसार क्या, वही ‘संसारी’ है। इसीलिए संसार उसे ख़ूब नचाता है ।

जैसे कि आप किसी शहर में पहुँच जाओ और आपको उस शहर का कुछ पता न हो, तो आपको रिक्शे वाले और ऑटो वाले खूब नचाएँगे। वैसे ही हम जी रहे हैं, हम संसार में हैं, पर संसार का हमें कुछ पता नहीं है, तो लुट रहे हैं, बस लुट रहे हैं। कुछ पता तो है नहीं कि कहाँ पर हैं, और चल क्या रहा है, कि जैसे किसी व्यवसायिक अस्पताल में पहुँच जाओ और तुम्हें कुछ अपने ही शरीर का पता न हो, तो खूब लुटोगे। कोई तुमसे कहेगा कि तुम्हें ये बीमारी है, कोई तुमसे कहेगा कि ये तुम्हारी दवाई है, तो तुम खूब लुटोगे। आज कल के अस्पतालों में देखा है क्या होता है? तुम्हें अपना ही कुछ पता नहीं है, तो डॉक्टर जो बताएगा वो तुम्हें मानना पड़ेगा। तुम्हारे ही शरीर के बारे में तुम्हें बताएगा कोई और, तो ऐसा ही हम संसार में जीते हैं। हमें कुछ पता नहीं है कि हम कौन हैं, और दुनिया क्या है, तो लुट रहे हैं। कोई भी हमें जो कुछ भी बता देता है, हमें वही करना पड़ता है ।

आगे कह रहे हैं अष्टावक्र, ‘त्वमेकः परमार्थतः’। जो विश्व को जानने निकलता है वो जान जाता है कि विश्व और विश्व में संनिहित वैविध्य है ही नहीं। ‘अरे! मैं ही तो हूँ, ‘त्वमेकः- एक’, और वही आखिरी सत्य है, पारमार्थिक सत्य। वेदांत सत्य के तीन तल बोलता है, उसमें जो सबसे ऊँचा होता है, उसे ‘पारमार्थिक सत्य’ कहते हैं। ‘मैं ही तो हूँ’।

‘तुम्हारे अतिरिक्त’, अष्टावक्र कह रहे हैं, ‘न जीव है न आत्मा है’। मूल भी तुम, फूल भी तुम। आत्मा मूल, जीव फूल। मूल भी तुम, फूल भी तुम, तुम्हारे अतिरिक्त कोई नहीं है। यही ज्ञान है, यही प्रेम है और यही अहिंसा है। यही जानना है, और इसी जानने में जो भाव उठता है, वो प्रेम है।

‘अब कहाँ कुछ पराया लग रहा है। ज्यों-ज्यों जानता गया, त्यों-त्यों दिखता गया कि जो भी कुछ अलग-अलग और दूर-दूर दिखता था, वो मैं ही तो हूँ’- यही प्रेम है।

ज्ञान जब गहरा होता है तो प्रेम बन जाता है। आपके ज्ञान में कुछ सत्य है या नहीं, परखना हो तो बस ये देख लीजियेगा कि आपका ज्ञान प्रेम की तरलता पा रहा है या नहीं। अगर ज्ञान झूठा है, तो वो पत्थर की तरह हो जाएगा। जमेगा, उस पर तहें बनेंगी, और अगर ज्ञान सच्चा है तो वो पिघलेगा और बहेगा, वो बचेगा नहीं। ‘बहने’ का अर्थ समझ रहे हो न? बहाव का अर्थ होता है- जहाँ कुछ है ही नहीं। कुछ बचा हुआ नहीं है, कुछ भी शेष नहीं है, बस एक प्रवाह है, वही प्रेम है।

‘एक प्रवाह है मुझसे समष्टि की ओर, और समष्टि से मेरी ओर। किसी से कटा हुआ नहीं हूँ’।

-‘बोध-सत्र’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: https://www.youtube.com/watch?v=vt_VHf1xfNg

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