उक्तियाँ, बोध सत्र से, १- ७ फरवरी ‘१५

10959369_586446291489674_509195280396940666_nउक्तियाँ, बोध सत्र से, १- ७ फरवरी  ‘१५

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१. आप कैसे हैं और आपका जीवन कैसा है- यह एक साथ बदलता है। यह मज़ाक की बात है कि हम सत्य के समीप आ जाएँ, बोध को उपलब्ध हो जाएँ, और हमारा जीवन जैसे चल रहा है वैसे ही चलता रहे। बोध आपके जीवन को बदले इसकी आपने अनुमति दी है?

जो अपने जीवन को बदलने से रोकेगा, उसका आतंरिक बदलाव रुक जाएगा। जो पा रहा है भीतर, वो न गा रहा हो बाहर- तो उसका भीतर का बदलाव रुक जाएगा। जब मन बदल रहा है तो जीवन बदलेगा, और जो बदलाव को रोकेगा उसका मन बदलना रुक जायेगा।

२. समय देह है। जब तक देहभाव रहता है, तब तक समय रहता है।

३. जो खास दिन की प्रतीक्षा में हैं, उन्हें तो प्रतीक्षा ही मिलेगी।

४. जितना तुममें देहभाव गहरा होगा, उतना ही संसार तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण रहेगा। संसार को शून्य जानने के लिए वो दृष्टि चाहिए, जो पहले खुद को शून्य जाने।

५. मन ऐसा हो जो प्रतीक्षा में भी प्रतीक्षारत न रहे।

६. न कुछ नया जुड़ेगा, न कुछ पुराना कभी कहीं गया है। जिस महासमुद्र से उठे थे, वहीँ वापस समा गए।

७. जब कहो कि सब वहीँ से आता है, तो कहो, ‘पूर्ण’। जब कहो कि सब वहीँ घुल जाता है, तो कहो, ‘शून्य’।

८. कबीर से कुछ माँगना ही मत, कबीर के अलावा। तुमसे अब हम कम कुछ माँगेगे ही नहीं। कम माँगना, माँगने का अपमान होगा।

९.  सत्य प्रेम है, प्रेमपत्र नहीं। अपनी साखियों के माध्यम से तुम्हें जहाँ को बुला रहे हैं कबीर, वहाँ को जाओ। साखी पकड़कर मत बैठ जाओ।

१०. कबीर, कबीर के अलावा कुछ नहीं कहते। कबीर होना माने साक्षी होना। तुम भी साक्षी हो जाओ।

११. योगभ्रष्ट कौन? जो शिष्य तो बना, पर गुरुता को उपलब्ध न हो पाया।

१२. उसको मत देखो जो बोल रहा हूँ। उसको देखो जो बोल रहा है।

१३. हम सोचते हैं कि हमें पता है कि हम क्या कर रहे हैं।

१४. हम वो हैं जो मूल और फूल को एक साथ नहीं देख सकते। सत्य और संसार को अलग-अलग देखना ऐसा ही है जैसे कोई फूल और मूल को अलग-अलग समझे। जैसे कोई एक वृक्ष को अपने खंडित मन से खंड-खंड देखे। यही तो निशानी है खंडित मन की: उसे सब अलग-अलग दिखाई देता है; वो सुख में दुख, और सुख-दुख में आनंद नहीं देख पाता। फूल, शूल और मूल सब अलग-अलग हैं उसके लिए।

टुकड़े देखे तो संसार, पूरा देखा तो सत्य।

१५. परमात्मा से प्रेम लगना बड़े सौभाग्य की बात है। लेकिन ये सौभाग्य, चुनौती और खतरा दोनों लेकर आता है: जो पायेगा उसे गाना पड़ेगा। उसे अपने रोम-रोम से अपने प्रेम की उद्घोषणा करनी पड़ेगी। और जो ये हिम्मत नहीं दिखा पायेगा वो महापाप का भागी बनेगा। दोहरा जीवन जीना विश्वासघात है, परम सत्ता के प्रति।

१६. प्रेम से मन बचता ही इसलिए है, प्रेम को तमाम सीमाओं में बांधता ही इसलिए है, क्योंकि अदम्य होता है प्रेम, विस्फोट होता है प्रेम। उसके आगे न मन ठहर सकता है, न मन के सारे तर्क। डरपोक और कायर मन के लिए प्रेम नहीं है।

१७. बाहर से देखो तो तिनका, उसका दिल खोलो तो आकाश।

१८. आत्मा की पुकार और संसार की आसक्ति के बीच इंसान अटका रहता है जीवन भर।

१९. जब प्रीतम के मंदिर जाते हैं, तब सीढ़ियाँ नहीं गिनी जातीं, प्रेम के पंखों पर उड़कर आया जाता है।

२०. ये बिल्कुल झूठी बात है कि दुःख में इंसान भगवान को याद करता है। दुःख में क्या याद आता है? दुःख में हम सुख को याद करते हैं, सत्य को नहीं। दुःख का अर्थ ही है कि प्रस्तुत स्थिति की तुलना की जा रही है, किसी स्मृति या कल्पना से। दुःख में अगर सुख की याद न आए, तो दुःख बचेगा ही कहाँ?

हम दुःख में सुख का सुमिरन करते हैं, सत्य का नहीं।

२१. मन जिधर को भागता है, उसी को वो खुशी मानता है। मन सुख की तरफ नहीं भागता है, बल्कि मन जिधर को भागे वहीँ उसका सुख है। मन किधर को भागेगा, वो संस्कारों पर निर्भर करेगा।

२२. दुःख में उसकी याद आती है जिसकी तुलना में दुःख लग रहा हो। दुःख को यदि अपने भीतर कोई पैठ ही जाने दे, कोई अभीप्सा न रहे, कल्पना न रहे, तो दुःख दुःख रहेगा ही नहीं।

२३. जिसे सुख में सत्य याद आ गया, उसे दुःख भी तुरंत याद आ जाएगा। दुःख नहीं बचेगा और सुख भी नहीं बचेगा।

२४. ‘सदा सुखी रहो’ – यह श्राप है। मूढ़ ही ऐसा आशीर्वाद दे सकते हैं और कामांध ही ऐसा आशीर्वाद पा खुश हो सकते हैं। सुख तो एक अंतहीन दौड़ है, एक असंभव तलाश।

२५. त्रिकालदर्शी कौन? जिसको अब समय छल नहीं पाता।

२६. दुखी आदमी सिर्फ यह याद करता है की कैसे बचूँ। राम नहीं चाहिए उसे। उसे दुःख से हटना है बस। समाधि नहीं पानी है, बस दुःख से त्वरित छुटकारा चाहिए।

२७. आध्यात्मिक मन दुःख का शिकार नहीं हो सकता।

२८. पाप दुःख की ज्वाला में नहीं जलते; पाप बोध की ज्वाला में जलते हैं।

२९. सुमिरन करने से दुःख ही नहीं छूटता, सुख-दुःख दोनो छूटते हैं। जब जाते हैं, तब दोनों एक साथ जाते हैं। मात्र सहजता बचती है।

३०. गुरु कौन? जो उपाय जाने। जो तुम्हारी चालाकी से ज़्यादा चालाक हो।

३१. संसारी आदमी को संसार का, कुछ पता नहीं होता। तभी तो वो संसारी है।

३२. मुफ़्त मिलेगा, बस पकड़ना मत। वो इसी शर्त पर मिलता है कि पकड़ना मत।

३३. मन की ख्वाहिश बस यही है कि मज़ा लूँ, और सज़ा भी न मिले। पर जहाँ मज़ा है, वहाँ सज़ा है।

३४. मस्त हो सकते थे पर व्यस्त हो-  करने में।

३५. समय से मुक्ति चाहिए तो समय को महत्व देना बंद करो।

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