गहरा प्रेम, गहरा विरोध

अपणे संग रलाँई पिआरे, अपणे संग रलाँई।

पहलां नेहुं लगाया सी तैं, आपे चाँई चाँई;
मैं पाया ए या तुध लाया, आपणी तोड़  निभाईं।

-बुल्ले शाह

वक्ता: बुल्ले शाह प्रार्थना कर रहे हैं कि ‘निभाना’। ‘अपणे संग रलाँई प्यारे, अपणे संग रलाँई’- निभाना। ऋचा पूछ रही हैं कि बात थोड़ी विपरीत लग रही है। ‘परम से क्यों कहा जा रहा है कि तुम निभाना? उसके निभाने में शक है क्या? कहना तो यह चाहिए था कि मैं निभाता रहूँ। तो ये बात कुछ विपरीत लग रही है की बुल्ले शाह प्रार्थना कर रहे हैं कि ‘प्रभु तुम निभाना’। बुल्ले शाह क्यों कह रहे हैं ऐसा?’

जो आपने बात कही सुनने में प्यारी है, पर देखिये कि अहंकार के रास्ते कितने सूक्ष्म होते हैं। कबीर कहते हैं न, ‘मन को मिरतक देखि के, मति माने विश्वाश’। अहंकार जब स्थूल होता है, तो कहता है, ‘क्यों निभाऊँ मैं किसी से और निभाने की आवश्यकता क्या है? जो है मेरे सामने है और उसको परखने के लिए, जानने के लिए, मेरे पास बुद्धि है। कोई वादा नहीं, कोई निभाने की बात नहीं, कोई सुरति नहीं, कोई ध्यान नहीं, कोई निष्ठा नहीं, कोई आस्था नहीं, कोई समर्पण नहीं, ज़रूरत क्या है निभाने की?’

यहाँ से बात आगे बढ़ती है, तो कुछ राज़ खुलते हैं। मन को यह स्पष्ट होता है कि निभाना तो पड़ेगा क्योंकि तुम्हारी बुद्धि नाकाफ़ी है, क्योंकि तुम मूर्ख हो। तुम नहीं निभाओगे तो तुम्हारा काम नहीं चलेगा, बड़ा दुःख पाओगे, और दुःख मिल रहा होता है। प्रमाण सामने होता है, तो साक्ष्य अनदेखा नहीं किया जा सकता। तो मन कहता है, ‘हाँ बात तो ठीक है, नहीं निभाया तो बड़े दुःख पाए। समर्पण नहीं किया तो जीवन रेगिस्तान जैसा है। अकड़े खड़े हैं, तो पूरा शरीर दुःख रहा है। तो इसका अर्थ यह है कि निभाना तो पड़ेगा’, और फ़िर तुम प्रसन्न होते हो कि ये देखो हमने अहंकार पर विजय पा ली, मन मान गया कि निभाना पड़ेगा, पहले मानता ही नहीं था।

मन पहले कहता था, ‘मैं नहीं निभाऊंगा’, मन अब कहता है, ‘मैं निभाऊंगा’, कुछ मान नहीं गया है। ‘मन को मृतक जान के, मत कीजै बिस्बास’, बात कुछ खुली? मन पहले क्या कहता था? ‘मैं नहीं निभाऊंगा’। मन अब क्या कहता है? ‘मैं निभाऊंगा’। बुल्लेशाह इसलिए कह रहे हैं, ‘तुम निभाओ’।

‘मैं पहले बोध सत्र में नहीं जाता था, अब लगातार जाता हूँ, बिना नागे के जाता हूँ। अरे! मैं सुधर गया हूँ, मैं बेहतर हो गया हूँ’। कुछ-कुछ बात दिख रही है? और फिर एक दूसरा भी होता है, जो कहता है बुलाया जाता है तो चले जाते हैं। वह कहता है, ‘हम नहीं जानते कि कुछ करना है। हम तो बस इतनी प्रार्थना कर सकते हैं कि जब तुम्हें उचित लगे बुला लेना। और हम ये भी ज़ोर देकर ना कह पाएंगे कि बुला ही लेना, क्योंकि क्या पता कब उचित है बुलाना, और कब नहीं उचित है। तो हम तो बस मौन होकर खड़े हो जाएंगे, बुलाना हो तो बुलाना, ना बुलाना हो तो ना बुलाना। हाँ, हमसे कोई बाधा ना पाओगे। हम खाली रहेंगे, हम उपलब्ध रहेंगे, हमसे गूँज उठेगी’।

कभी खाली भवनों में जाकर देखना, वहाँ गूँज उठती है, क्योंकि वो खाली होते हैं। गूँज का अर्थ जानते हो? जो तुमने कहा ठीक वही हुआ, वही वापस आया। तुमने कहा, ‘आओ’ तो ‘आओ’ ही वापस आया। हम खाली थे, हम उपलब्ध थे सुनने के लिए। हमारी इतनी हैसियत कहाँ कि हम कहें, ‘हम आते हैं’। और जब तक हम कह रहे हैं ‘हम आते हैं’, तब तक तो हमने चालाकी से ना आने का विकल्प खुला छोड़ा हुआ है, क्योंकि यदि आने का फैसला मैंने किया है तो मैंने अपने पास यह अधिकार अभी सुरक्षित रखा है कि किसी दिन कह दूँ, ‘अब नहीं आऊँगा’। यदि मैं आने वाला हूँ, तो न आने वाला भी हो सकता हूँ। मैं ही तो बैठकर तय करता हूँ न कि आज आना है, तो मैं ही बैठकर के ये भी तय कर सकता हूँ कि आज नहीं आना है। कर्ताभाव सुरक्षित रखा है।

बुल्लेशाह ठगिनी को ठगना जानते हैं। वो मन के इन पुराने दाँव-पेंचों में फँसने वालों में नहीं हैं, तो वो ये कहेंगे ही नहीं, ‘प्रभु तुझसे प्रीत मैं निभा रहा हूँ’। वो कह रहे हैं, ‘तू निभा, तू। तुझ पर छोड़ा, और तुझ पर छोड़ना ही मेरा निभाना है, इसके अतिरिक्त कोई निभाना होता नहीं’। बात की सूक्ष्मता को पकड़िये। जीव का निभाना, निभाना नहीं है। उसका निभाना है, अपनी ओर से न निभाना। ‘नहीं, मैं नहीं निभा रहा, तू निभा। अपनी ओर से जो मैं कर सकता था, वो मैंने सब तुझ पर छोड़ दिया, यही मेरा निभाना है। हमारा तुम्हारा जो वादा हुआ था, उस वादे में जो करना है वो तुम्हें करना है, और जो कुछ नहीं करना है वो हमें करना है। हमारा तुम्हारा अनुबंध ही यही है।

कृष्ण कहते हैं गीता में, ‘एकमात्र कर्ता मैं हूँ। अर्जुन, तेरा मेरा रिश्ता ही यही है कि मैं करूँगा। प्रतीत भले हो कि तू कर रहा है। हाँ ठीक, बाण तेरे गाण्डीव से चलेंगे, शरीर तेरा गति करेगा, पर चलाने वाला मैं हूँ’। और जो जानते हैं वो अच्छे से जानते हैं कि बाण अर्जुन ने नहीं कृष्ण ने ही चलाये थे। धनुष रहा होगा अर्जुन का, कला रही होगी अर्जुन की, कौशल रहा होगा अर्जुन का, और शरीर रहा होगा अर्जुन का, पर चलाने वाले तो कृष्ण ही थे। बाण खाने वाले भी कृष्ण ही थे। चला भी रहे थे, खा भी रहे थे।

कुरुक्षेत्र हो या मथुरा-वृंदावन हो, दोनों जगह कोई अलग-अलग घटना थोड़ी ही घट रही है। जो लीला वो गोपियों के साथ कर रहे थे, वही लीला तो कुरुक्षेत्र में भी हो रही थी न। हाँ, वहाँ ऐसा लगता था कि रास है, और यहाँ ऐसा लगता था कि युद्ध है। हो क्या रहा था? हो कुछ नहीं रहा था, दोनों जगह कृष्ण का नृत्य था। ना रास था, ना युद्ध था, दोनों जगह बस कृष्ण का नृत्य था।

तो बुल्लेशाह नहीं फँसने वाले कि हम निभाएंगे। उन्होंने कहा, ‘हम समझ गए हैं। तुम्हारा हमारा रिश्ता क्या है, वो हम समझ गए हैं। तुम्हारा हमारा रिश्ता वही है- तुम पिया हो और हम पिया की प्यारी हैं। जो करोगे, सब कुछ तुम करोगे।

जो करोगे वो तुम करोगे, हमें कुछ नहीं करना है। क्या आशय है इस बात का कि जो करोगे सो तुम करोगे, हमें कुछ नहीं करना है? अर्थ क्या हुआ? बात समझियेगा, ‘जो करोगे सो तुम करोगे, ये बड़ा विधायक वाक्य है। ‘विधायक’ माने किसी बात को ज़ोर देकर कहा जा रहा है, पुष्टि की जा रही है, पॉज़िटिव स्टेटमेंट। ‘हमें कुछ नहीं करना है’, ये पूरे तरीके से निषेधात्मक वाक्य है, नेगेटिव स्टेटमेंट। और जीवन यही है, इन दोनों को एक साथ ले कर चलना।

‘जो करोगे सो तुम करोगे’, ये है गहरे से गहरा समर्पण। ‘जो करोगे सो तुम करोगे’, ये गहरे से गहरा समर्पण है। ‘हमें कुछ नहीं करना है’, ये गहरे से गहरा विरोध है। दोनों बातें एक साथ हैं इसमें, समर्पण भी और विरोध भी। आपको ताज्जुब होगा इस बात पर की ये कैसे हो सकता है कि समर्पण भी है और विरोध भी है।

शरीर के तल पर, मन के तल पर, जीना ही ऐसे है कि संसार हावी न हो जाए, क्योंकि संसार यदि हावी हो गया तो संसार के प्रति मात्र हिंसा रहेगी। जो तुमपर हावी होता है, तुम उसके दुश्मन हो जाते हो। होते हो या नहीं? तो संसार का गहरा विरोध करना ज़रूरी है, ताकि संसार से दुश्मनी न हो जाए और तुम संसार से प्रेम में जी सको। इस बात को समझना, भूल हो जाएगी अगर ध्यान नहीं दिया।

जब मैं कहता हूँ संसार का विरोध करो, करो, करो और ज़रूर करो, जान चली जाए तो भी करो। कबीर कहते हैं-

अधिक सनेही माछरी, दूजा अपल सनेह ।
जबहि जलते बिछुरै, तब ही त्यागै देह ।।

मछली जैसे रहो, कि हमें ज़रा भी छेड़ोगे और जल से बाहर निकालोगे तो जान दे देंगे।

और कबीर ये भी कहते हैं, ‘फुलवा भार न ले सकै’, कि ज़रा हमारे ऊपर भार अगर डालोगे तो अभी टूट जाएंगे, अभी मुरझा जाएंगे, जियेंगे नहीं। हमें बंधक बनाने की कोशिश ना करना। जब मैं ये कहता हूँ तो हो सकता है ये भ्रम हो जाता हो कि मैं कह रहा हूँ कि संसार से शत्रुता में जियो। बात को समझो, मैं कह रहा हूँ संसार के विरोध में जियो क्योंकि संसार की प्रकृति है हावी होना, संसार की प्रकृति है तुम्हें संस्कारित करना। तुम पैदा होते हो तो पहले ही क्षण से संसार तुम्हारे साथ क्या कर रहा होता है? वो तुम्हें संस्कारित करने के, नियोजित करने के प्रयत्न में लग जाता है। संसार का विरोध करो ताकि संसार तुम पर हावी न हो जाए। यदि हावी हो गया, तो तुम उसके शत्रु हो जाओगे। गौर से परखो इस बात को कि ऐसा ही है या नहीं।

दुनिया में जो भी कोई है, वो क्या संसार का शत्रु ही नहीं है? हम सब दुनिया को कैसे देखते हैं? कि दुनिया हमारी बैरी है। ऐसे ही देखते हैं ना? तभी तो लगातार अपनी सुरक्षा की कोशिश में लगे रहते हैं। अगर दुनिया को हम बैरी की तरह ना देख रहे होते, तो हम इतनी दीवारें क्यों खड़ी करते? आप प्रतिपल अपनी सुरक्षा की चिंता में जीते हो। इसका अर्थ क्या है? आपने संसार को क्या बना रखा है? दुश्मन बना रखा है। और संसार को दुश्मन आपने बना ही इसलिए रखा है क्योंकि पहले आपने संसार को अपने ऊपर हावी होने दिया। जो आपके ऊपर हावी होगा वो आपका दुश्मन हो जाएगा। अब आप अपनी सुरक्षा करोगे और उस से कभी प्रेम में नहीं जी सकोगे। मैं कहता हूँ संसार का विरोध करो ताकि तुम संसार में प्रेम में जी सको। जो संसार का विरोध नहीं करेगा, वो कभी संसार से प्रेम नहीं कर सकता।

हर बच्चे को विद्रोही होना चाहिए और हर जवान के भीतर आग जलनी चाहिए कि ‘नहीं स्वीकारूँगा, गहरा विरोध है’। ‘नहीं स्वीकारूँगा’, और नहीं स्वीकारने में भूलना नहीं, हिंसा नहीं है, प्रेम है। जब भी कोई तुम पर यह आरोप लगाये या तुम्हारे ही मन के किसी कोने से यह शंका उठे कि ‘क्या मैं दुनिया का दुश्मन हूँ?’, तो याद रखना कि तुम दुनिया के दुश्मन नहीं हो, तुम तो दुनिया से प्रेम में ही जीना चाहते हो, और जितना गहरा तुम्हारा प्रेम होगा उतना ही गहरा तुम्हारा विरोध होगा। बिना गहरे प्रेम के, तुम गहरा विरोध कर नहीं सकते।

ये सारी मान्यतायें, ये ढर्रे, ये जीने के तरीके, ये तुम्हारे आसपास के लोग, मैं कहता हूँ, मैं बिल्कुल कहता हूँ कि जान देकर भी इनका विरोध करो। और मैं ये इसलिए कहता हूँ क्योंकि मैं चाहता हूँ कि तुम्हारा इनसे प्रेम रहे। जब मैं कहता हूँ कि तुम्हारे परिवार में जो कुछ हो रहा है उसका विरोध करो, तो मैं ये बिल्कुल भी नहीं कह रहा हूँ या चाह रहा हूँ कि तुम्हारा परिवार टूट जाए। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारे रिश्ते प्रेमपूर्ण रिश्ते रहें, मैं चाहता हूँ कि तुम्हारे रिश्ते स्वस्थ रिश्ते रहें।

एक बात ध्यान से समझना, दो लोगों का आपस में कोई रिश्ता स्वस्थ रिश्ता मात्र तब होता है जब पहले दोनों का परमात्मा से रिश्ता स्वस्थ हो। हर स्वस्थ रिश्ते की बुनियाद परमात्मा है। जिस घर में आध्यात्मिकता नहीं है उस घर में कोई भी स्वस्थ रिश्ता हो ही नहीं सकता। जिस घर में आध्यात्मिकता नहीं है वहाँ प्रेम हो ही नहीं सकता।

तुम झूठ बोलते हो जब तुम कहते हो हमारे घर में वैसे तो बहुत प्रेम था, पर इन सत्याग्रहियों ने आग लगा दी है। प्रेम था ही नहीं। शरीर और शरीर के मध्य थोड़ी ही प्रेम होता है कि मियाँ-बीवी घर में रह रहे हैं तो उससे प्रेम हो जाएगा। शरीर कोई प्रेम जानता है? तुम्हारे हाथ में प्रेम बैठा है, तुम्हारा पेट प्रेम जानता है, तुम्हारी नाक और तुम्हारे घुटने की हड्डी, यहाँ से प्रेम होग? या तुम्हारी आँतों में प्रेम बसता है?

प्रेम का घर तो आत्मा है। आत्मा को तुमने कभी जाना नहीं तो प्रेम कहाँ से आएगा? पर तुम इस दुर्भाग्य को कभी स्वीकार नहीं करोगे कि हमारे घर में, परिवार में, समाज में, पूरे विश्व में प्रेम कहीं है ही नहीं। प्रेम आएगा कहाँ से? प्रेम तो आध्यात्मिकता का फूल है। आध्यात्मिकता नहीं है तो प्रेम कैसा? तो गहरा विरोध करो, प्रेम की खातिर लड़ो। लड़ रहा हूँ तुझसे क्योंकि आशिक़ हूँ तेरा, तुझसे प्रेम न करता होता तो इतनी ऊर्जा कहाँ से आती मुझमें कि तुझसे लड़ जाऊँ। जान दिए दे रहा हूँ क्योंकि प्रेम करता हूँ तुझसे, और तेरी भी जान ले लूँगा क्योंकि प्रेम करता हूँ तुझसे।

ये कुछ खास तरह का प्रेम है। ये वो प्रेम नहीं है कि तुम मेरे मुँह पर मलाई मलो और मैं तुम्हारे मुँह पर मक्खन। ये वो नहीं है कि आओ, आओ अच्छी-अच्छी बातें करें और मीठा-मीठा कर के सो जाएं। ये तो वो प्रेम है जो लहू की धार से सींचा जाता है। तो गहरा विरोध होना चाहिए, गहरा विरोध। और उस गहरे विरोध के लिए आत्मा में गहरा समर्पण ज़रूरी है, क्योंकि वो ऊर्जा तुम्हारी अपनी नहीं हो सकती। तुम्हारी ऊर्जा उठती है तुम्हारे तर्कों से, और तुम्हारे तर्क जल्दी हार जाएंगे। तुम कोई भी तर्क दो, तर्क पर आधारित तुम जितनी लड़ाइयाँ लड़ोगे वो जल्दी ही पाओगे कि अब उनमें ऊर्जा नहीं बची है, तुम थक जाओगे, तुम हार जाओगे, तुम्हें हारना पड़ेगा। वो ऊर्जा तो सिर्फ गहरे समर्पण से उठ सकती है।

सुन्दर से सुन्दर छवि संत की वो रही है जिसमें संत के एक हाथ में धर्म-ग्रन्थ होता है, दूसरे हाथ में तलवार होती है, और दोनों एक दूसरे के परिपूरक हैं। धर्म-ग्रन्थ के बिना तलवार चल नहीं पाएगी, थक जाएगी, डर जाएगी, हार जाएगी, या फिर आततायी हो जाएगी, हिंसक हो जाएगी। और तलवार के बिना जो धर्म है, वो पाखण्ड है। जिस धर्म में विरोध के लिए जगह नहीं है और जिस धर्म से तुम्हारे भीतर से गहरे से गहरा विरोध नहीं उठता, वो धर्म झूठा है।

तुम कहोगे, ‘विरोध ज़रूरी क्यों है? समायोजित हो कर भी तो रह सकते हैं?’, तो तुमने ज़रा ध्यान नहीं दिया। तुम समझ ही नहीं रहे हो कि संसार की प्रकृति क्या है। संसार की प्रकृति ही है तुम्हें संस्कारित करना। तुम्हें विरोध करना ही पड़ेगा, विरोध के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं है। तुममें से जो लोग ये सोचते हों कि नहीं-नहीं, नहीं-नहीं, संसार से सुन्दर, सुमधुर, औपचारिक रिश्ते बनाकर भी तो रखा जा सकता है, वो झूठ बोलते हैं, उन्हें पता ही नहीं है। संसार से कोई सुमधुर रिश्ता नहीं हो सकता। संसार सिर्फ़ सबको गुलाम बनाना जानता है। संसार का अर्थ ही है ढर्रे, और ढर्रे मात्र ये चाहते हैं कि तुम उन पर ही चलो, उनसे हटो नहीं। संसार का अर्थ है ढर्रे, और ढर्रों का अर्थ होता है हम पर चलो, हमसे हटना नहीं। हमसे अगर हटे, तो हम तुम्हें अपराधी घोषित कर देंगे। तो विद्रोह तो करना ही पड़ेगा न।

दो-तीन बातें कह रहा हूँ, ये विद्रोह शत्रुता या हिंसा नहीं है, ये विद्रोह प्रेम की हुंकार है। जिसके प्रति विद्रोह कर रहे हो, उसके तुम दुश्मन नहीं हो। उसी का गहरा प्रेम तुम्हें ऊर्जा दे रहा है। और ये बात घोषित करते हुए लजाना नहीं कि तुझसे प्यार करता हूँ इसलिए ही तेरे विरोध में खड़ा हूँ। तुझसे कुछ कम प्यार करता होता, तो कब का तुझे स्वीकार कर लिया होता। यदि मेरे प्यार में ज़रा भी अपूर्णता होती, तो मैं क्यों इतनी जान जलाता? मैं कहता, ‘ठीक है जैसा चल रहा है वैसा चलने दो ना। क्या फ़र्क पड़ता है?’

‘तो तुझे ये भ्रम ना रह जाए कि मेरे दिल में तेरे लिए जगह नहीं। दिल साफ़ है, दिल धड़कता है, सत्य के लिए, प्रेम के लिए ही धड़कता है, इसलिए हाथ में तलवार है’, ये होता है अकर्ता का भाव। ‘जो करेगा तू करेगा’, ये है समर्पण। ‘हमें कुछ नहीं करना है’, ये है विरोध क्योंकि संसार लगातार तुमसे करवाना चाहता है।

विरोध का अर्थ यह नहीं है कि कुछ नया कर के दिखाएंगे। विरोध का अर्थ बस इतना ही है कि वो नहीं करेंगे जो तुम हमसे करवाना चाहते हो, क्योंकि हमें कुछ नहीं करना है, हमारा करने वाला तो कोई और है। हमने अपनी डोर तो किसी और को दे दी है। तुम्हारी आज्ञाओं का पालन ना करेंगे, यही विरोध है। विरोध का अर्थ समझ रहे हो ना? ‘तेरी कैसे मान लूँ? मुझे जिसकी माननी है वो कोई और है’, ये विरोध है। ‘समर्पित हूँ किसी और को’, इसी को कबीर कहते हैं- सती होने का भाव। यही कबीर की सती है, ‘मेरा पति कोई और है, तेरी कैसे मान लूँ? तू जब भी सामने आएगा, तेरा तो विरोध ही करुँगी’।

‘सती’ से अर्थ समझियेगा। किसी औरत को सती नहीं कह रहे हैं कबीर, और कबीर ने सती को लेकर के खूब बात करी है। ‘सती’ मन की वो अवस्था है जिसमें मन समर्पित है मात्र उस परम पति को, और मन कह रहा है, ‘ना किसी और के लिए जगह नहीं है। कोई और आएगा, तो उसका विरोध है’। आप कहेंगे कि विरोध क्यों? उसे छोड़ा भी तो जा सकता है, उसे नज़रंदाज़ भी तो किया जा सकता है। बिल्कुल कर लीजिये, पर यही तो विरोध हो जाएगा, इसी का नाम तो विरोध है।

दुनिया आपसे चाहती है कि आप कुछ करें, और आप दुनिया की उपेक्षा कर दीजिये, नज़रंदाज़ कर दीजिये, इसी का नाम तो विरोध है। और क्या होता है विरोध? यही तो तलवार है। दुनिया कहेगी कि अब तुम्हारी इतनी उम्र हो गयी, अब ये सब करो। तुम उपेक्षा कर दो, यही तो विरोध है। तुम्हें कुछ खास थोड़े ही करना है, तुम्हें बस वो नहीं करना है जो तुमसे तुम्हारे मालिक करवाना चाहते हैं, यही तो विरोध है। तुम्हें कुछ नया अजूबा कर के नहीं दिखाना है, तुम्हें कहीं को भागना नहीं है, तुम्हें बस अपनी जगह खड़े रहना है, यही तो विरोध है। कबीर कह रहे थे-

सज्जन जन वही है, ढाल सरीखा होय ।
दुःख में आगे रहे, सुख में पाछे होय ।।

वही भक्त है। यही तो विरोध है कि तुम आकर्षित करोगे तो हम आकर्षित नहीं होंगे। तुम हमें डराओगे, हम पीछे नहीं हटेंगे, यही विरोध है। अपनी जगह खड़े रहने के लिए ही तलवार चाहिए, कुछ हासिल करने के लिए नहीं। संत में और लुटेरे में यही अंतर होता है, लुटेरा तलवार उठाता है कहीं पहुँचने के लिए और संत तलवार उठाता है अपनी जगह खड़े रहने के लिए, अपने केंद्र पर आसीत् रहने के लिए। तलवार दोनों ही उठाते हैं।

हमें कुछ चाहिए नहीं दुनिया से, हम बस ये चाहते हैं कि हम जैसे हैं वैसा हमें रहने दो। हमारा विद्रोह बस इस खातिर है, और वही असली विद्रोह है। तुम्हारी नहीं सुन सकते। बात महीन है, ध्यान से नहीं सुनोगे तो अर्थ का अनर्थ कर बैठोगे, और अर्थ का अनर्थ खूब हुआ है, इसलिए तो अब धर्म के नाम पे इतनी लड़ाइयाँ चल रही हैं, जिनका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। और इसलिए वहाँ लड़ाइयाँ नहीं हो रही हैं जहाँ हो जानी चाहिए थीं। जहाँ लड़ाइयों का कोई प्रयोजन नहीं, वहाँ रोज़ लड़ाइयाँ हो रहीं हैं, और जहाँ इसी क्षण विद्रोह हो जाना चाहिए, वहाँ सब मुर्दे बैठे हुए हैं, वो विद्रोह जानते नहीं।

लड़ाइयाँ कहाँ चल रही हैं? लड़ाईयाँ चल रही हैं इराक़ में और सीरिया में। कोई प्रयोजन नहीं, व्यर्थ। और लड़ाइयाँ कहाँ होनी चाहिए थीं? लड़ाई होनी चाहिए एक-एक दफ़्तर में, लड़ाई होनी चाहिए इन सारे भरे बाज़ारों में, यहाँ विद्रोह की आग उठनी चाहिए। विद्रोह करना चाहिए हर खरीददार को जिसे लुभाया जा रहा है। विद्रोह करना चाहिए हर उस सामान्य गृहस्थ को जिसे धकेल दिया गया है चक्की में। वहाँ विद्रोह का कोई लक्षण नहीं। वहाँ हम ऐसे जीते हैं कि हम तो बिल्कुल समुचित रूप से समायोजित हैं, वैल-एडजस्टेड।

लड़ाइयाँ चल कहाँ रही हैं? अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं पर जहाँ लड़ाईयों का कोई अर्थ नहीं। एक देश का सैनिक दूसरे देश के सैनिक को मार रहा है, और दोनों एक दूसरे को जानते नहीं। किस बात पर मार दिया, पता नहीं। और जहाँ अभी इसी समय यलगार हो जानी चाहिए, वहाँ लोग मुर्दे पड़े हैं। बेटा बाप से सवाल नहीं कर रहा है कि तुम ये कैसी ज़िंदगी जी रहे हो, बाप बेटे को आईना दिखाने को तैयार नहीं है। वहाँ कोई विद्रोह है ही नहीं। सड़कों पर विद्रोह होना चाहिए, हमारे महानगरों में विद्रोह होने चाहिए, और मैं समझता हूँ इन सबसे ज़्यादा बड़ा विद्रोह होना चाहिए हमारे विद्यालयों में कि ‘तुम ये क्या कर रहे हो? मेरे मन में ये कैसे संस्कार भरे रहे हो?’ पर वहाँ कोई विद्रोह नहीं है।

तो मूर्खता और कैसी होती है? जहाँ लड़ने की कोई ज़रूरत नहीं, वहाँ लड़ रहे हो। जहाँ प्राण देकर लड़ जाना चाहिए, वहाँ तुम ज़ंजीरें पहने बैठे हुए हो।

-‘बोध सत्र’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: https://www.youtube. com/watch?v=Xyto_eLmn6U