मृत्यु में नहीं, मृत्यु की कल्पना में कष्ट है

प्रश्न: मृत्यु से भय इसलिए नहीं लगता कि शरीर छूट जाएगा, पर मृत्यु से पहले का कष्ट आक्रांत करता है| इस कष्ट से बचने का क्या मार्ग है?

वक्ता: कोई ज़रूरी नहीं है की मृत्यु से पहले कोई कष्ट हो, हो भी सकता है और नहीं भी| मृत्यु से पहले ऐसा कोई भी विशेष कष्ट नहीं होता, जो जीवन में अन्यथा ना होता हो| पच्चीस साल का ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ था, फिलिप ह्यूग्स, अभी उसकी मौत हुई है| उसे कहाँ कोई कष्ट हुआ? गेंद लगी, और क्योंकि गेंद भी हटते हुए पीछे गर्दन में लगी थी, तो बहुत कष्ट नहीं हो सकता| यही गेंद अगर उसने सीधे माथे पर खाई होती तो ज़्यादा कष्ट होता| आप में से जिन लोगों ने क्रिकेट खेला है और चोटें खाईं हैं, वो यह अच्छे से जानते हैं|

कोई कष्ट नहीं है, कुछ ही पलों के भीतर ही वो बेहोश हो गया, और बेहोशी में ही उसके प्राण चले गए| कहाँ कष्ट था? बस एक छोटी-सी नस टूटी, प्राण गए| कहाँ कष्ट था? यह भी मन की कल्पना है| जैसे हज़ार कल्पनाएं मन करता है ना, वैसे ही ये भी| ध्यान देने योग्य बात दूसरी है, वो यह है कि मन यह कल्पना क्यों करता है|

मन यह कल्पना इसलिए करता है ताकि उसका यह असुरक्षा का भाव स्थाई बना रहे, ताकि आघात कोई खतरा है, ऐसी घंटी लगातार बजती रहे| कुछ बुरा है जो भविष्य में होने जा रहा है, यह बोझ मन पर लगातार बना रहे| मन मुक्त ना होना पाए, मन मुक्त हो गया तो अहंकार जगह कहाँ पाएगा?

हल्के मन में अहंकार के लिए जगह नहीं हो सकती, तो किसी न किसी अनहोनी की आशंका बनी रहनी चाहिए| कुछ बुरा है जो घटने जा रहा है, कुछ और नहीं दिखा दे रहा तो यही कल्पना कर लो की बड़ी कष्ट पूर्ण मृत्यु आने जा रही है| मृत्यु में कष्ट हो भी सकता है, लोग तड़प-तड़प कर भी मरे हैं, लेकिन फिर लोग तड़प-तड़प कर जीये भी तो हैं| आप यह ही क्यों सोचते हो कि मौत ही ख़ास तौर पर तड़पाएगी, जीवन भी तो तड़पाता है! और जिन क्षणों में आप मौत के कष्ट की कल्पना कर रहे होते हैं, अगर आप गौर से देखेंगे तो पाएंगे कि ठीक उसी समय जीवन बड़ा कष्ट पूर्ण हो गया होता है| बात पर ध्यान दीजिये|

जीवन सबसे ज़्यादा कष्ट पूर्ण कब होता है? जब आप मौत के कष्ट की कल्पना कर रहे होते हैं| मौत तो नहीं है पर जीवन को ज़रूर आपने दुखदाई बना लिया, यह सब मन की चालें हैं| अगर कुछ बुरा होने जा रहा है, तो अभी मुझे क्या करना चाहिए? मुझे अपनी सुरक्षा का इंतज़ाम करना चाहिए, तो मैं वो करूँगा| जिसे बार-बार मौत का विचार सताएगा, वो सीधे इंश्योरेंस एजंट के पास जाएगा, और बहुत लोग हैं जो चहते ही यही हैं कि ऐसा ही हो| ठीक?

जिसे बार-बार मौत का विचार सताएगा, वो तुरंत जाकर मकान बनवाएगा कि मेरे बाद मेरे बीवी-बच्चों का क्या होगा| तो दुनिया का काम-धंधा ऐसे ही तो चल रहा है ना| किसी को मौत का सपना आया, तो वो जाकर एक मकान खरीद ले आया| यह जो इतने बड़े-बड़े व्यापार और आदमी की इतनी व्यर्थ दौड़-धूप चल रही है, वो सब क्या है? वो मौत का डर ही तो है! उसकी आपको कोई बहुत व्याख्या या विश्लेषण करने की भी ज़रूरत नहीं है|

इंसान को मौत का डर नचा रहा है, बात ख़त्म| आप चलें जाएं न्यूयॉर्क, या शिकागो, या हिंदुस्तान में आप चलें जाएं गुड़गाँव, या बैंगलौर, वहाँ आपको जितनी यह व्यवसायिक गतिविधियां दिखाई देतीं हैं, आपको क्या लगता है यह सब क्या है? यह जो ऊँची-ऊँची इमारतें हैं, और यह जो एक देश से दूसरे देश में जाते हुए जहाज़ हैं, यह जो बड़े-बड़े व्यापारियों के प्रतिनिधि मंडल हैं, यह जो तमाम देशों के बीच में बैठकें हो रहीं हैं और कोशिश की जा रही है कि किसी भी तरीके से तरक्की हो, उन्नति हो, व्यापार को प्रोत्साहन मिले, उद्योग लगे, यह सब और क्या चल रहा है?

यह जो पूरी दुनिया नाच रही आपके चारों ओर, असल में ‘नाच’ शब्द उपयुक्त नहीं है, यह जो आपके चारों ओर पूरी दुनिया भय से कांप रही है और डोल रही है, और विक्षिप्त हालत में बदहवास हो कर इधर-उधर दौड़ रही है, सुबह-सुबह आपको जो यह ट्रैफ़िक दिखाई देता है सड़क पर, आपको क्या लगता है यह क्या है? इसकी ऊपरी व्यवस्था पर मत जाइयेगा कि कई लोग कतारबद्ध हो कर एक दिशा में जा रहे हैं, सड़क पर जा रहें हैं, इसकी ऊपर की व्यवस्था पर मत जाइयेगा| यह भीतर ही भीतर सिर्फ मौत का भय है जो हमारी दुनिया को चला रहा है, यह कुछ भी और नहीं है|

अब यह बहुत विचित्र, वीभत्स और साथ ही साथ हास्यास्पद बात है कि इस मौत के भय को हमने तरक्की का नाम दिया हुआ है| हम कहते हैं कि फलाना महीने का इतना कमाता है, बड़ी तरक्की कर ली है| जो परम बेवक़ूफ़ है, उसको हम कहते हैं कि इसने परम प्रगति पाई है| जो जितनी बड़ी इमारत में घुसकर नौकरी करता है या उसका मालिक है और जो जितनी बड़ी कार में चलता है और जितने ऊँचे-ऊँचे ख्वाब लेता है, उसको हम कहते हैं कि उसने उतनी ही प्रगति की है| वो उतना बड़ा मूर्ख है! आंतरिक कष्ट उसका, आंतरिक अंधकार उसका ऐसा है की आप देखें तो आपको दया आ जाए|

पुराने बादशाह होते थे, बड़े-बड़े, वो मरने से पहले अपने लिये स्मारक खड़े कर जाते थे| दिल्ली शहर में देखा है? फलाने का मकबरा, फलाने का गुंबद| देखा है? यह सब क्या है? यह जो बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी की जा रही हैं, जानते हैं यह क्या है? ‘मौत के बाद भी बचा रहूं, नष्ट होने से बच जाऊं, मेरे बाद भी इस दुनिया में मेरा कोई नाम रहे, कोई हस्ती रहे- यह सब मौत का डर है| जो जितना डरा है, वो उतनी ऊंची इमारत खड़ी करेगा|

जिसे मिटने का जितना डर है, वो अपने निशान उतना छोड़ना चाहेगा|

जिसे मिटने का डर ही नहीं, वो कहेगा, ‘क्यों छोडूं निशान?’ उसे अच्छे से पता है कि कोई निशान चलता भी नहीं है| वो ऐसा ही है जैसे रेत पर पदचिन्ह, उतना भी नहीं! जैसे पानी पर लकीर! पर चमत्कार, आदमी का दिमाग, एक चमत्कार! असुरक्षा के भाव से हमारा एक-एक कर्म निकलता है, और इससे बड़ा चमत्कार नहीं हो सकता कि हम सोचें कि असुरक्षा से निकलता हुआ कृत्य हमें सुरक्षा दे जाएगा| असुरक्षा के भाव से हम एक-एक हरकत करते हैं अपनी, और उम्मीद यह करते हैं की इससे सुरक्षा मिल जाएगी, जैसे कि अँधेरे के गर्भ से रोशनी फूट सकती हो|

(मौन)

प्रकाश ही प्रकाशित करेगा ना? या अँधेरे से प्रकाश विस्तीर्ण होगा? डरे हुए मन से जो काम करते हो, उससे डर से मुक्ति कहाँ पाओगे? निर्धनता के भाव से जो कुछ करते हो, उससे धन कैसे मिल जाएगा? लेकिन करते ही तुम तभी हो जब निर्धनता का भाव होता है| जिसे धन्यता का भाव हो गया, उसका करना बड़ा कम हो जाता है| उससे होता नहीं, उसके माध्यम से होता है| उसका करना बहुत कम हो जाता है क्योंकि धन्यता मिल गई|

धन्यता हमें मिली नहीं है, हमें मिली है सिर्फ निर्धनता| ये कमी है, वो कमी है, ये खोट है, वो पालें, ऐसे तरक्की हो जाए| मुझसे मेरे एक परिचित मिले अभी, सोलह साल बाद अमेरिका से आए| उन्होंने मुझसे पूछा, ‘तो अब आगे क्या?’ मैंने कहा, ‘तो अभी क्या?’ उन्होंने मेरा चेहरा देखा और फिर ज़्यादा बातचीत हुई नहीं| ये ‘आगे क्या(व्हाट नेक्स्ट)’, क्या होता है? यह पता है, ‘अभी क्या(व्हाट नाओ)’? अभी का ठिकाना नहीं, आगे की बात| और आगे की बात होती ही तब है जब अभी का ठिकाना नहीं होता| जिसका अभी का ठिकाना है वो आगे की तरफ़ देखेगा क्यों? ‘आगे क्या(व्हाट नेक्स्ट)’, क्यों भाई कहाँ जाना है? कहाँ जाना है? ‘ऊपर क्या (वॉटस अप)?’ लेकिन पहले ये बताइये की नीचे क्या चला गया(वॉट वेंट डाऊन इन दा फर्स्ट प्लेस)| यह ‘अप(ऊपर)’ माने क्या होता है? इतना क्या है तुम्हारी ज़िन्दगी में जो लगातार ‘नीचे ही नीचे(डाउन ही डाउन)’ रहता है कि तुम्हें ‘अप-अप(ऊपर-ऊपर)’ करना पड़ता है?

(सभी श्रोतागण हँसते हैं)

बातें मज़ाक की तो हैं, पर मज़ाक से आगे की भी हैं, इनसे हमारे चित्त का पता चलता है| जो भी कोई मिलता है वही पूछता है, ‘ऊपर क्या(वॉटस अप)?’ अरे! ऊपर(अप) की क्या ज़रूरत है? सब द्वैत में ही रहेगा, ऊपर और नीचे(अप और डाउन)|और ऊपर (अप) के लिए नीचे(डाउन) आवश्यक है| तुम इतने नीचे(डाउन) क्यों हो? पहले यह बताओ| डरे हुए हैं, बहुत ज़्यादा डरे हुए हैं| कल्पना भी नहीं कर पाते कि बिना डर के सांस लेने का अर्थ क्या होता| गला ऐसे घुटा हुआ है की किसी तरह से बस सांस आ-जा रही है| पर इतने समय से घुटा हुआ है कि आदत पड़ गई है इसी घुटन में जीने की| कल्पना भी नहीं कर पाते हैं कि कभी गला न दबा हो, तब सांस लेना कैसा लगेगा, यह कल्पना ही नहीं कर पाते.

(मौन)

स्थिति जल्दी ही यह आने वाली है या फिर शायद आ ही चुकी हो कि दिल्ली में रहने वाले लोगों को अगर आप हिमालय पर ले जाएं तो उनकी तबीयत खराब हो जाएगी, सल्फर-डाई-ऑक्साइड, कार्बन-मोनो-ऑक्साइड नहीं मिलेगी ना| माहौल कुछ ठीक नहीं है, चिर-परिचित बदबू नहीं आ रही है| कैंचीधाम में, जिस रिसॉर्ट में हमारे बोध-शिविर लगते हैं, उस बेचारे की हालत ख़राब है| क्यों? वहां कोई जाता नहीं| क्यों नहीं जाता? क्योंकि वहाँ पर सल्फर-डाई-ऑक्साइड और कार्बन-मोनो-ऑक्साइड नहीं हैं|

वहाँ दुकानें नहीं हैं, वहाँ मनोरंजन नहीं है, वहाँ बेकार के अवसर नहीं हैं| वहाँ पिज़्ज़ा-हट, पिज़्ज़ा नहीं दे कर जाता| वहाँ खड़े हो कर, आते-जाते, आदमी-औरत नहीं देख सकते| वहाँ आपको दाएं जाना हो, कि बाएं जाना हो, कि सीधे जाना हो, पैदल ही जाना पड़ेगा| कोई वाहन आता ही नहीं वहाँ, यही सब तो है कार्बन-मोनो-ऑक्साइड और सल्फर-डाई-ऑक्साइड| देखिये ना यह सब वहाँ नहीं मिलते तो लोगों ने वहाँ जाना बंद कर दिया, उकता जाते हैं, मन छटपटाता है|

मन ठीक उसी के लिए छटपटाता है, जो वो छोड़ कर आया है| हमारे यहाँ भी लोग हैं, ऐसा हुआ है की अगर पाँच दिन का वहाँ कैंप लगता है, तो दो-तीन दिनों में भाग आते हैं| कहते हैं, ‘उफ़! दम घुट रहा है, कुछ खास है जो पीछे छोड़ आए’| पीछे तुम जो भी छोड़ कर आये हो, वो ही तुम्हारे चित्त का प्रदूषण होता है, उसी के लिए भाग रहे हो वापस| और अगर हाथ पकड़ कर उनको रोको, तो भागते हैं ज़ोर से, कि बर्दाश्त नहीं हो रहा अब| और जैसे ही दिल्ली पहुँचते हैं, किसी कार के एग्जॉस्ट पाईप में नाक लगा कर पहले तो गहरी सांस लेते हैं, और कहते हैं, ‘अब जान में जान आई’!

यह सब संकेत हैं, अर्थ को समझें| ‘कार का एग्जॉस्ट पाईप’ मतलब ऐसा नहीं है कि कार में ही नाक डाल देते हैं, वो घर में है कार, वो दफ्तर में है कार| घर में पहुँचे तो पति से ज़रा गाली-गलौच किया, और वही रोज़ की व्यर्थ जो दिनचर्या थी दोबारा वही की, और लगा जान में जान आई| वहाँ तो राम सब छुड़वा रहे थे| वापस मिला जब वही सब कुछ, जब कढ़ाई से करछी टकराई, तो आहा! क्या ध्वनि उठी! वहाँ तो व्यर्थ ही पक्षियों की चहचाहट सुनने को मिलती थी| अब यह फिर से रसोई में बर्तनों के टकराने की गूँज, आहा! यही तो संगीत है ना| अनहद नाद और क्या होता है? कटोरी, करछी और चम्मच, अनहद|

‘कहाँ हमें तुम कबीर की बातें बता रहे थे? कहाँ ऋभु के वचन, कहाँ बुल्ले शाह, कहाँ अष्टावक्र, यह सब कोई देवता हैं? हम वापस आए गए| अगले दिन सुबह बॉस देवता के सामने साष्टांग किया की आपकी खातिर मैं सब कुछ छोड़ कर आ रहा हूँ, ठीक वैसे ही जैसे लैला ने मजनूँ के लिए सब कुछ छोड़ा था, वैसे ही जैसे संतों ने परमात्मा के लिए दुनिया छोड़ी थी, मैं आपके लिए कैम्प छोड़ कर आ रहा हूँ’| और बॉस ने कहा, ‘वरदान! तुम्हारी तनख्वाह बीस रुपये बढ़ाई जाती है’, और तुम उसके पैरों में लोट जाते हो, ‘मज़ा आ गया’!

(मौन)

खौफ़, खौफ़, हकीक़त कुछ नहीं है उसमें| जो लोग कैंप में होते हैं, उनको हज़ार तरीके के खौफ़ सताते हैं, जैसे की कुछ छूटा जा रहा है, और जब लौट कर आते हैं तो पता चलता है कि कुछ नहीं था, खौफ़| वो खौफ ही मृत्यु तुल्य कष्ट है|

मृत्यु में कोई कष्ट नहीं है, खौफ़ में कष्ट है|

– ‘बोध-सत्र’ पर आधारित| स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं|

सत्र देखें:https://www.youtube.com/watch?v=yROGjM-4cLk