असली रण अपने विरुद्ध है

कबिरा रण में आइ के, पीछे रहे न सूर |
साईं के सन्मुख रहे, जूझे सदा हुजूर ||

-कबीर

प्रश्न: जूझने की बात क्यों की जा रही है ? जब सारी साधना विश्राम की और शांति की है, तो जूझने की बात क्यों की जा रही है?

वक्ता: ‘विश्राम’, ‘शांति’ मात्र शब्द नहीं हैं, कल्पनाएं नहीं हैं| ‘विश्राम’ और ‘शांति’ सिर्फ़ बात करने के लिए नहीं हैं, उन तक पहुँचना होता है, उनकी चर्चा नहीं करनी होती| और उन तक पहुँचने के मार्ग में हज़ारों बाधाएं हैं, जिन में केंद्रीय बाधा तुम स्वयं हो |

‘रण’ का अर्थ ही है- अपने विरुद्ध खड़े हो जाना|

‘कबिरा रण में आइ के, पीछे रहे न सूर’, तुम जैसे हो, ऐसा होते हुए तुम्हें विश्राम मिल जायेगा क्या? शांति मिल जाएगी क्या? तुम कह रहे हो जूझने की ज़रूरत क्या है, मत जूझो ! नहीं जूझते तो तुम्हारे पास अभी है क्या बेचैनी, उन्माद और विक्षिप्तता के अलावा? मत जूझो ! कह तो ऐसे रहे हो, जैसे कि जूझने के कारण शांति भंग हो रही हो| कह तो ऐसे रहे हो जैसे संग्राम के कारण तुम्हारे विश्राम में ख़लल पड़ता हो| विश्राम जाना है कभी? शांति जानी है कभी? प्रश्न ही काल्पनिक है कि ‘जब खेल शांत होने का है तो कोई जूझे क्यों?’ क्योंकि जूझ तो रहे ही हो, क्योंकि संग्राम में तो हो ही, पर उल्टा लड़ रहे हो| पता भी नहीं है तुम्हें कि किसके विरुद्ध लड़ना है| ऐसे नशे में हो कि पहचान ही नहीं है कि दुश्मन कौन है और दोस्त कौन है| संग्राम में तो हो ही|

संग्राम का अर्थ समझते हो? संग्राम का अर्थ है, ‘खतरा है और अपनी रक्षा करनी है’| क्या लगातार इसी भाव में नहीं जी रहे हो ?तो लड़ाई तो चल ही रही है| कोई जीव ऐसा नहीं है जो लड़ न रहा हो| कबीर का सूरमा वो है, जिसने सच्ची लड़ाई लड़ना सीख लिया है| अंतर समझना, यहाँ कोई नहीं है जिसने हथियार दाल दिये हों, यहाँ कोई नहीं है जो अहिंसक हो, यहाँ कोई नहीं है जो युद्धक्षेत्र से बाहर हो| जो है, वही युद्धरत है|

दुनिया कुछ नहीं है, दुनिया कुरुक्षेत्र ही है| धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र! बस इतना ही है कि कुछ कृष्ण की तरफ खड़े है, और कुछ कृष्ण के विरुद्ध|

कबीर का सूरमा वो है जो कृष्ण के साथ खड़ा हो कर लड़ता है| लड़ सभी रहे हैं| ये उम्मीद मत करना की लड़ने से मुक्ति पा जाओगे, लड़ना तो पड़ेगा| अर्जुन ने कोशिश की थी कि न लडूँ, लड़ना तो पड़ेगा, यहाँ भगोड़ों के लिए कोई जगह नहीं है| लड़ना तो पड़ेगा, भाग कर जाओगे कहाँ? जहाँ जाओगे वहीं लड़ाई है| जहाँ जाओगे वहीं संसार बिखरा पड़ा है, वहीं ‘दूसरे’ हैं, वहीं छिनने का डर है, वहीं मौत का खौफ़ है, जहाँ जाओगे लड़ाई वहीं है|

जहाँ भी जाओगे, अपने को लेकर ही जाओगे न? जहाँ जाओगे वहीं घर्षण है, जहाँ जाओगे वहीं हिंसा है, जहाँ जाओगे वहीं परायापन है, जहाँ जाओगे वहीं युद्ध है| तुम लड़ो, पर देख के लड़ो कि वास्तव में किसके विरुद्ध खड़े होना है| हमारी अधिकांश लड़ाइयाँ स्वयं को बचाने के लिए होती हैं| हम लड़ते है कि ‘मैं’ बचा रहा हूँ, और मेरे दुश्मन नष्ट हो जायें| यही है न हमारी लड़ाई ? हम ऐसे ही लड़ते हैं न?

और विचित्र है कबीर का सूरमा! वो ऐसे लड़ता है कि, ‘मैं मिटूँ’! कबीर कहतें है मेरा सूरमा पहले सिर काट कर देता है, फिर लड़ने जाता है| यह अजीब बात! तुम जब भी लड़े हो तुमने कहा है, ‘मेरा सिर बचा रहे’ और कबीर का सूरमा जब लड़ने जाता है तो पहले अपना सिर काट कर रख देता है, फिर लड़ने जाता है |

तुम लड़ते हो तो कवच बाँध कर लड़ते हो, और कबीर का सूरमा जब लड़ने जाता है, तो कबीर कहते हैं कि सबसे पहले वो अपने सारे बंध, कवच, लोहा, सब खोल कर रख देता है, फिर लड़ने जाता है| यह अजीब बात है! तुम लड़ते हो तो अपने लिए लड़ते हो, कबीर का सूरमा अजीब है| वो पता नहीं किसके लिए लड़ता है? लड़ना तो है ही| अपने विरुद्ध लड़ो !

तुम्हारे और शांति के बीच में, मात्र तुम खड़े हो|

और याद रखना, संसार से लड़ाई, संसार के विरुद्ध लड़ के नहीं जीती जा सकती | संसार से लड़ाई तो अपने ही विरुद्ध खड़े होकर जीती जा सकती है, क्योंकि संसार तुम्हारे बाहर नहीं है, तुम्हारे भीतर है| तुम ही उसे लेकर घूम रहे हो |

‘कबिरा रण में आइ के, पीछे रहे न सूर’, नहीं, वो लड़ेगा, पीछे होने का सवाल ही नहीं पैदा होता| कोई विकल्प ही नहीं है कि लड़ाई से बचा जा सके क्योंकि वो जानता है, शांति नहीं मिल जानी भाग कर| अशांति तो अपने ही भीतर लेकर घूम रहा है, तो शांति कहीं और भाग कर कैसे मिलेगी? जहाँ भी जाएगा, अपने साथ अशांति लेकर जाएगा|

‘साईं के सन्मुख रहे, जूझे सदा हुजूर’, जब लड़ना है ही, तो क्यों न कोई सार्थक लड़ाई लड़ें? अरे जूझ तो तुम भी रहे हो, जूझ तुम्हारा पड़ोसी भी रहा है, जूझ तो सकल संसार रहा है| जब जूझना है ही तो क्यों न कोई सार्थक लड़ाई लड़ें?

जब कुरुक्षेत्र है ही, तो क्यों न कृष्ण के पक्ष में खड़े होकर लड़ें? क्यों न धर्म युद्ध लड़ें?

रोज़ चोट खाते हो, रोज़ घाव खाते हो, रोज़ मरते हो, दिन में सौ-सौ बार उलझते हो| बात शांति की कर रहे हो, शांति का कोई अनुभव है? कबीर कहते हैं:

मरना हो तो मर जाइये, छूट जाए संसार |

ऐसी मरनी क्यों मरें, दिन में सौ-सौ बार ||

दिन में सौ-सौ बार मर रहे हो और बात कर रहे हो कि आध्यात्मिकता तो शांति के लिए होती है| कबीर तुमसे कह रहे हैं कि पूरा ही लड़ डालो! यह छोटी-मोटी लड़ाइयां क्या लड़ते हो? ये क्या उलझे- उलझे फिरते हो, काट ही डालो न! असली दुश्मन को काट डालो|तभी वो कहते हैं, ‘अपना सिर काट डालो फिर लड़ो’| वही तो असली दुश्मन है, और कौन है ? अपना सिर काट नहीं पाओगे, जब तक अपने लिए लड़ रहे हो| तो कबीर कहते हैं,

सूरा सोई सराहिये, जो लड़ै धनी के हेत |

अपने हेतु नहीं लड़ता वो| क्योंकि जो अपने लिए लड़ेगा, वो तो अपने को सुरक्षा देगा| और अपना माने? अपने सारे विषाद, अपने सारे क्लेश, अपनी सारी कलह, और अपने सारे युद्ध|

जो अपने लिए लड़ेगा उसके युद्ध अनवरत् चलते ही जायेंगे, जो राम के लिए लड़ेगा उसके युद्ध ख़त्म हो जाएंगे |

‘साईं के सन्मुख रहे, जूझे सदा हुजूर’, ‘मेरी’ लड़ाई नहीं ‘उसकी’ लड़ाई, दुश्मन बाहर नहीं, दुश्मन भीतर| एक अन्य जगह पर कबीर कहते हैं कि, सूरमा वही है जो माया को माया जाने,

माया तजै भक्ति करै, सूर कहावै सोय |

यही है सूरमा की परिभाषा| समझो इस बात को| किसी और से नहीं लड़ रहा वो, वो स्वयं से लड़ रहा है| वो दूसरों के विरुद्ध भी यदि खड़ा हुआ दिखता है तो बस इसलिए ताकि दूसरों से प्रभावित न हो पाए, उसे दूसरों से कोई विशेष प्रयोजन है ही नहीं| वो हकीक़त जानता है दूसरों की, वो जानता है कि दूसरे कहाँ हैं, ‘दूसरे मेरे भीतर ही हैं| उनसे लड़ कर क्या होगा? वो तो छाया है| छाया से लड़ कर क्या मिलना है?

सैनिकों ने, बादशाहों ने, सिकंदरों ने, खूब लड़ाइयाँ लड़ीं, पर वो सारी लड़ाइयाँ क्या थीं? ‘मैं कायम रहूँ और मैं बढ़ता जाऊँ’|भारत ने कुछ दूसरे किस्म की लड़ाइयाँ लड़ी हैं, ‘मैं मिटता जाऊँ’| और भारत ने ‘महावीर’ उसको माना है जो अपने को मिटाता गया है, बढ़ाता गया नहीं |

ये तो बड़ी सामान्य-सी बात है कि, अहंकार लगातार हीनता के, कमी के भाव में जीता है, तो अपने आप को बढ़ाना चाहता है| तो कोई भी सिकंदर यही कोशिश करेगा कि अपना राज्य बढ़ाऊँ, अपना प्रभाव बढ़ाऊँ, अपना ‘होना’ बढ़ाऊँ, बड़ी साधारण बात है ! एक भिखारी भी यही कर रहा है और एक सिकंदर भी यही कर रहा है |

कबीर का सूरमा यह नहीं कर रहा है| वो इसके विपरीत जा रहा है, वो अपना होना घटा रहा है| और अपना होना घटने के लिए, राम का भरोसा चाहिए क्योंकि तुम्हारी बुद्धि तो हमेशा इस बात का विरोध ही करेगी कि अपने विरुद्ध खड़े हो| बुद्धि कहेगी, ‘क्या कर रहे हो, अपने को मिटा रहे हो?’ परम का भरोसा चाहिए इस लड़ाई को लड़ने के लिए| उसी के भरोसे, उसी तक पहुँचने के लिए यह लड़ाई लड़ी जाती है, और उसी तक पहुँचने का नाम शांति है |

इस लड़ाई को लड़े बिना शांति नहीं मिलेगी| कृपा करके इस विचार से मुक्ति पाएं कि आप कहीं कोने- कतरे में छिप सकते हैं और आप शांति पा सकते हैं| नहीं हो पायेगा! पलायन कोई विकल्प है ही नहीं, भगोड़ापन कोई विकल्प है ही नहीं| लड़ना पड़ेगा ! लड़ रहे ही हो, दिख नहीं रहा क्या? नहीं लड़ रहे हो? जूझे तो हुए हो, दिन-रात जूझ रहे हो| खुल के लड़ो, छुपे-छुपे न लड़ो, कि दिन में सौ-सौ बार मर रहे हैं|

आओ! खुले में आओ मैदान में| यह क्या घुटी-घुटी सी लड़ाई है, घुटी-घुटी सी चीख है, दुःखी तो हो ही न? घुटी सी चीख सुनी है? जैसे की कोई मुँह पर तकिया लगा कर रोए, और सुबके कि ‘ऐसा हमारा जीवन है, खुल कर रो भी नहीं पाते’| रोना ही है तो अंतर्नाद करो! चिल्लाओ, खुल कर चिल्लाओ! यह घुट-घुट कर, छिप-छिप कर रोने से तो तुम संसार का साथ दे रहे हो| संसार तुमसे यही कहना चाहता रहा है, ‘तुम सुखी हो, तुम सुखी हो, चलो हम सब इस भ्रम में जियें की हम सुखी हैं’|

और तुम अपने दुःख खूब छिपाते हो| छिपाते हो या नहीं छिपाते? तुम बिल्कुल नहीं बताओगे पड़ोसी को कि ‘जल रहा हूँ, मेरे घर में आग लगी हुई है’| बिल्कुल नहीं बताओगे! दोनों घर जल रहे है, दोनों पड़ोसी जल रहे हैं, पर दोनों एक दूसरे से यही कहेंगे, ‘हाँ, सब ठीक है|

‘गुप्ता जी, सब ठीक?’

‘सब ठीक!’

‘शर्मा जी, सब ठीक’

‘सब ठीक!’

और दोनों सुबक रहे हैं, तकिये में मुँह छिपा कर सुबक रहे हैं| और ये करके दोनों में से किसी का दुःख कम नहीं हो रहा है| हाँ! संसार चल रहा है, धोखा चले जा रहा है, ‘हम ठीक हैं ‘| आओ न बाहर, आओ बजाओ ‘रणभेरी’|

कल मैं द्विज की बात कर रहा था| दूसरा जन्म होगा कहाँ से जब तक तुम पहले से ही चिपके रहोगे? कबीर का सूरमा अपने विरुद्ध लड़ता है, अपने को मिटाता है, तभी तो राम को पाता है| खेल सारा मिटाने का है, और जिसको मिटाना है तुम उसी के पक्ष में खड़े हुए हो| कबीर कहते हैं,

मरने से यह जग डरे मेरो मन आनन्द |

कब मरिहौं कब भेटिहौं पूरण परमानन्द ||

कबीर इंतज़ार कर रहे हैं मिटने का और तुम मिटने से खौफ़ खाते हो| तुम यथास्थिति को कायम रखे हुए हो, किसी भी तरीके से जो चल रहा है बस चलता रहे| कुछ बदल ना जाए| अरे, कुछ नहीं बदलेगा तो तुम्हारे दुःख भी कहाँ से बदलेंगे| तुम्हें समझ में नहीं आता क्या? दिन रात उसी चक्की में पिस रहे हो, बस उम्मीद किये जाते हो कि कोई चमत्कार होगा| कोई चमत्कार नहीं होना है, चमत्कार हो ही रहा है| इससे बड़ा चमत्कार क्या हो सकता है कि गुलाम, गुलाम बने रहना चाहता है| तुम्हें और कौन-सा चमत्कार देखना है?

संसार से बड़ा चमत्कार और कोई नहीं है| जो है नहीं तुम्हें वो दिखाई देता है, जो है तुम्हें वो दिखाई नहीं देता| इससे बड़ा चमत्कार क्या होगा?

मैं फिर कह रहा हूँ- युद्ध और शांति, एक दूसरे के विपरीत नहीं| जो युद्ध से भागेगा, वो शांति से भी भाग रहा है| जो जूझने से डर रहा है, वो राम को कभी न पायेगा |

जहाँ संग्राम नहीं, वहाँ राम नहीं|

आध्यात्मिकता भगोड़ों को पनाह देने के लिए नहीं है, कि संसार से भागे तो आध्यात्मिकता में आ कर छिप गए, कि लड़ना न पड़े| सत्य सूरमा के लिए है, और परम पलायन से नहीं मिलता|

‘न दैन्यं न पलायनं’|

– ‘बोध सत्र’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: https://www.youtube.com/watch?v=DeT_OvoX9XA