सहायता की प्रतीक्षा व्यर्थ है

वक्ता: आनंद का सवाल है, ‘अपने डर को कैसे तोड़ सकता हूँ? जब तक कोई बाहरी सहायता ना मिले, मैं कैसे अपने द्वारा बनाए गए अपने घेरों से, अपनी सीमाओं से बाहर आऊँ?’

जीवन किसी बाहरी सहायता की प्रतीक्षा करने का नाम नहीं| जीवन किसी ख़ास मसीहा का स्वागत करने का नाम नहीं है| कोई मदद नहीं आने वाली बाहर से, सारा इंतज़ार व्यर्थ है| अपनी मदद तुम्हें ख़ुद ही करनी पड़ेगी| ये जो डर है, ये जो सिमाएँ हैं, इन्हें तुम्हें स्वयं ही समझना पड़ेगा| हाँ, जब तुम स्वयं समझने को तैयार हो जाओगे, उस दिन पाओगे कि सारा अस्तित्व सहायता करने को तैयार है| विपरीत मत समझ लेना कि मदद पहले आती है, और फ़िर उस मदद से मुक्ति निकलती है|

जब मुक्ति दिखाई देती है तो चारों तरफ़ से मदद दिखाई देती है| और ये पक्का जानो कि मदद करने के लिए कितने लोग, कितनी स्थितियाँ तैयार बैठी हैं| 95दिक्क़त मदद के अभाव की नहीं है, दिक्क़त ये है कि तुम अभी तैयार नहीं हो| दिक्क़त ये है कि तुम अभी जान नहीं पा रहे कि ये सीमाएँ तुमने ख़ुद बनाईं हैं| अपने डर का कारण तुम ख़ुद हो, अपने आप को बांधने वाले तुम ख़ुद  हो|

जिस दिन सोच लोगे कि उड़ना है, उस दिन पाओगे कि सब कुछ उड़ने में मदद कर रहा है, कोई एक सहायक नहीं है| जीवन में सब कुछ तुम्हारी सहायता करने के लिए उत्सुक है, एक-एक क्षण| क्या तुम तैयार हो?

एक आदमी था, वह एक दरवाज़े पर दस्तक दिए जा रहा था, और दरवाज़ा था कि खुलने का नाम ही नहीं ले रहा था| एक दूसरा व्यक्ति बहुत देर से ये सब देख रहा था| वह उसके पास गया और कहा, ‘दोस्त, ये तुम किसको धोखा दे रहे हो? ये तुम लगातार दस्तक दिए जाते हो, ये तुम किसको छल रहे हो? क्या तुम्हारा इरादा वाकई है बाहर जाने का? तुम वाकई उड़ना चाहते हो? तो उस पहले व्यक्ति ने कहा, ‘हाँ, मैं उड़ना चाहता हूँ, नहीं तो मैं दस्तक क्यों देता| मेरे दस्तक देने से तुम को समझ नहीं आ रहा कि मेरी कितनी इच्छा है उड़ने की?’ यह सुनकर दूसरा आदमी हँसने लगा| उसने कहा, ‘तुम झूठ बोल रहे हो| वास्तव में उड़ना चाहते तो तुम्हें दिख जाता कि दरवाज़ा है ही नहीं’| उसने कहा, ‘देखो! दरवाज़ा खुला हुआ है| तुम दस्तक क्यों दे रहे हो? जिसे दरवाज़े के बाहर जाना होगा उसे दिख जाएगा कि दरवाज़ा खुला हुआ है, और वह उड़ जाएगा| वह प्रतीक्षा नहीं करेगा’|

96सारी प्रतीक्षा इसी बात की है| प्रतीक्षा का अर्थ होता है कि भविष्य में कुछ विशेष हो जाना है| नहीं, जो होना है अभी होना है| भविष्य हमें कुछ नहीं दे सकता, वर्तमान के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं, दूसरे पर निर्भरता व्यर्थ है| अभी मैं तुमसे बोल रहा हूँ, शब्द तो मेरे हैं, पर समझ किसकी है? तुम मुझे सुन रहे हो, शब्द मेरे हैं| पर समझ किसकी है? मैं तुम्हारे काम नहीं आ रहा, ये यकीन जानो, तुम्हारी समझ तुम्हारे काम आ रही है| और अगर तुम्हारी समझ हमेशा जागृत रहे जितनी अभी जागृत है, तो इतना बोलने की ज़रूरत ही नहीं रह जाएगी| मेरा बोलना तो सिर्फ बहाना है, काम तो तुम ख़ुद अपने आ रहे हो| और अगर  अभी निर्णय कर ही लिया कि तुम्हें नहीं समझना है, तो तुम कुछ भी कर लो, कुछ नहीं होने वाला है|

दो बातें निकल कर आ रही हैं| पहली- भविष्य किसी के काम नहीं आता| और दूसरी- कोई दूसरा किसी के काम नहीं आता| तुम्हें अपनी मदद ख़ुद करनी हैं|

(श्रोताओं से पूछते हुए) और कब करनी है? जो भविष्य पर टाल रहा है, वह सिर्फ़ अपने आप को धोखा दे रहा है| जो किसी और की प्रतीक्षा कर रहा है, वह समझ नहीं रहा बात को|

हम सब असमंजस में रहते हैं, बैचन रहते हैं, कुछ है जो कचोटता रहता है, कोई कमी दिखाई देती है| ये इस बात का प्रमाण है कि जीवन जीने के तरीके में कोई भूल है, और अगर भूल है तो उसको ठीक भी तुमको ही करना पड़ेगा| अगर तुममें ठीक करने की योग्यता ना होती तो तुम्हें इस भूल का कोई अहसास भी नहीं होता|

भूल का अहसास तो तुम्हें हर पल हो रहा है| बोरियत अनुभव करते हो ना? बेचैनी अनुभव करते हो ना? मन इधर- उधर भागता है ना? शंका97 रहती है ना? दुविधा रहती है ना? निराशा रहती है ना? ये सब प्रमाण हैं इस बात के कि तुम्हें कुछ और चाहिए| तुम्हें वह नहीं होना था जो तुम अपने आप को जान कर बैठे हो| और अगर तुम्हें इतना दिखाई दे रहा है, तो आगे क्या होगा ये भी तुम्हें ख़ुद ही समझना होगा, कोई और नहीं आएगा तुम्हारी मदद करने के लिए, किसी की प्रतीक्षा मत करना| तुम्हारे पास पूरी- पूरी काबिलियत है ये जान पाने की, कि अब अगला कदम क्या उठाना है|

मदद मिलेगी, ख़ूब मिलेगी, ये मत समझना कि मैं ये कह रहा हूँ कि मदद नहीं मिलेगी लेकिन पहली मदद तुम्हें ख़ुद ही करनी पड़ेगी| और जो अपनी मदद करने को तैयार नहीं है, उसे कोई और मदद नहीं दे सकता| तुम अपनी मदद करो और देखो कि हर दिशा से मदद आती है या नहीं|

-‘संवाद’ सत्र पर आधारित| स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं|

सत्र देखें: सहायता की प्रतीक्षा व्यर्थ है

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लेख १ : तुम्हें स्वयं ही खोजना पड़ेगा

लेख २ : मुक्ति कैसे पाऊँ?

लेख ३ : डर और मदद