सवाल-जवाब नहीं, समाधान

प्रश्न: क्या मेरे हर सवाल का जवाब, ‘मैं हूं’ है?

वक्ता: जिस भाषा में तुमने ये सवाल पूछा है कि क्या मेरे हर सवाल का जवाब, ‘मैं हूं’ है, मैं उत्तर की शुरुआत भी उसी भाषा से करता हूं| तुम सिर्फ सवालों के जवाब ही नहीं हो, सवाल भी तो तुम्हीं हो| जवाब की बात तो तब उठती है ना जब पहले…

श्रोता १: सवाल हो|

वक्ता: जब पहले सवाल हो| सवाल भी तो तुम्हीं ने खड़े किये हैं| सवालों के साथ दो काम किये जा सकते हैं| पहला ये कि उनको जवाब दे दिया जाए| और दूसरा ये कि उनका समाधान हो जाए| जिस ‘मैं’ से सवाल निकलते हैं, उसी ‘मैं’ से जवाब बड़ी आसानी से मिल जाएंगे| इसीलिये जवाबों की कोई कीमत होती नहीं| जहां से सवाल आया, वहीं से जवाब भी आ जाएगा| और कितनी ही बार तुमने सवाल उठाएं हैं और जवाब पा लिये हैं| है न?

आज पहली बार तो नहीं होगा कि सवाल उठ रहा होगा? हज़ार बार हो चुका है ना कि सवाल उठे हैं, और हज़ार बार तुम्हें जवाब भी मिल चुके हैं| और सवाल फिर भी उठते रहते हैं| इसका मतलब समझो| इसका मतलब ये है कि ये जो सवाल पूछने वाला ‘मैं’ है, अगर यही जवाब भी दे रहा है, और बहुदा यहीं से जवाब आते हैं, अगर यही जवाब भी दे रहा है, तो जवाब किसी कीमत का नहीं हो सकता| सवाल-जवाब की प्रक्रिया को समझते हो? हर सवाल में जवाब की अपेक्षा पहले से छिपी होती है| उदाहरण देता हूं, समझना|

तुम एक दुकान में जाते हो| एक सुपर-स्टोर है जहां सब कुछ उपलब्ध है, और तुम वहां जा कर सवाल पूछते हो कि आलू का भाव क्या है| ठीक है? ये एक ‘मैं’ है जिससे ये सवाल निकला है, एक ‘मन’ है जिससे ये सवाल निकला है| निश्चित-सी बात है कि तुमने पहले ही अपेक्षा पाल रखी है कि तुम्हें आलुओं का भाव बता दिया जाएगा| प्रश्न तुमने पूछा कि आलू किस दाम मिल रहे हैं, और इसके उत्तर में अगर तुम्हें मुक्ति का रास्ता बता दिया गया तो क्या तुम्हारा मन स्वीकार करेगा? तुम खड़े हो गये हो और काउंटर पर तुम पूछ रहे हो कि आलू किस भाव मिल रहें हैं, और उसने तुमको बताना शुरू कर दिया कि संसार के महापुरुषों ने आज तक क्या-क्या बोला है मुक्ति के बारे में, और मोक्ष तक कितने मार्ग जाते हैं, तो तुम क्या करोगे? तुम स्वीकार ही नहीं करोगे| तुमको तो एक जवाब चाहिये| क्या? आलुओं का…?

सभी श्रोतागण (एक स्वर में): भाव|

वक्ता: प्रश्न में उत्तर की अपेक्षा पहले से छुपी हुई है और उससे हट कर कोई उत्तर प्रश्न स्वीकार करेगा ही नहीं| मानते हो कि नहीं?

सभी श्रोतागण (एक स्वर में): हाँ, सर|

वक्ता: तो तुम सवाल नहीं पूछते, तुम एक उम्मीद सामने रखते हो और तुम चाहते हो कि वो उम्मीद पूरी हो जाए| इसीलिये जवाब मिलते जाते हैं, मिलते जाते हैं, फिर भी जीवन नहीं बदलता| एक जवाब मिलता है तो चार नये सवाल खड़े होते हैं क्योंकि इन सवालों की कोई कीमत ही नहीं है| तुमने ‘मैं’ की बात की| जिस ‘मैं’ से ये सवाल निकला है, उसी ‘मैं’ ने उत्तर भी तय कर रखा है कि यही उत्तर स्वीकार करुंगा, उससे हट कर कोई उत्तर मुझे स्वीकार ही नहीं है| सवाल हमारे बड़े विचित्र होते हैं ना?

मुल्ला नसरुद्दीन से जज पूछ रहा है कि क्या तुम अभी भी अपनी बीवी की पिटाई करते हो? वो कहे, ‘हाँ’ तो भी फंसा, वो कहे, ‘ना’ तो भी फंसा| अगर वो कहे, ‘हाँ’, तो फंसा की पिटाई करता है| और कहे, ‘ना’, तो भी उसने इतना तो मान ही लिया कि पहले करता था| तो इसीलिये जो साधारण शिक्षक होता है वो जवाब देता है और सोचता है कि उसने बड़ा काम कर लिया| वो ये समझ ही नहीं पाता कि जवाबों से कभी कुछ खास मिल नहीं सकता| एक तरह की उत्सुकता है जो शांत हो सकती है कि आलू का भाव कितना है, पर उससे तुम्हारे चित्त पर कोई अंतर नहीं पड़ा| तुम्हारा जो उलझा हुआ मानस था, तुम्हारा जो व्यथित ‘मैं’ था, वो उलझा हुआ और व्यथित ही रह गया|

प्रश्न की हमेशा एक सीमा होती है और प्रश्न ये चाहता है कि उत्तर उसी सीमा के भीतर मिले| ये बात समझ में आ रही है? जो एक छोटा-मोटा, अनाड़ी शिक्षक होता है, वो प्रश्न को लेता है और प्रश्न की सीमा को स्वीकार करते हुए उसी सीमा के भीतर जवाब को रख देता है| ऐसा जवाब सिर्फ काम चलाऊ है| दूसरी बात तुमसे मैंने की थी, ‘समाधान’ की| वो बात ही कुछ और है| समाधान, ‘मैं’ की सीमओं को नहीं मानता| समाधान कहता है कि तुम मुझे मात्र लक्षण दिखाने आए हो| मैं बीमारी का जड़-मूल से इलाज कर दूंगा| समाधान कहता है कि तुम जो प्रश्न पूछ रहे हो, तुम्हें ठीक-ठीक पता भी नहीं है कि ये प्रश्न मूलतः कहां से आ रहा है| तुम्हें तो बस एक छोटे से उत्तर की अपेक्षा है पर मैं देख पा रहा हूं| पर मैं देख पा रहा हूं कि इस एक प्रश्न का उत्तर तुम्हारे किसी काम नहीं आएगा| तो इसीलिये मुझे प्रश्न की सीमओं को तोड़ना पड़ेगा और बहुत आगे जाना पड़ेगा| इतना आगे जाना पड़ेगा कि तुम्हें जवाब भले ना मिले, पर प्रश्न विलीन हो जाए|

(मौन)

जवाब तो प्रश्न को मान्यता देता है| तुमने जवाब मांगा कि क्या अपने सारे सवालों का जवाब, ‘मैं हूं’ है| जवाब यदि मिल गया तो प्रश्न को वैधता मिल जाती है| समाधान प्रश्न को ही विगलित कर देता है, वो उसे वैधता नहीं देता, वो उसे गला देता है, हटा ही देता है| समझ रहे हो? जवाब समझ लो करीब-करीब ऐसा ही है कि तुम्हारा खून कुछ अशुद्धियां लिये हुए है, जिसके कारण तुम्हारे चहरे पर एक मुहांसा पड़ रहा है और तुम कहो कि मुझे इस मुहांसे का इलाज करना है| उसका इलाज कर भी लोगे तो क्या होगा? वही लक्षण शरीर के किसी और हिस्से में प्रकट हो जाएगा, चहरे पर कहीं और आ जाएगा| तुम इलाज करते जाओगे, सतही और उन इलाजों से तुम्हें तात्कालिक रूप से तो लगेगा कि कुछ फायदा हो गया है, पर कुछ होगा नहीं| एक के बाद एक तुम उसके ऊपर कभी क्रीम लगाओगे, कभी कुछ और करोगे, और हो सकता है एक दिन, दो दिन को लगे कि ठीक हो गया, शांति मिल गई, अब ये गया| पर दो दिन बाद पाओगे कि वो कहीं और निकल रहा है, किसी और रूप में| क्योंकि रक्त की जो अशुद्धि है वो तो अपना रंग दिखाएगी ही ना|

तो जवाब होता है कि सतह-सतह पर, जैसे तुमने कोई क्रीम लगा दी, एक सतही आराम देने की कोशिश| समाधान होता है कि रक्त में अशुद्धि है, तो रक्त का ही शोधन करना पड़ेगा| जो मन रक्त को गन्दा करे बैठे था, वो मन निश्चित रूप से वो है जिसने सतह पर ही जीवन जिया है| ये मन ये नहीं चाहेगा कि इलाज दूर तक जाए| ये मन तो यही कहेगा कि मुझे बस अभी भर के लिये कोई काम चलाऊ हल, कोई तात्कालिक आराम दे दो| ये ‘मैं’, जवाब नहीं है, ये ‘मैं’ तो और गहरी उलझन है| ये ‘मैं’ तो और गहरी उलझन है| यहां से तुम्हें कोई जवाब नहीं मिलेगा| अगर तुम सोच रहे हो कि अपने सारे सवालों का जवाब तुम खुद हो, तो गलत सोच रहे हो|

यदि ‘सोहेल’ सवाल है, तो ‘सोहेल’ ही जवाब नहीं हो सकता| दूसरे शब्दों में पलट कर कहूंगा कि यदि ‘सोहेल’ सवाल है, तो सोहेल को लगेगा यही कि ‘मैं’ ही, जवाब हूं| और यही असली समस्या है कि तुम ही सवाल खड़े करते होऔर तुम ही जवाब लेकर आ जाते हो| और वो जवाब और कुछ नहीं होते वो उसी मन से निकलते हैं जहां से सवाल आया था| इसी कारण उन जवाबों की कोई कीमत नहीं होती| एक शराबी का मन है, वो शराब पीना चाहता है| उसके मन में प्रश्न उठ रहा है कि शराब कहां मिलेगी, और वो खोज कर के पता लगा ले| उसे जवाब मिल जाए कि शराब कहां मिल रही है, तो क्या उसका इससे काया-कल्प हो जाएगा? जिस मन में उत्सुकता उठी थी, प्रश्न उठा था कि शराब कहां मिलेगी, उसी मन ने ये पता भी लगा लिया कि शराब इस जगह पर मिलेगी, क्या ये जवाब उसके किसी काम का है? या ये जवाब उसे और गढ्ढे में गिरा रहा है? जल्दी बताओ|

सभी श्रोता (एक स्वर में): और गढ्ढे में गिरा रहा है|

वक्ता: तो, ‘शराबी’ यदि प्रश्न है तो ‘शराबी’ ही उत्तर नहीं हो सकता| ‘बेहोशी’ यदि प्रश्न है, तो ‘बेहोशी’ ही उत्तर नहीं हो सकती| ‘सोहेल’ यदि प्रश्न है, तो ‘सोहेल’ ही उत्तर नहीं हो सकता| हालांकि सोहेल को लगेगा यही कि ‘मैं’ उत्तर हूं|

श्रोता २: अगर कुछ अच्छी चीजें लें? जैसे की अभी तो शराबी है का उदहारण है…,

वक्ता: जहां कुछ भी अच्छा होगा, वहां प्रश्न उठेगा क्यों? वहां तो सीधे-सीधे कर्म होगा ना| अच्छी तो समझ ही होती है| और समझदारी में सवाल-जवाब नहीं होते| वहां मात्र समझ होती है|

तो फिर प्रश्न ये है कि यदि, ‘मैं’ से उठने वाले सवाल, और ‘मैं’ से ही आने वाले जवाब हमारे विशेष काम के नहीं होते तो फिर इन सवालों का करें क्या? क्या इन सवालों को कोई महत्व ही ना दें? क्या इन सवालों को कभी पूछा ना जाए? तो फिर हम इस संवाद में क्या कर रहें हैं? सवाल पूछने क्यों आए हैं?

सवाल पूछने वाला जो मन है, वो उस जमीन की तरह है जिस पर तमाम तरह के कैक्टस उग रहे हैं| तुम एक-दो कांटेदार पौधे साफ करोगे, यदि वो जमीन वैसी की वैसी ही रही, तो उस पर और कैक्टस उगेंगे| समस्याओं से, प्रश्नों से, वो चित्त लगातार आक्रांत रहेगा ही क्योंकि उसकी मिट्टी ही ऐसी है कि उस पर गन्दगी ही उग सकती है| कैक्टस तो फिर भी बहुत साफ-सुथरा होता है, प्राकृतिक होता है, उदहारण भर के लिये बोल दिया| हमारे चित्त की जो मिट्टी है, उससे तो अक्सर दुर्गन्ध उठती है, और हम सोचते हैं कि उस दुर्गन्ध का, उस गन्दगी का कोई सतही निराकरण हो सकता है| नहीं हो पाएगा| तुम्हें पूरी मिट्टी बदलनी पड़ेगी| मन में जो कुछ भर रखा है उसको ही बदलना पड़ेगा|

ऐसे समझ लो कि किसी कमरे में बरसों की गन्दगी जमा हो| बरसों की, पता नहीं कितने अनगिनत बरसों की और उस कारण उस कमरे में दुर्गन्ध ही दुर्गन्ध छा गई हो| और तुम कहो कि अब इसका उपाय ये है कि मैं थोड़ी खुशबू लेकर, इत्र लेकर, रूम-फ्रेशनर लेकर ज़रा इस कमरे में छिड़क दूं| तो तुम कितने होशियार हो? और तुम कहो कि ये जो गन्दगी है, मैं इसके ऊपर चादर डाले देता हूं तो ये दिखाई नहीं देगी| और जो दुर्गन्ध फैली हुई है, मैं उसके ऊपर खुशबू छिड़के देता हूं तो दुर्गंध पता नहीं चलेगी| तो तुमने क्या होशियारी की? कुछ भी नहीं| और मज़े की बात ये है कि जिस व्यक्ति ने गंदगी उस कमरे में भरने दी थी, वही व्यक्ति खुशबू छिड़कना चाहता है| इन दोनों ही कामों में तुमको क्या दिखाई दे रहा है?

एक व्यक्ति है जो अपने कमरे में गन्दगी जमा होने दे रहा है| ये उसका पहला काम है| और उसका दूसरा काम है कि जब वो गंदगी उसको कष्ट दे रही है, उससे दुर्गन्ध उठ रही है, पीड़ा हो रही है, तो वो कह रहा है कि मैं थोड़ी-सी खुशबू छिड़क दूंगा| इन दोनों ही कामों में उस व्यक्ति का क्या रूप दिखाई दे रहा है तुम्हें? उस व्यक्ति के बारे में क्या पता चल रहा है तुम्हें? कि वो नासमझ है| नासमझी में उसने पहला काम क्या किया?

कुछ श्रोतागण (एक स्वर में): गन्दगी को भर लिया|

वक्ता: पहले तो उसने अपने कमरे में गंदगी इकट्ठा होने दी| और अपनी नासमझी में वो दूसरा काम क्या कर रहा है? कि गंदगी को रहने दो, खुशबू छिड़क लो| उसी ‘मैं’ से ये सवाल निकला, उसी ‘मैं’ से समस्या उत्पन्न हुई, और उसी ‘मैं’ ने एक उत्तर भी खोज लिया कि खुशबू छिड़क लो| हो रही है ना गड़बड़? करना कुछ और पड़ेगा| चित्त की जो मिट्टी है, जहां से समस्याएं उठती हैं, जहां से सवाल उठते हैं, जहां से दुर्गन्ध उठती है, वो मिट्टी ही बदलनी पड़ेगी| वो मिट्टी ही बदलनी पड़ेगी| क्या है वो मिट्टी? चित्त की जो मिट्टी है, वो क्या है? क्या है जिसको हम बदलने की बात कर रहें हैं?

श्रोता २: जो मन में भरा पड़ा है|

वक्ता: मन में क्या भरा पड़ा है?

श्रोता २: हर इंसान की अपनी सोच होती है| वो अपने तरीके से सोचता है| हम लड़कों में तो कोई भी काम होता है, जैसे अपनी दोस्ती है, तो वो दोस्त के बारे में जो सोचता है अपने तरीके से सोचता है| इससे ये पता चलता है कि मेरा दोस्त मेरे बारे में क्या सोचता है| पर वो सब कुछ जो अपने अंदर होता है, हम उसी को इस तरह से सोचते हैं कि ये मेरा दोस्त मेरे बारे में उसी तरह से सोचता है|

वक्ता: तो ये जो सोच है, जिसको हम कहते हैं कि ये ‘मेरी सोच’ है, और ये ‘मेरे’ तरीके हैं जीने के, यही मन में इकट्ठा हुई गन्दगी है| ये जो हमारी धारणाएँ है, वहीं से सवाल उठते हैं| वरना सवाल कुछ उठ ही नहीं सकता| जानते हो सवाल क्या होता है? सवाल क्या है? जब मन सत्य से टकराता है, जब कल्पनाओं में और तथ्यों में, जब तथ्यों और सत्य में घर्षण होता है, तो उसी घर्षण का नाम है, ‘सवाल’| अन्यथा सवाल क्यों उठेगा?

नदी बहती रहती है, सवाल थोड़े ही पूछती है| फूल खिलता रहता है, सवाल थोड़े ही पूछता है| आदमी का मन ही है जिसमें सवाल और समस्याएं भरी रहती हैं| सवाल कहां से आता है? सवाल यहां से आता है कि मैंने कुछ सोच रखा था, पर मैं वैसा होता पाता नहीं| तो फिर मैं सवाल करता हूं कि सच क्या है| अरे! जो सामने है वो सच है| पर क्योंकि तुम उसको स्वीकारना नहीं चाहते, तो इसीलिये तुम ये प्रश्न उठाते हो कि देखिये सोच तो मेरी गलत हो नहीं सकती, जो मुझे धारणाएँ दे दी गई हैं वो तो गलत हो ही नहीं सकतीं, पर उन धारणाओं का कोई मेल भी नहीं दिखता तथ्यों के साथ| कोई संगति ही नहीं दिखती| तब फिर सवाल खड़े होते हैं|

मैं तुम्हारे सामने आता हूं, तुम मुझसे सवाल पूछते हो, ‘जीवन क्या है?’| किसी पक्षी ने, किसी जानवर ने आज तक ये सवाल नहीं पूछा| और ऐसा नहीं है कि वो बड़े दुःख में हैं इसलिए वो ये सवाल नहीं पूछ पाया| वो ये सवाल नहीं पूछेगा क्योंकि वो पूरी तरह जी रहा है| वो वही है जो उसे होना है| तो उसको ये प्रश्न ही नहीं उठता कि जीवन क्या है| हमें ये प्रश्न उठता है क्योंकि हम जी नहीं रहे हैं, हम कल्पना कर रहे हैं कि हम जी रहे हैं| तो फिर हमें पूछना पड़ता है कि जीवन क्या है| प्रश्न उठता ही हमारी सोच से है| सोच ना हो, तो प्रश्न ही ना हो| और सोचने से मेरा तात्पर्य विचारणा की शक्ति नहीं है| मैं मेधा की, बुद्धि की बात नहीं कर रहा हूं| मैं धारणाओं की बात कर रहा हूं, मान्यताओं की बात कर रहा हूं| मैं उस सारे कचरे की, अंधविश्वासों की बात कर रहा हूं जो हमने मन में भर रखे हैं|

तुमने मान ही रखा है कि जीवन ऐसे जीना चाहिये और जीवन वैसे जीना चाहिये| पर जब तुम जीवन वैसे जीना चाहते हो, तो तुम पाते हो कि तुम्हें कष्ट ही कष्ट मिल रहा है| फिर तुम सवाल उठाते हो कि मुझे कष्ट क्यों मिल रहा है| बात तो सीधी है| तुम्हें कष्ट इसलिए मिल रहा है क्योंकि तुम्हारे तरीके कष्टपूर्ण हैं, अन्यथा अस्तित्व ने कुछ ठान नहीं रखा है कि तुम्हें कष्ट देना है|

अपनी धारणाओं को ध्यान से देखो| सारे प्रश्न वहीं से उठते हैं, और सारे जवाब भी वहीं से उठ आते हैं| ये सवाल- जवाब का खेल कब तक खेलते रहोगे? इसको साफ करो, ये पूरा खेल ही साफ करो| जब ना सवाल रहता है, ना जवाब बचता है, तो उसी का नाम होता है, ‘समाधान’| समाधान समझ रहे हो? समाधान का अर्थ ये नहीं होता कि मन चाहा उत्तर मिल गया| सवाल का अर्थ ये होता है कि प्रश्न ही नहीं बचा| प्रश्न को उत्तर मिल गया, इस बात का नाम नहीं है ‘समाधान’| अब प्रश्न ही शेष नहीं रहा, इसका नाम है, ‘समाधान’| अरे, मन में अब सवाल उठते ही नहीं, तब समझना कि समाधान हुआ| कब हुआ समाधान? जब…

सभी श्रोतागण (एक स्वर में): सवाल उठते ही नहीं|

वक्ता: अब सवाल उठते ही नहीं| क्योंकि सवाल उठते ही, बटी हुई, सीमित सोच से हैं| सवाल उठते ही अहंकार से हैं| सवाल उठते ही मन की दुर्गन्धयुक्त मिट्टी से हैं| हमने वो मिट्टी ही साफ़ कर दी, अब तो हम जी रहे हैं| जीना है, या सवाल जवाब करने हैं? फूल खिलता है, खिलने से पहले सौ बार सवाल-जवाब नहीं करता| ‘बारिश तो नहीं हो जाएगी? धूप पूरी मिलेगी या नहीं? हवाएं किस दिशा में बह रहीं हैं?’ वो बस खिलता है| वो सोचता नहीं है इतना| हम ही हैं जिन्हें बार-बार सोचना पड़ता है| और सोच तुम्हें सवालों के अतिरिक्त और कुछ नहीं देगी|

ना बड़ा सवाल होता है, ना छोटा सवाल होता है| हम सब यहां बैठे हुए हैं, कुछ लोग इस संशय में होंगे कि हमने इतने बड़े-बड़े सवाल लिख दिये हैं, उन्हें सबके सामने पूछे या ना पूछें| कुछ सोच रहें होंगे कि मेरा सवाल तो बड़ा साधारण है, ये पूछने लायक है या नहीं है|

ना छोटा सवाल, ना बड़ा सवाल| एक समस्या-मुक्त मन| एक प्रश्न-मुक्त चित्त|

गलत मत समझ लेना| मैं ये नहीं कह रहा हूं कि यदि सवाल हैं तो उनको दबा दो| हमने बात की थी उस आदमी की जो कचरे पर चादर डाल देता है| तो सवालों को दबाना वैसा ही हो जाएगा कि कचरे पर चादर ही डाल दी| मैं कचरे पर चादर डालने की बात नहीं कर रहा हूं| मैं कह रहा हूं कि प्रश्नों को कुछ खास मत समझ लेना, और जवाबों के पीछे मत भागते रहना| और सवाल-जवाब के इस खेल को बड़ी गंभीरता से मत ले लेना| जब तक सवाल उठ रहें हैं, तब तक चित्त अशांत ही है|

तुम वहां पहुँचो जहां मन ऐसा निर्मल हो जाए कि वो बस खुल कर जिये| जीने में उसको कोई अवरोध ना दिखाई दे| कोई सवाल उठे ही नहीं|

ठीक है?

सभी श्रोतागण(एक स्वर में): जी, सर|

-‘संवाद’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

संवाद देखें: https://www.youtube.com/watch?v=aVr2N_QhweQ