पहला याद रखो,आखिरी स्वयं होगा

श्रोता १: यहाँ पर एक पंक्ति है: गावै तो ताणु होवै किसै ताणु | इसका अनुवाद लिखा था, ‘कोई उसकी शक्ति का गुणगान करे- ये शक्ति किसके पास है?’

वक्ता: वो ठीक है, अनुवाद में कोई गलती नहीं है| नानक कह रहे हैं कि जिसको मिलता है वो गाता है| वो सबको दे रहा है| लेकिन तुम्हारा गाना भी, तुम्हारी समस्त अभिव्यक्तियां भी कभी उसे पूर्णता से व्यक्त नहीं कर पाएंगी|

कोई उसकी ताकत के बारे में गाएगा – कल तुम गा रहे थे ना, ‘ओ सबसे बड़ी ताकत वाले, तू चाहे तो हर आफत टाले’?

कोई गाएगा कि उसने हमें कितना दिया है!

श्रोता १: कोई उसके उपहार के बारे में गाएगा…

वक्ता: हां- ‘गावै को दाति जाणै नीसाणु‘|

कोई गाएगा कि उसमें कितने गुण हैं, महानता है, ऐश्वर्य है, सुन्दरता है| कोई गाएगा कि समस्त बोध उसी से आ रहा है| कोई गाएगा कि वो रचयिता है- वही बनाता है, वही मिटाता है| कोई गाएगा कि जीव की समाप्ति के बाद वही है जो जीवन का पुनरारंभ करता है| कोई गाएगा कि वो कितनी दूर नज़र आता है| कोई गाएगा कि वो बिल्कुल पास है|

सभी ठीक ही गा रहे हैं| पर किसी ने भी पूर्ण को नहीं गा दिया| जो कह रहा है कि वो बहुत दूर है, वो बिल्कुल ठीक गा रहा है| जो कह रहा है कि वो करीब से करीब है, वो भी बिल्कुल ठीक गा रहा है| कल ईशावास्योपनिषद् हमसे क्या कह रहा था? वो भीतर भी है और बाहर भी है| कोई गा रहा है कि वो भीतर है| वो भीतर है| कोई गा रहा है कि वो हृदय की गुफ़ा में निवास करता है| और कोई गा रहा है कि वो चाँद-तारों में है| कोई गा रहा है कि वो बड़ा द्रुतगामी है, कितनी तेज़ चलता है| उपनिषद् ने हमसे ये भी कहा था कि मन की गति से ज़्यादा तेज़ उसकी गति है| और कोई गा रहा है कि वो चलता ही नहीं| वो स्थिर खड़ा है, अकंपित| दोनों ही ठीक गा रहे हैं| कौन उसकी महिमा का पूर्ण-वर्णन कर सकता है? कोई नहीं| नानक आगे आकर हमसे कहेंगे कि मात्र वही है जो अपने आप को जान सकता है| अभी कहा था ना मैंने? आपे…

सभी श्रोतागण(एक स्वर में):आपे जाणै आपु ||

तो पूरा-पूरा उसे तुम तो जान नहीं सकते, पर तुम गाओ| तुम तब भी गाओ| तुम्हारा गाना हमेशा आंशिक होगा, लेकिन गाओ| समझ रहे हो बात को? गाते, गाते, गाते, गाते, तुम वहां पहुँच जाओगे, जहां मौन हो जाओगे| और फिर वहां कुछ आंशिक नहीं रहता| गीत के बोल तो सदा आंशिक ही होंगे| शब्द हैं, शब्दों की सीमाएं होती हैं| मौन की कोई सीमा नहीं होती| उसके गीत गाओगे तो मौन को पा जाओगे| गीत भले अधूरा होगा, पर मौन पूरा होगा| बाहर गीत होगा, जो अधूरा-अधूरा सा होगा| और भीतर?

सभी श्रोतागण(एक स्वर में): मौन|

वक्ता: मौन होगा| नितांत पूरा! और दोनों एक साथ होंगे|

श्रोता २: इसकी तीसरी पंक्ति?

वक्ता: देदा दे लैदे थकि पाहि |

दिये जा रहा है, दिये जा रहा है, दिये जा रहा है| जितना बड़ा तुम्हारा कटोरा नहीं है, उससे ज्यादा वो उसमें उड़ेले जा रहा है, उड़ेले जा रहा है| तुम्हारे कटोरे तो हमेशा सीमित होंगे| तुम अपना आँचल कितना फैला सकते हो? इतना| और देने वाले के पास अक्षय भंडार है| तुम थक जाते हो लेते लेते, उसका देना नहीं बंद होता|

(मौन)

वक्ता: तुम पात्र हो, पात्र| पात्र माने? कटोरा, बर्तन| तुम पात्र हो| पात्रता तुम्हारी है| और हर पात्र अपनी सीमा के साथ होगा| जैसे बारिश बरस रही हो, और कटोरे में इतना-सा आ रहा हो| और जो बाकी आ रहा हो, वो छलका जा रहा हो| तो वो तो बारिश है| लूटो जितना ले सकते हो, पियो| कल कबीर कह रहे थे ना…

मदवा पी गई बिन तोलै…

नापने की ज़रुरत ही नहीं है| असंख्य को, असीमित को नापा नहीं जाता| वहां नापने-तोलने का कोई मतलब ही नहीं है| जितना चाहिये, उठाओ| ले जाओ, लेते जाओ|

श्रोता १: एक बात ध्यान में आई थी कि हमें दूसरों के हक़ का नहीं लेना चाहिये| तो ये तो..

वक्ता: तुमको जितना अपने कटोरे में मिल रहा है, लो| ये परवाह मत करो कि कल के लिये रखूं, परसों के लिये रखूं| ठीक वही बात तो कही जा रही है कि बारिश लगातार है| और तुम्हारा कटोरा? इतना-सा| तो लूटो| फ़िक्र क्या करनी है? लूटने से क्या अर्थ है? कि इधर-उधर जाना पड़ेगा बारिश इकट्ठा करने? कटोरा जहां है वहीं बैठा रहे, कुछ ना करे, तो भी कैसा रहेगा?

सभी श्रोतागण(एक स्वर में): भरा हुआ|

वक्ता: सदा भरा हुआ| तुम्हें मिलता रहेगा| पर यहां ऐसे भी कटोरे हैं, जो खुद खाली हैं और जाकर दूसरों से भी लड़-लड़ के उन्हें औंधा कर देते हैं कि इसमें भी भरने ना पाए| कटोरे को मिले, उसके लिये एक शर्त तो है ही ना| क्या?

सभी श्रोतागण (एक स्वर में): उसका मुंह खुला रहे|

वक्ता: उसका मुंह ऊपर की ओर खुला रहे, प्रार्थना में| कि जैसे सीप जब खुली होती है तो उसमें बूंद पड़ती है, और कहते हैं कि वह मोती बन जाती है| पर उसके लिये एक अनिवार्यता होती है| क्या?

सभी श्रोतागण (एक स्वर में): सीप का मुंह खुला हो|

वक्ता: सीप का मुंह आसमान की ओर हो| पर यहां कटोरों के पास अहंकार है| तो जिनका मुंह खुला भी होता है, वो उन्हें जा कर औंधा कर देते हैं, पलट देते हैं| ना उनके पास खुद कुछ है, ना वो औरों को कुछ लेने देंगे| या कि जा कर एक कटोरा चढ़ कर बैठ गया है, दूसरे के ऊपर|

मस्त रहो, मग्न रहो, पाते रहो, गाते रहो| और छक के पियो|

श्रोता ३: गाने की भी क्या ज़रुरत है?

वक्ता: ज़रुरत कुछ नहीं है| पर अगर पाने से गाना स्वयं उठता हो, तो? ज़रुरत तो अपूर्णता में होती है| कोई कमी है, कमी का नाम होता है, ज़रुरत| और अगर गाना ज़रुरत से ना उठता हो, तो? पर सवाल जायज़ है तुम्हारा क्योंकि तुमने आज तक जो भी किया है वो ज़रुरत की खातिर ही किया है| कुछ भी कर्म हम करते क्यों हैं? क्योंकि कोई कमी लगती है, ज़रुरत है, कष्ट है, दुःख है, बेचैनी है, तो कुछ करते हैं| गाया ज़रुरत-वश नहीं जाता| गाया मज़े में जाता है, आनन्दवश|

श्रोता ४: ये पंक्ति समझाइये:अम्रित वेला सचु नाउ वाडियाई वीचारु |

वक्ता: क्या लिखा है? यही तो लिखा है कि सुबह-सुबह नाम गाओ उसका| अमृतवेला माने ब्रह्म-मुहूर्त| सुबह-सुबह उसका नाम गाओ| मतलब क्या है इस बात का? कुछ भी और करो, उससे पहले उसका नाम आए| वो पहला है, वो प्रथम है, वो अव्वल है| बाकी अपनी गतिविधियों में घुस जाओ, उससे पहले उसका नाम लो| क्या पता वो गतिविधियाँ ही बदल जाएं| उसका नाम लेना कोई नियम नहीं है कि सुबह उठते ही उसका नाम ले रहे हो| ये किसी रिवाज़ का हिस्सा नहीं है| इसका अर्थ ये है कि उसका नाम लिया| अब उसका नाम लेने से दिन-भर जो होगा, सो होगा| ये नहीं है कि दिन-भर जो करना है उसकी योजना तो तैयार है, और उस योजना का एक हिस्सा है कि सुबह-सुबह उसका नाम भी लेना है| पहले वो आ जाए|

पहले वो आ जाए| उसके बाद जो होना है, सो हो| और यदि पहले वो आ गया, तो बाद में जो होना होगा, अच्छा ही होगा| शुभ ही होगा| इसी को कृष्णमूर्ति कहते हैं, ‘पहला कदम ही…’

सभी श्रोतागण (एक स्वर में): आखिरी कदम है|

वक्ता: आखिरी कदम है| पहला ठीक रखो, अव्वल, प्रथम, केंद्र| आगे सब अपने आप ठीक हो जाएगा| उसको ठीक रखो और आगे की चिंता छोड़ो| उसकी चिंता छोड़ो| बात आ रही है समझ में? इसको कबीर क्या कहते हैं?

एक साधे, सब सधे |

एक को साधो, बाकी सब सध जाएगा| इसको नानक कह रहें हैं कि सुबह, अमृतवेला में, सबसे पहले उठ कर उसका नाम लो|
उसकी वडियाई को विचारो, पहला काम ये करो| वो बात जितनी आचरण की है, उतनी ही अंतस की भी है| ये तो होना ही चाहिये कि प्रातः काल उठ कर उसका नाम लो| पर वो नाम, मात्र मौखिक नहीं हो सकता कि बस मुंह से बोल दिया| नाम लेने का अर्थ है कि सबसे पहले उसमें स्थापित हो जाओ| ये तुम्हारा पहला दायित्व है, पहला कदम है| उसके बाद अपने आप सब ठीक होगा| अपने आप तुम्हारे जीवन में एक सुन्दर व्यवस्था रहेगी| सब शुभ रहेगा|

श्रोता ७: सर, ये बात ये भी संकेत कराती है कि हम कुछ भी करें, उन सब में वो सबसे पहला होना चाहिये|

वक्ता: हाँ, हमेशा प्रथम, हमेशा केन्द्रीय, हमेशा सबसे ज़्यादा ज़रुरी|

(मौन)

जो अमृतवेला होती है, वो एक बहुत अच्छा मौका होती है याद करने के लिये| क्यों? वो, वो बिंदु होता है जहां पर द्वैत के दो सिरे मिल रहे होते हैं| कल किसी ने कहा था और बिल्कुल ठीक कहा था कि दिन कभी रात को नहीं जानता| और रात कभी दिन को नहीं जानती| किसने कहा था?

श्रोता ८: सर, उपनिषद् में लिखा था|

वक्ता: है ना? दिन कभी रात को नहीं जानता, रात कभी दिन को नहीं जानती| पर एक बिंदु होता है जहां रात और दिन, गले मिलते हैं| वो ब्रह्म-मुहूर्त होता है| वो, वो बिंदु होता है, जहां पर द्वैत के दो सिरे एक क्षण के लिये करीब आ जाते हैं| याद रखना, रात में ऐसा कुछ नहीं होता जो ये सूचना दे कि दिन आने को है| रात, रात होती है| तुम रात को देखो, कहीं से तुम्हें दिन नहीं दिखाई देगा| और अभी दिन है, दिन में कहीं रात की झलक नहीं है| अप्रत्याशित घटना घट जाती है, जादू हो जाता है| रात की कोख से, दिन निकल आया! ये कैसे हो गया? यही ब्रह्म का काम है| यही जादू है| समझ रहे हो? अकारण कुछ हो गया ना? कोई कारण है कि अँधेरे में से उजाला निकल पड़े? अकारण कुछ हो गया| इस कारण वो ब्रह्म-वेला बड़ी महत्वपूर्ण मानी गयी है|

और दूसरे कारण तो हैं ही कि सो कर उठते हो, मन ताजा रहता है, थकान कम रहती है| वो सब लेकिन बाद की बातें हैं|

ये जो परंपरा रही है कि सुबह और साँझ पूजा की जाए, उसके पीछे समझ यही रही है कि ये दोनों संधि-काल होते हैं| जब दो विपरीत ध्रुव मिलते से होते हैं| आ रही है बात समझ में? इसका ये नहीं अर्थ है कि सुबह नाम लेकर किस्सा ख़त्म करो| कि ‘नानक ने कहा था कि अमृतवेला में नाम लेना, तो ले लिया अमृतवेला में नाम| अब दिन भर हमें जो करना है सो कर रहें हैं|’ इसका ये अर्थ ना कर लेना| हर वेला, अमृतवेला है| लगातार नाम लेना है|

श्रोता ९: स्मरण|

वक्ता: निरंतर स्मरण|

– ‘बोध-शिविर सत्र’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सत्र देखें: https://www.youtube.com/watch?v=Rop6lo2srGA