उक्तियाँ, बोध सत्र से, ७ दिसंबर ‘१४

DSC00012 - Copyउक्तियाँ, बोध सत्र से, ७ दिसंबर ‘१४

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१. हरिजन तो हारा भला, जीतन दे संसार । 

हारा तो हरि से मिले, जीता जम के द्वार ।। 

प्रश्न: हरिजन की हारने में भी भलाई कैसे है? ‘जीता जम के द्वार’ इससे क्या तात्पर्य है?

संक्षिप्त उत्तर:

~ जीतने का भाव इस बात की पुष्टि है कि हारने का डर है। जो जीतने की कोशिश में लगा हुआ है वह जीवन नष्ट कर रहा है क्योंकि समय तुमसे तुम्हारी हर जीत छीन लेता है। कभी कोई जीत आखिरी हुई है?

~ जीत तभी जब हारने की सम्भावना मिट जाए। और वो आखिरी जीत होगी क्योंकि तब जीतना ही महत्वहीन हो जायेगा।

~ अगर जीवन में कुछ ऐसा नहीं है जो असीम है तो हार निश्चित है।

~ जो मन को मारे वो वास्तविक धन है और जो मन की असुरक्षा से निकला हो वो नकली धन है।

~ अगर तुम्हारे पास वो धन नहीं है जो संसार से आगे जाये तो तुम महागरीब हो।

~ जो क्षुद्र को माँगता है उसे क्षुद्र भी नहीं मिलता। पर जो असीम को माँगता है, उसे असीम प्राप्त हो जाता है।

~ हरिजन का हारना हार नहीं, हार का अतिक्रमण है। जीत-हार के चक्र से मुक्त हो जाना है। वही कबीर का ‘हारा’ है।

कबीर का हारा वो नहीं जो जीत नहीं पाया, कबीर का हारा वो है जो जीत से आगे निकल गया।

~ जिस दिन आपको यह अहसास हो जाता है कि आप बहुत सीमित हैं, गरीब हैं, उस दिन सम्भावना बनती है उसे पाने की जो असीमित है, सबसे अमीर है।

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२ . हद चले सो मानवा, बेहद चले सो साध । 

हद-बेहद दोनों तजे, ताका मता अगाध ।।  

प्रश्न: इस दोहे में ‘हद’ और ‘बेहद’ दोनों को त्यागने से क्या आशय है? कृपया स्पष्ट करें। 

उक्तियाँ:

~ संसार का अर्थ ही है सीमा। सीमित होने का भाव और असीमित होने की चेष्टा, इसी का नाम संसार है।

~ सीमाओं को मान्यता देने के दो ही तरीके हैं। एक सीमा के अंदर रहना और दूसरा सीमा के बाहर जाना। संसार इन्हीं दोनों चेष्टाओं का नाम है।

~ सीमा के अंदर रहने वाला गृहस्थ है और सीमा के पार जाने वाला साधु। दोनों अपने-अपने कारागृह में कैद हैं। एक सीमा के बाहर नहीं जा सकता तो दूसरा अंदर नहीं आ सकता। हम सभी के अंदर यही दो व्यक्ति जी रहे हैं। किसी तीसरे की हमें ख़बर ही नहीं है। उस तीसरे के चित्त में सीमाओं का कोई महत्व ही नहीं है। वही ‘हरिजन’ है।

~ संसार का अर्थ ही है खुले आकाश में लकीर खींचना। जो जितनी लकीरें खींचता है, वो संसार को उतनी ही मान्यता देता है।

~ अपने अनन्त स्वभाव से दूर जाना ही हरि से दूरी है। सीमा खींची नहीं कि हरि से दूरी हो गयी। इसीलिए हरि तक पहुँचने के लिए सीमाओं का उल्लंघन नहीं करना है, अपितु सीमाओं को मिटाना है।

~ अनंतता आपका स्वभाव है इसीलिए सीमाओं में रहना अटपटा लगता है।

~ मन का भटकाव शुरू हुआ है सीमित को मान्यता देने की शुरुआत से। इसीलिए मन की वापसी भी वहीं से होगी।

~ जो सीमित को मान्यता देता है वो सीमित को भी पूरी तरह से नहीं पाता है। जो अनंत को मानता देता है उसे तत्क्षण अनंत उपलब्ध हो जाता है ।

~ सीमित है ही सीमित। उससे कैसे पूरा मिल सकता है। पूर्ण से ही पूर्ण मिल सकता है।

~ सीमाओं में रहना समझौता है। तुम समझौता करके शांत नहीं रह पाओगे क्योंकि सीमाओं में रहना तुम्हारा स्वभाव नहीं है।

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३. सर, आप इतनी बार बता चुके हैं कि क्या सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। लकिन फिर भी जब उसके अलावा कुछ आकर्षक लगता है तब उसकी तरफ़ खिंचा चला जाता हूँ। ऐसा क्यों होता है?

उक्तियाँ:

~ तुम समय को तोड़ पाए या नहीं यह इस बात पर निर्भर करेगा कि समय में क्या किया।

~ जब परहेज़ में श्रद्धा नहीं तो दवाई में श्रद्धा कैसे हो सकती है?

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6. परम की याद भी परम ही दिलाता है। फिर ऐसा क्यों है कि यह पुकार कुछ ही को आती है? जीवन में जो भी घट रहा है वह उसी के हाथ में है, वह खुद ही अपने पास बुलाता है। परन्तु यह सबके साथ क्यों नहीं होता? यदि मैं अभी यहाँ हूँ, तो क्यों हूँ?

उक्तियाँ:

~ आप ही आप को बुलाता है। उसके अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं, तो किसे बुलाया जाए?

~ जो विस्तृत है, वही तो धोखा है। जो अलग-अलग है, वही भ्रम है।

~ जब तक खुद को उससे अलग और उससे दूर जानोगे, उससे अलगाव बना रहेगा।

~ जो तुममें विराट और महान है, वो तुम्हारा हिस्सा नहीं, तुम्हारी बुनियाद है।

~ परमात्मा तुम्हारे भीतर नहीं, तुम परमात्मा के भीतर हो।

~ तुम जो हो, तुम्हें उसी की तो याद आयेगी।

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7. आप ही का कथन है कि दौड़ उसने जीती जो दौड़ा ही नहीं। और मैंने एक उपनिषद में भी कहीं पढ़ा था कि जो दौड़ा नहीं वो जीत गया। लकिन जब मैनें ओशो को पढ़ा तो वो एक जगह कह रहे थे कि पथ उसी का चल रहा है जो धीर गति से आगे बढ़ रहा है, अपने लक्ष्य पर आँखें जमाए। कृपया इन दोनों कथनों के विरोधाभास को स्पष्ट कीजिये।

उक्तियाँ:

~ हम सोचते हैं कि हम हैं, पथ है और लक्ष्य है। तो लक्ष्य हम से आगे ही होगा।

~ जो ऊँचे से ऊँचा लक्ष्य है वो तुम्हारे भीतर है और उसे पाया ही जा चुका है। मन तब धीर है, शांत है।

~ भीतर परमात्मा बैठा हुआ है, और बाहर उसके अवतार ही अवतार हैं। भीतर सत्य बैठा हुआ है और बाहर उसकी गूंज ही गूंज है।

~ हर लक्ष्य उस आख़िरी लक्ष्य को पाने की चाह है। और वो आख़िरी लक्ष्य है मन का साफ़ होना।

~ जीवन जीने की कला ही यह है कि उस आखिरी लक्ष्य की प्राप्ति सर्वप्रथम हो। उसको पाओ फ़िर क़दम बढ़ाओ।

~ क़दम बढ़ाने के दो तरीके:

उचित: उसको पाकर, पूर्णता के भाव से क़दम बढ़ाना।

अनुचित: उसको भुलाकर, अपूर्णता के भाव से कदम बढ़ाना।

~ जो कुछ भी कीमती है वो बेशर्त होता है, मुफ़्त होता है।

~ बाहर-बाहर प्रकृतिस्थ, अंदर-अंदर समाधिस्थ।

~ जब भीतर शून्यता होती है, तब बाहर तथाता होता है ।

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Clarity Sessions are held on every Sunday at 9:00 a.m. and every Wednesday at 6:30 p.m.

All are welcome to attend. Venue: G-39, Sec-63, Noida. Contact: 08860547544