उक्तियाँ, बोध सत्र से, दिनांक २६ नवंबर '१४

उक्तियाँ, बोध सत्र से, दिनांक २६ नवंबर ‘१४a

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1. आपदः संपदः काले दैवादेवेति निश्चयी।

तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वान्छति न शोचति॥

                                       –अष्टावक्र गीता (११.३) 

अनुवाद: जो यह समझ गया कि सुख और दुःख, आपदा और संपदा, कर्मफल के कारण, समय में अपना असर दिखाते हैं,  वो निश्चय ही तृप्त रहता है। उसकी इन्द्रियाँ स्वस्थ रहती हैं। उसके लिए न कामना हैं, न शोक।

प्रश्न: ऐसा कैसे हो सकता है कि मुझे न सुख छुए, न दुःख छुए?

संक्षिप्त उत्तर:

~हम दो हैं। दूसरा, पहले की लीला है। दोनों वस्तुतः एक ही हैं।
पहला जिसमें गहराई है। वो समय में नहीं है। वो बिंदु समान है।
दूसरा जो समय में जीता है। जिसके इंद्रियगत अनुभूति है।

~जो समय ने दिया है उस पर समय का प्रभाव होगा ही।
शरीर समय है। शरीर चाह कर भी समय के पार नहीं जा सकता। और मन भी समय-संसार ने दिया है।

~ जहाँ समय है, वहाँ कर्मफल है। शरीर और मन,  दोनों पर कर्मफल का असर होता है। शरीर पर स्थूल रूप से दिखाई देता है और मन पर सूक्ष्म रूप से। इसमें कोई अपवाद संभव नहीं है। अतः शरीर और मन दोनों को कर्मफल भुगतना ही होगा।

~ न सुख न दुःख, न आपदा न संपदा, का अर्थ है, इन दोनों से गुज़र जाना। इनका विरोध नहीं करना।

~ योगी कौन है? योगी वो है जो दुःख से पूरा गुज़रे, सुख से पूरा गुज़रे और दोनों से अछूता रह जाए।

~ योगी पुराना काट कर नया नहीं पैदा करता है। न विरोध करता है, न लिप्त हो जाता है।

~ योगी में असाधारणता नहीं बस अविरोध है।

~ योगी ही पूरे तरीके से अनुभव कर पाता है क्योंकि उसकी इन्द्रियाँ स्वस्थ होती हैं, पूरा-पूरा काम करती हैं।

~ ऐसी इन्द्रियाँ जो संसार को पूरा-पूरा अनुभव कर पाती हैं, स्वस्थ इन्द्रियाँ कहलाती हैं। ऐसी आँखें निराकार को देखती हैं, ऐसे कान अनहद को सुनते हैं।

~ न सुख का विरोध है, न दुःख का विरोध है। न सुख और माँगना, न दुःख कम करने की मांग करना।

~ आध्यात्म में निषेध नहीं है। उसमें महा-स्वीकार है।

~ न मिले तो नहीं मांगेंगे। मिल जाए तो स्वीकार कर लेंगे।

~ उपरोक्त दो मनोदशाओं के अतिरिक्त एक और है- वो अहंकार है। उसे न मिले, तो वो अर्जित करने की कोशिश करता है और मिले तो पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पता है। और की चाह रह जाती है।

~ जहाँ पूरा गुज़र गए वहाँ जो शेष बचता है वो तुम हो। जहाँ पूरा न गुज़रे, जो ठहर जाता है वो तुम्हारा क्लेश होता है।

~ कर्मफल उसी के लिए है जो इससे भागना चाहता है। तुम इसका विरोध न करो तो तुम कर्मफल, प्रारब्ध से मुक्त हो जाओगे।

~ विरोध करना छोड़ो। अपने अंदर से उठते हुए विरोध का भी विरोध करना छोड़ो।

~ ज़ेन में पोले बांस जैसा होने की बात कही जाती है। अप्रतिरोध, समर्पण से संगीत पैदा होता है। वही कृष्ण की मुरली भी है।

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प्रश्न 4: अद्वैत के अलावा जहाँ कहीं भी रहती हूँ वहाँ पूरी तरह से खो जाती हूँ। यहाँ से जितनी दूर जाती हूँ उतना वापस आना मुश्किल हो जाता है। कैसे अप्रभावित रहूँ?

उक्तियाँ:

~ सही समय पर पूछा गया सवाल ही समाधान बन जाता है।

~ संत वो जिसके लिए मौका उठा तो बोध उठा, मौका गया तो मन शांत।

~ ज्ञान ऐसा हो की जिसकी जब ज़रूरत न हो तो याद भी न आये। और जब ज़रूरत हो तो स्वतः उठ खड़ा हो जाये।

5. पारस में, अरु संत में बड़ो अन्तरो जान

वो लोहा कंचन करे, ये कर दे आप समान

                                                 कबीर 

प्रश्न: अज्ञात में कदम उठाने से भय क्यों लगता है ?

उक्तियाँ:

~ जिस अधूरे मन से कदम उठाते हैं समर्पण के लिए, उसी अधूरे मन से भय उठता है।

~ जितनी बार उचित कदम उठाओगे, आगे का रास्ता उतना ही आसान हो जायेगा।

~ जितना करीब जाओगे, करीब जाना उतना ही आसान होता जायेगा।

~ अभी अपना कदम सही उठाओगे, तो अगला कदम खुद ही सही हो जायेगा।

~ जहाँ हो वहाँ ईमानदार रहो और वहीँ से आगे बढ़ो।

~ हर कदम तुम्हें बदल देता है। अगले कदम पर तुम तुम नहीं रहोगे। इसीलिए आगे के क़दमों की कल्पना या चिंता करना व्यर्थ है। तुम बस अभी जहाँ हो वहाँ से उठते एक कदम की सुध लो।

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