उक्तियाँ बोध सत्र से, २३ नवंबर '१४

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उक्तियाँ बोध सत्र से, रविवार, २३ नवंबर ‘१४

विषय: कबीर, अष्टावक्र

शुद्धमद्वयमात्मानं भावयन्ति कुबुद्धयः|

न तु जानन्ति संमोहात्यावत्जीवमनिर्वृताः||

-अष्टावक्र गीता(१८.४३)

प्रश्न १: सुबुद्धि और कुबुद्धि में क्या अंतर है?

कृताकृते च द्वन्द्वानि कदा शान्तानि कस्य वा|

एवं ज्ञात्वेह् निर्वेदाद्भव त्यागपरःअव्रती||

-अष्टावक्र गीता(१८.४३)

प्रश्न २: निर्वेद, त्यागी व् अव्रती होने का क्या तात्पर्य है?

सज्जन जन वही है, ढाल सरीखा होय|

दुःख में आगे रहे, सुख में पाछे होए||

-कबीर दास

प्रश्न ३: ‘दुःख’ में आगे आना और ‘सुख’ में पीछे जाना, इनका क्या तात्पर्य है?

जा गुरु ते भ्रम न मिटे, भ्रान्ति न जिवका जाय|

ता गुरु झूठा जानिये, त्यागत देर न लाये||

-कबीर दास

प्रश्न ४: ‘गुरु’ कौन होता है?

ज्ञानी सो ज्ञानी मिले, रस की लूटम लूट|

ज्ञानी-अज्ञानी मिले होवे माथा कूट||

-कबीर दास

प्रश्न ५: जो आत्म-ज्ञानी है, तो अज्ञानी से क्यों मिलेगा?

साधो भाई जीवित करो आशा, जीवत समझे जीवत बूझे, जीवत मुक्ति की आशा|

जीवत करम की फांसी न कटी, मुए मुक्ति की आशा|

तन छूटे ज्यों मिलन कहत है, सो सब झूठी आशा||

-कबीर दास

प्रश्न ६: जीवन में तन का क्या महत्व है?

अबहूँ मिला तो तबहूँ मिलेगा, नहीं तो जमपुर बासा|

सत गाहे सतगुरु की चिन्हे बिसबासा|

कहे कबीर साधन हितकारी, सब साधन के दासा||

-कबीर दास

प्रश्न ७: साधन क्या है?

उक्तियाँ: 

  • जो स्रोत में नहीं डूबा, वही समय से अपेक्षा रखता है।
  • बेचैनी भी झूठी, इलाज भी झूठा।
  • बेचैनी आशा रूप में: कुछ मिल जाएगा। बेचैनी ममता रूप में: कुछ छूट न जाए। आशा और ममता तब उठते हैं जब आप सत्य से दूर होते हैं।
  • असली गुरु कौन? जिसे तुम कोशिश के बाद भी त्याग न पाओ।
  • जो भी तुम इकट्ठा करोगे वो सत्य नहीं हो सकता।
  • ऊंची से ऊंची उपलब्धि मेरी यही हो सकती है कि मैं बहरा न हो जाऊँ, अंधा न हो जाऊँ। वो सुन सकूं जो सीधे-सीधे कहा ही जा रहा है। वो देख सकूं जो साक्षात ही है।
  • माया का मंत्र: ज़िन्दगी गर्मागर्म, कौन सा भ्रम?
  • सुख क्या है? मन को उसके संस्कारों के अनुरूप विषय मिल जाना।
  • हम सुख भी भोगते हैं और दुख भी। हम निरंतर भोक्ता हैं।
  • जब दुख आए तो जहाँ हो वहीं रहना। पीछे न हटना। जब सुख आये तब भी जहाँ हो वहीँ रहना। आगे न बढ़ना। न आगे न पीछे। न सुख न दुःख। तुम और तुम्हारा अचल आसन।
  • अरे, इतना ही कहा था कि सुख से मत चिपको, ये कब कहा था कि दुःख से चिपक जाओ?
  • हर विचार, हर वाक्य एक समस्या है जो सुलझी नहीं। सुलझाव मौन है। इसलिए समाधान शब्दों में व्यक्त नहीं हो सकता और ये बताया नहीं जा सकता कि ‘क्या समझा’ क्योंकि जो समझा वो ‘कुछ नहीं’ है। शून्यवत है।
  • जो अनस्तित्व में जीता है वो अस्तित्व का राजा हो जाता है।
  • अभी को साधो, कल अपने आप ठीक हो जाएगा।
  • ताज भी झुके हुए सिर पर ही रखा जा सकता है।
  • साधन ही साध्य है।
  • संसार में साधन आपका दास है, सत्य में आप साधन के दास हो।
  • तेरे लिये तेरे आँसू असली हैं पर मुझे पता है कि ये नकली हैं। इन्हें नकली जानते हुए भी तेरे लिए इनका समाधान करूंगा। ये करुणा है।
  • कर्त्तव्य नहीं रहता तो नफ़रत नहीं रहती।
  • यदि कर्त्तव्य वास्तव में विदा हुआ है तो प्रेम आएगा।
  • प्रेम में वो वादे भी निभ जाते हैं जो किए ही नहीं।
  • हम वादे निभाने में जितने हिन्सक होते हैं, जितनी नफ़रत होती है उतनी अन्यथा कभी नहीं होती।
  • अव्रती होने का अर्थ है कि जो उचित हो वो होगा मेरे माध्यम से। और उसमें बहुत ऊर्जा होती है।
  • दिल ऐसा शान्त रहे जैसे सफ़ेद चोटी हिमालय की, और बाहर ऐसा नाच रहे जैसे चोटी से बहती पहाड़ी नदी।
  • बुद्धि: guiding force कुबुद्धि: keeps self before Truth सद्बुद्धि: keeps the Truth in an incomparable position
  • कुबुद्धि will always create a future.
  • I am not going to worry. It is the best that is going to happen.
  • Battle of Truth – I have to show up. I won’t count my wounds because there is no option to not to show up in the battle.
  • You cannot find the Truth, you can just be available to it.
  • Sit at the center and rule the circle.
  • No-responsibility is not Irresponsibility.
  • No-responsibility is beyond responsibility. Beyond responsibility is Love.
  • He is passionless and is a great Lover and has enormous energy.  You are passionate and have no love and no energy.
  • Love is not passion, love is not excitement, love is a silent music.

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