छोड़ना नहीं, पाना

वक्ता: परम त्याग नहीं, परम प्राप्ति| ये सिर्फ शब्दों की बात नहीं है| ये पूरा-पूरा दृष्टि का ही अंतर है| सत्य आपके समक्ष आएगा ही नहीं अगर आप पाने की भाषा में बात नहीं करेंगे| अगर आपकी संतोष की वही धारणा है, जो आमतौर पर चली आ रही है, अगर आप दमन, शमन, निरोध, इन्हीं शब्दों के साथ जीते हैं, अगर संयम, कर्त्तव्य, दायित्व, अभ्यास, वैराग्य यही सब आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं, तो चूक जायेंगे, मिलेगा नहीं|

ज़ोर दे कर कह रहा हूं, छोड़ने को छोड़ो, पाने की बात करो| छोड़ने में क्या रखा है| जो छूटना है, वो छूट ही जाएगा| जैसे ही उसकी मूल्यहीनता दिखेगी, वो छूट जाएगा, अपने आप छूट जाएगा, यदि छूटना चाहिए तो| तुम छोड़ने को ही छोड़ो, तुम तो पाने पर आओ| तुम बड़े हो, जीवन पाने के लिए है, विशाल है, बृहद है|

(मौन)

हम सवाल भी करते हैं, तो तुम देखना कि दस में से आठ सवाल हम यही करते हैं कि ये समस्या है, इससे पार कैसे पाऊँ| पर समस्या कोई बड़ी कभी होती नहीं है| किसी की समस्या है डर, किसी की समस्या है सम्बन्ध, कुछ इसी तरह की दो-चार समस्याएं होती हैं| आप बात हमेशा किसकी बात करते हो? समस्या की| और समस्या की बात कर-कर के, आपने किसको महत्वपूर्ण बना दिया है?

सभी श्रोतागण(एक स्वर में): समस्या को|

वक्ता: आप पाने की बात कभी करते ही नहीं, आप लगातार समस्या से मुक्ति की बात करते रहते हो|

समस्या छोड़नी नहीं है, स्वास्थ्य पाना है|

उसकी बात आप करते ही नहीं| क्यों समस्याओं पर केन्द्रित है मन? मन को उसके आसन पर बैठने दो| फिर काहे की समस्या? कबीर का एक दोहा है-

चाह गई चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह|

जिनको कुछ न चाहिए, वे शाहन के शाह||

दूसरी पंक्ति पर गौर करो| ‘जिनको कुछ न चाहिए वे शाहन के शाह’| आमतौर पर इसका अर्थ ये निकला जाता है कि शाहों का शाह वो है जिसे कुछ नहीं चाहिए| मैं बिल्कुल साफ-साफ कह रहा हूं कि कबीर ने ये नहीं कहा है| कबीर ने कहा है, ‘जो शाहों का शाह है उसे कुछ नहीं चाहिए’| बहुत अंतर है दोनों बातों में| तुमने सोच रखा है कि कुछ न चाहना तरीका है अपनी बादशाहत को पाने का| मैं कह रहा हूं, ‘बादशाहत पहले मिलती है, फिर चाहना छूटता है’|

कबीर विधि नहीं दे रहें हैं कि चाहना छोड़ो तो शाह बन जाओगे| कबीर घोषणा कर रहे हैं कि शाह ऐसा होता है| विधि देने में और वर्णन करने में अंतर होता है| कबीर सिर्फ वर्णन कर रहे हैं| क्या? कि शाह कैसा होता है| कैसा होता है शाह? जिसे कुछ चाहिए ही नहीं होता है| लेकिन पहले बादशाहत आती है| पहले बादशाहत आती है, चाहना उसके बाद छूटता है| बादशाहत को पाओ, छोड़ने की भाषा में मत बात करो| समझ रहे हो? बादशाहत को पाओ|

कोई तर्क कर सकता है- ‘सर छोड़ के ही तो पाया जाता है’| ना, छोड़-छोड़ कर नहीं पाया जाता| पा लेने से छूटता है| तुमने सिर्फ धारणा बना रखी है कि छोटे हो| अपने बड़ेपन  को देखो, और उसे पा लो| बड़े हो जाओगे, बीमारियां अपने आप छूट जाएंगी| मुझे मालूम है कि मैं दोहरा रहा हूं, पर फिर कह रहा हूं|

पहले अपने बड़े होने का बोध आता है, उसके बाद जो कूड़ा-कचरा है वो गिरता है| सच तो ये है कि जब बड़े होने का बोध आ भी जाता है, तो भी कुछ समय तक कूड़ा-कचरा शायद लगा रहे, आदतवश लगा रहेगा, फिर गिरेगा| अतीत की एक आदत है, तो ये होगा| बड़े हो गए हैं, लेकिन पुराना कचरा अभी साथ चल रहा है, पर गिर जाएगा| (एक श्रोता की ओर इंगित करते हुए) आप के शरीर पर घाव है| जब घाव है, तो घाव के ऊपर एक पपड़ी जमेगी ना?

श्रोता १: जी |

वक्ता: पपड़ी हटा कर तुम्हें स्वास्थ्य मिलेगा, या जब स्वास्थ्य मिलेगा तब पपड़ी अपने आप हट जाती है? और तुम कहो कि नहीं त्याग करूंगा तो स्वास्थ्य मिल जाएगा| तुम पपड़ी का त्याग करते चलो बार-बार, तो क्या स्वास्थ्य मिल जाएगा? पपड़ी अपने आप हट जाएगी, बस तुम स्वस्थ हो जाओ| हां, ये हो सकता है कि घाव ठीक हो गया हो, तब भी कुछ घंटों तक, एक-आध दिन तक पपड़ी लगी रहे| वो आदत है, पर हट जाएगी| तुम परवाह मत करो, वह हट जाएगी|

(मौन)

श्रोता १(भगवद्गीता के एक श्लोक का हिंदी में अनुवाद पढ़ते हुए): इन्द्रियों से अतीत, केवल शुद्ध हुए, सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य, जो अनंत आनंद है, योगी उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है और जिस अवस्था में स्थित होकर यह योगी, परमात्मा के स्वरुप से विचलित होता ही नहीं है, उसे योग कहते हैं|

वक्ता: धीरे-धीरे अलग-अलग भागों में पढ़ो|

श्रोता १: इन्द्रियों से अतीत, केवल शुद्ध हुए सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य, जो अनंत आनंद है|

वक्ता: इन्द्रियों से अतीत कहा है| गलत मत समझ लीजियेगा| एक तथ्य है कि मन से अतीत, इन्द्रियों से अतीत, मन और इन्द्रियों का प्रयोग करके ही जाया जा सकता है| इन्द्रिय नाश की बात नहीं हो रही है| इन्द्रियों से अतीत| इन्द्रियों पर गौर करते हैं| क्या हमने इन्द्रियों का भी पूरा प्रयोग किया है? क्या इन्द्रियां हमारी मुक्त हैं? कान ठीक से सुनते नहीं हैं| आंखें ठीक से देखती नहीं हैं| इन्द्रियों ने कोई भूल नहीं कर दी है| इन्द्रियां कोई बीमारी नहीं हैं कि आप छूटते ही बोलें, ‘नहीं, नहीं वो आँखों से नहीं दिखता’| मैं आपसे कह रहा हूं कि वो आखों से दिखता है|

शब्द कोई शोर नहीं है कि तुम कह दो कि नहीं, परम का शब्द सुनाई नहीं देता| और तुम कहो, ‘अनहद सुनाई थोड़े ही देगा’| मैं कह रहा हूँ, परम का शब्द बिल्कुल सुनाई देता है, तुमने अपने कान ख़राब कर रखे हैं| कबीर हों या बुल्लेशाह हों, सब कह गए हैं कि बजता है अनहद का बाजा, और हमें सुनाई देता है| शून्य शिखर पर अनहद का ही डंका बजता है| और कबीर कहते हैं कि उसमें से छत्तीस राग निकलते हैं|

इन्द्रियों के ऊपर मन बैठा है| मन जब भटका रहता है, मन जब अपने स्त्रोत से जुदा रहता है, तो इन्द्रियां भी भटक जाती हैं| कृष्ण ही हैं, जो अर्जुन को समझाते हैं कि इन्द्रियों के ऊपर मन है, और उसके भी ऊपर आत्मा| जब ऊपर से ही वियोग है, तो हमारी इन्द्रियां भी भटकी-भटकी सी हैं| क्यों, आप भूल गए क्या? कृष्णमूर्ति ने पूछा था ना आपसे, ‘क्या कभी पेड़ देखा है?’ पेड़ दिखता है| कभी देखा है? इन्द्रियों का दमन नहीं करना, इन्द्रियों को जागृत करना है| इन्द्रियों से अतीत यदि जाना है, तो मैं कह रहा हूं कि इन्द्रियों को जगाओ| हमारी तो इन्द्रियां सोई हुई पड़ीं हैं| हमें कहां कुछ सुनाई देता है?

ये है सामने सब कुछ| बोलो क्या दिख रहा है आपको? कुछ दिख भी रहा है? कुछ दिख रहा है?

(मौन)

आंख कैमरा भर तो नहीं है ना? कि आँख का अर्थ है कैमरा? ना| यदि आपको बस उतना ही दिखता है, जितना कैमरे को दिखता है, तो क्या दिखा? कान और वॉइस् रिकॉर्डर में कुछ तो अंतर होगा? तुम्हारा कान यदि बस वही सुन सकता है जो एक वॉइस् रिकॉर्डर भी सुन सकता है, तो तुम सुन कहां रहे हो? हमारी इन्द्रियां सोई पड़ीं हैं| और जब कृष्ण कह रहे हैं कि इन्द्रियों से अतीत जाओ, तो कह रहे हैं कि जगाओ इनको, यही मुझ तक ले कर आएंगी| इन्द्रियों से मन, मन से आत्मा, जगाओ इनको| साफ-साफ देखो| आंख बंद कर लेने को नहीं कह रहे हैं| वो कह रहें हैं कि पूरा देखो| आँखों को खोलो क्योंकि मनुष्य हो| मनुष्य होने का अर्थ ही यही है कि इन्द्रियां हैं| वो तुम्हारा मानवीय गुण हैं| वही तुम्हारा मनुषत्व हैं| तुम इन्द्रियां हटा रहे हो, तो तुम अपने मनुषत्व में भी कुछ बाकी नहीं छोड़ रहे|

(मौन)

सजग इन्द्रियां, संवेदनशील इन्द्रियां, कुछ छुप ना जाए जिनसे, जो पूरा देख पाएं| जो निर्गुण के गुण देख लें, जो निराकार का आकर देख लें, ऐसी इन्द्रियां| जो अनहद का शब्द सुन लें, ऐसे कान| जो परम की खुशबू सूंघ लें, उसका इत्र, ऐसी नाक़| हांथ ऐसे जो स्पर्श करते हों सीधे परमात्मा को| परमात्मा कोई धारणा है क्या कि दिखाई नहीं देगा, सुनाई नहीं देगा| कहां है? तुम कहोगे, ‘कल्पना है! बेकार की बात है, परमात्मा’|

कल्पना है? कल्पना नहीं है| ये रहा| ये है (एक पत्थर की ओर इंगित करके)| छुओ, सामने है| और आंखों से अगर तुम्हें दिखता नहीं, तो अंधे हो| और कान से सुनाई नहीं देता, तो बहरे हो| ये बेकार की बात मत करना कि वो तो अतीन्द्रिय है| ‘अरे! आंखों से कहां से दिखेगा?’ तो और कहां से दिखेगा? मनुष्य हो ना? तो और कहां से देखते हो? बताओ| तो कहेंगे, ‘हमारी तीसरी आँख खुली हुई है| शिव नेत्र हैं हमारे पास’| किसको बेवकूफ बना रहे हो?

इन्हीं आंखों से दिखेगा| और कोई तीसरा नेत्र नहीं होता| तीसरे नेत्र का अर्थ ही यही है कि नेत्रों के पीछे का नेत्र खुल गया है| नेत्रों के पीछे जो नेत्र है, वो खुल गया है| वो तीसरा नेत्र है| वो माथे में कहीं नहीं होता| कई लोग घिसते रहते हैं कि तीसरा नेत्र खुलेगा|ऐसा नहीं होता|

(मौन)

समझ में आ रही है बात? (एक श्रोता की ओर इंगित करते हुए) ये गाता है, “तेरा मेरा एक नूर, काहे को हुज़ूर, तूने शकल बनाई है श्वान की ..”| ये होता है धार्मिक चित्त| जो दिख रहा है, उसी में दिख रहा है| आंखों से ही तो दिखा ना उन्हें श्वान? आंखों से ही श्वान दिखा ना? और उन्हीं आंखों से उस श्वान में क्या दिखा? परम दिखा! तो ऐसी हों आंखें| कल्पना नहीं है| विचार भर नहीं है| विचार, युक्ति, अवधारणा कुछ नहीं है वो|

(मौन)

वो तो साक्षात से भी ज़्यादा साक्षात है| करीब से ज़्यादा क़रीब है| प्रकट से ज़्यादा प्रकट है| तुम उसके अलावा और किसकी आवाज़ सुन रहे हो? तुम उसके अलावा और किसको देख सकते हो? कोई और है भी देखने के लिए? है कोई और जिसकी आवाज़ सुन सकते हो? तो फिर ये सब क्या है कि कान बंद करोगे तब वो सुनाई देगा, और आंख बंद करोगे तब वो दिखाई देगा? ना, ये बातें नौसिखियों के लिए ठीक हैं कि आंख बंद करो और कान बंद करो| योगी के लिए नहीं| वहां तो खुली आंख से दिखता है| वहां तो हाथ में लेकर खेला जाता है, मिट्टी में है|

श्रोता १: वो कहते हैं, ‘खुली आंख समाधि’|

वक्ता: कबीर का है, “साधो सहज समाधि भली”| वो सब समाधि नहीं है कि ये कर रहे हो, वो कर रहे हो|

सहजता में समाधि है| उठ रहें हैं, चल रहें हैं, खा रहें हैं, पी रहें है, समाधिस्थ हैं|

श्रोता २(भगवद्गीता के एक श्लोक का हिंदी में अनुवाद पढ़ते हुए): उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है, और जिस अवस्था में स्थित यह योगी परमात्मा के स्वरुप से विचलित होता ही नहीं|

वक्ता: ऐसा बैठा है कि हिलता ही नहीं| अंगद का पांव जमा दिया है, हिला के दिखाओ| उसको अलग-अलग तरीके से वर्णन किया जाएगा| कोई कहेगा कि पिया से ऐसी मिली हूं कि पिया ही बन गई हूं| ऐसा नाम लिया रांझा का कि रांझा ही हो गई| कोई कहेगा कि उसके महासागर में मेरी बूंद सागर ही हो गई, ‘बुंद समानी समुन्द्र में’| कोई कहेगा कि मैं जो था, अपने आप जान लिया| पर बात वही एक ही है|

सत्य में बैठ गए, विचलित होते ही नहीं| चल रहीं हैं हवाएं, चल रहें हैं तूफान| बुझना तो छोड़ो, दिया कांपता भी नहीं| ऐसा पाया है उसको कि हम वही हो गये हैं| अब वो हमसे छूटेगा कैसे?

अगर वो हमारे हाथ में होता तो तुम हमारा हाथ काट सकते थे, छुड़ा लेते| अगर वो हमारे दिमाग में होता तो तुम हमारी स्मृति छीन सकते थे, छूट जाता| वो आंखों में होता, तो आंखें निकाल सकते थे| पर वही हो गए हैं| अब हमसे छूटेगा कैसे? इसे कहते हैं आसन में स्थित हो जाना| हम वही हो गए हैं| कोई तरीका ही नहीं है कि वो हमसे छूट सके|

वक्ता: तू, तू करता…|

श्रोता २: तू हुआ|

वक्ता: तू हुआ| कैसे छुड़ाओगे? छुड़ा कर दिखाओ| ये नही कि बड़ा बल है हममें, हम वही हैं| हमसे छूटेगा कैसे वो| तुम्हें क्या लग रहा है, ये सब नकली है? ये सब नकली नहीं है|

ना तो ये जगत भ्रम है, ना कहीं कोई माया है, कुछ मिथ्या नहीं है| सब असली है, और सब ये परमात्मा ही है|

तुम मंदिर में बैठे हो अभी, कुछ नकली नहीं है इसमें से| ये मत कह देना कि अरे, ये द्वैत है, तो नकली है| सब असली है| कहीं कुछ नकली होता ही नहीं| असली की ही सत्ता है, असली ही असली है चारों ओर| ये रहा परमात्मा, देखो| देखो! ये रहा| उसी में बैठे हो, उसी की सांस ले रहे हो| छूओ! ये रहा परमात्मा| कुछ नकली नहीं है|

(नदी की धारा के बहाव से उत्पन्न शोर की ओर इंगित क़रते हुए)

ये कृष्ण ही बोल रहे हैं और कोई नहीं बोल रहा| तुम क्या सोचते हो, गीता कोई कागज़ है जो हाथ में ले लोगे?

(पर्वत से गिरते झरनों के उद्गम की ओर इंगित करते हुए ) वो रही गीता, ऊपर से आती हुई|

जो आयतें उतरीं थीं, ऐसे ही उतरीं थीं, यही फ़रिश्ता है| ऐसे ही बोलता है वो| इन्हीं कानों से सुनोगे|

(मौन होकर आसपास की ध्वनियों को महसूस करते हुए)

देखो, बोला| बोल रहा है ना? क्या बोल रहा है? कानों को ऐसा कर लो जो सुन सकें|

श्रोता २: मेरे पास आओ|

वक्ता: करो ऐसा कानों को जो साफ़-साफ़ सुन सकें जो वो बोल रहा है|

-‘बोध-शिविर सत्र’ पर आधारित| स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं|

सत्र देखें: https://www.youtube.com/watch?v=snMru7MfNAw