डर-डर के मर जाना है?

वक्ता: तुम्हारे पास बात ऐसे पहुंचती है कि तुमने मुझसे सुन लिया| मेरे पास कहां से आती है?

श्रोता १: सोच कर|

वक्ता: नहीं, सोच कर नहीं आती है| मुंह काला कर के आती है| अभी मेरी शक्ल देख रहे हो? झुल्साई-सी दिख रही है? नहीं दिख रही होगी, क्योंकि तुमने मुझे पहले ज़्यादा देखा नहीं है| पता है ये कैसे झुलसी है? ये ऐसे झुलसी है कि पिछले दो-तीन महीने से लगातार, मैं अपनी बाइक उठाता हूं, और पहाड़ों पर चला जाता हूं| वहां घूम रहा हूं, फिर रहा हूं, अकेले रह रहा हूं| किनारे पर, रेत पर, चुपचाप पड़ा हुआ हूं| रात भर पड़ा हुआ हूं| नदी में कूद गया हूं, झरने पर चढ़ गया हूं| वहां से ये सारी बातें आती हैं|

तुम तक आती हैं कि तुम आसानी से यहां, ए.सी. वाले कमरे में बैठ कर, मुझे सुन रहे हो| मैंने कीमत अदा की है, इसलिये मुझे भूलती नहीं| तुमने कीमत थोड़े ही अदा की है| तुम तो सोच रहे हो कि यहां पर आसानी से बैठ कर, सुनने से, तुम्हें मिल जाएगा| मैं वहां जान का जोखिम उठाता हूं, तब मुझे कुछ मिलता है| मेरी तो बुलेट फिसल गई, तो मैं गिरा भी धड़ाम से| जब गिरता हूं, तब अचानक बल्ब जलता है कि कुछ समझ में आया| और वो मैं यहाँ आकर संवाद में बोल देता हूं|

तो तुम भी बाहर तो निकलो ना| यहां क्यों बैठे रहते हो? फिर जो पता चलेगा, वो असली होगा| वो कोई नहीं भुला सकता तुमसे| फिर जो पता चलेगा, वो असली होगा| फिर वो तुमसे कोई नहीं छीन सकता| फिर कोई आकर तुमसे सौ बार कहे कि आप बेवकूफ हैं, कैसी बातें करते रहते हैं, दिमाग हिल गया है| तुम कहोगे…|

श्रोता १: कोई बात नहीं|

वक्ता: इतना भी नहीं कहोगे| हो सकता है, देखो भी नहीं उसकी ओर। तुम्हें सुनाई नहीं पड़ेंगी लोगों की बातें| तुमको नदी ने सच बता दिया ना| तुम्हें आसमान ने सच बता दिया है|

श्रोता २: सर, आपने कहा कि आप बाइक से गिर गए थे, फिर आपका बल्ब जला| समझ आई| लेकिन सर, ये खतरा था कि वहीँ पर कोई खाई होती और आप नीचे गिर जाते| तो फिर? क्या उसका फायदा?

वक्ता: यही होता कि संवाद नहीं ले रहा होता| तो क्या हो जाता?

(सभी श्रोतागण हँसते हैं)

श्रोता २: मैं यही तो कह रहा हूं कि अगर हम गिर जाएं या ऐसी कोई घटना हो जाए तो फिर.. .?

वक्ता: होने को तो कुछ भी, कभी भी हो सकता है| तुम एक बात बताओ| मैं तुमसे एक सवाल पूछता हूं| गिरने की संभावना क्या है? क्या है? कि कोई गया, और लौट कर नहीं आया, इसकी क्या संभावना है? ऐसा कितने मामलों में एक बार होता है?

श्रोता २: शून्य या एक, मतलब आएगा या नहीं आएगा|

वक्ता: अगर सौ लोग जाते हैं, तो उसमें से कितने लौट कर आते हैं, कितने नहीं? वही संभावना कहलाती है| हज़ार में से कितने लोग हैं, जो जाते हैं, पर कभी लौट कर नहीं आ पाते? जल्दी बोलो|

श्रोता ३: सर, आधे-आधे|

वक्ता: पचास प्रतिशत? क्या आधे वहीँ रुक जाते हैं?

श्रोता ४: सर, मुश्किल से दस प्रतिशत|

वक्ता: दस प्रतिशत! तुम सच में ऐसा सोचते हो कि पहाड़ों पर मौत फैली हुई है? कि सौ लोग गए, तो दस मर गए? ऐसा होता है क्या?

श्रोता ५: नहीं, ऐसा नहीं है| वो तो परिस्थितियों पर निर्भर करता है|

वक्ता: मुझे, तथ्यात्मक संख्या दो। अरे, उन सब में जो जाते हैं और वहां आनन्द लेते हैं, समय बिताते हैं, उनमें से कितने मर जाते हैं?

श्रोता ५: सर, हजार में से कोई दो प्रतिशत|

वक्ता: ठीक है? हज़ार में से दो? नौ सौ अट्ठानवे लौट कर आते हैं? तुम उन दो का ख्याल कर रहे हो, नौ सौ अट्ठानवे का नहीं। तुम अपनी गणित देखो| तुम उन दो से चिपक कर खड़े हो गए हो, जो मर गए| और जो नौ सौ अट्ठानवे लौट कर आ गए, तुम उनकी ओर देखना भी नहीं चाहते|

श्रोता ६: सर, यही तो बात है कि हमें गिलास आधा खाली दिखता है और..

वक्ता: आधा भी नहीं है यहाँ। दो, और नौ सौ अट्ठानवे हैं|

श्रोता ६: हां, हमें खाली दिखता है, पर जो थोड़ा-सा भरा है वो नहीं दिखता| बात तो वही है ना?

वक्ता: विपरीत है| जो इतना-सा खाली है, तुम्हें वो दिखाई दे रहा है| जो पूरा भरा हुआ है, वो नहीं दिखाई दे रहा| मरने की एक प्रतिशत संभावना है| तुम उस एक प्रतिशत को पकड़ कर बैठ गए हो| और जो निन्यानवे प्रतिशत ज़िन्दगी है, उसको तुम छोड़े दे रहे हो| यही हमारी कहानी है| मरने की एक प्रतिशत संभावना के कारण, निन्यानवे प्रतिशत जिंदगी को तुमने छोड़ रखा है| फिर पूछते हो कि जिंदगी उबाऊ क्यों है? उदास क्यों है? हम ऐसे क्यों रहते हैं? ऐसे ही रहते हो, क्योंकि निन्यानवे प्रतिशत ज़िंदगी तो तुम्हें फालतू ही लगती है| वो जो एक प्रतिशत डर है, वो इतना भारी है कि तुम उसके बोझ के नीचे ख़त्म हो चुके हो| और मरना तो है ही| अभी और कितने दिन जी लोगे? हिन्दुस्तान का जो औसत प्रतिशत जीवन है, उसके हिसाब से तुम अपनी एक तिहाई ज़िंदगी जी चुके हो, या एक चौथाई| अगर तीन या चार दिन लेकर आए थे जीने के लिये, तो एक दिन तो बीत गया| तुम अब कितने दिन और जिओगे, ये बता दो?

श्रोता ७: सर, ऐसा ही सोचते रहे, तो हम यही सोचते रह..

वक्ता: सोचते नहीं रहें, मैं तथ्य की बात कर रहा हूं|

श्रोता ७: सर, लेकिन अगर हम यही सोचते रहें कि कल तो हमें मर जाना है, तो क्यों पढ़ें?

वक्ता: बेशक, ये सोचना चाहिये| जो कुछ भी भविष्य के लिये किया जा रहा है, वहां पर ये ख्याल ज़रुर रखना चाहिये कि वाकई मेरे पास दिन कितने हैं| हमारा पागलपन ही यही है कि हम अपनी कहानियों के बीच में ही मर जाते हैं| मरता हुआ आदमी भी यही सोच रहा होता है कि अभी बीस साल और मिलें तो ये कर लूंगा| कहानी कभी पूरी नहीं होती| तुम्हें दिखाई भी नहीं पड़ रहा होता है कि तुम्हारे दिन खत्म हो रहे हैं, बहुत तेजी से ख़त्म हो रहें हैं| तुम्हें पता है कि क़रीब बीस साल तुमने अपने खत्म कर दिये हैं| छोटी मात्रा नहीं होती ये| बीस साल! और आजकल तीस साल में दिल का दौरा पड़ना शुरू हो गया है|

(मौन)

जीना कब शुरू करोगे, ये बता दो? एक जगह उल्लेख है, किसी ने कहा है, ‘दुनिया ऐसे लोगों से भरी हुई है, जो बीस की उम्र में मर जाते हैं पर अस्सी पर ही जाकर दफनाए जाते हैं’| मर वो बीस की उम्र में ही जाते हैं| बीस से लेकर अस्सी तक, सिर्फ़ भूत डोल रहा होता है| भूत माने समझते हो? अतीत| बीस की उम्र में मर गया था, पर ऐसा लगता था कि ज़िन्दा है| तो वो चलता रहा| अंततः जब वो अस्सी का हो गया, तब उसको जलाया गया| तो ये हमारी कहानी है|

-‘संवाद’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

संवाद देखें: https://www.youtube.com/watch? v=Vl9x79fpbQA