ध्यान का फल है भक्ति

वक्ता: चतुराई चूल्हे पड़े, ज्ञान कथे उल्साये!
           भाव भक्ति जाने बिना, ज्ञान पनो चली जाये!

भक्ति की, ज्ञान पर श्रेष्ठता बता रहे हैं| तुम्हारे ज्ञान की दो कौड़ी की कीमत नहीं है यदि..?

श्रोता १: भाव भक्ति न हो|

वक्ता: ‘भाव भक्ति’ नहीं है| तुम्हारी सारी चतुराई चूल्हे में गयी, और ज्ञान में लग गई आग! (हँसते हुए) भक्ति तुझमें है नहीं, भाग सके तो भाग!

‘भाव भक्ति जाने बिना, ज्ञान पनो चली जाये’| भक्ति के बिना तुम्हारा ज्ञान किसी काम का नहीं है| देखिये ऐसा नहीं है कि ज्ञान की कोई कीमत नहीं है| थोड़ी ही देर पहले कबीर ने कहा था, ‘ज्ञान-ध्यान का साबुन लगेगा’| ठीक है? ज्ञान अपने आप में अद्भुत, विलक्षण, बहुत-बहुत कीमती है| लेकिन आख़िरी कदम पर आ कर ज्ञान को भक्ति में रुपांतरित होना ही पड़ेगा| ठीक इसी तरह से भक्ति भी ज्ञान के बिना अगर हो रही है, तो बड़ी पाखंडी भक्ति है| बात को समझे बिना ही अगर आप समर्पित हो गए तो वो भी बहुत बड़ा पाखंड है| समर्पण आवश्यक है, पर जब समझा ही नहीं तो समर्पण कैसे कर रहे हो? फिर तो यह अंधा समर्पण है|

श्रोता २: सिर्फ मानने जाने वाला|

वक्ता: हाँ| जानो और जानने के बाद फिर पूरी तरीके से सिर झुक जाये| एक बार जान लिया, ठीक है| बुद्धि का पूरा प्रयोग करो| तुमको उसका विच्छेदन करना है, काटना है, छांटना है, बुद्धि से जो कुछ कर सकते हो, कर लो| लेकिन एक बार दिखाई देने लगे कि सच क्या है तो अब खड़े मत रहना, अब मत लड़ना| अब बिल्कुल सिर झुका दो| नहीं तो..? ‘चतुराई चूल्हे पड़े’! अब यह ज्ञान ही वरना तुम्हारा दुश्मन बन जाएगा| ठीक है?

श्रोता ३: सर, इसका मतलब जो ज्ञान भक्ति में परिवर्तित नहीं हुआ, वो चतुराई में होगा ही|

वक्ता: बहुत बढ़िया| ज्ञान जब भक्ति नहीं बनता तो सड़ने लगता है| फिर वो कुटिलता बन जाता है|

श्रोता ४: अहंकार की परम सीमा!

वक्ता: वो अहंकार का खिलौना बन जाता है, बड़ा घातक अहंकार होता है| यह कौन सा अहंकार है? ‘ज्ञानी अहंकार है’| यह रावण वाला अहंकार है! अहंकार तो है ही है, और उसको ज्ञान और मिल गया है| अब वो सब कुछ काट देगा, चिथड़े-चिथड़े कर देगा| ठीक है? ज्ञान बिल्कुल दो धारी तलवार है| ध्यान दीजियेगा, ज्ञान से आप असत्य को तो काटिये ही, लेकिन आखिर में खुद को भी काट डालिये| ज्ञान से पूरी दुनिया को काटिये और आखिर में आत्महत्या कर लीजिये| इसी आत्महत्या का नाम ‘भक्ति’ है| इसी का नाम ‘समर्पण’ है| अगर आपका ज्ञान ऐसा रहा कि उससे आपने बाकि सब तो काट दिया, लेकिन अपने आप को बचाए रखा तो बड़ी गड़बड़ हो जाएगी, बहुत-बहुत गड़बड़ हो जाएगी| आप विद्वान बन जाओगे| आप पंडित बन जाओगे| क्या कहते हैं बुल्लेशाह इस बारे?

पढ़ पढ़ आलम पागल होया, कदी अपने आप नू पढ़या नईं|
जा जा वड़दा मंदिर मसीतां, कदी अपने आप चे वड़या नई||

तो आलम को पढ़ते रहेंगे, और शक्ल कैसी रहेगी? जल्लादों जैसी रहेगी| जितनी किताबें पढ़नी हैं, पढ़ लो, मन को शांत कर लो, अंत में ढाई आखर और पढ़ लेना| सब पढ़ लो लेकिन अंत में वो ढाई आखर और पढ़ लेना| वो नहीं पढ़ा तो जितना पढ़ा है वो सब पलट कर तुम्हारे ऊपर ही आएगा|

श्रोता २: अभी ये सब न पढ़ें, पर ढाई आखर पढ़ लिया तो?

वक्ता: मुश्किल हो जाता है| यह सब पढ़े बिना ढाई अक्षर पढ़ना मुश्किल हो जाता है| फिर वो जो ढाई अक्षर है, वह प्रेम नहीं आसक्ति बन जाता है|

श्रोता ३: इसी को तो पाखंड कहते हैं|

वक्ता: फिर वो गड़बड़ हो जाती है| ऐसा हो सके तो बहुत अच्छा है, पर होता नहीं है| तुम कह रही हो कि क्या ज्ञान के बिना भक्ति हो सकती है| फिर वो वैसी ही भक्ति हो जाती है जैसे आमतौर पर मंदिरों में पाती हो कि समझ में कुछ नहीं आता पर ऐसे ही खड़े हो गए हैं| समझा नहीं है कि ईश्वर क्या है, मंदिर क्या है, पर ऐसे खड़े हो गए हैं|

श्रोता ४: अभी कुछ दिन पहले मैं किसी से मिली थी, तो उन्होंने कहा, ‘मैं तो रोज़ मंदिर आती हूँ, चार-पाँच साल हो गए, फिर भी मझे कुछ दिया नहीं है’|

वक्ता: हाँ| फिर वो सब रहेगा| वही वो लड्डू खिला रहे हैं|

श्रोता ४: दूध पिला रहे हैं, माखन चटा रहे हैं, झूला झुला रहे हैं|

वक्ता: दूध पिला रहे हैं, माखन चटा रहे हैं, और लड्डू गोपाल को अपने साथ सुला रहे हैं, झूला झुला रहे हैं, और उन सब को नाम क्या दे रखा है ‘प्रेम’, कि ये तो हमारा परम के प्रति प्रेम है|

श्रोता ५: वहाँ तक भी तो उस परम को जानने की चेष्टा ली जाती है?

वक्ता: वहाँ क्या चेष्टा आती है? तुमने प्रेम को…

श्रोता ५: वहाँ तक भी नहीं आते तो?

वक्ता: अपना खिलौना बना लिया है| तुम उसके साथ खेल रहे है| तुम्हारे अहंकार का खिलौना बन गया है| है न?

श्रोता ५: सर, तो इसका मतलब कि बृज में जाकर जो इतने लोग कृष्ण के प्रेम में नाच रहे होते हैं, वो बिना मतलब ही…

वक्ता: कोई समझ के नाचा है? चैतन्य महाप्रभु भी नाचे थे| चैतन्य का नाम सुना है? और उनके जैसा कोई नहीं नाचा| वो इन सब नाचने वालों के पितामाह थे| असल में कृष्ण के लिये नाचने की परम्परा ही चैतन्य से शुरू होती है, पर चैतन्य बहुत बड़े पंडित भी थे| जब उनका ज्ञान पक गया, तो भक्ति में परिवर्तित हुआ| चैतन्य जैसा पंडित कोई नहीं हुआ है, ज्ञानी थे पूरे वो| जब ज्ञान उनका पूरा पक गया तब उन्होंने गली-गली नाचना शुरू किया| ऐसे नहीं कि जानते समझते कुछ हैं नहीं और नाच फालतू रहे हैं| नाचने से कुछ हो जाता, तो फिर जितने नचइये थे वो सब..

सभी श्रोतागण(एक स्वर में): चैतन्य हो जाते|

वक्ता: चैतन्य हो जाते| चैतन्य होकर नाचा जाता है, नाचने से कोई चैतन्य नहीं हो जाता|

श्रोता ४: और फिर प्रश्न की बात नहीं आती| फिर आप जहाँ हो वहीं नाचेंगे|

वक्ता: मीरा गली-गली नाचे तो एक बात है, पर जो गली-गली नाचे वही मीरा नहीं हो गया| ठीक है?

श्रोता ५: क्या यह कह सकते हैं कि चैतन्य का नाचना ज़रूरी था?

वक्ता: आखिर में तो नाचना पड़ेगा ही!

श्रोता ३: चैतन्य कहने पर तो नाचना है न? अष्टावक्र नहीं आ रहे दिमाग में|

वक्ता: (हँसते हुए) अब अष्टावक्र को देखा नहीं गया है नाचते हुए|

(सभी श्रोतागण हँसते हैं)

उनको चोट ज़्यादा थी तो (हँसते हुए), पर नाचेंगे वो भी| इसमें कोई शक नहीं है| बुद्ध भी नाचेंगे, अष्टावक्र भी नाचेंगे| कृष्ण तो नाचते हैं ही, कृष्ण तो नाचते हैं ही, कृष्ण का नाच तो सबने देखा है| पर बुद्ध भी नाचेंगे और अष्टावक्र भी नाचेंगे| हाँ नाचने के उनके तरीके अलग होंगे| उनके तरीके अलग होंगे, पर नाचने के अलावा कुछ नहीं है| जो पाएगा उसे नाचना ही पड़ेगा| ‘जब सामने होवे यार तो..?’

सभी श्रोतागण(एक स्वर में): नचना पैंदा है|

वक्ता: नाचना पड़ता है| वहाँ पर विकल्प नहीं रह जाता, और कोई तरीका ही नहीं है| नाचोगे नहीं तो करोगे क्या?

श्रोता २: आपने जो लिखा था, ‘पाओ और गाओ’|

वक्ता: हाँ! जब पाओगे तो गाने के अलावा और कोई विकल्प ही नहीं है, गाना पड़ेगा| हाँ, बेसुरा गाओ तो अलग बात है, उसमें कोई दिक्कत नहीं है|

(सभी श्रोतागण हँसते हैं)

वक्ता: वो तो कह ही रहे हैं न बुल्लेशाह,

‘जिस तन होइया इश्क कमाल, वो नाचे बेसुर और बेताल’|

तो बेताल नाचो, बेसुध गाओ, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता| पर यह आवश्यक है कि, नाचो भी, गाओ भी, वो तो होगा| लेकिन, वहाँ पर फिर साथ में बहुत बड़ी चेतावनी जुड़ी हुई है| किसी को मिल गया है इस कारण वो नाच रहा है, वो एक बात है, और कोई सोच रहा है कि नाचने-नाचने से हो जाएगा वो बिल्कुल ही दूसरी बात है| वैसे नहीं होता है| प्रक्रिया विपरीत नहीं चलाने लग जाना|

श्रोता ४: ‘गाओ और पाओ’ नहीं, ‘पाओ और गाओ’|

वक्ता: हाँ| हम कार्य-कारण को उल्टा कर देते हैं| ठीक है? हम सोचते हैं कि लक्षणों को अपनाने से हमें तत्व मिल जाएगा| तत्व पहले आता है, लक्ष्ण उसके बाद में आते हैं| महावीर को बोध हुआ, आनंद हुआ, तो उनके कपड़े झड़ गए, गिर गए| करना क्या है इनका? दिख गया उनको कि यूँ ही आनंद है| अब कोई यह सोचे कि कपड़े अपने झाड़ देगा, नंगा घूमेगा तो महावीर हो जाएगा, तो यह पागलपन की बात है| ऐसे नहीं होगा| जिन्होंने कर्ता-भाव छोड़ दिया, उनके केश भी लंबे हो गए, उनकी दाढ़ी भे लंबी हो गई| उन्होंने कहा, ‘जो हो रहा है, सो हो, हम नहीं रोकेंगे| हम अस्तित्व के रास्ते में बाधा नहीं बनेंगे|’ तुम अकसर पाओगे यह बात संतों में |

यह अकर्ता भाव का द्योतक हैं| ‘नदी बह रही है, बहे, मैं होता कौन हूँ उसको रोकने वाला? शरीर की अपने प्रक्रियाएं हैं वो कर रहा है, मैं होने दूंगा| इसी में शरीर का स्वास्थय है| मैं होता कौन हूँ कि मैं कहूँ कि नहीं अच्छी नहीं लगती, इनको काट देना चाहिए’| तो उनकी दाढ़ी इसलिए बढ़ती है क्योंकि उनमें पहले आया, अकर्ता-भाव| अब कर्ता-भाव तुममें ठूस-ठूस कर भरा हुआ है, और तुम दाढ़ी बढ़ा लो और कहो, ‘दाढ़ी बढ़ने से हम धार्मिक हो गए’ तो दाढ़ी बढ़ने से धर्म थोड़ी आ जाएगा! धर्म पहले आता है| जब मन में धर्म उगता है, तब दाढ़ी बढ़ती है| मन में तुम्हारे हिंसा भरी हुई है और दाढ़ी बढ़ा कर घूम रहे हो तो उससे थोड़ी ही तुम धार्मिक हो जाओगे|

समझ में आ रही है बात? लक्षणों को मत अपनाने लग जाइये, चिन्ह अपनाने से कुछ नहीं होता| ठीक है?

श्रोता ३: आचरण नहीं|

वक्ता: आचरण नहीं अंतस|

-’ज्ञान सेशन’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सेशन देखें: https://www.youtube.com/watch?v=ce2CIAgMn1U