अधूरे जिससे होते पूरे

प्रश्न: सर, इस पंक्ति में कहा गया है, ‘उस पर सब आश्रित हैं, वो किसी पर आश्रित नहीं है(गॉड फीड्स बट इज नॉट फेड)’| इस का क्या तात्पर्य है?

वक्ता: ये बहुत अर्थपूर्ण पंक्ति है, और इसको बहुत ध्यान से समझा जाना चाहिए,’गॉड फीड्स बट इज नॉट फेड’|

वो प्रथम है, अव्वल है| उससे तुम्हारी हस्ती है, तुमसे उसका वजूद नहीं है| तुम उठाते हो, तुम गिरते हो| वो ना उठता है, ना गिरता है| तुम आते हो, तुम जाते हो, वो ना आता है, ना जाता है| जब तुम नहीं थे, तब भी वो था, और तुम अपने आप को जो समझते हो, जब तुम नहीं रहोगे, वो तब भी रहेगा| ये तो छोड़ ही दो कि अतीत में था, अभी है और भविष्य में होगा| समय की धारा भी जब रुक जाएगी, तब भी मात्र वही होगा|

गॉड फीड्स बट इज़ नॉट फेड|

इसका अर्थ है कि वो किसी पर निर्भर नहीं है| ध्यान देना, तुम्हारे मानने पर तो बिल्कुल ही निर्भर नहीं है| इसका आशय समझ रहे हो क्या है? इसका आशय है कि तुम ये फ़िक्र करो ही मत कि लोग उसको मानते हैं कि नहीं मानते हैं| अक्सर जो धर्मावलम्बी होते हैं, उनको ये बड़ी फ़िक्र रहती है कि लोग खुदा को मान रहे हैं या नहीं मान रहे हैं| वो बड़ी गिनती रखते हैं कि कितने लोग मान रहे हैं| कोई ना माने तो भी कुछ फर्क नहीं पड़ना है| जो है सो है| किसी को ना दिखाई दे, तो इससे, उसके होने में क्या खलल पड़ता है? वहां कोई जनतंत्र थोड़े ही चल रहा है कि गिनों कितने लोग कहते हैं, ‘हां’| और ‘हां’ कहते हैं, तो होगा और मना कर दें, तो नहीं है| ऐसा थोड़े ही है मामला| तुम मानते हो? मानने वाला कौन? मानने वाला भी अहंकार, और न मानने वाला भी अहंकार| मानते हो, तुम्हारे लिये अच्छा| नहीं मानते हो, तो सज़ा भी तुम्हीं को| वो तुम्हारे मानने पर निर्भर नहीं है|

गॉड इज़ नॉट फेड|

मतलब, ‘वो नित्य है’| उसका वजूद किसी और पर आश्रित नहीं है| वो प्रथम है| वो अकारण है| उसका कोई माई-बाप नहीं है| उसके पीछे कोई और है ही नहीं| आगे-पीछे, सारे विस्तार, सारी श्रृंखलाएं, उसी से शुरू होती हैं| उसी से शुरू भी होती हैं, और वापिस जा कर के उसी में?

सभी श्रोतागण (एक साथ): ख़त्म हो जाती हैं|

वक्ता: समां भी जाती हैं| तो, कहने वाला कह रहा है कि तुम ये ज़िम्मेदारी अपने ऊपर रखो ही मत| एक और पंक्ति है, उसमें कहा गया है, ‘तुम्हारी ज़िम्मेदारी हमारे ऊपर है| वी हैव प्रोवाइडेड फॉर यू’| लेकिन आदमी का अहंकार इतना गहरा है कि ये तो छोड़ ही दो कि वो अपनी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लेता है, वो ख़ुदा की ज़िम्मेदारी भी अपने ऊपर ले लेता है| वो कहता है, ‘हम ना बनाएं, तो मंदिर कैसे बनेगा? हम व्यवस्था ना रखें, तो मस्जिद कैसे चलेगी?’
मनाही ये है कि तुम अपना बोझ खुद ना उठाओ, और इंसान का कर्ताभाव इतना सघन है कि अपना बोझ तो छोड़ दो, उसका दावा है कि वो खुदा का बोझ भी उठा रहा है|

तो बड़े प्यार से, धीरे से कहा जा रहा है, ‘हम तुम्हें खिलते हैं, तुम हमें नहीं खिलाते हो| तुम हमारी फ़िक्र छोडो| हम कर लेंगे अपना इंतज़ाम| हम अपना भी कर लेंगे, और तुम्हारा भी कर देंगे’| पर ये सुनने में अच्छा नहीं लग रहा है ना? ‘कोई मेरा इंतज़ाम क्यों करे? क्या मेरे दो हाथ नहीं हैं? क्या मेरे दिमाग में कोई कमी है? अरे! हम निर्भर क्यों रहें? हम सिर उठा कर चलेंगे, हमारी कोई गैरत है’| ऐसा होता है कि नहीं होता है? अच्छा-सा नहीं लगता ना, जब कोई कहता है कि किसी और ने पहले ही तुम्हारे लिये सब प्रबंध कर रखा है? अजीब-सा लगता है? यही अहंकार है| लेने में कोई संकोच मत करो| मिलता है, मजे से लो| सभ्यता ने हमें ये भी तो खूब सिखा दिया है कि यदि मुफ्त का मिल रहा है तो लो मत, और आप जितना सभ्य होते जाते हो, उतना ज़्यादा आपको अड़चन आती जाती है|

श्रोता ३: मुफ्त का लेने में|

वक्ता: मुफ्त का लेने में| बुद्ध इसलिये सिखाते हैं कि भिक्षा लो| क्योंकि भिक्षा लेने में, तुम ये नहीं कह सकते कि मैंने कुछ दिया, इस कारण मिला| अब ये जो तुमको मिला है, ये तोहफ़ा है| पर देखो, हमें तोहफे लेने में भी कितनी दिक्कत होती है| कोई तोहफ़ा दे देता है तो फिर हम जल्दी से जल्दी क्या कोशिश करते हैं?

श्रोता ४: वापसी तोहफ़ा(रिटर्न गिफ्ट) देने की|

वक्ता: वापसी तोहफ़ा(रिटर्न गिफ्ट) देने की|

श्रोता ५: पार्टी में होता तो है| आप तोहफ़ा देते हैं, आपको रिटर्न गिफ्ट मिलता है|

वक्ता: आपको रिटर्न गिफ्ट मिलता है| हम ईश्वर के साथ और क्या करते हैं? तूने मेरी फ़रियाद सुन ली, अब प्रसाद चढाऊंगा| ये रिटर्न गिफ्ट है हमारा| हम अहसान नहीं रखते किसी का| तुमने हमें दिया है?

सभी श्रोतागण (एक साथ): हम तुम्हें वापिस देंगे|

वक्ता: वापिस देंगे| तो ऐसों से ही कहा जा रहा है, तुम्हारे चलाने से हम नहीं चलते| लहर समुद्र से है, समुद्र लहर से नहीं है| लेने में कोई अफ़सोस मत मनाया करो| छोटा मत अनुभव किया करो| ले ही तो रहे हो वैसे भी दिन रात, और कर क्या रहे हो? कितने पैसे दे रहे हो कि हम साँस लेते हैं तो ज़रा इसकी कीमत भी अदा करें? कितने पैसे देते हो? बस एक चीज़ चाहता है समग्र, तुमसे सिर्फ एक ही मांग है| क्या? कि लो, जितना लेना है लो| तुम्हारे लिये ही है सब कुछ| लेकिन बस…?

सभी श्रोतागण (एक साथ): कृतज्ञता|

वक्ता: कृतज्ञता रहे| और कृतज्ञता में भी ये नहीं कि इतनी दफ़ा ये करो और इतनी दफ़ा वो करो| ये भाव मत रखो कि …?

सभी श्रोतागण (एक साथ): कुछ कमी है|

वक्ता: कुछ कमी रह गई है| और जो कमी रह गई है, उसको अब मैं पूरा करूँगा| बस इतनी सी मांग है अस्तित्व की; कृतज्ञता| और वो मांग भी इसलिए नहीं है कि वो अपने लिये कुछ चाहता है| वो मांग इसलिए है ताकि तुम्हें कष्ट ना हो| उसकी मांग ही यही है कि कष्ट मत अनुभव करो| ‘सफरिंग इज़ सिन|’ कष्ट ना अनुभव करो, यही मांग है बस उसकी| हम दे रहें हैं, तुम लो| तुम क्यों सीमाएं बनाते हो लेने की? जहां कहीं तुम पाओ कि नहीं मिल रहा है, तो ये मत समझना कि देने वाले ने कोई कमी रखी है| उसका अर्थ बस इतना ही है कि तुम लेने के लिये प्रस्तुत नहीं हो|

अगर तुम पीड़ा में हो, तो वो तुम्हारी अपनी करतूत है, और यही सज़ा है| हम कह रहे थे ना, सज़ा मिलती है| सजा भी वो नहीं देता| उसको तुम्हें सजा देकर क्या मिलेगा? तुम स्वयं अपने आप को सज़ा देते हो| तुम्हारी पीड़ा ही तो तुम्हारी सज़ा है| महत्वकांक्षा ही तो सजा है| तुम्हारी सारी कोशिशें ही तो सज़ा हैं| और कौन सी सज़ा होती है? कोई देवदूत नहीं उतरेगा कि आए और तुम्हें दो-चार थप्पड़ मारे| कुछ नहीं आने वाला| ये जो दिन-रात का नर्क है, जिसको कबीर कह गाएं हैं,

मरना हो तो मर जाइये, छूट जाए संसार |

ऐसी मरनी क्यों मरें, दिन में सौ-सौ बार ||

ये जो दिन में, सौ-सौ बार मरना है, इसी का नाम जहन्नुम है,  यही नर्क है, यही सज़ा है| क्या पाना है? क्या कमाना है?

श्रोता ६: जो मिल जाए|

वक्ता: उसमें पाया क्या और कमाया क्या?

श्रोता ७: सर, आपने जो बोला कि जो मिल जाए, लेते रहो| जो लेगा, जो ले रहा है, वो तो कहीं ना कहीं अहंकार ही होता है ना?

वक्ता: हां, और क्या? उसको ही मिल रहा है|

श्रोता ७: जो पीड़ा सह रहा है, वो तो अहंकार ही सह रहा है ना? इंसान तो नहीं सह रहा है?

वक्ता: इंसान अहंकार के अलावा और क्या है?

श्रोता ९: वही मैं… मैं| सर जैसे कहते हैं, ‘श्रद्धा’,जो कहते हैं ना, हैव फेथ, वो कौन कहता है?

वक्ता: अहंकार|

श्रोता १०: अहंकार| आप जब कष्ट सहते हो, आपने किसी और के अहंकार को महत्व दे दिया, और साथ-साथ अपने अहंकार को भी महत्व दे दिया, जो आपको कष्ट दे रहा है|

वक्ता: हां, हां|

श्रोता ११: तो, अंततः तो सब अहंकार ही हो गया?

वक्ता: सब वही है| सब बातें ही उससे कही जाती हैं| कहना-सुनना और किससे करोगे? आत्मा से, या परम से? वहां कोई बातचीत नहीं होती| ये कहना, ये सुनना, ये सारा लेनदेन, ये सारा पढ़ने-पढ़ाने का खेल| ये किससे, किसकी बातचीत हो रही है?

सभी श्रोतागण (एक साथ): अहंकार से अहंकार की|

श्रोता १२: सर, जब अहंकार भी स्त्रोत भी से ही निकला है, तो स्त्रोत को फिरपरम अहंकार भी तो कह सकते हैं?

वक्ता: जो कहना है कहो| उसने कभी आकर किसी को रोका है कि हमें ये न कहो? जो भी कहो, लेकिन जरा प्यार से कहो| वो देने में कोई कमी नहीं रखता है| आप आज तैयार हो जाओ|

(किसी पक्षी की अचानक से आती आवाज़ की ओर इशारा करते हुए)

वक्ता: देखो! ‘हां’ कह रहा है|

(मौन)

वक्ता: ये बात अविश्वसनीय है ना? हमने कोई पात्रता नहीं दिखाई, हमने कोई कीमत नहीं अदा की है, फिर भी एक स्रोत है जहां से सब मिल सकता है| हमारे ‘हां’ करने की देर है|

श्रोता १३: ये तो बड़ी लालच वाली बात हो गई?

वक्ता: तुम कर लो लालच| कोई दिक्कत नहीं है| जैसे हमने कहा ना कि तुम्हें लक्ष्य बनाना है, गोल बनाना है, तुम बना लो, पर फिर परम लक्ष्य बनाओ| तुम्हें लालच करना है ना? तो परम लालची हो जाओ|

श्रोता १४: भगवान लालच मंज़ूर करेगा?

वक्ता: अगर उसका लालच है| वो कहता है कि जब मैं उपलब्ध हूं, तो छोटे-मोटे लालच क्यों करते हो| जब पूर्ण-विरट मिल सकता है, तो छोटे-मोटे पर जा कर क्यों तुम्हारा मन अटकता है? उपनिषद कहते हैं, ‘विराट’| इसको समझाते हुए कहते हैं, इसके लिये एक पंक्ति है|

अणोरणीयान्महतो महीयानात्मा गुहायां निहितोSस्य जन्तोः

बड़े से बड़ा| बड़े से बड़ा, उपलब्ध है| साथ ही ये कहते हैं, छोटे से छोटा| ‘छोटे से छोटा’ मतलब? ऐसा छोटा कि वो हर जगह समाया हुआ है| रेशे-रेशे में समाया हुआ है| तो गुनाह यही है पहला, कि पूर्ण के अतिरिक्त किसी और की कामना की| तुम करो लालच, पर पूर्ण की कमाना करो ना फिर| और दूसरा गुनाह, कि देख नहीं पाए कि वो अंतरयामी है| अणु से भी छोटा है| सोचा की कौन जान पाएगा, छोटी-सी ही तो मक्कारी की है| वो सूक्ष्मतम अति सूक्ष्म है, हर जगह मौजूद है, हर तरफ उसकी निगाह है|

मैं वो करता हूं, जो तू मुझसे करवाता है|

तू रुलाए रो लें हम, तू हँसाए तो हँस लें हम|

‘अकर्ता भाव’, मालिक जो चाहेगा, सो हम करेंगे| व्यक्तिगत इच्छा नहीं है| ऐसा नहीं है कि इच्छा नहीं है| दोनों का अंतर समझिएगा| आपने अगर इच्छा का ही दमन कर दिया, तो आपने जीवन को ही कुचल डाला| आपके जो ये आम सन्यासी वैगेरह होते हैं, ये इच्छा के ही विरुद्ध खड़े हो जाते हैं| ये कहते हैं, ‘कैसी भी इच्छा पाप है| अपनी हर इच्छा को दबाओ’| दमन-शमन, यही इनकी भाषा होती है| इच्छा पाप नहीं है, व्यक्तिपरक इच्छा, वहाँ भूल है| तुम सारी इच्छाएँ करो, यदि तुम्हारी इच्छा, पूर्ण की इच्छा बन चुकी है| बड़ी से बड़ी इच्छा करो| दाएं की, बाएं की, विराट की, पूरा मैदान खुला है तुम्हारे लिये| पर वो ‘तुम्हारी’ इच्छा ना हो| इच्छा में कमी नहीं है| फिर दोहरा रहा हूं, इच्छा में चूक नहीं है| व्यक्तिगत इच्छा में चूक है|

-‘ज्ञान सेशन’ पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

सेशन देखें: https://www.youtube.com/watch?v=_Gux5K_uiSo