विवेक क्या है?

वक्ता: विवेक क्या है? विवेक, विवेक का शाब्दिक अर्थ तो भेद करना ही है; अंतर करना। लेकिन किस-किस में अंतर करना? एक अंतर ये होता है कि एक ही आयाम, एक ही डायमेंशन की दो अलग-अलग इकाईयों में तुम अंतर करो, कि X एक्सिस है और उसमें तुम अंतर कर रहे हो कि पॉजिटिव X एक्सिस पर क्या है और नेगेटिव X एक्सिस पर क्या है। ठीक है? तो एक अंतर तो ये हो गया कि काला और सफ़ेद का अंतर कर लिया| इसमें आयाम एक ही है| क्या आयाम है काले और सफ़ेद में, जब अंतर कर रहे हो? कि दो ऐसी चीज़ें हैं जो आँखों से दिखाई देती हैं, तो एक ही आयाम है| या तुमने पाप और पुण्य का अंतर कर लिया, उसमें भी आयाम एक ही है| कौन सा आयाम है उसमें? नैतिकता का, कि कुछ बातें हैं जिनको करना पाप माना गया है, कुछ बातें हैं जिनको करना पुण्य माना गया है| ऐसा करो, ऐसा ना करो | ये सारी बातें अंतर तो देती हैं, भेद तो देती हैं पर ये वास्तविक रूप से विवेक का क्षेत्र नहीं हैं |

विवेक का अर्थ होता है ये देखना कि कौन सी चीज़ है जो मन के आयाम की है, और कौन सी चीज़ है जो मनातीत है| इनमें अंतर कर पाए तो विवेक है| आदिशंकर, जो अद्वैत के आचार्य हुए हैं, उन्होंने विवेक की परिभाषा दी है – नित्य और अनित्य में भेद करना विवेक है | नित्य और अनित्य मेंभेद | नित्य माने वो जो है भी, होगा भी, जिसका समय से कोई लेना ही देना नहीं है, जो समय के पार है| ठीक है? और दूसरी चीज़ें, वस्तुएं, व्यक्ति, विचार होते हैं, जो समय में आते हैं और चले जाते हैं, उनको अनित्य कहते हैं| नित्य वो जिसका समय से कोई लेना देना नहीं है, जो कालातीत सत्य है, वो नित्य है| और वो सब कुछ जो समय की धार में है, अभी है, अभी नहीं होगा, यानि कि मानसिक है; वो सब अनित्य है|

तो एक तरीका ये है उसको देखने का, कि दो अलग-अलग आयाम हो गए, एक आयाम हुआ मन का कि क्या ये सब मानसिक है, जो बातें अभी हो रही हैं| मानसिक क्या है? मानसिक वो सब कुछ है जो द्वैतात्मक है, जहाँ पर आँखों से देखा जा रहा है, कानों से सुना जा रहा है और फिर मन से उसका विश्लेषण किया जा रहा है, यही द्वैत है | जो कुछ भी इन्द्रियों से पकड़ते हो, उसी का नाम द्वैत है|

विवेक का अर्थ हुआ ये देखना कि मैं जिन बातों को महत्वपूर्ण माने बैठा हूँ, वो सब इन्द्रियगत हैं, मानसिक हैं, समय की धारा की हैं या फिर वो सत्य हैं| और ये दो अलग-अलग आयाम हैं| यहाँ एक ही आयाम में भेद नहीं किया जा रहा है| यहाँ कहा जा रहा है कि तुम चाहे काले को महत्व दो, चाहे सफ़ेद को महत्व दो, बात एक ही है क्योंकि दोनों एक ही आयाम के हैं| ठीक है? तुम चाहे पकड़ने को महत्व दो, चाहे छोड़ने को महत्व दो, बात एक ही है क्योंकि वो एक ही आयाम के हैं| तो ये विवेक का प्रश्न ही नहीं है| क्योंकि विवेक का अर्थ है वास्तविक रूप से अंतर कर पाना और वास्तविक रूप से अंतर ये होता है कि जो बात मेरे सामने है, वो मानसिक है या सत्य है|

सत्य क्या? सत्य वो जो स्वयं अपने पर निर्भर है| सत्य में और द्वैत में यहीं अंतर है| कि द्वैत में जो कुछ है उसे अपने विपरीत पर निर्भर होना पड़ता है| काले को सफ़ेद पर निर्भर होना पड़ेगा| अगर सफ़ेद न हो तो काला नहीं दिखाई दे सकता| काला न हो तो सफ़ेद नहीं दिखाई दे सकता| अगर सब सफ़ेद ही सफ़ेद हो जाए तो तुम्हें सफ़ेद दिखना बंद हो जाएगा| तुम जो लिखते हो ब्लैक-बोर्ड पर वो इसी कारण दिखाई देता है क्योंकि..

श्रोता १: पीछे काला है|

वक्ता: ठीक है ना? तो ये द्वैत की दुनिया है| यहाँ पर कुछ भी सत्य नहीं है, क्योंकि काला वो जो सफ़ेद का विपरीत है, सफ़ेद वो जो काले का विपरीत है| और पूछो कि काला और सफ़ेद दोनों क्या, तो इसका कोई उत्तर ही नहीं मिलेगा| इन्द्रियां हमें जो भी कुछ दिखाती हैं, वो द्वैत की दुनिया का ही होता है| उसको जानने वालों ने सत्य नहीं माना है| इसलिए उन्होंने इन्द्रियों और मन की दुनिया को एक आयाम में रखा है और सत्य को दूसरे आयाम में रखा है| और विवेक का अर्थ है- इन दोनों आयामों को अलग-अलग देख पाना| साफ-साफ देख पाना कि क्या है जो बस अभी है, अभी नहीं रहेगा, क्या है जो अपने होने के लिए, अपने विपरीत पर निर्भर करता है| सत्य अपने होने के लिए अपने विपरीत पर निर्भर नहीं करता | सत्य का कोई विपरीत होता ही नहीं है| सत्य पराश्रित नहीं होता| सत्य है| उसे किसी दूसरे के समर्थन की, सहारे की, प्रमाण की, कोई आवश्यकता नहीं होती है, वो बस होता है| बात समझ में आ रही है? तो विवेक ये हैं कि मैं जानूं कि क्या सत्य है और क्या सत्य नहीं है| मैं जानूं, क्या है जो मात्र मन में उठ रहा है, कल्पना है, विचारणा है और क्या है जो उस कल्पना का आधारभूत सत्य है, स्रोत ही है समस्त कल्पनाओं का|

अब इसको अगर और सपाट शब्दों में कहूं तो, ‘ब्रह्म को जगत से पृथक जानना ही विवेक है, सत्य को असत्य से अलग जानना ही विवेक है’| बहक न जाना| हम कब असत्य को सत्य मान लेते हैं? महत्व दे कर| तुम्हारे सामने कुछ है, वो तुम्हें बहुत आकर्षित कर रहा है, तुमने उसे खूब महत्व दे दिया| जब तुम किसी चीज़ को बहुत महत्व दे रहे हो, खिंचे चले जा रहे हो, आकर्षित हुए जा रहे हो, तो इसका अर्थ क्या है? तुम उसको क्या मान रहे हो? सत्य मान रहे हो| ये अविवेक है कि जो सत्य है नहीं, तुम उसकी ओर खिंचे जा रहे हो, तुम उसको महत्व दे रहे हो | तुमने उसको बड़ी जगह दे दी| ये अविवेक है | विवेक का अर्थ है, जो सत्य नहीं है, उसको जानूँगा कि सत्य नहीं है| सत्य क्या? जिसका समय कुछ नहीं बिगाड़ सकता| सत्य क्या? जो अपने होने के लिए अपने विपरीत पर आश्रित नहीं है| समझ रहे हो बात को? ये है विवेक|

तो जब महावीर कह रहे हैं कि विवेक से खाओ, विवेक से चलो, तो क्या आशय हुआ उनका? उनका आशय हुआ कि तुम्हारा चलना सत्य की दिशा में रहे, तुम्हारा बोलना सत्य की दिशा में रहे| और सत्य की दिशा कैसे पता चलेगी? कहना तो ठीक है कि कह दिया कि सत्य की दिशा में चलो| विवेक का अर्थ हुआ- सत्य की दिशा में चलो| पर बतायेगा कौन कि सत्य की क्या दिशा है? स्वयं सत्य बताएगा| क्योंकि सत्य के अलावा और कोई बताने के लिए है ही नहीं कि उसकी दिशा क्या है| विवेक इसलिए आता है, श्रद्धा से| स्वयं सत्य से पूछना पड़ता है कि अपने आने का, अपने तक पहुँचने का रास्ता बता दो, क्योंकि मन तो सत्य तक का रास्ता नहीं जान पायेगा| बताओ क्यों? क्योंकि मन द्वैत के आयाम पर, मान लो X एक्सिस पर है और सत्य का कोई और ही आयाम| जिसने अपने आप को X,Y के तल पर कैद कर रखा हो, वो किसी और आयाम में कैसे पहुँचेगा? समझ रहे हो बात को? तो विवेक बहुत गहरी बात है| विवेक का अर्थ ये नहीं है कि ज़रा देख कर पांव रखना कि कहीं गड्ढा न हो, कि पानी कहाँ है और ज़मीन कहाँ है| इसमें अंतर करने का नाम विवेक नहीं है| विवेक में अंतर निश्चित रूप से किया जाता है, पर वो अंतर इस बात का नहीं होता है कि तुम्हारे सामने जो खाना रखा है वो घी से बना है या तेल से बना है| वो अंतर बहुत सूक्ष्म अंतर है| बहुत महत्वपूर्ण चीज़ है वो अंतर करना, वो ये छोटी-मोटी बातों में नहीं है|

वो अंतर क्या है? नित्य और अनित्य का भेद करना, सत्य और असत्य का भेद करना, वास्तविक और छवि में भेद कर पाना| जो ये कर पाए, वो विवेकी कहलाता है, कि बड़ा विवेकवान आदमी है| आम आदमी कल्पनाओं में जीता है| जो कल्पनाओं में जिये, वो विवेकी नहीं है| जो छविओं में जिये, वो विवेकी नहीं है| जो अपने मतों में जिये, धारणाओं में कैद रहे, वो विवेकी नहीं हो सकता| जो किसी भी ऐसी वस्तु, ऐसी ऑब्जेक्ट से आकर्षित है या तादात्मय बैठा लिया है, जिसका आना-जाना पक्का है, अभी है, अभी नहीं है, जो कल्पना का विषय है, जिसने किसी भी ऐसी वस्तु से आकर्षण या तादात्मय बैठा लिया है, वो व्यक्ति विवेकी नहीं हो सकता| ये बात समझ में आ रही है? तो ये सामने एक कार जा रही है हमारे, हम हाईवे पर हैं| तुम्हें वो कार खींच रही है अपनी ओर, नया मॉडल है, खूबसूरत रंग है और तुम खिंचे चले जा रहे हो| ये क्या हुआ?

श्रोता २: खिंचे चले जा रहे हैं तो ये असत्य है |

वक्ता: वो कार न दिखती तो क्या खिंचते उसकी ओर ?

श्रोता २: नहीं |

वक्ता: वो कार तुम तक कैसे पहुँची? इन्द्रियों के माध्यम से |

श्रोता २: मन से |

वक्ता: जब भी कुछ तुम तक इन्द्रियों के माध्यम से पहुँचे और तुम्हें जकड़ ले, तो समझ लेना कि क्या हो रहा है, अविवेक| ‘ये विवेक की बात नहीं हो सकती, ये इन्द्रियों तक ही तो पहुँचा है मुझ तक’| अगर तुम्हारे मन में प्रेम किसी व्यक्ति को देख कर उठता है, तो क्या वो वास्तविक प्रेम है? क्या ये विवेक है?

श्रोता ३: नहीं, देख के अगर प्रेम होता है, तो नहीं है|

वक्ता: नहीं है ना | क्योंकि ये बात पूरी तरह से अब इन्द्रियगत हो गई है| दिखा, तो मन मचल उठा, या कि उसकी याद आई तो मन मचल उठा | दोनों ही स्थितियों में हुआ क्या है? एक मानसिक तरंग है ये, एक प्रकार का ये विचलन ही है |कि या तो स्मृति ने, या दिखने ने, या सुनने ने मन में एक हलचल पैदा कर दी |

श्रोता ३: विचार गया और सब ख़त्म|

वक्ता: हाँ, तो ये विवेक नहीं हो सकता, इसको प्रेम मत समझ लेना| समझ में आ रही है बात? विवेक का अर्थ है उसके साथ रहना, लगातार, जिसको आँखें देख नहीं सकती, जिसको कान सुन नहीं सकते, जिसकी बात ज़बान नहीं कर सकती | लगातार उस आयाम से जुड़े रहने का नाम विवेक है कि मुझे तो बस वही पसंद है| कौन?

‘जो मन का विषय नहीं है, जो आँखों का विषय नहीं है, जो ज़बान का या छूने का विषय नहीं है, पर फिर भी वो सबका स्रोत है, मुझे तो वो ही पसंद है, मैं उसी के साथ रहता हूँ’; ये है विवेक| ‘और उसके अलावा कुछ और आता है, तो हमें नहीं भाता है| सत्य के अलावा तुम हमारे सामने कुछ भी लाओगे, हमें रुचता ही नहीं है’, ये विवेक हुआ| समझ में आ रही है बात? सत्य के अलावा तुम हमारे सामने कुछ भी लाओ, हम मचलेंगे नहीं, हम लालाहित नहीं हो जायेंगे कि छूने को मिल जाये, कि पा लें, कि इकट्ठा कर लें| बात समझ में आ रही है?

श्रोता ४: जी सर |

वक्ता: क्या मचलता हुआ मन, विवेकी मन हो सकता है?

श्रोता ३: नहीं |

वक्ता: नहीं ना|

श्रोता ४: नही | सर, ये आपने एक शब्द अभी उपयोग किया था, ‘मनातीत’| इसका अर्थ क्या है?

वक्ता: ‘मनातीत’ मतलब, मन जिस आयाम में विचरता रहता है, उस आयाम से आगे| मन के अतीत, मन से आगे| मन से आगे| मन तो मात्र स्मृतियों में, कल्पनाओं में और उम्मीदों में ही विचरता है न?

श्रोता ४: जी सर|

वक्ता: तो वो जो ना भूत में बैठा है, न भविष्य में मिल जाना है| जो सिर्फ वर्तमान है, उसमें रहना विवेक है कि मुझे तो वही पसंद है|

श्रोता २: जो इस क्षण में है, वही सत्य है |

वक्ता: पर जो इस क्षण में है, ये बात सैद्धांतिक रूप से कहने के लिए तो ठीक है| लेकिन इस क्षण में क्या है? तुम ये भी कह सकते हो कि इस क्षण में मेरे सामने गुलाब जामुन हैं और मुझे बहुत पसंद हैं |

श्रोता २: जी, कह सकते हैं|

वक्ता: कह सकते हो न? तो वो बात पारिभाषिक रूप से ठीक होते हुए भी काम की नहीं है तुम्हारे| तुम्हारे लिए काम की यही बात है कि जब भी कभी किसी वस्तु को या व्यक्ति को या विचार को महत्व दे रहे हो, तो ये दो बातें जाँच लेना| पहली बात- क्या ये इन्द्रियों के माध्यम से मुझ तक पहुँचता है? दूसरी बात- क्या मेरा इससे जुड़ाव तब भी रहेगा जब मन हलचल में नहीं रहेगा, या जुड़ाव सिर्फ तब है जब ये आँखों से दिख रहा है या जब इसकी याद आ रही है?

श्रोता ३: यानी जब इन्द्रियां अपना कार्य….

वक्ता: न भी कर रही हों क्या तब भी, क्या तब भी ये मौजूद रह सकता है मेरे साथ? अगर नहीं रह सकता, तो समझ लेना कि उसके साथ होना कोई विवेकपूर्ण बात नहीं है| और तीसरी बात कि क्या समय इसको मिटा देगा| यदि समय मिटा सकता है तो फिर उस विषय में कुछ रखा नहीं है| जो कुछ भी समय तुमसे छीन सकता है, विवेक इसी में है कि उससे जुड़ा ही न जाए| विवेक का अर्थ है वो पा लेना, जिसे समय तुमसे छीन नहीं सकता| यही विवेक है| अब तुम जा रहे हो शिविर में, दो बातें हो सकती हैं| पहली ये कि तुम ये चार दिन बड़े मज़े में गुजारो| ठीक है? और जब चार दिन ख़त्म तो जो हो रहा था वो प्रक्रिया भी ख़त्म | एक तो ये सम्भावना है और दूसरी सम्भावना है कि वहाँ जो तुम कुछ ऐसा पाकर लौटो जो समय तुमसे छीन ही नहीं सकता| विवेक कहाँ है?

श्रोता ३: वो पाने में जो समय हमसे छीन नहीं सकता |

वक्ता: है ना? तो एक आदमी तो वो होगा जो कहेगा चलो चार दिन मज़े कर लो और एक दूसरा आदमी होगा, जो कहेगा मैं चार दिन मज़े करने नहीं आया हूँ| मुझे वो सत्य चाहिए, जो चार दिन क्या, सदा ही अब मेरे साथ रहेगा| ऐसा कुछ भी अगर मुझे मिला जो चौथे दिन के बाद नहीं रहेगा तो फिर तो मैं भिखारी ही लौटा, खाली हाथ गया था खाली हाथ वापस आ गया| समझ रहे हो न बात को? अगर तुम वहाँ जा कर उदाहरण के लिए पेड़ों से, और पौधों से और जितने शिविर के बाकि लोग हैं, तुम उन्हीं के साथ मचलते रहे और आकर्षित होते रहे, तो मुझे ये बताओ चौथे दिन के बाद क्या होना है? वो लोग रहेंगे? वो पहाड़ रहेगा? वो जगह रहेगी? वो जानवर, वो चिड़ियाँ, वो सब जो वहाँ हैं वो रहेंगे?

श्रोता ३: नहीं |

वक्ता: और तुमने चार दिन किस में बिता दिए?

श्रोता २: मज़े में |

वक्ता: ऐसी चीज़ों के साथ होने में जिनको समय तुमसे छीन लेगा, क्या ये विवेक का काम था?

श्रोता ३: नहीं |

वक्ता: यही अविवेक कहलाता है| कि जो मुझसे समय छीन लेगा मैं फालतू ही उसके साथ जुड़ गया| और एक दूसरा तरीका भी है कि मन के आयाम से हट कर के किसी ऐसी जगह की तुमको कुछ झलक सी मिल जाए, कुछ इशारा सा मिल जाए, जो पक्की है, जो कभी हिलती ही नहीं| जहाँ कुछ परिवर्तनीय नहीं है, जिसको एक बार जान लिया, एक बार पा लिया, तो बदल ही गए| तब समझो कि तुम्हारे लिए ये चार दिन किसी काम के रहे| दो तरह के लोग लौटेंगे वहाँ से| एक वो जो अपने साथ कुछ ले कर के आयेंगे, और अपने साथ क्या ले कर के आते हैं लोग, लोग अपने साथ बहुत सारा ज्ञान ले कर के आयेंगे, जितनी वहाँ किताबें दी जायेंगी, उन किताबों का पूरा इतना ढेर ले कर के आयेंगे, बहुत सारी यादें और बहुत सारे नये फ़ोन नंबर ले कर के आयेंगे, और दो-दो सौ, चार-चार सौ फोटोग्राफ्स ले कर के आयेंगे| तो एक तो तरीका ये है कि तुम अपने साथ कुछ ले कर के आ रहे हो और दूसरा तरीका ये है कि तुम स्वयं ही बदल कर आ रहे हो| इसमें से क्या है जो तुम्हारे साथ रहेगा और क्या है जो नहीं रहेगा?

श्रोता ३: जो बदल कर आ रहे हैं वो |

वक्ता: है ना? और जिस परिवर्तन की जो बात कर रहा हूँ, ये ऐसा नहीं है कि पुरानी आदत हट कर कोई नई आदत आ गयी| पुरानी आदत बदली और नई आदत उसके एवज में, परिपूरक के रूप में आ | ना, वास्तविक बदलाव वो है जिसमें पुराना ढर्रा तो हटे, लेकिन नया ढर्रा ना आने पाये| अगर पुराना ढर्रा हट कर नया ढर्रा आ गया, तो कोई बदलाव नहीं हुआ है| वास्तविक बदलाव का अर्थ ये है, कि जब हम कह रहे हैं कि विवेक इसमें है कि मैं बदलूँ, विवेक इसमें है कि मैं बदलूँ, तो मेरे बदलने कामतलब ये नहीं है कि पहले मैं एक तरीक़े से सोचता था और अब मैं दूसरे तरीक़े से सोच रहा हूँ | इसका अर्थ ये है कि मेरे भीतर जो बैठा हुआ था, जो लगातार सोचने को व्याकुल रहता था, वो शान्त हो गया है| ऐसा नहीं हुआ है कि पहले एक प्रकार की मानसिकता थी, और अब दूसरे प्रकार की हो गयी है| ऐसा नहीं है| मुझे मानसिकताओं से ही मुक्ति मिल गयी है| बात समझ में आ रही है?

तो वास्तविक बदलाव है, हल्का हो जाना, कि मैं जितना बोझ ले कर चलता था, वो सारा बोझ मैं वहाँ पर छोड़ आया| तो इसी बात को तुम ऐसे भी कह सकते हो कि दो तरीक़े के लोग हैं, एक जो वहाँ से कुछ ले कर के आयेंगे और दूसरे जो वहाँ पर कुछ छोड़ कर आयेंगे| अब ये तुम्हें देखना है कि तुम्हें क्या करना है| ले कर आना तो बड़ा आसान है, पर छोड़ना बड़ा मुश्किल है| और विवेक इसी में है कि असत्य को छोड़ दिया| सत्य को वास्तव में पाना नहीं होता है, सत्य तो मौजूद ही है| उसको पाना कैसा है? असत्य को छोड़ना होता है| मन पर जो सब कचड़ा एकत्रित होता है न, उस कचड़े को त्याग देना होता है, विसर्जित कर देना होता है| ‘तू जा, तू कचड़ा है, मुझे तेरी ज़रूरत नहीं’- ये विवेक है| जो अभी बातचीत की है, अब चौथे दिन के अंत में पूछूंगा कि कुछ ले कर आ रहे हो, या छोड़ कर आ रहे हो| और जवाब ईमानदारी से देना, ये नहीं कि पहले से ही पता है कि क्या बोलना है, तो बोल दिया| ये सब नहीं |

श्रोता १: सर, वास्तव में जब मैं वहाँ से चला था तो अंशुमान सर ने मुझे पहली बार बोला था कि मैं तुम्हें ऐसा सुझाव दूँगा जिससे की तुम्हारी ज़िंदगी में थोड़ा सा परिवर्तन आएगा| मैंने कहा किमेरी उम्र लगभग अट्ठाईस साल है, अट्ठाईस साल में मैंने कोशिश ही नहीं की परिवर्तित होने की, तो अब कैसे हो सकता हूँ| तो उन्होंने कहा कि जो परिवर्तित होना ही नहीं चाहता वो कैसे हो जायेगा| तो मैंने कहा कि ठीक है मैं अपने आप को चुनौती देता हूँ इस बार कि मुझे परिवर्तित होना है| तो फिर तब उन्होंने सुझाव दिया आपके साथ आने का |

वक्ता: अच्छा किया उन्होंने| यहाँ आए हो, लेकिन फ़िर कह रहा हूँ कि किसी तलाश में मत रहना| मन ऐसा चालाक होता है न कि तुम उससे कहोगे कि अपनी पुरानी चीज़ अलग रख दे, तो कहेगा कि चलो ठीक है, रख दूँगा, पर कोई नई चीज़ दे दो| उसे कुछ चाहिए पकड़ने के लिए|

तो किसी नये की तलाश में मत रहना, कि कुछ नया मिल जायेगा| बस इतना करना कि जो अभी तुम्हारे पास है, जिसको तुम अपना होना कहते हो, जिसको तुम अपनी सत्ता कहते हो, जिसको तुम कहते हो कि ये मेरा जिंदगी के प्रति नज़रिया है,उसको परखने के लिए ईमानदार रहना| मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि बिना उसको परखे ही त्याग दो| मैं कह रहा हूँ कि दिन भर लगातार ऐसी स्थितियां बना करेंगी जिसमें तुम्हारे सामने ईमानदारी से आत्मविचार, अपनी ओर देखने का समय रहेगा| उसका ठीक उपयोग करना| और जब लगे कि कुछ ऐसा पकड़ रखा है जिसकी कोई कीमत नहीं, तो उसे फिर त्यागने में संकोच ही मत करना| इतना ही करना है बस, और कोई बड़ा खेल नहीं है, बहुत आसान है| जब भी दिखाई दे कि फालतू ही किसी बात को अट्ठाईस साल से पकड़े हुए था, तो कोई बात नहीं, इंसान हैं, भूल हो गई थी, कुछ मान बैठे थे, संस्कार हैं पुराने, कंडीशनिंग, अब अगर दिख रहा है कि ये बात खरी नहीं है, तो हम छोड़ देंगे| इसमें कोई शर्म की बात नहीं है| है ना? लोगों को ये भी एक सम्मान का मुद्दा लगता है, ठसक-अहंकार का मुद्दा लगता है, कि ‘मेरे विचार’, ‘मेरा नज़रिया’, मेरी ‘धारणाएं’, ऐसे कैसे मैं इनको गलत मान लूँ, ऐसे कैसे मैं इनको नकली मान लूँ| ऐसे मत रहना| ईमानदारी से परखना और फिर जो हो उसे होने देना; यही विवेक है|

-‘संवाद’ पर आधारित| स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं|

संवाद देखें: https://www.youtube.com/watch?v=JSvgS4UOLSo